20 साल पहले किसान के इस बेटे शुरू की थी हेल्थ केयर कंपनी, आज हैं अरबपति

जिसके पिता दूसरों के खेतों में करते थे मजदूरी, वो हेल्थ केयर कंपनी खड़ी करके बन गया अरबपति...

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वेलुमणि एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता दूसरों के खेत में मजदूरी करते थे। तमिलनाडु के एक छोटे से गांव के रहने वाले वेलुमणि ने बड़े ही विपरीत हालात में शुरूआती पढ़ाई की। वेलु ने केमिस्ट्री से अपना ग्रैजुएशन पूरा किया।

अरोकियास्वामी वेलुमणि
अरोकियास्वामी वेलुमणि
वेलु की पहली सहयोगी बनीं उनकी पत्नी। वह स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया में काम करती थीं और वेलु के बिज़नेस में सहयोग देने के लिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी। 

जब भी हम किसी भी सेक्टर से जुड़ी बड़ी कंपनियों के बारे में बात करते हैं, तो हमारी नज़र उनके सालाना रेवेन्यू या नेटवर्थ पर जा टिकती है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि कई हज़ार करोड़ रुपयों की इन कंपनियों की शुरूआत भी एक वक़्त पर ज़ीरो से ही हुई थी। आज हम बात करने जा रहे हैं, मेडिकल डायग्नोस्टिक सेक्टर की मौजूदा सबसे बड़ी कंपनियों में से एक, थायरोकेयर और उसके संस्थापक अरोकियास्वामी वेलुमणि की।

वेलुमणि एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता दूसरों के खेत में मजदूरी करते थे। तमिलनाडु के एक छोटे से गांव के रहने वाले वेलुमणि ने बड़े ही विपरीत हालात में शुरूआती पढ़ाई की। क्वॉर्ट्ज इंडिया के मुताबिक वेलु ने केमिस्ट्री से अपना ग्रैजुएशन पूरा किया। इसके बाद 1979 में वह कोयंबटूर की एक फार्मा कंपनी में बतौर केमिस्ट काम करने लगे। उस वक्त वेलु की उम्र महज 20 साल थी और उन्हें 150 रुपए मासिक वेतन मिलता था। तीन साल बाद कंपनी बंद हो गई और वेलु बेरोज़गार हो गए।

वेलुमणि इस मौके को ही अपने जीवन का टर्निंग पॉइंट मानते हैं। नौकरी जाने के बाद वेलु ने भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी, मुंबई) में लैब असिस्टेंट की नौकरी के लिए आवेदन दिया। उन्हें नौकरी भी मिल गई, लेकिन कुछ वक़्त बाद ही उन्होंने आगे पढ़ने का मन बना लिया। 1985 में उन्होंने मास्टर डिग्री की पढ़ाई शुरू की और 1995 तक उन्होंने थायरॉइड बायोकेमिस्ट्री में पीएचडी भी कर ली। क्वार्ट्ज़ इंडिया के हवाले से वेलु ने बताया कि उन दिनों वह पढ़ाई और कमाई दोनों साथ-साथ करते थे। भाभा अनुसंधान केंद्र, वैज्ञानिकों को पढ़ने और रिसर्च करने की छूट देता था।

इस यात्रा को मुख़्तसर करते हुए वेलु कहते हैं कि 1982 तक उन्हें यह भी नहीं पता था कि थायरॉइड ग्रंथि (ग्लैंड) कहां होता है, लेकिन 1995 में अपनी पीएचडी पूरी करने के बाद वह थायरॉइड बायोकेमिस्ट्री के एक्सपर्ट हो गए। भाभा अनुसंधान केंद्र में वेलु ने 14 साल काम किया और इसके बाद उन्होंने बेशुमार अनुभव को ऑन्त्रप्रन्योरशिप के साथ जोड़ने का फ़ैसला लिया। वेलु ने थायरॉइड बीमारी की जांच के लिए टेस्टिंग लैब की चेन खोलने का इरादा बनाया। वेलु ने अपने प्रोविडेंट फ़ंड (1 लाख रुपए) को निवेश के तौर पर इस्तेमाल किया। दक्षिण मुंबई में पहला सेंटर खुला और 37 साल की उम्र में वेलु ने अपने बिज़नेस की शुरूआत की।

