2014 में मोदी को जिताने वाले 10% अस्थिर वोटर बिहार चुनाव में निभाएंगे अहम भूमिका

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भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को बिहार में भी दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे बुरी तरह सता रहे हैं। बार-बार दोहराये जाने वाली एक बहुत पुरानी कहावत है कि 

‘‘जो इतिहास से सबक नहीं लेते वे उसे दोहराने के लिये बाध्य होते हैं और पहली बार त्रासदी के रूप में और दूसरी बार तमाशे के रूप में दोहराते हैं।’’ 

अगर भाजपा चतुर और बुद्धिमान होती तो उसने दिल्ली में बड़े पैमाने पर हुई अपनी हार से कोई सबक सीखा होता और उसके अनुसार समन्वय किया होता। लेकिन अहंकार बहुत घातक होता है। विशेषकर सत्ता और विचारधारा का अहंकार तो किसी भी महान व्यक्ति की आंखों पर भी पर्दा डाल देता है। वास्तव में बिहार चुनाव में बिल्कुल यही हो रहा है और दिल्ली के बाद मोदी और भाजपा के लिये यह एक और पूर्ण पराजय का कारण बन रही है जो प्रधानमंत्री की मूल कमजोरी साबित हुई।

तस्वीर सौजन्य-shutterstock.com
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दिल्ली चुनावों के दौरान मैंने एक बात कही थी और लोगों ने उस वक्त मेरी इस बात को नहीं माना था। उस समय मैंने कहा था कि हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में मोदी की जीत सकारात्मक वोट को पाने के कारण नहीं हुई थी बल्कि एक ‘वास्तविक विकल्प’ की अनुपस्थिति इसका मुख्य कारण थी। मतदाता अपने सामने मौजूद राजनीतिक व्यवस्था से तंग आ चुके थे और उन्हें मोदी और भाजपा दूसरों के मुकाबले अधिक बेहतर दिखाई दी। इसीलिये लोगों ने उनमें ‘पूर्ण’ विश्वास न दिखाते हुए ‘आंशिक’ विश्वास जताया। लेकिन दिल्ली एक बिल्कुल ही अलग खेल साबित हुआ। आम आदमी पार्टी (आप) की साख बहुत अच्छी थी और यह ताजी हवा के एक झोंके की तरह सामने आई। इसने एक बिल्कुल नई तरीके की राजनीति की बात की, स्वच्छ राजनीति की, ईमानदार राजनीति की। और इन्होंने इस बारे में सिर्फ बात ही नहीं की बल्कि वर्ष 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान और फिर 49 दिन की अपनी सरकार के कार्यों से इस बात को साबित भी किया। आप के रूप में दिल्ली की जनता के सामने एक ‘वास्तविक’ विकल्प था और यही दिल्ली के चुनावों में साफतौर पर परिलक्षित भी हुआ था।

दिल्ली ने भारतीय चुनाव के इतिहास में एक बिल्कुल नए उभरते हुए माॅडल को पेश किया। वर्ष 2009 के बाद से यह माॅडल ठोस परिणाम प्रस्तुत कर रहा है। वर्ष 2009 में जब सबने मनमोहन सिंह को चुका हुआ मान लिया था तब कांग्रेस 200 सीटों को पार पाने में सफल रही और भाजपा बुरी तरह चारों खाने चित्त हुई। यह एक बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था का परिणाम था। चूंकि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे इसलिये इसका श्रेय उन्हें दिया गया। यह इस सच्चाई का साफ प्रतिबिंब था कि लोग ‘रूढ़िवादी पहचान’ के इर्दगिर्द होने वाले चुनावों से आजिज आ चुके थे। वे चाहते थे कि बहस असली मुद्दों पर हो और इन्हीं पर वोट भी डाले जाएं जिसे मैं ‘‘भारतीय चुनावों का आधुनिकीकरण’’ कहता हूँ।’’

राजनीतिक पंडित इस बात को भूल गए कि इससे पहले के चुनावों में भी 4 से 6 प्रतिशत तक अस्थिर (Floating Voters) मतदाता होते हैं जो बिल्कुल अंतिम समय पर यह निश्चित करते हैं कि उन्हें किसे वोट देना है। बीते कुछ वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण और आधुनिक प्रौद्योगिकी की बढ़ती हुई पहुंच के चलते ऐसे मतदाताओं की संख्या बढ़कर 8 से 10 प्रतिशत तक पहुंच गई है। ऐसे मतदाता जाति, पंथ, धर्म, लिंग, जोड़-तोड़, धनबल, बाहुबल और मदिरा की ताकत पर चलने वाली परंपरागत राजनीति से घृणा करती है। ये फैसले बहुत सोच-समझकर लेते हैं। यह वह वर्ग है जिसने अन्ना आंदोलन का जबर्दस्त समर्थन किया और बाद में जब मोदी ने गैर-सांप्रदायिक मुद्दों पर आधारित अपने अभियान का आगाज करते हुए अपनी सांप्रदायिक छवि को पीछे छोड़ते हुए खुद को ऐसे प्रस्तुत किया जो देश को सभी बुराइयों से मुक्त करवा देगा। लोगों ने उन्हें अभूतपूर्व समर्थन दिया और वे प्रधानमंत्री बनने में सफल हुए। लेकिन उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद इस वर्ग की निराशा को बढ़ाते हुए उनके वैचारिक मित्रों ने लगातार भड़काऊ भाषण देना शुरू कर दिया और इसके चलते सांप्रदायिक और विशेष समुदाय और कुछ व्यक्तियों को अपना निशाना बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी। मोदी को ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया।

