सुंदरता का बाजार कितना जायज, कितना जरूरी!

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बीस वर्षीय मानुषी ने सभी प्रतिस्पर्धियों को पीछे छोड़ खिताब अपने नाम कर लिया। मानुषी कहती हैं कि मैं अपनी मां के अत्यधिक करीब रही हूं। सोचती हूं कि मुझे मिले इस सम्मान की पहली हकदार मेरी मां है। सभी मांएं अपने बच्चों के लिए बहुत कुछ कुर्बान करती हैं।

मानुषी छिल्लर (फोटोसाभार- सोशल मीडिया)
मानुषी छिल्लर (फोटोसाभार- सोशल मीडिया)
 वह समाजसेवा के कार्यों से भी जु़ड़ी रही हैं। उन्होंने हाइजीन से संबंधित एक कैंपेन में करीब 5000 महिलाओं को जागरूक किया था। भारत के लिए साल 1966 में पहली बार रीता फारिया ने मिस वर्ल्ड खिताब जीता था।

सौंदर्य प्रतियोगिताएं दरअसल बाजार की उसी योजना का हिस्सा हैं, जिनके चेहरे इस्तेमाल कर स्त्री प्रसाधनों का अरबों-खरबों का बाजार पूरी दुनिया पर छाया हुआ है। 

अक्सर कहा जाता है कि कामयाबी के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है, जबकि कामयाबी अपनी मेहनत और प्रतिभा से मिलती है, न कि किसी का हाथ होने से। हाथ-साथ देने वाला तो एक निमित्त-माध्यम मात्र होता है। यही बात अमिताभ बच्चन पर लागू होती है, प्रियंका चोपड़ा पर और मिस वर्ल्ड मानुषी पर भी। गौरतलब है कि चीन के सान्या शहर में बीती रात मिस इंडिया मानुषी छिल्लर को इस साल की मिस व‌र्ल्ड घोषित किया गया। स्पर्धा में दुनियाभर की 118 सुंदरियों ने हिस्सा लिया था।

बीस वर्षीय मानुषी ने सभी प्रतिस्पर्धियों को पीछे छोड़ खिताब अपने नाम कर लिया। मानुषी कहती हैं कि मैं अपनी मां के अत्यधिक करीब रही हूं। सोचती हूं कि मुझे मिले इस सम्मान की पहली हकदार मेरी मां है। सभी मांएं अपने बच्चों के लिए बहुत कुछ कुर्बान करती हैं। इसलिए मेरा मानना है कि मां ही वह शख्स है, जिसे सर्वोच्च सम्मान मिलना चाहिए। मानुषी के इसी जवाब ने उन्हें खिताब दिला दिया। मानुषी हरियाणा के झज्जर जिले की हैं। उनके माता-पिता डॉक्टर हैं। वह सपरिवार अब दिल्ली में रहती हैं। वे सोनीपत के बीपीएस मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस सेकंड ईयर में हैं और कार्डिएक सर्जन बनना चाहती हैं।

उनका कहना है कि बचपन से ही वह इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए मचलती रहती थीं। वह समाजसेवा के कार्यों से भी जु़ड़ी रही हैं। उन्होंने हाइजीन से संबंधित एक कैंपेन में करीब 5000 महिलाओं को जागरूक किया था। भारत के लिए साल 1966 में पहली बार रीता फारिया ने मिस वर्ल्ड खिताब जीता था। इसके बाद साल 1994 में ऐश्वर्या राय, 1997 में डायना हेडन, 1999 में युक्ता मुखी और साल 2000 में प्रियंका चोपड़ा ने यह खिताब अपने नाम किया। अब 17 साल बाद मानुषी छिल्लर मिस वर्ल्ड 2017 बनी हैं।

सुरेश घनगस की एक कहानी है - 'शार्टकट'। उसमें सवाल उठाया जाता है कि बाजार और व्यावसायिकता के दबावों से मुक्त होकर यदि स्त्री आदमी के हाथों का खिलौना बनी रहेगी तो समाज की गाड़ी पटरी पर कैसे चलेगी? लेकिन यह सवाल हमे सच के दूसरे पहलू से भी सुपरिचित कराता है। मानुषी अपनी मां को श्रेय दें या पिता को, उनके श्रेय देने से भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थितियों का सच नहीं बदल जाता है। जब भी इस तरह प्रोग्राम आयोजित है, उनके पीछे अथाह पैसे की पैरोकारी होती है।

