बिहार के एक छोटे से कस्बे का लड़का बन गया अंतर्राष्ट्रीय कंपनी का मालिक

अतुल चाहते तो मोटी-तगड़ी तनख्वाह पर नौकरी पा सकते थे, लेकिन उन्होंने लीक से हटकर चलने का फैसला लिया और बन गये एक कामयाब उद्यमी।

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पहली बार जब अतुल ने लैब में स्टूडेंट्स को मेंढक की चीरफाड़ करते देखा तो गश खाकर बेहोश हो गये। इसी वाकये के बाद अतुल ने डॉक्टर बनने का इरादा छोड़ दिया, लेकिन अतुल की कमजोरी या नाकामयाबी उन्हें बाद में इतना कामयाब उद्यमी बना देगी ये शायद उन्होंने खुद भी नहीं सोचा था।

आईटी कंपनी शुरू करने वाले पहले दलित उद्यमियों में एक हैं बिहार के अतुल पासवान। इतना ही नहीं उन्होंने भारत के बाहर जाकर काम किया और जापान जैसे विकसित देश में भारत की ताकत और तकनीकी श्रमता का लोहा मनवाया। अतुल चाहते तो मोटी-तगड़ी तनख्वाह पर नौकरी पा सकते थे लेकिन उन्होंने लीक से हटकर चलने का फैसला लिया और उद्यमी बने। उनकी कामयाबी की कहानी लोगों के सामने प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत बनकर खड़ी है। 

सपने देखना और सफल होने की ख्वाइश रखना अच्छी बात है, लेकिन उन्हें पूरा करने का माद्दा विरलों में ही होता है। बिहार के सिवान जिले के अतुल पासवान ने बचपन से ही डॉक्टर बनने का सपना देखा था, लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि डॉक्टरी के लिए चीरफाड़ भी करनी पड़ती है। पहली बार जब अतुल ने लैब में स्टूडेंट्स को मेंढक की चीरफाड़ करते देखा तो गश खाकर बेहोश हो गये। इसी वाकये के बाद अतुल ने डॉक्टर बनने का इरादा छोड़ दिया, लेकिन अतुल की कमजोरी या नाकामयाबी उन्हें बाद में इतना कामयाब उद्यमी बना देगी ये शायद उन्होंने खुद भी नहीं सोचा था।

दिल्ली ने दिखाई नयी राह

इसी दौरान उनके एक दोस्त ने उन्हें बताया कि दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में फॉरेन लैंग्वेज में डिग्री कोर्स चलता है। इस कोर्स के जरिये उन्हें विदेश जाने का अवसर मिल सकता है। अतुल ने जापानी भाषा में ग्रेजुएशन के लिए एडमिशन टेस्ट दिया और सलेक्ट हो गए, लेकिन उनके लिए सबसे बड़ी समस्या थी अंग्रेजी। बिना अंग्रेजी के पाठ्यक्रम पूरा करना मुमकिन नहीं था और अतुल की पूरी स्कूली शिक्षा हिन्दी में ही हुई थी। लेकिन कहते हैं, न जहाँ चाह वहाँ राह, अतुल ने दक्षिण भारत से जेएनयू में पढ़ने आये विद्यार्थियों से अंग्रेज़ी सीखी और इसी अंग्रेजी के ज़रिये जापानी भाषा की पढ़ाई पूरी की। 1997 में उनका ग्रेजुएशन पूरा हुआ। अब तक उन्हें अहसास हो चुका था कि केवल विदेशी भाषा के ज्ञान से उनका कैरियर आजीवन सुरक्षित नहीं रह सकता। उन्होंने एमबीए करने का फैसला लिया और पुदुच्चेरी यानी पहले पॉन्डिचेरी यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। पॉण्डिचेरी में एमबीए की पढ़ाई के दौरान उन्हें सॉफ्टवेयर की दुनिया को करीब से जानने का मौका मिला और आईटी इंडस्ट्री में कर्मचारियों को मिलने वाली तगड़ी तनख्वाह ने उन्हें काफी आकर्षित भी किया। इंजीनियरिंग की डिग्री के बिना इस क्षेत्र में प्रवेश पाना आसान नहीं था। अतुल के विदेशी भाषा के ज्ञान और एमबीए की डिग्री ने इस कमी को पूरा किया और उन्हें जापान की एक बहुत बड़ी आईटी कंपनी फुजित्सु में नौकरी मिल गई।

