आतंकी हमले के शिकार जावेद व्हील चेयर पर आने के बावजूद संवार रहे हैं दिव्यांग बच्चों की ज़िंदगी

वादी-ए-कश्मीर में रहने वाले जावेद आंतकी हमले में अपनी एक किडनी, पेट की आंत और शरीर के निचले हिस्से की रीढ़ की हड्डी खो चुके हैं। वे पूरी तरह से व्हील चेयर पर हैं, लेकिन फिर भी दिव्यांग बच्चों को दे रहे हैं शिक्षा...

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यूं तो पहली नजर में उन्हें देखकर कोई भी कहेगा कि यह तो जिंदगी की जंग हार चुका इंसान है। लेकिन जब निगाह जावेद की उपलब्धियों पर जाती है तो खुद को उसके समक्ष अक्षम महसूस करना स्वाभाविक है। जावेद अहमद टाक अपने पैतृक कस्बे बिजबेहड़ा में विकलांग बच्चों के लिए 'जेबा आपा' नामक एक स्कूल चला रहे हैं, जिसमें 55 बच्चे पढ़ते हैं...

जिंदगी कभी अपने आशिकों के मायूस नहीं करती। वह हमेशा वक्त से छीन कर कुछ ऐसे मोड़ अपने चाहने वालों के जीवन में ला ही देती है जो मायूस चेहरे पर खुशी के कमल खिला देती है। ऐसा ही कुछ जावेद के साथ भी हुआ।

आंतक की आग में झुलसी और अपने कत्ल हुये ख्वाबों की मजार पर फातिया पढ़ती हजारों जिंदगानियां जमीन की जन्नत कश्मीर में दहशतगर्दी के हासिल को बयान करने के लिये काफी हैं। तबाह हजारों जिंदगी के बहीखाते में दर्ज टूटे ख्वाबों, अधूरे ख्यालों, दरकते अरमानों और कभी न पूरे होने वाले वादों के हिसाब-किताब की लंबी फेहरिस्त आज भी अपने हिस्से के गुम हुये रोशन सवेरे का जिक्र करते हुये आंसुओं के सैलाब में डूब जाती हैं। मायूसी के बेपनाह अंधेरों में गुम उनका मुस्तकबिल मांझी के खुशनुमा यादों के सहारे आज की चुनौतियों के सामने बेबस खड़ा नजर आता है, लेकिन इन्हीं तवील अंधेरों में जावेद अहमद टाक जैसे जवां शख्सियत का उदय होता है जो कहते हैं कि मुश्किलों से कह दो मेरा खुदा बड़ा है। जो जिंदगी को जिंदादिली का नाम बताते हैं।

यूं तो जावेद को पहली नजर में देखकर कोई भी कहेगा, कि यह तो जिंदगी की जंग हार चुका इंसान है। लेकिन जब निगाह जावेद की उपलब्धियों पर जाती है तो खुद को उनके समक्ष अक्षम महसूस करना संभवत: मुमकिन है। जावेद अहमद टाक अपने पैतृक कस्बे बिजबेहड़ा में विकलांग बच्चों के लिए जेबा आपा नामक एक स्कूल चला रहे हैं जिसमें वर्तमान में 55 बच्चे हैं।

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जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में एक कस्बा है बिजबेहड़ा। काफी पिछड़ा इलाका है यह। पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद के पैतृक कस्बे बिजबेहड़ा की पांपोश कॉलोनी में रहने वाला जावेद अहमद टाक आज बेशक व्हील चेयर पर हैं। उसकी एक किडनी नहीं है, पेट की एक आंत निकाल दी गई है। शरीर का निचला हिस्सा और रीढ़ की हड्डी काम नहीं करती। लेकिन वह हमेशा ऐसा नहीं था। वह मनहूस तारीख तारीख थी, 21 मार्च, 1996.

दोपहर करीब साढ़े बारह बजे का वक्त था। सब कुछ सामान्य चल रहा था। घर में चाची और उनके बच्चे थे। अचानक कुछ आतंकवादी घर में घुस आए। वह चाचा के बेटे का अपहरण करने आए थे। चाचा के बेटे को खोजते हुए आतंकी चारों तरफ से अंधाधुंध फायरिंग करने लगे। घर में कोहराम मच गया। परिवार के लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर छिपने लगे। इस बीच आतंकियों की एक गोली जावेद की रीढ़ की हड्डी में लगी। वह गिर पड़े। पीठ से खून की धारा बह निकली। आतंकी कहर बरपाकर चले गए। इसके बाद जावेद को अस्पताल पहुंचाया गया। हर पल उनकी हालत बिगड़ती गई। मां बेहाल थीं। लगा कि अब नहीं बचेगा बेटा। किडनी और लीवर ने काम करना बंद कर दिया था। डॉक्टर ने कहा, आखिरी कोशिश करेंगे। ऑपरेशन के बाद जावेद की जान तो बच गई, पर चलने-फिरने के लायक नहीं रहे।

