लुधियाना की रहने वाली एक महिला उद्यमी ने इस तरह दिलाई भारतीय उद्योग को नई पहचान 

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करीब चार दशक पूर्व पंजाब के लुधियाना में शॉल का निर्माण करने वाले एक हैंडलूम आधारित उद्यम के रूप में अस्तित्व में आने वाला विचार आज देश में शॉल, स्कार्फ और स्टोलों का अग्रणी निर्माता और ब्रांड है।

अपनेे पति के साथ मृदुला
अपनेे पति के साथ मृदुला
मृदुला ने अंग्रेजी साहित्य से एमए करने का फैसला किया। पढ़ाई के दौरान ही उनके दोनों बेटों का जन्म हुआ। एमए की डिग्री लेने के बाद वे एक स्कूल में अध्यापन का काम करने लगीं।

शॉलों का निर्माण करने वाली अग्रणी कंपनी बिल्डिंग शिंगोरा कभी भी मृदुला के जीवन की प्राथमिकताओं में नहीं था लेकिन उन्होंने काफी मदद और समर्थन के बूते पर इस सफर को तय किया और सफलता पाई। 70 वर्षीय मृदुला जैन शॉल, स्कार्फ और स्टोलों के अग्रणी भारतीय लग्जरी ब्रांड शिंगोरा को स्थापित करने के अपने पूरे सफर का सारांश इन शब्दों में प्रकट करती हैंः 'एक चीज होती है जिसे अवसर कहा जाता है। भगवान आपको मौका देता है और आपको उसे लपकना होता है। जब भी मेरे सामने अवसर आए मैंने उन्हें दोनों हाथों से लपका। आज मैं जो भी हूं इसी वजह से हूं।'

करीब चार दशक पूर्व पंजाब के लुधियाना में शॉल का निर्माण करने वाले एक हैंडलूम आधारित उद्यम के रूप में अस्तित्व में आने वाला विचार आज देश में शॉल, स्कार्फ और स्टोलों का अग्रणी निर्माता और ब्रांड है। आज की तारीख में शिंगोरा, जिसका टर्नओवर करीब 100 करोड़ रुपये के आंकड़े को छूने के करीब है, करीब 100 खुदरा स्टोरों के माध्यम से पूरे देश में अपनी पहुंच बना चुका है और देश के कुल शॉल निर्यात के करीब 20 प्रतिशत की हिस्सेदारी का मालिक है।


शुरुआती दिन

एक रूढ़िवादी परिवार में जन्म लेने वाली मृदुला को उच्च शिक्षा के अपने मंसूबों को भूलकर विवाह को प्राथमिकता देने के लिये कहा गया। उन्होंने अपने परिवार वालों की इच्छाओं का मान रखते हुए लुधियाना के रहने वाले एक व्यवसायी से विवाह किया। लेकिन शादी के तुरंत बाद मृदुला ने अपने पति के सामने अपनी आगे पढ़ने की इच्छा व्यक्त की। वे कहती हैं, 'रूढ़िवादी भारतीय मर्दों से जुड़ी तमाम धारणाओं को पीछे छोड़ते हुए मेरे पति ने उच्च शिक्षा पूरी करने में मेरी मदद की।'

मृदुला ने अंग्रेजी साहित्य से एमए करने का फैसला किया। पढ़ाई के दौरान ही उनके दोनों बेटों का जन्म हुआ। एमए की डिग्री लेने के बाद वे एक स्कूल में अध्यापन का काम करने लगीं। वे कहती हैं, 'मैं हमेशा से ही काम करते हुए अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी। मैं अपने बेटों के लिये सिर्फ घर पर ही रहने वाली माँ नहीं बनना चाहती थी।' लेकिन मृदुला के लिये घर और काम दोनों को संभालना काफी मुश्किल और चुनौतीपूर्ण हो रहा था। इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया जिससे उन्हें काम करने और अपने बेटों कर परवरिश करने का मौका मिला।

मृदुला ने करीब 10 सालों से घर पर ही बच्चों को पढ़ाना जारी रखा और अंततः उन्हें महसूस हुआ कि उनकी आकांक्षाएं कहीं अधिक बड़ी हैं। उनकी हमेशा से ही फैशन में रुचि थी और इसके अलावा उनके मन में रंगों के प्रति भी जुनून था। वे बताती हैं कि शॉल निर्माताओं को यार्न (धागा) की आपूर्ति करने वाले एक भतीजे के साथ अचानक हुई बातचीत के दौरान उनके मन में शॉल निर्माण करने का विचार आया। उन्हें ऐसा लगा कि यह एक ऐसा काम है जो उनके मन को सुहाने वाला है और साथ ही उनके काम के लिये घर से निकलने की इच्छा को भी पूरा करता है।

वे कहती हैं, 'इस विचार ने मुझे एकदम ही प्रभावित किया। मैं खुद के पहनने के लिये इस्तेमाल होने वाले शॉलों से बिलकुल भी संतुष्ट और खुश नहीं थी। मुझे इस बात की अहसास हुआ कि शॉलों के लिये डिजाइन का पैटर्न सिर्फ दो या तीन तक ही सीमित था।' मृदुला को इस बात का अहसास हुआ कि शॉलों को अगर बिल्कुल नए डिजाइनों में प्रस्तुत करके और अधिक फैशनेबल बनाया जाए तो इनके बाजार में ऐतिहासिक बदलाव लाया जा सकता है। उन्होंने इस विचार को अपने पति के साथ साझा किया और उन्होंने बिना क्षण गंवाए उनके नए सफर में मदद करने को हामी भर दी।

