कबाड़ की बाइक से किसान ने बनाए ट्रैक्टर, रिमोट से दौड़ा रहे

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बाजार से लाखों का ट्रैक्टर कौन खरीदे, अब तो गांवों के युवा किसान कबाड़ में पड़ी बाइकों से खुद का मिनी ट्रैक्टर बनाकर खेतों की जुताई ही नहीं, निराई-गुड़ाई भी करने लगे हैं। बारा (राजस्थान) के योगेश नागर तो खुद के तैयार किए रिमोट से बिना ड्राइवर के ट्रैक्टर दौड़ा रहे हैं। उन्हें अब तक ऐसे साठ रिमोट बनाने के ऑर्डर भी मिल चुके हैं। वह सेना के टैंक भी बिना ड्राइवर, रिमोट से चलाना चाहते हैं।

जुगाड़ के ट्रैक्टर और योगेश
जुगाड़ के ट्रैक्टर और योगेश
योगेश का ये रिमोट सैटेलाइट के जरिए ट्रैक्टर में लगे ट्रांसमिटर से कनेक्ट होता है और डेढ़ किलोमीटर की रेंज तक काम करता है। अब तो योगेश को ऐसे रिमोट बनाने के साठ से अधिक ऑर्डर भी मिल चुके हैं। अब योगेश सेना के टैंकों को भी चलाने वाला रिमोट बनाना चाहते हैं।

हमारे गांवों के अन्न से ही शहरों का जीवन चलता है और मुख्यतः गांव की ही प्रतिभाएं देश चला रही हैं। यद्यपि आज करोड़ों शिक्षित ग्रामीण युवा रोजगार के लिए दर-दर भटक रहे हैं लेकिन ऐसे भी होनहार हैं, जिनका हुनर गांव की मिट्टी में ही सुर्खियां बटोर रहा हैं। ऐसे ही हुनरमंद हैं राजितराम वर्मा, जयेश सागर, प्रहलाद माली, योगेश नागर, जो बाइक से ट्रैक्टर बनाकर खेतों में दौड़ा रहे हैं। बारा (राजस्थान) के एक किसान परिवार में जन्मे योगेश नागर ने तो ऐसे ट्रैक्टर का आविष्कार कर डाला, जो बिना ड्राइवर के दौड़ता है। योगेश के पिता ट्रैक्टर ड्राइवर रहे हैं। उन्होंने लोन पर ट्रैक्टर खरीदा था। उसी से घर की रोजी-रोटी चलती।

ट्रैक्टर चलाते-चलाते वह जब गंभीर रूप से अस्वस्थ रहने लगे तो योगेश कोटा में अपनी बीएससी फर्स्ट इयर की पढ़ाई छोड़कर गांव लौट आए और खुद ट्रैक्टर चलाने लगे। दो माह बाद उन्होंने सोचा कि क्या उनका ट्रैक्टर बिना ड्राइवर के भी दौड़ाया जा सकता है? यह बात जब उन्होंने अपने पिता को बताई, यकीन न करते हुए वह बात टाल गए। बाद में योगेश का ये सपना पूरा करने के लिए उनको बिना चालक वाले ट्रैक्टर का सेम्पल बनाने के लिए दो हजार रुपए दिए। योगश ने सेंपल बना दिया। पिता हैरत से भर उठे। योगेश ने अपने बनाए रिमोट से ट्रैक्टर को चला दिया। इसके बाद पिता ने रिश्तेदारों से 50 हजार रुपए कर्ज लेकर योगेश को दिए। इसके कुछ माह बाद योगेश ने ऐसा रिमोट तैयार कर लिया जिससे ट्रैक्टर को बिना ड्राइवर के चलाया जा सकता है। योगेश का ये रिमोट सैटेलाइट के जरिए ट्रैक्टर में लगे ट्रांसमिटर से कनेक्ट होता है और डेढ़ किलोमीटर की रेंज तक काम करता है। अब तो योगेश को ऐसे रिमोट बनाने के साठ से अधिक ऑर्डर भी मिल चुके हैं। अब योगेश सेना के टैंकों को भी चलाने वाला रिमोट बनाना चाहते हैं।

