एक समय 60 रुपये के वेतन पर परिवार चलाने वाले आज सैंकड़ो करोड़ के मालिक

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" मेरे पास कुछ नहीं है। कुछ भी नहीं। मैं बस एक अच्छा उद्यमी हूँ- राजकुमार

200 स्क्वायर फुट के किराए के कमरे में बसर और 60 रूपये के वेतन पर गुजर से निकले राजकुमार गुप्ता, आज बड़े महशूर रियल एस्टेट टाइकून और प्रसिद्ध व्यवसायी हैं। उनकी ‘ रंक से राजा’ बनने की कहानी किसी को भी प्रेरित कर सकती है। लेकिन उनकी ये कहानी अंतर आत्मा से कड़ी मेहनत करने की गवाही की मांग करती है। अपनी कम कमाई के दिनों में भी गुप्ता उच्च सोच रखते थे। एक छोटे से कमरे में अपने बढते परिवार के साथ रहते हुए भी, वे हमेशा दूसरों के प्रति अच्छे रहे। अगर आप कर्म पर भरोसा नहीं करते तो इस कहानी को सुनने के बाद आप भरोसा करने लगेंगे।

राजकुमार गुप्ता मुक्ति ग्रुप के संस्थापक, अध्यक्ष हैं। 1984 में उन्होंने पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में पहले आवासी अपार्टमेन्ट को लांच किया। अपनी आधुनिक वास्तु सेन्स के फलस्वरूप राजकुमार गुप्ता कोलकाता में हुगली बेल्ट पर बहुमंजिल निवासों का विचार लेकर भी आये। तब से मुक्ति ग्रुप बंगाल में एंटरटेनमेंट हब में मल्टीप्लेक्स, इंटरनेशनल होटल, लाउन्ज, फाइन डायन रेस्टोरेंट के साथ एक बड़ा खिलाड़ी बनकर उभरा है। लेकिन अभी भी राजकुमार गुप्ता का नाम इन्टरनेट पर उपलब्ध अन्य नामों की तरह आसानी से नहीं मिलता।

साधारण और नम्र व्यक्तित्व के गुप्ता का ध्यान ज्यादातर बिजनेस और चैरिटी कार्य केन्द्रित है। दो बार ‘दुनिया को आपकी कहानी से प्रोत्साहन मिलेगा’ कहने पर वो इंटरव्यू देने को राजी हुए। सफलता की इस ऊँचाई पर पहुँच कर भी वे बहुत विनम्र होकर बातचीत में शामिल हुए।

शुरुआत

‘मैं पंजाब में काफी गरीब परिवार में पैदा हुआ। वहां मैं अपनी पढ़ाई के लिए संघर्ष कर रहा था। फिर मैं कोलकाता आ गया और यहां मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की। 1978 में मैंने एक निजी संस्था में जब पहली नौकरी शुरू की तो उस वक़्त मेरा वेतन 60 रूपये महीना था। वहां कुछ साल बिताने बाद मैं हिन्दुस्तान मोटर्स में आ गया। वहां थोड़ा वेतन बढ़ा। इस नौकरी में मैंने पाँच-छ: साल गुज़ारे और यहां मैंने व्यापार के गुर सीखे। इसके बाद मैंने अपना व्यापार और सप्लाय का बिजनेस शुरु कर दिया।

परोपकार से कैसे बना सफलता का रास्ता

मैं 200 स्क्वायर फुट में परिवार के साथ रहता था। आज मैं आज आजादी से जी पा रहा हूँ। इसके लिए मैं अपनी जिंदगी को शुक्रियाअदा करता हूँ और उनके लिए कुछ करना चाहता हूँ जो मेरे जितने भाग्यशाली नहीं हैं। जब मैंने अपने दोस्तों से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि यह कैसे संभव है जब तुम्हारी अपनी गुज़र मुश्किल से हो पा रही है। मैंने उनसे कहा कि हम भी उस स्थिति में हो सकते थे। हम इस तरह जी रहे हैं तो किस्मत वाले हैं और इस वजह से हमें जरुरतमंदों को मदद देनी चाहिए। चैरिटी करने के लिए जरूरी नहीं है कि यह कोई बड़ी मात्रा में की जाये, आप छोटी-छोटी मदद नेक इरादों से कर सकते हैं। स्टेशन पर जरुरतमंदों को स्वच्छ पानी नहीं मिलता इसके लिए हम एक आदमी को मटके के साथ वहां बैठा देते हैं और वो लोगों को पानी पिलाता है। इसमें ज्यादा खर्चा नहीं आता और इसमें मेरे दोस्त भी सहयोग करते हैं। इसके बाद हमने गरीबों के लिए मुफ़्त दवाखाना शुरू किया। इसमें हमें आर्थिक नुकसान हुआ लेकिन वह ज्यादा नहीं था। हमने लोगों से पुराना फर्नीचर लिया और रोज़ कुछ समय निकल कर उसकी मरम्मत भी कराई। इस तरह हमने दवाखाने की शुरुआत की और इसका उद्घाटन हिन्दुस्तान मोटर्स के अध्यक्ष एनके बिरला ने किया।

