समाज के वंचित वर्गों एवं आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली लेखिका थीं महाश्वेता देवी 

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प्रख्यात लेखिका और समाज के वंचित वर्गों एवं आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली महाश्वेता देवी का आज निधन हो गया। वह 91 वर्ष की थीं। वह लंबे समय से गुर्दे, फेफड़े और बुढ़ापे से संबंधित बीमारियों का सामना कर रही थीं।

अपने उपन्यासों और कहानियों में उन्होंने एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर पूरी ईमानदारी से और एक लेखक के तौर पर पूरी शिद्दत के साथ समाज के हाशिए पर रहने वाले वंचितों की दयनीय अवस्था का चित्रण किया और उनके कल्याण की आकांक्षा की । उनके इसी महती कार्य के लिए उन्हें पद्मविभूषण, मैगसेसे, साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कारों से सम्मानित किया गया ।

उनकी सभी रचनाओं में, चाहें वे ‘हजार चौरासीर मां’ हो या ‘अरण्येर अधिकार’, ‘झांसीर रानी’ हो या ‘अग्निगर्भा’ ,‘रूदाली’ हो या ‘सिधु कन्हुर डाके’..दलितों के जीवन और उनके हालात की झांकी मिलती है।

लेखक और पत्रकार की भूमिका निभाने के अलावा महाश्वेता देवी ने आदिवासियों और ग्रामीण क्षेत्रों के अपनी ही भूमि से बेदखल किए गए लोगों को संगठित होने में मदद की ताकि वे अपने और अपने इलाकों के विकास का काम कर सकें । इसके लिए उन्होंने बहुत से संगठनों की स्थापना की ।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उनके निधन पर शोक जताते हुए कहा कि देश ने एक महान लेखक खो दिया। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन के समय महाश्वेता देवी ने ममता का समर्थन किया था।

ममता ने ट्वीट किया, ‘‘भारत ने एक महान लेखक खो दिया। बंगाल ने एक ममतामयी मां खो दी। मैंने अपनी एक मार्गदर्शक गंवाई। महाश्वेता दी को शांति मिले।’’

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी ने अपने शोक संदेश में कहा, ‘‘मुझे महाश्वेता देवी के निधन के बारे में जानकर बहुत दुख हुआ। मैं शोकाकुल परिवार और उनके चाहने वालों के प्रति गहरी संवेदना प्रकट करता हूं।’’ महाश्वेता देवी की बहुत सी रचनाओं के आधार पर फिल्में भी बनाई गईं । गोविंद निहलानी ने 1998 में ‘हजार चौरासी की मां’ बनाई जिसमें एक ऐसी मां का भावनात्मक संघर्ष दिखाया गया है जो नक्सल आंदोलन में अपने बेटे के शामिल होने की वजह नहीं समझ पाती है । 1993 में कल्पना लाजमी ने उनके उपन्यास ‘रूदाली’ पर इसी नाम से फिल्म बनाई । इतना ही नहीं इतालवी निर्देशक इतालो स्पिनेली ने उनकी लघु कहानी ‘चोली के पीछे ’ पर ‘गंगूर’ नाम से कई भाषाओं में फिल्म बनाई ।

साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कारों से सम्मानित महाश्वेता देवी ने आदिवासियों और ग्रामीण क्षेत्र के वंचितों को एकजुट करने में मदद की ताकि वह अपने इलाकों में विकास गतिविधियां चला सकें।

उन्होंने आदिवासियों के कल्याण के लिए बहुत सी सोसायटियाँ बनाईं। अपने गृहनगर में एक सेलीब्रिटी की हैसियत रखने वाली महाश्वेता देवी वास्तविक जीवन में बेहद सादगीपसंद थीं।

ढाका में एक मध्यवर्गीय परिवार में 1926 को जन्मीं महाश्वेता के पिता मनीष घटक एक सुविख्यात कवि और चाचा रित्विक घटक प्रख्यात फिल्मकार थे । घटक को भारत में समानांतर सिनेमा का स्तंभ माना जाता है।

