सिर्फ 'आधा गांव' नहीं, सबकी राह के रहे राही मासूम रज़ा

राही मासूम रज़ा की जिंदगानी

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धारावाहिक 'महाभारत' के संवाद से राही का एक दुखद प्रसंग जुड़ा है। जब निर्माता-निर्देशक बीआर चोपड़ा ने उनसे गुज़ारिश की, वक़्त न होने के बहाने इंकार कर दिया। जब उन पर साम्प्रदायिक जुमलेबाजियां होने लगीं, फिर तो उन्होंने इस ऐतिहासिक सीरियल के ऐसे डॉयलाग लिखे कि पूरी दुनिया उनकी कलम का लोहा मान गई।

उन्हें पचहत्तर उपन्यासों 'टोपी शुक्ला', 'सीन 75', 'कटरा बी आर्ज़ू', 'नीम का पेड़', 'मैं एक फेरीवाला', 'शीशे का मकां वाले', 'ग़रीबे शहर' के साथ उर्दू में एक महाकाव्य '1857' (क्रांति कथा) आदि नाम से भी अपार प्रसिद्धि मिली। 

हिंदी-उर्दू साहित्य की बेजोड़ कथाकृति 'आधा गांव' प्रसिद्ध टीवी सीरियल 'महाभारत' की पटकथा और अपनी लोकप्रिय कविताओं, नज़्मों से हिंदुस्तान के घर-घर में जाने-पहचाने गए भारतीय साहित्य के स्तंभ राही मासूम रज़ा का 01 सितम्बर को जन्म दिन होता है। मूलतः गाजीपुर (उ.प्र.) के एक सुशिक्षित शिया परिवार में जन्मे एवं जिंदगी का आखिरी बड़ा हिस्सा मुंबई में गुजार देने वाले इस बेमिसाल शायर और लेखक ने 1965 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए वीर अब्दुल हमीद की जीवनी पर आधारित पहली कृति 'छोटे आदमी की बड़ी कहानी' लिखी थी। उनके जिंदगीनामे की छानबीन से पता चलता है कि जब वह इलाहाबाद में थे, अलग-अलग नामों से रूमानी दुनिया के लिए पन्द्रह-बीस उपन्यास उर्दू में लिखे थे, जिनमें कई एक गुम हो गए। उनके छपने की नौबत ही नहीं आई। अपनी अत्यंत लोकप्रिय औपन्यासिक कृति 'आधा गाँव' पर राही लिखते हैं - 'उपन्यास वास्तव में मेरा एक सफर था। मैं ग़ाज़ीपुर की तलाश में निकला हूं लेकिन पहले मैं अपनी गंगोली में ठहरूंगा। अगर गंगोली की हक़ीक़त पकड़ में आ गयी तो मैं ग़ाज़ीपुर का एपिक लिखने का साहस करूंगा।' उनकी कृति 'मैं एक फेरी वाला' इस कविता से उनके शब्दों की लाजवाब तासीर का पता चलता है -

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो।
मेरे उस कमरे को लूटो
जिस में मेरी बयाज़ें जाग रही हैं
और मैं जिस में तुलसी की रामायण से सरगोशी कर के
कालिदास के मेघदूत से ये कहता हूँ
मेरा भी एक सन्देशा है
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो।
लेकिन मेरी रग रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है,
मेरे लहू से चुल्लु भर कर
महादेव के मुँह पर फेको,
और उस जोगी से ये कह दो
महादेव! अपनी इस गंगा को वापस ले लो,
ये हम ज़लील तुर्कों के बदन में
गाढ़ा, गर्म लहू बन-बन के दौड़ रही है।

राही के पिता गाजीपुर की ज़िला कचहरी में वकालत करते थे। प्रारम्भिक शिक्षा ग़ाज़ीपुर में हुई। बचपन में पैर में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गयी थी, लेकिन इंटरमीडियट करने के बाद वह अलीगढ़ आ गये और उच्च शिक्षा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई। वर्ष 1960 में एम.ए. फिर 1964 में 'तिलिस्म-ए-होशरुबा' पर पीएचडी करने के बाद राही दो वर्ष उसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे। इसी शहर के मुहल्ला 'बदरबाग' में रहते हुए उन्होंने विश्व साहित्य जगत को 'आधा गाँव', 'दिल एक सादा काग़ज़', 'ओस की बूंद', 'हिम्मत जौनपुरी' आदि से समृद्ध किया। परिस्थितिवश उन्हें अध्यापन कार्य छोड़ना पड़ा और सन् 1968 में वह रोज़ी-रोटी की तलाश में मुंबई पहुंच गये। वहां साहित्य-सृजन के साथ उन्होंने कुल तीन सौ फ़िल्मों की पटकथा-संवाद और दूरदर्शन के लिए सौ से अधिक धारावाहिक लिखे, जिनमें 'महाभारत' और 'नीम का पेड़' अविस्मरणीय रहे।

उन्हें पचहत्तर उपन्यासों 'टोपी शुक्ला', 'सीन 75', 'कटरा बी आर्ज़ू', 'नीम का पेड़', 'मैं एक फेरीवाला', 'शीशे का मकां वाले', 'ग़रीबे शहर' के साथ उर्दू में एक महाकाव्य '1857' (क्रांति कथा) आदि नाम से भी अपार प्रसिद्धि मिली। उर्दू में उनका पहला उपन्यास 'मुहब्बत के सिवा' और पहली किताब ‘नया साल मौज-ए-गुल में मौज-ए-सबा' के बाद ‘रक्स-ए-मैं' ने भी उन्हे शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचाया। 'मैं तुलसी तेरे आँगन की' फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्म फ़ेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। गंगा-यमुना संस्कृति की प्रतीक राही आजीवन देश की पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्फुट-स्तंभ लेखन भी करते रहे। 15 मार्च, 1992 को मुंबई में ही उनका इंतकाल हो गया था। राही की इस ग़ज़ल की लाइनें आज भी लोगों की जुबान पर तैरती रहती हैं -