डॉक्टर ने बताया कि कमर से नीचे का अंग बेकार हो गया है। अब वह हमेशा व्हील चेयर पर रहेंगे। जावेद सन्न थे, ये क्या हो गया ! परिवार की उम्मीदें टूट चुकी थीं। जावेद बताते हैं, 'एक डॉक्टर ने मुझसे कहा कि अब अगर तुम्हारी रीढ़ की हड्डी में खरोंच भी आई, तो उसे ठीक होने में वर्षों लग जाएंगे।' अब आंखों के सामने सिर्फ अंधेरा था। डाक्टर बन गरीबों को दवा देनेकी ख्वाहिश रखने वाले जावेद की जिंदगी खुद दवा के सहारे हो गई थी, लेकिन जिंदगी कभी अपने आशिकों के मायूस नहीं करती। वह हमेशा वक्त से छीन कर कुछ ऐसे मोड़ अपने चाहने वालों के जीवन में ला ही देती है जो मायूस चेहरे पर खुशी के कमल खिला देती है। ऐसा ही कुछ जावेद के साथ भी हुआ।

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करीब एक साल तक जावेद बिस्तर पर पड़े रहे। एक दिन घर के बाहर पड़ोस के बच्चों के खेलने की आवाज सुनाई दी। वे गरीब बच्चे थे। ऐसे बच्चे, जो कभी स्कूल नहीं गए। जावेद ने मां से कहा, बच्चों को बुलाओ, मैं उन्हें पढ़ाऊंगा। कुर्सी पर बैठ नहीं सकते थे, लिहाजा मां ने टेक लगाकर बेड पर बैठा दिया। रोज क्लास लगने लगी। धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ती गई। डॉक्टर न बन पाए तो क्या हुआ, अब टीचर बनकर समाज के लिए कुछ करने और जीने का मकसद मिल चुका था। जावेद कहते हैं, कि 'आतंकी हमले का पीड़ित होने के कारण 75 हजार रुपये का मुआवजा मिला और उसी पैसे से मैंने यह स्कूल शुरू किया। मैंने तय किया कि मैं अपनी मदद खुद करूंगा।' 

जावेद ने आगे पढ़ने का फैसला किया। कॉलेज नहीं जा सकते थे, इसलिए घर बैठकर पढ़ने का रास्ता निकाला। इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर और मानवाधिकार विषय में ग्रेजुएशन किया और फिर जम्मू-कश्मीर यूनिवर्सिटी से सोशल वर्क में एमए। डिग्री मिलने के बाद जावेद में नया उत्साह आ गया। अब वह विकलांगों की समस्याएं उठाने लगे। राज्य और केंद्र स्तर पर मानवाधिकार आयोग को तमाम खत लिखे। श्रीनगर स्थित कुष्ठ रोगियों की एक कॉलोनी की समस्याएं उठाते हुए आयोग में शिकायतें दर्ज कराईं। आयोग ने उन शिकायतों पर राज्य सरकार को जरूरी कार्रवाई के निर्देश दिए। अब तक जावेद को यकीन हो चला था कि कोशिश की जाए, तो समाज को बदला जा सकता है।

जावेद ने जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में विकलांगों की समस्या से जुड़ी कई जनहित याचिकाएं दाखिल कीं। जम्मू-कश्मीर यूनिवर्सिटी में उनकी पहल पर विकलांगों की सुविधा के लिए रैंप बनाए गए, ताकि वे आसानी से इमारत में आ-जा सकें। जावेद अहमद सवाल खड़ा करते हैं कि राज्य में विकलांगों की सही गणना, उनकी विकलांगता की प्रकृति का कोई पक्का आंकड़ा नहीं है। ऐसे में उनके कल्याणार्थ कोई योजना कैसे सिरे चढ़ सकती है?

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जावेद की तारीफ करते हुए कहा, 'जम्मू-कश्मीर के जावेद ने अपनी मुश्किलों को अवसर में बदल दिया। आतंकी हमले में घायल होने के बाद उनके इरादे और मजबूत हो गए।' जावेद की मां आतिका बानो कहती हैं, कि जावेद पहली जनवरी को पैदा हुआ था। हमें खुदा ने नए साल का तोहफा दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उसका नाम लिया है। सचमुच जावेद हमारे लिए खुदा की नेमत है। पीएम की तारीफ के बाद जावेद पूरे देश में हीरो बन गए हैं।

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