वेलु की पहली सहयोगी बनीं उनकी पत्नी। वह स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया में काम करती थीं और वेलु के बिज़नेस में सहयोग देने के लिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी। वेलुमणि बताते हैं कि हर बिज़नेस की तरह, शुरूआती दिनों में उनके बिज़नेस को भी संघर्ष के लंबे दौर से गुज़रना पड़ा। अपने दशकों के अनुभव से वेलु बताते हैं कि जब आप संघर्ष में ही मज़ा लेना सीख लेते हैं, तब ही आप तरक्की कर सकते हैं।

अपनी पत्नी के साथ अरोकियास्वामी वेलुमणि
अपनी पत्नी के साथ अरोकियास्वामी वेलुमणि

भारत में थायरॉइड की बीमारी का आंकड़ा काफ़ी चिंताजनक है। 10 में से 1 एक व्यक्ति थायरॉइड डिसऑर्डर से पीड़ित है और ख़ासतौर पर महिलाएं। थायरॉइड की समस्या से पीड़ित महिलाओं को प्रेग्नेंसी से संबंधित कई जटिलताओं का सामना करना पड़ता है और कई बार डिलिवरी के दौरान उन्हें अपनी जान तक गंवानी पड़ती है। भारत में डायग्नोस्टिक लैब्स की इंडस्ट्रियल ग्रोथ को देखते हुए थायरोकेयर ने मेटाबॉलिज़्म, डायबिटीज़, कैंसर आदि रोगों की जांच भी शुरू कर दी है। अभी भी जांच के लिए आने वाले 28 प्रतिशत सैंपल्स थायरॉइड के ही होते हैं।

पुराने दिनों की चुनौती याद करते हुए वेलु बताते हैं कि सैंपल्स को संभाल करना रखना, उनकी जांच से ज़्यादा पेचीदा काम हुआ करता था। जांच सेंटरों की संख्या कम थी और देशभर के अलग-अलग हिस्सों से सैंपल्स आया करते थे। वेलु कहते हैं कि उन्होंने हमेशा कोशिश की जांच की कीमतें बाज़ार में सबसे कम हों। भारत में हेल्थ डायग्नोस्टिक इंडस्ट्री के भविष्य के बारे में वेलुमणि काफ़ी आश्वस्त हैं। आंकड़ों के मुताबिक़, 2018 तक इस इंडस्ट्री की नेटवर्थ 61,600 करोड़ रुपयों तक पहुंचने की संभावना है। अपने बिज़नेस मॉडल के बारे में बताते हुए वेलु कहते हैं कि उन्होंने शुरूआत से ही फ़्रैंचाइज़ी बिज़नेस की प्लानिंग की थी।

इसकी वजह स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि कुछ सालों पहले तक कोई भी लैब एक दिन में दो सैंपल से ज़्यादा नहीं ले सकती थी, लेकिन फ्रैचाइज़ी मॉडल की बदौलत, लैब्स की संख्या बढ़ी और साथ ही, सैंपल की जांच कराना भी पहले से सस्ता हो गया। थायरोकेयर का ग्रोथ रेट पिछले 20 सालों से लगातार बढ़ ही रहा है और इस संबंध में वेलुमणि कहते हैं कि इस विकास की दो प्रमुख वजहें हैं। एक तो यह कि उनकी कंपनी ने पिछले 20 सालों में कभी भी लोन या उधार नहीं लिया। दूसरी यह कि थायरोकेयर ने पिछले 10 सालों से 60 करोड़ रुपए का कैश बैकअप बनाकर रखा हुआ है।

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