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जापान में रहकर अतुल को यह एहसास हुआ कि भारत की बड़ी-बड़ी आईटी कंपनियाँ भी जापान में इसलिए बिज़नेस नहीं कर पाईं क्योंकि उन्हें जापानी भाषा बोलने वाले इंजीनियर्स नहीं मिल पा रहे थे। इसी कारण भारत का सॉफ्टवेयर उद्योग अधिकतर अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में सक्रिय है जहाँ इंग्लिश कॉमन भाषा है। अतुल ने यह भी पाया कि जापान का ‘राष्ट्रवाद’ कुछ ऐसा है कि वहां के लोग और वहां की ज्यादातर कम्पनियां विदेशी आयात में यकीन नहीं करती हैं। जापान के बाज़ार को समझने के बाद अतुल ने तय किया कि वे जापान के बाज़ार में पैर जमाने वाली आईटी कंपनी शुरू करेंगे।

साल 2005 के अंत में अतुल ने अपनी कंपनी ‘इंडो सकुरा’ की स्थापना की। ‘इंडो सकुरा’ एक फूल का नाम है, जो कि जापान में ज्यादा होता है। मूलतः सुकरा फूल है और ‘इंडो सकुरा’ इसी फूल की एक किस्म। बड़ी बात ये है, कि जापान में अतुल की प्रतिस्पर्धा में कोई नहीं था, इसी वजह से उनका कारोबार चल निकला। 2006 में उन्होंने भारत की आईटी राजधानी कहे जाने वाले बैंगलोर में अपना लोकल ऑफिस खोला। लेकिन यहाँ भी वही दिक्कत आई– जापानी भाषा। उन्होंने अपने इंजीनियर्स को जापानी भाषा में पारंगत करने के लिए एक तरीका निकाला। एक ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू किया गया, जिसमें उनका जापान की कंपनी ओमरान के साथ टाई-अप हुआ। इस प्रोग्राम के तहत ओमरान कुछ इंजीनियर्स को जापानी भाषा की बेस्ट ट्रेनिंग देती थी और ट्रेन्ड इंजीनियर्स को दोनों कंपनीज़ आधे-आधे बाँट लेती थी। अतुल का काम आसान होता जा रहा था, लेकिन उन्हें क्या पता था कि मुश्किलें तो अगले मोड़ पर उनकी राह तक रही थी।

साल 2008 अतुल के लिए मुसीबतों वाला रहा। एक कंपनी के लिए सॉफ्टवेयर बनाने में भाषा की विविधता की कारण इंडो सकुरा के इंजीनियर्स से गलती हो गई। जैसा सॉफ्टवेयर क्लाईंट चाहते थे वैसा नहीं बन पाया। क्लाईंट का काफी समय और पैसा उस सॉफ्टवेयर को बनवाने में खर्च हो गया था, जिसका उन्हें कोई फल भी नहीं मिला। इसीलिए क्लाईंट ने अतुल को कोर्ट में घसीटने की धमकी दे दी। कानून के पचड़े में फंसने पर हर्जाने की बड़ी रकम भी देनी पड़ सकती थी, अतुल के लिये ये कतई मुनासिब नहीं था। किसी तरह समझौता हुआ और अतुल को अपना प्रॉफ़िट छोडना पड़ा।

