हरियाणा के 'मोचीराम' पर लट्टू हुए आनंद महिंद्रा

हरियाणा के 'मोचीराम' को आनंद महिंद्रा ने खोज निकाला, मदद करने के लिए भेजी अपनी टीम...

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महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन आनंद महिंद्रा हरियाणा के जींद के एक मोची नरसीराम पर मेहरबान हुए हैं। उनकी एक सड़क छाप दुकान पर लिखा है- 'जख्मी जूतों का हस्पताल'। आनंद चाहते हैं, नरसीराम आइआइएम के छात्रों को मॉर्केटिंग पढ़ाएं। नरसीराम के लिए एक अनोखे स्टार्टअप में वह धन भी निवेश करने जा रहे हैं। उनकी टीम इस काम में जुट गई है।

आनंद महिंद्रा
आनंद महिंद्रा
आनंद महिंद्रा देश के एक बड़े उद्योगपति हैं। अब उन पर इस अनोखे ‘स्टार्टअप’ में निवेश धुन समाई है। उन्होंने अपने काम की मार्केटिंग के लिए जो तरीका अपनाया है, एकदम से लाजवाब है। उनके आइडियल ‘डॉक्टर साहब’ भी जूतों की मरम्मत के लिए जर्मन तकनीक के इस्तेमाल का दावा कर रहे हैं। 

महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन आनंद महिंद्रा ने एक ट्वीट क्या किया, सोशल मीडिया पर बेइंतहा वाहवाही का शोर-सा मचा हुआ है। उनकी नजर हरियाणा के एक मोची पर जा टिकी और वह 'जख्मी जूते का इलाज' करने वाले उस शख्स पर मेहरबान हो उठे। कहने लगे कि ऐसे लोगों को आइआइएम (भारतीय प्रबंधन संस्थानों (IIM) में पढ़ाने का मौका देना चाहिए। वह उस मोची को एक अच्छा डिजायन किया हुआ वर्कस्पेस देंगे। इसके साथ ही उनकी टीम मोची के लिए ठिकाने की डिजायन बनाने में जुट गई है। फिलहाल, आनंद महिंद्रा की इस अनायास की मेहरबानियों की बात बाद में, पहले आइए, भारतीय मोचियों की जिंदगी के कुछ पन्ने पलट लेते हैं।

जिंदगी का दर्द जानना है तो एक नजर अपनी आसपास की सड़कों के किनारे चिलचिलाती धूप, बारिश, ठंड में मौसम की परवाह किए बगैर रॉपी लेकर रोजी-रोटी की साधना करते किसी मोची को गौर से देख-जान लीजिए। देखिए न कि जूतों की सिलाई-सफाई करते-करते नेरूल (मुंबई) के मोची मनोज पुर्बे किस तरह देखते ही देखते अपने इलाके के स्टार बन गए क्योंकि उन्होंने नेत्रहीन आवारा कुत्तों की सेवकाई में अपना वक्त झोक दिया। इस तरह की सेवकाई की शुरुआत हुई ऐसिड अटैक से आंखें गंवा चुके मोती नाम के एक कुत्ते की जिंदगी में दाखिल होकर। सड़क किनारे ठीया जमाए मोती शराबियों की गंध मिलते ही भौंकने लगता। जब मनोज पुर्बे ने उसे सड़क किनारे कराहते देखा तो उठाकर क्लिनिक में भर्ती करा दिया।

उसके बाद तो ऐसे कुत्तों की सेवकाई में वे जुट गए। पिछले छह-सात सालों से यह सिलसिला जारी है। एक मोची की जिंदगी तो वैसे ही अपने हालात से दो-चार होती रहती है, जब इस कदर अपनी मनुष्यता का परिचय देता है, खाए-अघाए बेपरवाह बाकियों को देख-सोच कर तमाम तरह के प्रश्न बहुत कुछ कहने को उकसाने लगते हैं। शायद इसी तरह के उकसावे में कभी क्रांतिधर्मी कवि धूमिल ने किसी 'मोचीराम' पर एक लम्बी कविता लिख डाली होगी। वैसे भी धूमिल की कविताएँ आम जन की भाषा में उसके दर्द को, उसके विद्रोह को व्यक्त करती हैं, साथ ही समाज और व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करती है। अपनी 'मोचीराम' कविता के बहाने धूमिल एक साथ समाज की तमाम विसंगतियों की ओर हमारा ध्यान खींचते हैं, साथ ही जाति-वर्ण व्यवस्था पर चोट करते हुए मध्य वर्ग के झूठे आत्मगौरव और दिखावे को नंगा कर देते हैं। 'मोचीराम' कविता की कुछ पंक्तियां -

