बस कंडक्टर की पत्नी बनीं गुजरात की 'कोयला क्वीन'

गुजरात की सविताबेन सिर्फ तीसरी कक्षा तक पढ़ पाईं और आज की तारीख में हैं 'सटर्लिंग' जैसी बड़ी कंपनी की मालकिन

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औरत यदि चाहे तो क्या नहीं कर सकती है। किताबी ज्ञान ज़िंदगी से मिले अनुभवों से बड़ा नहीं होता, जिसका जीवंत उदाहरण हैं गुजरात की सविताबेन, जो सिर्फ तीसरी कक्षा तक पढ़ीं, लेकिन अपनी मेहनत और लगन के बल पर आज एक कोयला कंपनी की मालकिन हैं। उनके मां-पिता बेचते थे कोयला। एक समय ऐसा भी था, जब सविताबेन बड़ी मुश्किल से परिवार और बच्चों के साथ अपना जीवन काट रही थीं और अब लोग उन्हें 'कोयला क्वीन' के नाम से पहचानते हैं...

गुजरात की सविताबेन ने दलित होने के बावजूद भी कभी नहीं लिया आरक्षण। दो बार निकाली गईं अपने ही मकान से, लेकिन नहीं टूटा हौसला और हिम्मत।

बात लगभग पांच दशक पुरानी है। देवजीभाई परमार अहमदाबाद म्युनिसिपल ट्रांसपोर्ट सर्विस में बस कंडक्टर का काम करते थे। 60 रुपये मासिक तनख्वाहपाने वाले देवजीभाई के कंधों पर अपने माता-पिता, पत्नी और छह: बच्चों से भरपूर गृहस्थी चलाने का भार था। माता-पिता के खर्च, कर्ज़ चुकाने और किराए की रकम देने के बाद उनके पास केवल 20 रुपये हीबचते थे, जिससे उन्हें बच्चों और घर का खर्च उठाना पड़ता था। हालांकि देवजीभाई की पत्नी सविताबेन बेहद मेहनती और समझदार महिला थीं, लेकिन बढ़ती महंगाई में बच्चों की परवरिश कर पाना मुश्किल होता जा रहा था। वे खुद केवल तीसरी कक्षा तक पढ़ीं थी इसीलिए उन्हें कोई काम मिल पाना मुश्किल था। उनके माता-पिता भी बहुत गरीब थे और कोयला बेचने का काम करते थे। सविताबेन ने सोचा कि वह भी माता-पिता के साथ यही काम करें, लेकिन उनकी माता ने यह कहकर मना कर दिया कि इससे उनकी छोटी बहनों के रिश्ते आने में समस्या हो सकती है ।

अपने दम पर की कारोबार की शुरूआत

लेकिन, सविताबेन के पास एक ही रास्ता था। खुद कोयला खरीदकर बाज़ार में बेचे। अहमदाबाद में उन दिनों कई कपड़ा मिलें थीं, जिनमें से अधजला कोयला निकलता था। यह कोयला वे बाज़ार में बेच देते थे। सविताबेन ने इन्हीं मिलों से कोयला खरीदकर बेचना शुरू कर दिया। उन दिनों घरों में भी कोयले पर ही खाना पकता था, इसीलिए सविताबेन को ग्राहक ढूंढने में अधिक परेशानी नहीं हुई। वे पहले अहमदाबाद की गलियों में कोयला बेचने लगी, फिर धीरे धीरे बड़े बाजारों में। दिन में कोयला बेचने के बाद वे शाम को अपने परिवार के साथ चरखा चलाकर सूत का काम करती थीं। इस सूत के बदले उन्हें थोड़े पैसे और थोड़ा राशन मिल जाता था।

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लगभग पांच–छह: साल तक सविताबेन सड़कों पर कोयला बेचती रहीं। पहले वे घरों में और ईंट भट्टे वालों को कोयला बेचती थीं। फिर उन्होंने पक्के कोयले बेचने का काम शुरू किया।

जिन दिनों सविताबेन कोयला बेचती थीं, उन दिनों पक्का कोयला बेचने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था। व्यापारी यह लाइसेंस लेकर अपने सब-एजेंट्स को कोयला बेचने का काम देते थे। उन्हीं में से एक व्यापारी थे श्री जैन, जिन्हें सविताबेन काका कहती थीं। काका को रेल से आने वाला कोयला बेचना होता था। उन्होंने सविताबेन की लगन को देखकर कोयला बेचने का काम उन्हें सौंप दिया, जबकि अन्य व्यापारियों ने उन्हें दलित कहकर काम देने से मना कर दिया था। अपनी जाति के कारण हुए इस भेदभाव से सविताबेन निराश नहीं हुई। धीरे-धीरे रेलवे का अधिकतर कोयला सविताबेन कमीशन पर बेचने लगीं। सविताबेन अपने परिवार के साथ एक चाल के छोटे से कमरे में रहती थी । उस चाल के पास ही एक होटल था– नीलम होटल। सविताबेन व्यापारियों को वहीं मिलने बुलाती थीं। उनके तीनों बेटे भी इसी काम में उनका हाथ बंटाते थे। कोयले का कारोबार करने की वजह से कुछ ही महीनों में सविताबेन ‘सविताबेन कोलसावाला’ के नाम से विख्यात हो गईं। गुजराती में कोयले को कोलसा कहते हैं।