मृदुला कहती हैं, 'मेरे पति अपने एक परिचित से मेरे लिये आठ हथकरघे लाए ताकि मैं अपने खुद के शॉलों का निर्माण शुरू कर सकूं।' मृदुला ने पंजाब की फलकारी नामक विशिष्ट कला तकनीक पर आधारित डिजाइन पैटर्न के साथ शॉल बनाना शुरू किया। वे कहती हैं, 'मेरे डिजाइनों के पैटर्न बिल्कुल नए थे और इन्होंने तुरंत ही हर खरीदार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।' वे याद करती हैं कि कैसे उन्हें पहला ऑर्डर 10 लाख रुपये का मिला था।

बीतते सालों के साथ मृदुला ने अपने व्यापार को संचालित करने के साथ ही शॉल क्लब और वूल एसोसिएशन ऑफ लुधियाना की स्थापना में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके अलावा उन्हें वूल उद्योग का अध्ययन करने और श्रेष्ठ तकनीक को भारत लाने के लिये सरकार द्वारा यूरोप यात्रा पर भी भेजा गया। वे कहती हैं, 'मुझे महसूस हुआ कि कपड़े के उत्पादन को सिर्फ हथकरघा तक सीमित करना हमारे विकास में बड़ी बाधा डाल रहा था। हमारे सामने आगे बढ़ने के लिये सिर्फ एक ही रास्ता था और वह था उत्पादन को बढ़ाना जो सिर्फ पावरलूम (बिजली से चलने वाले करघे) के जरिये ही संभव था।

हालांकि उस समय के भारतीय कानूनों के हिसाब से कपड़ा बनाने के लिये पावरलूम का उपयोग प्रतिबंधित था। करीब पांच से छः वर्ष तक सरकार के साथ चले वार्ताओं के दौर के बाद मृदुला और वूल एसोसिएशन और शॉल क्लब के प्रतिनिधि पावरलूम के आयात और उपयोग पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून में बदलाव करवाने में सफल रहे। वे कहती हैं, 'इसके बाद ही न केवल हमारा व्यापार काफी फला-फूला बल्कि समूचे भारत में ऊन का उद्योग बढ़ने में सफल रहा है।'

मृदुला याद करते हुए बताती हैं कि कैसे वर्ष 1995-96 के बाद सबकुछ उनके व्यापार के बिल्कुल अनुकूल रहा। पावरलूम का इस्तेमाल करने वाला कानून लागू हो गया था जिसके चलते वैश्विक बाजारों तक पहुंच बढ़ी और इसी बीच उनका बेटा अमित अमरीका से टेक्स्टाइल का अध्ययन करके वापस लौट आया।

तकनीक को अपनाना

अमित वर्ष 1996 में अपनी माँ के साथ व्यापार में जुड़े और वे शुरू से ही व्यापार में नवीनतम तकनीक को अपनाने के इच्छुक थे। वे कहते हैं, 'मैंने अपनी माँ को जर्मनी से दो मशीनों को आयात करने की राय दी जिनकी कीमत करीब 50 लाख रुपये प्रति मशीन थी। इसके अलावा मैंने 30,000 डॉलर का एक डिजाइनिंग सॉफ्टवेयर भी खरीदने का प्रस्ताव रखा।'

उस समय जब पूरे व्यापार जगत ने जिसमें सरकारी विशेषज्ञ भी शामिल थे, ने अमित के इस प्रस्ताव और विचार को बिल्कुल बेकार बताया, मृदुला ने अपने बेटे में विश्वास जताया और उनके प्रस्तावों पर पैसा लगाने का फैसला किया। इसके बाद से ही शिंगोरा के विकास का ग्राफ ऊपर की तरफ ही गया है।

एक सफल ब्रांड तैयार करना

अमित कहते हैं, 'आप सिर्फ मेट्रो शहरों के भरोसे नहीं रह सकते। आपके लिये यह जानना और समझना काफी महत्वपूर्ण है कि एक इंडिया भी है और फिर इसके अलावा एक भारत भी है। जब भारत की विनिर्माण क्षमता और इंडिया की मार्केटिंग क्षमता का मिलन होता है तो उसके नतीजे के रूप में एक ऐसा मजबूत भारतीय ब्रांड सामने आता है जो न सिर्फ भारतीय बाजार में ही हिट होगा बल्कि अंर्तराष्ट्रीय बाजार में भी कोई उसका मुकाबला करने वाला नहीं होगा।'

अगर मृदुला समय रहते जोखिम उठाने का जज्बा नहीं दिखातीं और तकनीकी प्रगति के लिये निवेश करने से अपने कदम पीछे खींचतीं तो आज शिंगोरा फैशन की दुनिया का इतना बड़ा नाम बिल्कुल भी न बन पाता। किसी भी उद्यमी के लिये सामने आने वाली चुनौतियों में अवसरों को तलाशना और एक ऐसे समय में जब पूरी दुनिया आपके काम में विश्वास न करे उस समय बड़े और कड़े निर्णय बेहद महत्वपूर्ण हैं और मृदुला इस बात का एक जीता-जागता उदाहरण हैं।

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