सवाल उठता है कि कहां से आता है वह पैसा, और कौन लोग हैं, जो इस तरह के कार्यक्रमों पर तालियां बचाते हैं। सौंदर्य प्रतियोगिताएं दरअसल बाजार की उसी योजना का हिस्सा हैं, जिनके चेहरे इस्तेमाल कर स्त्री प्रसाधनों का अरबों-खरबों का बाजार पूरी दुनिया पर छाया हुआ है। इस मसले के एक एकदम भिन्न दूसरे पहलू पर रोशनी डालती हुई रोशनी सिन्हा लिखती हैं कि सरकारी तथा निजी क्षेत्र की कुछ उच्च पदस्थ महिला अधिकारियों पर गौर करें तो इन क्षेत्रों के जेंडर पूर्वाग्रहों तथा पुरुष प्रधान वातावरण के अलावा पारिवारिक ताना-बाना भी उनकी जकड़बंदी की एक बड़ी वजह नजर आता है।

निजी क्षेत्र की महिला अधिकारियों के आंकड़े आ चुके हैं और इसमें उनकी भागीदारी मात्र 4 या 5 प्रतिशत पाई गई है। आईएएस या आइपीएस जैसे पदों पर भी महिलाओं की यही है। कई सैंपल सर्वे और विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा कराए गए सर्वेक्षण नतीजों में भी दर्शाया गया कि यदि आप बच्चा चाहती हैं तो उंचे करियर का ख्वाब देखना भूल जाइए। सवाल है कि यदि बच्चों का पालन-पोषण स्त्री और पुरुष दोनों की जिम्मेदारी समझा जाता तो क्या इस सुखद एहसास और अनुभूति का नुकसान सिर्फ औरत के हिस्से आता? आखिर वजह क्या है जो 10 वीं, 12 वीं में बाजी मारने की ख़बरों के बाद उच्च शिक्षा में लड़कियां पिछड़ जाती हैं? और तो और, यह दायरा पार करके अगर वे आगे भी बढ़ जाएं तो फिर उच्च पद-प्रतिष्ठा वाली नौकरियों में वे और पिछड़ जाती हैं। जाहिर है कि परिवार के अंदर स्त्री की भूमिका की और ज्यादा पड़ताल जरूरी है।

सौंदर्य प्रतियोगिताओं के सच से एक सीधा सा सवाल जुड़ा हुआ है कि क्या कभी बुजुर्ग महिलाओं की भी सौंदर्य प्रतियोगिता होती है। नहीं, तो क्यों? बस, इन प्रश्नों के भीतर मर्दवादी बाजार की कुचेष्टा छिपी है। ऐसे आयोजन क्यों स्त्रियों के देह का प्रदर्शन करते रहते हैं। कैटवॉक क्या है? दरअसल हमारे देश में ही नहीं, पूरी दुनिया में स्त्रियों की स्थिति अंतर्विरोधों से भरी हुई है। बेरोजगारी और बाजार की चमक-दमक नई उम्र की लड़कियों को स्त्री विरोधी समाज की नुमायश में खींच ले जाती है। जिसे शोहरत कहा जाता है, वह और कुछ नहीं, बाजार का वह जहरबाद है, जो बड़ी संख्या में प्रतिभा संपन्न बालिकाओं को दिखावे की दुनिया में उतार कर अपने व्यवसाय का कद ऊंचा करने में जुटा है। किसी बच्चे को इस सच से कन्विंस करने की कोशिश करिए, फिर देखिए कि वह किस तरह दुश्मन भाव से उछल जाता है। जो घुट्टी नई पीढ़ी को पिलाई जा रही है, आने वाले वक्त में यह पूरे समाज के लिए भारी पड़ेगी। सुंदर होने का मतलब बाजार का खिलौना होना नहीं है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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