जातिवाद के कारण अपने ही मकान से निकलने की पीड़ा भी झेली

साल 1977 की बात है। जिस नीलम होटल में वे व्यापारियों से सौदा करती थीं, उसी होटल में एक डॉक्टर अक्सर आते-जाते थे। वे इस दलित महिला की लगन और समझदारी से बहुत प्रभावित थे। वे अहमदाबाद की मेघानी नगर में रहते थे और उनका मूल निवास वड़ोदरा के पास था। उन्होंने सविताबेन से कहा कि वे पढ़ाई करके घर लौटने वाले हैं और मेघानी नगर वाला उनका मकान खाली रहेगा, तो क्यों न सविताबेन अपने परिवार के साथ वहीं रह लें। परिवार बड़ा था और मकान छोटा, इसीलिए सविताबेन को यह ऑफर अच्छा लगा। उस वक़्त उस घर की कीमत करीब पचास हज़ार रुपये थी । सविताबेन ने अपनी जमा पूंजी के 15 हज़ार रुपये उन्हें दिए और डॉक्टर साहब ने बाक़ी पैसे बाद में लेने की सहूलियत उन्हें दे दी।

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दलित होना सविताबेन को यहां भी भारी पड़ा। मेघानी नगर की सोसाइटी ने एक दलित परिवार को प्रॉपर्टी ट्रांसफर करने से इंकार कर दिया। इधर डॉक्टर साहब भी जिद्दी थे, इस वजह से उन्होंने पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी सविताबेन के नाम कर दी। लेकिन सोसाइटी वालों ने सविताबेन के परिवार का जीना मुश्किल कर दिया। इधर 1975 में तत्कालीन गुजरात सरकार ने एक नया फैसला लिया। फैसला था शिक्षण संस्थानों में पिछड़ी जातियों के लिये आरक्षण बढ़ाने का। फैसले के विरोध में सारे शहरों में आंदोलन हो रहे थे। इसके चलते सविताबेन को वह मकान आखिर छोड़ना ही पड़ा। एक और परिचित ने उन्हें अपने मकान में शरण दी, लेकिन दलित विरोधियों ने उन्हें वहां भी नहीं बख्शा। दलितों को गालियां दी जाती थी, बीसी यानी बैकवर्ड कास्ट कहकर चिढ़ाया जाता था। आखिर सविताबेन सपरिवार वापस उसी दस बाई दस की चाल में लौट गयी। कुछ समय बाद उन्होंने शाही बाग़ में एक दूसरा घर लिया।

आरक्षण के लाभ को कहा हमेशा 'ना'

सविताबेन ने कभी भी इस तरह से भेदभाव बरते जाने की शिकायत नहीं की, न ही उन्होंने कभी दलितों को मिलने वाले आरक्षण का फायदा उठाया। उनके तीनों बेटे ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन तीनों बेटियों को उन्होंने ग्रेजुएशन कराया है। सविताबेन ने न तो कारोबार में, न बच्चों की पढ़ाई में, कभी आरक्षण का लाभ लिया। उन्हें गर्व है कि वे और उनका परिवार जो भी है, अपनी मेहनत और लगन से हैं।

सिरामिक इंडस्ट्री में रखे कदम और कारोबारी दुनिया में बनाई अपनी ख़ास पहचान

सविताबेन के कोयला कारोबार के ग्राहकों में सिरेमिक इंडस्ट्री के लोग भी थे। उससे प्रेरित होकर साल 1988 में सविताबेन ने कप और प्लेट बनाने का कारखाना खरीदा। कारखाने के उत्पाद अहमदाबाद के लोकल मार्केट में ही खप जाते थे और प्रतिमाह पांच लाख तक की बिक्री हो जाती थी। इसी दौरान सविताबेन ने कुछ ज़मीनें भी खरीद लीं। उनके बड़े बेटे मुकेश का इरादा सिरेमिक टाइल्स बनाने का था । अहमदाबाद के पास मेहसाना में उनकी एक ज़मीन थी । साल1991 में कलकत्ता, मुंबई और अहमदाबाद से मशीनें और सामान मंगवाकर उन्होंने सिरामिक टाइल्स बनाने की एक फैक्ट्री खोल ली। ये फैक्ट्री प्रतिदिन करीब 600 डिब्बे टाइल्स बनती थी । मुकेश कारोबार को और बढ़ाना चाहते थे, इसी मकसद से उन्होंने साल 1996 में कोयले और कप प्लेट्स का काम छोड़कर पूरी तरह टाइल्स पर ध्यान देना शुरू कर दिया।

सविताबेन इन दिनों केवल ऑफिस में बैठकर काम होते देखती हैं।आज उनकी कंपनी जॉनसन टाइल्स जैसी कंपनी को भी सिरेमिक टाइल्स बेच रही है। इसके साथ-साथ उनका अपना ब्रांड 'स्टर्लिंग' भी पूरे देश में मशहूर है। कारोबार अब उनके बेटे संभालते हैं।

पत्रकारों से अलग-अलग समय पर हुई बातचीत के दौरान अपने पुराने दिनों को याद करते हुए सविताबेन कहती हैं, कि जब वे माता-पिता से कोयला बेचने का काम मांगने गयी थीं, तो माँ ने उन्हें कहा था कि वे उनसे पैसे ले जाएं लेकिन यह काम ना करे। अगर वे उस समय पैसे ले लेती तो आज इतने बड़े कारोबार की मालकिन नहीं होतीं।

कम पढ़ी-लिखी, गरीब और दलित होने के कारण उन्हें अपने दम पर ही कुछ करना था और उन्होंने कर दिखाया। पति, सास-ससुर और बेटों के सहयोग ने उन्हें कदम-कदम पर हौसला दिया। न उन्होंने किसी से मदद मांगी, ना ही किसी सहानुभूति की अपेक्षा की। सविताबेन हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा हैं, जो संसाधन की कमी के कारण खुद कोलाचार समझता है।

जब एक कंडक्टर की पत्नी व्यापार में इतना नाम कमा सकती है, तो उनसे प्रेरणा लेकर कितने लोगों का जीवन बदल सकता है।

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