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इतना बड़ा नुकसान अतुल के लिये किसी सदमे से कम नहीं था। उन्होंने सोचा कि इससे बेहतर तो कोई नौकरी ही कर लेते, कम से कम वेतन तो मिलता। हालाँकि, अतुल ने इस निराशा को खुद पर हावी नहीं होने दिया और सोचा कि यही गलती नौकरी में होती तो उससे भी हाथ धोना पड़ता, जिसके बाद का संघर्ष हो सकता है और भी कठिन हो जाता। अतुल ने खुद को संभाला और दोबारा अपने काम में जी जान से जुट गए। अतुल की मेहनत बेकार नहीं गई और उनका फैसला सही निकला। 2011-12 में अतुल की कंपनी का टर्न ओवर तकरीबन 20 करोड़ रूपए तक पहुँच गया था।

संघर्षों का दौर थमा भी नहीं था कि एक और झटके ने अतुल को झकझोर दिया। 2011 में जापान में आये सुनामी ने पूरे जापान को हिला कर रख दिया था। उन दिनों अतुल बिहार के अपने पैतृक गाँव में थे, क्योंकि कुछ दिनों पहले ही उनके पिता का निधन हुआ था। अतुल तुरंत वापस नहीं जा सकते थे, लेकिन फोन पर अपने इंजीनियर्स और क्लाईंट्स के टच में थे। उधर जापान में यह खौफ फैल रहा था कि न्यूक्लियर प्लांट के रेडिएशन टोक्यो शहर तक पहुँच सकते हैं जहाँ अतुल का ऑफिस था। यह खबर सुनकर माँ ने अतुल को वापस जापान जाने से मना किया, लेकिन अपनी जिम्मेदारियों को देखते हुए माँ को मनाकर अतुल टोक्यो लौट आये। भूकंप और सुनामी ने विकसित जापान को तबाह कर दिया था। सड़कें टूट गईं थी और चारों तरफ बिजली की कमी हो रही थी। कारोबार फिर से खड़ा करने के लिये अतुल ने रात-दिन एक कर दिया, लेकिन अब स्थितियाँ बदल चुकीं थी। अतुल के काफी इंजीनियर्स काम छोड़कर वापस भारत लौट चुके थे, जिससे जापानी कंपनियों को इंडो सकुरा पर भरोसा नहीं हो रहा था। उन्हें डर था कि नए इंजीनियर्स भी काम छोड़कर चले गए तो उन्हें काफी नुकसान होगा। एक साल में कंपनी का टर्न ओवर आधा हो चुका था।

अब अतुल को सॉफ्टवेयर कंपनी के अलावा भी कुछ ऐसा करना था जिससे उनकी आय सुचारू रूप से चलती रहे। एक ही कंपनी पर फोकस करना अब मुनासिब नहीं था। इसी इरादे से उन्होंने हेल्थ केयर कंसल्टेंसी शुरू की। इसके तहत वे भारत में काम कर रहीं लगभग 1500 जापानी कंपनीज़ के तकरीबन 50 हज़ार जापानी कर्मचारियों को हेल्थ सर्विस बेचते हैं। वे केवल एक फोन पर उन्हें मेडिकल सुविधा उपलब्ध करवाते हैं। अब अतुल के टर्नओवर का लगभग 10 प्रतिशत इसी बिज़नेस से आता है। अतुल की इंडो सकुरा का टर्न ओवर अब लगभग 15 करोड़ सालाना तक पहुँच गया है।

भेदभाव का करना पड़ा सामना

बिहार के छोटे और पिछड़े कस्बे से निकले एक दलित व्यक्ति का इस ऊँचाई तक पहुंचने का सफर उतार-चढ़ाव से भरपूर रहा है। अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग पत्रकारों से हुई बातचीत में अतुल ने बताया है, कि दलित वर्ग का होने से उन्हें जापान में तो कोई नुकसान नहीं हुआ लेकिन एक बार भारत की ही एक कंपनी ने उन्हें काम देने से मना कर दिया था। हालांकि अतुल इसे कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं मानते हैं, क्योंकि उनकी काबिलियत ने एक रास्ता बंद होने पर हज़ार अन्य मौके दिये हैं।

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