महाश्वेता देवी ने रविंद्रनाथ ठाकुर के शिक्षण संस्थान शांतिनिकेतन में शिक्षा प्राप्त की और प्रसिद्ध नाटककार बिजोन भट्टाचार्य से उनका विवाह हुआ । बिजोन इंडियन पीपल्स थियेटर एसोसिएशन (इप्टा) के संस्थापक सदस्यों में से एक थे।

महाश्वेता देवी के पुत्र नबरूण भी एक प्रख्यात कवि और उपन्यासकार थे और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित थे । उनका 2014 में निधन हो गया था । अपने जीवनकाल में महाश्वेता देवी ने न सिर्फ एक महाविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य की व्याख्याता के तौर पर काम किया बल्कि विभिन्न समाचार पत्रों में ग्रामीण भारत के लोगों के सामने पेश समस्याओं के विषय में आलेख भी लिखे।

एक व्याख्यान में उन्होंने बताया था कि साहित्य सृजन हो या समाचार पत्रों पत्रिकाओं के लिए लेखन या किसी भी तरह का रचनात्मक कर्म, इन सबके पीछे उनका सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर प्राप्त अनुभव काम करता है।

उन्होंने बंगाल ,बिहार और उड़ीसा के आदिवासी समुदायों और ग्रामीणों के अलिखित इतिहास पर गहन अनुसंधान किया और उन्हें ही अपनी रचनाओं का विषय बनाया।

साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत उनकी ऐतिहासिक गल्प रचना ‘अरण्येर अधिकार ’ आदिवासी नेता बिरसा मुंडा के जीवन और उनके संघर्ष तथा उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ मुंडा समुदाय के विद्रोह की गाथा कहती है।

उनकी रचना ‘अग्निगर्भा’ में चार लंबी कहानियां हैं जो नक्सलबाड़ी आदिवासी विद्रोह की पृष्ठभूमि में लिखी गई हैं । इसी तरह उनके उपन्यास ‘बीश एकुश’ में नक्सलबाड़ी आंदोलन की कुछ अनकही कहानियां हैं।

उनकी अन्य रचनाएं ‘चोटी मुंडा ओ तार तीर ’(1979)‘सुभाग बसंत ’(1980)और ‘सिधु कन्हूर डाके’(1981) हैं।

अधूरी रह गई महाश्वेता देवी की जीवनी, खो भी गई

अपने लंबे साहित्यिक सफर में सैकड़ों सुंदर रचनाओं के माध्यम से लोगों के दिलों को छूने वाली विख्यात लेखिका महाश्वेता देवी खुद अपनी वो कहानी पूरी नहीं कर सकी जिसमें वह उस मानसिक पीड़ा का जिक्र करने वाली थीं जिससे वह तलाक के बाद गुज़री थीं।

महाश्वेता देवी के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे डॉक्यूमेंटरी फिल्मकार जोसी जोसेफ ने कहा कि 2007 में नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हिंसा के बाद इस मशहूर लेखिका ने अपनी जीवनी लिखनी शुरू की थी।

जोसेफ ने पीटीआई से कहा, ‘‘उन्होंने आधा संस्मरण चार साल पहले पूरा कर लिया था लेकिन मकान बदलने और अपने एक पुराने साथी के साथ दिक्कत के बाद वह इसे खो बैठीं। उनकी यह जीवनी अब तक अधूरी है और हम नहीं जानते कि यह बेशकीमती रचना कहां पड़ी हुई है।’’ उन्होंने कहा कि जीवनी पूरी करने के लिए महाश्वेता देवी को मनाया गया लेकिन यह नहीं हो पाया।

महाश्वेता देवी ने जानेमाने नाटककार बिजोन भट्टाचार्य से शादी की थी। भट्टाचार्य ‘इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन’ (इपटा) के संस्थापक सदस्य थे। बेटे नवअरूण के जन्म के बाद दोनों 1962 में अलग हो गए।

लेखिका के करीबी लोगों का कहना है कि पति से अलग होने के बाद महाश्वेता देवी को मानसिक पीड़ा और वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा। जोसेफ ने कहा, ‘‘मुझे नहीं लगता कि इस जीवनी को छोड़कर उनकी कोई अन्य रचना होगी जो प्रकाशित नहीं हुई।’’ पीटीआई