गांव के ही युवा दसवीं फेल जयेश सागर ने बाइक से छोटा ट्रैक्टर बनाया है। उनका दावा है कि इस मिनी ट्रैक्टर में कम ईंधन की खपत होती है। जयेश बताते हैं कि जब वह 10वीं क्लास में फेल हो गए तो उनके पास करने को कोई काम नहीं था। उनके पास छह बीघे खेत है। वह खेती करना चाहते थे। ट्रैक्टर की जरूरत महसूस होने लगी लेकिन सोचने लगे, खरीदने के लिए ढाई लाख रुपए कहां से लाएं। इसके बाद उन्होंने ट्रैक्टर का एक नया मॉडल डेवलप करने की योजना बनाई। पांच हजार रुपए में बाजार से सेकेंड हैंड बाइक लेकर उसको मिनी ट्रैक्टर में तब्दील करने लगे। ट्रैक्टर तैयार हो गया। अब वह ऐसे मिनी ट्रैक्टर तैयार कर पैंतीस हजार रुपए में किसानों को बेच रहे हैं। उनका कहना है कि बड़े ट्रैक्टर से एक बीघा जमीन जोतने में दो सौ रुपए खर्च आता है, जबकि उनके बनाए ट्रैक्टर से तीस-पैंतीस रुपए में ही उतनी जमीन की जुताई हो जाती है।

अंबेडकरनगर (उ.प्र.) के गांव रघुनाथपुर के हैं दसवीं पास राजितराम वर्मा। उन्होंने भी अपनी तरह का एक अलग सा मिनी ट्रैक्टर बनाया है। इस मिनी ट्रैक्टर से खेत की जुताई ही नहीं, गुड़ाई-निराई भी की जा सकती है। तीस वर्षीय राजितराम वर्मा बताते हैं कि उन्हें अब गन्ने की गुड़ाई के लिए मजदूर नहीं खोजने पड़ते हैं। उन्होंने घर में पड़ी पुरानी बाइक, पुरानी साइकिल और पुराने ठेले के कलपुर्जों से मात्र 15 हजार रुपए में अपना मिनी ट्रैक्टर बनाया है। जब वह ट्रैक्टर बनाने के लिए घर में पड़ी पुरानी बाइक, साइकिल और ठेलों के पहिये खोलते थे तो परिवार वाले नाराज होते थे। उनको डांट खानी पड़ती थी। अब उनके बनाए मिनी ट्रैक्टर से प्रति घंटे दस बिस्वा खेत की जुताई पर लगभग अस्सी रुपए खर्चा आता है।

कोटा (राजस्थान) के गांव मिश्रौली के युवा किसान हैं प्रहलाद माली। उनके पास ट्रैक्टर खरीदने के पैसे नहीं थे। बैलों ने उनका साथ छोड़ दिया था। वह हर हाल में अपने खेतों की जुताई करना चाहते थे। प्रहलाद को भी वही उपाय सूझा। उन्होंने पांच हजार रुपए में अपनी बाइक को ही ट्रैक्टर बना दिया। उसमें खुरपे भी लगा दिए। अब वह अपने खुरपे वाले ट्रैक्टर से एक दिन में 12 बीघे खेत जोत लेते हैं। प्रह्लाद बताते हैं कि इस बार उनके गांव के बाकी किसानों ने 23 जून से ही बुवाई शुरू कर दी तो उन्हें लगा कि वह तो खेती में पिछड़ जाएंगे क्योंकि बैल हैं नहीं।

इसके बाद ही उन्होंने घरेलू जुगाड़ से खुद का ट्रैक्टर तैयार कर उसे खेतों में दौड़ा दिया। भीलवाड़ा ( राजस्थान) के गांव भगवानपुरा के किसान पारस बैरवा भी देसी जुगाड़ से अपनी कबाड़ में पड़ी बाइक का ट्रैक्टर तैयार कर अपने खेतों की जुताई कर रहे हैं। वह जब राजकोट (गुजरात) में रहे तो वहां के किसानों को इसी तरह के जुगाड़ से खेती करते देखा था। घर लौटकर उन्होंने पचीस हजार रुपए खर्च कर अपनी पुरानी बाइक का ट्रैक्टर बना लिया। आजकल वह उसी ट्रैक्टर से खेती कर रहे हैं। उससे वह निराई-गुड़ाई भी कर लेते हैं। इससे दो साल में उनको लगभग एक लाख रुपए की बचत हुई है। 

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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