राजकुमार गुप्ता और उनका परिवार
राजकुमार गुप्ता और उनका परिवार

इस तरह समाज सेवा में मेरा कद बढ़ा और मैं अच्छे ईमानदार लोगों के सम्पर्क में आया। उनमे से बहुत से लोग मेरे विचार को रूप देने के इच्छुक दिखे। मैंने अस्पताल, अपार्टमेंट काम्प्लेक्स के रूप में अपने प्रोजेक्ट उनके सामने रखे और इस तरह मेरी समाज सेवा ने मेरी किस्मत को मदद दी।

मुक्ति ग्रुप लोगो
मुक्ति ग्रुप लोगो

मुक्ति एयरवेज: एक टूटा हुआ सपना

मैं अपने जीवन में प्रसिद्ध और उपलब्धि नहीं चाहता हूँ। जब मुझे रियल इस्टेट के क्षेत्र में बहुत ही आकर्षक प्रस्ताव मिल रहे थे, तब मुझे कुछ बड़ा करने की खुजली होती थी। उस समय एशिया में एयरलाइन सेक्टर की शुरुआत हो रही थी और मैं इसका हिस्सा बनना चाहता था। इसलिए मैंने अपनी एयरलाइन शुरू करने की योजना बनायी।

निर्णय लेना आसान काम था। लेकिन मैं एयरोप्लेन के बारे में कुछ नहीं जनता था। मुझे पता चला कि प्लेन एअरपोर्ट से उड़ान भरते हैं और मुझे वहां जाना चाहिये। जब मैं वहां ऑफिस में गया और कहा “मैं एयरलाइन शुरू करना चाहता हूँ।”, तो ये सुनकर ऑफिस में हर कोई खड़ा हो गया। 1994 में बंगाल में शुरुआत करना गलत निर्णय था लेकिन में अड़ा हुआ था। तकनीकी बाधाओं को दूर करने के लिए अत्यंत उपयोगी अधिकारी थे और उन्होंने हमें सिखाया। तब हमने इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों की एक छोटी सी टीम को इकट्ठा किया।

मेरी प्रोजेक्ट रिपोर्ट 1 जनवरी 1995 जमा हुई। टाटा सिंगापुर एयरलाइंस की रिपोर्ट भी उसी दिन जमा हुई। मेरी रिपोर्ट को उड्डयन मंत्रालय द्वारा मंजूरी दे दी गयी, उनकी रिपोर्ट को नहीं दी गयी।

अपना लाइसेंस लेने से पहले मैं दिल्ली गया और वहां पर चपरासी से लेकर उड्डयन मंत्री गुलाम अली अय्यर से मिला। जब मैंने संयुक्त सचिव श्री मिश्रा से मुलाकात की तो उन्होंने बताया कि मेरा प्रस्ताव कितना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि वे एक ऐसे आदमी को लाइसेंस नहीं देंगे जिससे पास आवश्यक तकनीकी प्रशिक्षण और अन्य मापदंड नहीं हैं। मैंने उनसे कहा “मेरे पास इसमे से कुछ नहीं है लेकिन मैं एक अच्छा उद्यमी हूँ। मैं इसके लिए दूसरों को ले सकता हूँ और फाइनेंस का आयोजन कर सकता हूँ।” मेरी इस ईमानदारी से प्रभावित होकर उन्होंने मुझे लाइसेंस दे दिया।

अंतर्राष्ट्रीय हवाई जहाज विनिर्माण कंपनियों के साथ हमने जिस तरह के सौदों और बातचीत का आयोजन किया, वह देश में अपनी तरह का एक अलग ही किस्सा था। शुरू में हमें भारतीयों के बारे में यूरोपियन की पूर्वधारणा का खामियाजा सहन करना पड़ा। उन्होंने हमें गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन जब एक बार वे बिज़नस को समझे तो चीजें आसान हो गयी। जब हम एअरलाइंस शुरू करने वाले थे तभी उसी समय हर्षद मेहता घोटाला ने राष्ट्र को हिलाकर रख दिया। नई उदारवादी अर्थव्यवस्था में हलचल मच गयी। निवेशकों ने इस तरह के एक जोखिम भरे उद्यम को छूने से मना कर दिया और मुक्ति एयरवेज उड़ान भरने से पहले ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया।

असफलता और निराशा

एयरलाइन के असफल होने से मेरा दिल टूट गया। मैंने इसे बनाने में अपने जीवन के महत्वपूर्ण साल लगाये और यह मेरे से दूर हो रहा था। झटका तब लगा, जब वह टूट गया। कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि इसके बजाय मैंने रियल स्टेट में इतने साल लगाये होते तो आज हम इस क्षेत्र में देश के प्रमुख ख़िलाड़ी होते।

लेकिन मुड़कर पीछे देखने पर मुझे पता चला कि सफलता से हम आनन्दित तो हो सकते हैं, पर सही मायने में असफलता ही हमें सिखाती है। किसी दिन मैं मुक्ति एयरवेज एक वास्तविकता में बदलूंगा। तब तक मैंने जो हासिल किया है उससे मैं खुश हूँ।

जीवन में कुछ बड़ा करने वालों को संदेश

सफल होना प्रशंसनीय है, लेकिन आप केवल अपने बारे में सोच कर, जीवन में कहीं आगे नहीं बढ़ सकते। बड़ी तस्वीर के एक हिस्से के रूप में, खुद को देखो। वह काम करो जो मायने रखता है और दिल से करो। तब देखना जिंदगी आप को कहां ले जाती है।

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