दिल्ली विधनसभा चुनावों के दौरान मोदी की प्रचार की शैली, उनकी भाषा, अरविंद केजरीवाल के खिलाफ उनका विषवमन और गौण मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित करने की उनकी रणनीति ने उन्हें दिल्ली की जनता के सामने उजागर कर दिया। मोदी अपनी खासियत को भी खोते गए। अरविंद और आप नई-विकसित-आधुनिक-राजनीति के महीसा के रूप में उभरकर सामने आए। आप ‘असली’ विकल्प के रूप में सामने आई और भाजपा उसी पुरानी राजनीति का प्रतिबिंब। दिल्ली के फैसले ने मेरे तर्कों को सही साबित किया। कुछ इसी प्रकार की बातें बिहार में भी हो रही हैं। भाजपा और मोदी वहां भी उन्हीं गलतियों को दोहरा रहे हैं। बिहार चुनावों के बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि दिल्ली की तरह वहां भी लोगों में नीतीश कुमार के प्रति अपार विश्वास दिखाई दे रहा है। यह अपने आप में काफी उल्लेखनीय है क्योंकि वे पिछले नौ वर्षों से मुख्यमंत्री हैं। उनके खिलाफ कोई सत्ता विरोधी लहर दिखाई नहीं दे रही है। उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जा रहा है जिसने राज्य के चेहरे को ही बदलकर रख दिया है और जो सिर्फ विकास में यकीन रखता है। भाजपा द्वारा बेहद मजबूत मीडिया कैंपेन और बड़े पैमाने पर किये जा रहे प्रचार के बावजूद रिपोर्ट बताती हैं कि मुख्यमंत्री के रूप में वे लोगों की पहली पसंद हैं और मोदी से वैसे ही अधिक लोकप्रिय हैं जैसे दिल्ली में अरविंद उनसे कहीं आगे थे।

यह भारतीय राजनीति में एक बहुत महत्वपूर्ण विकास है। नीतीश की लोकप्रियता और स्वीकार्यता सभी जातियों और वर्गों में है। यह उनके लिये वास्तव में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि ऐसा बिहार में हो रहा है जहां राजनीति जाति से और केवल जाति से ही परिभाषित की जाती है। ऐसे में नीतीश विकास की बातें कर रहे हैं। मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल उनके पक्ष में एक मजबूत कारक के रूप में काम कर रहा है। इसमें कोई शक नहीं है कि लालू प्रसाद यादव के साथ उनका गठबंधन उनके पक्ष में साबित हो रहा है क्योंकि इसके चलते एक निश्चित वर्ग का वोट उनके खाते में आएगा। लेकिन वे 10 प्रतिशत अस्थिर मतदाता मजबूती से उनके पीछे खड़े दिखाई दे रहे हैं, जिनका निर्णय संतुलन को नीतीश के पक्ष में बदलने में कारगर साबित होगा।

यही 10 प्रतिशत आखिरकार निर्णायक साबित होंगे। यही वह 10 प्रतिशत था जो 2014 में मोदी के पक्ष में खड़ा था। लेकिन मोदी और भाजपा ने इस 10 प्रतिशत को अपने लिये मतदान करने और सोचने पर मजबूर नहीं किया और ये सिर्फ आरक्षण, मांस पर प्रतिबंध, ऊंची और नीची जाति, हिंदु-मुसलमान, दलित-महादलित, अगड़े-पिछड़े के बारे में ही बात कर रहे हैं। अख़लाक की हत्या और उसके बाद भाजपा नेताओं द्वारा दिये गए भड़काऊ बयान और मोदी की चुप्पी ने इस 10 प्रतिशत को और अधिक नाराज कर दिया है। सच कहूं तो मोदी ने इस ‘‘नए-उभरते-आधुनिक-वर्ग’’ के विश्वास को तोड़ दिया है जिसनें उन्हें वर्ष 2014 में यह सोचकर मत दिया था कि वे पारंपरिक राजनीति के खिलाडि़यों से अलग हटकर हैं। मोदी ने इस वर्ग को निराश तो जरूर किया है लेकिन इसके चलते भारतीय-चुनाव-के-आधुनिकीकरण की प्रक्रिया बिहार में नहीं रुकेगी बल्कि यह किनारों को और अधिक पैना करेगी और पारंपरिक राजनीति की सतह को कमजोर करेगी। यह हम सबके लिये सीखने को एक बेहतरीन सबक है।

(यह लेख मूलतः अंग्रेजी में लिखा गया है और इसके लेखक पत्रकार से आम आदमी पार्टी के नेता बने आशुतोष हैं। इसमें प्रस्तुत सभी विचार लेखक के निजी हैं।)