सब डरते हैं, आज हवस के इस सहरा में बोले कौन।
इश्क तराजू तो है, लेकिन, इस पे दिलों को तौले कौन।
सारा नगर तो ख्वाबों की मैयत लेकर श्मशान गया
दिल की दुकानें बंद पड़ी है, पर ये दुकानें खोले कौन।
काली रात के मुँह से टपके जाने वाली सुबह का जूनून
सच तो यही है, लेकिन यारों, यह कड़वा सच बोले कौन।
हमने दिल का सागर मथ कर काढ़ा तो कुछ अमृत
लेकिन आयी, जहर के प्यालों में यह अमृत घोले कौन।
लोग अपनों के खूँ में नहा कर गीता और कुरान पढ़ें
प्यार की बोली याद है किसको, प्यार की बोली बोले कौन।

लोकप्रिय धारावाहिक 'महाभारत' के संवाद लिखने के साथ राही के जीवन का एक बड़ा दुखद प्रसंग जुड़ा हुआ है। जब निर्माता निर्देशक बीआर चोपड़ा ने इसके लिए उनसे गुज़ारिश की तो समय की कमी का हवाला देते हुए उन्होंने मांग ठुकरा दी थी, जबकि बीआर चोपड़ा एक संवाददाता सम्मेलन में उनके नाम की घोषणा भी कर चुके थे। जब कुछ लोग उन पर दुखी करने वाली साम्प्रदायिक टिप्पणियां करने लगे, फिर तो उन्होंने इस ऐतिहासिक सीरियल के ऐसे डॉयलाग लिखे कि पूरी दुनिया ने उनकी कलम का लोहा मान लिया। एक संस्मरण में राही बयान करते हैं कि ‘हिंदू धर्म के स्वयंभू संरक्षकों ने इसका विरोध किया और पत्र पर पत्र आने शुरू हो गए, जिनमें लिखा था- क्या सभी हिंदू मर गए हैं, जो चोपड़ा ने एक मुसलमान को इसके संवाद लेखन का काम दे दिया।’ चोपड़ा ने वे सारे पत्र राही साहब के पास भेज दिए। इसके बाद अगले ही दिन राही ने चोपड़ा से फोन पर कहा- 'मैं महाभारत लिखूंगा। मैं गंगा का पुत्र हूं। मुझसे ज़्यादा भारत की सभ्यता और संस्कृति के बारे में कौन जानता है। मुझे बहुत दुख हुआ। मैं हैरान था कि एक मुसलमान द्वारा पटकथा लेखन को लेकर इतना हंगामा क्यों किया जा रहा है। क्या मैं एक भारतीय नहीं हूं।’ अपनी कविताओं में राही ने फिरकपरस्ती, सरमायेदारी पर बार-बार चोट किए। 'हम तो हैं कंगाल' शीर्षक नज़्म में उन्होंने अपने हालात कुछ इस तरह बयान किए कि पढ़ते ही आंखें नम हो लेती हैं-

हम तो हैं कंगाल
हमारे पास तो कोई चीज़ नहीं
कुछ सपने हैं आधे-पूरे
कुछ यादें हैं उजली-मैली
जाते-जाते आधे-पूरे सारे सपने
उजली-मैली सारी यादें
हम मरियम को दे जाएंगे
गंगोली के कच्चे घर में उगने वाला सूरज
आठ मुहर्रम की मजलिस का अफसुर्दा-अफसुर्दा हलवा
आँगन वाले नीम के ऊपर
धूप का एक शनासा टुकड़ा
गंगा तट पर चुप-चुप बैठा
जाना-पहचाना इक लम्हा
बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई
अहमद जान के टेबल की चंचल पुरवाई
खाँ साहिब की ठुमरी की कातिल अंगड़ाई
रैन अँधेरी, डर लागे रे
मेरी भवाली की रातों की ख़ौफ़ भारी लरज़ाँ तन्हाई
छोटी दव्वा के घर की वो छोटी सी सौंधी अँगनाई
अम्मा जैसा घर का आँगन, अब्बा जैसे मीठे कमरे
दव्वा जैसी गोरी सुबहें, माई जैसी काली रातें
सब्ज़ परी हो या शहज़ादा
सबकी कहानी दिल से छोटी
फड़के घर में आते-आते
हर लम्हे की बोटी-बोटी
मेरे कमरे में नय्यर पर हँसने का वो पहला दौरा
लम्हों से लम्हों की क़ुरबत
लम्हों से लम्हों की दूरी
गंगोली की, गंगा तट की
ग़ाज़ी पुर की हर मजबूरी
मेरे दिल में नाच रही है
जिन-जिन यादों की कस्तूरी
धुंधली गहरी, आधी-पूरी
उजली-मैली सारी यादें मरियम की हैं
जाते-जाते हम अपनी ये सारी यादें
मरियम ही को दे जाएँगे,
अच्छे दिनों के सारे सपने मरियम के हैं
जाते-जाते मरियम ही को दे जाएँगे
मरियम बेटी, तेरी याद की दीवारों पर
पप्पा की परछाई तो कल मैली होगी
लेकिन धूप तिरी आँखों के
इस आँगन में फैली होगी।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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