राँपी से उठी हुई आँखों ने मुझे क्षण-भर टटोला
और फिर जैसे पतियाये हुए स्वर में वह हँसते हुए बोला-
बाबूजी सच कहूँ- मेरी निगाह में न कोई छोटा है, न कोई बड़ा है
मेरे लिये, हर आदमी एक जोड़ी जूता है,
जो मेरे सामने मरम्मत के लिये खड़ा है।
और असल बात तो यह है कि वह चाहे जो है, जैसा है, जहाँ कहीं है
आजकल कोई आदमी जूते की नाप से बाहर नहीं है
फिर भी मुझे ख्याल है रहता है कि पेशेवर हाथों और फटे जूतों के बीच
कहीं न कहीं एक आदमी है जिस पर टाँके पड़ते हैं,
जो जूते से झाँकती हुई अँगुली की चोट छाती पर
हथौड़े की तरह सहता है।
यहाँ तरह-तरह के जूते आते हैं
और आदमी की अलग-अलग ‘नवैयत’ बतलाते हैं
सबकी अपनी-अपनी शक्ल है, अपनी-अपनी शैली है
मसलन एक जूता है: जूता क्या है- चकत्तियों की थैली है....
मैं चकत्तियों की जगह आँखें टाँकता हूँ
और पेशे में पड़े हुये आदमी को बड़ी मुश्किल से निबाहता हूँ।
....नामा देते वक्त साफ ‘नट’ जाता है, शरीफों को लूटते हो’ वह गुर्राता है
और कुछ सिक्के फेंककर आगे बढ़ जाता है
अचानक चिंहुककर सड़क से उछलता है और पटरी पर चढ़ जाता है
चोट जब पेशे पर पड़ती है तो कहीं-न-कहीं एक चोर कील दबी रह जाती है
जो मौका पाकर उभरती है, और अँगुली में गड़ती है।
....मैं जानता हूँ कि ‘इन्कार से भरी हुई एक चीख़’ और ‘एक समझदार चुप’
दोनों का मतलब एक है- भविष्य गढ़ने में ,’चुप’ और ‘चीख’
अपनी-अपनी जगह एक ही किस्म से अपना-अपना फ़र्ज अदा करते हैं।

कमोबेश हर मोचीराम की जिंदगी का दर्द कमोबेश इसी रंग-रूप का है, सड़क की जिंदगी में जो गुजरने वाले किसी-किसी के दिल में कभी-कभार हूक जाया करता है। पिछले दिनो ये हूक महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन आनंद महिंद्रा के दिल में भी फूट पड़ी और उन्होंने ट्वीट कर डाला। खबरची उनके ट्वीट किए एक-एक शब्द ले उड़े तो दुनिया जान गई कि हरियाणा के किसी मोचीराम पर उनकी अगाध कृपादृष्टि हो गई है। इस 'मोचीराम' का नाम है नरसीराम, जिनकी सड़क छाप दुकान के बैनर पर साफ-साफ अस्पताली अंदाज में लिखा है- 'जख्मी जूतों का हस्पताल', ओपीडी सुबह 9 बजे से दोपहर 1 बजे तक, लंच का समय- दोपहर 1 बजे से 2 बजे तक, लंच के बाद अस्पताल शाम 2 बजे से 6 बजे तक, हमारे यहां सभी किस्म के जूतों का इलाज जर्मन तकनीक से किया जाता है।'

इसे पढ़कर महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन को लगा- अरे, ये आदमी तो आइआइएम के स्टुडेंट्स को बहुत अच्छे से मार्केटिंग पढ़ा सकता है। फिर क्या था, तुरत-फुरत उनकी खींची तस्वीर सविवरण सोशल मीडिया पर तेजी से दौड़ पड़ी। उधर 'जख्मी जूतो का डॉक्टर' उनके मन में इस कदर समा गया कि उन्होंने वह उसके साथ बिजनेस तक करने के बारे में सोच बैठे। यहां तक सोच लिया कि उसके साथ किस तरह पैसा निवेश किया जाए। इसके लिए उन्होंने लोगों से ढूंढ निकालने की गुजारिश की। आखिरकार अब उन्हें नरसीराम के रूप में जूतों का डॉक्टर मिल चुका है। उनकी टीम ने मोची का पता लगा लिया है। आनंद महिंद्रा कुछ इस तरह ट्वीट करते हैं- 'हरियाणा में हमारी टीम उनसे मिली और पूछा कि हम कैसे उनकी मदद कर सकते हैं। बिल्कुल साधारण और नम्र नरसी जी ने पैसे नहीं मांगे। उन्होंने काम करने के लिए बेहतर जगह की जरूरत के बारे में बताया। मैंने अपनी डिजाइन टीम को चलती-फिरती दुकान डिजाइन करने को कहा है।' वाह यूनीक आइडिया! नरसीराम का 'जख्मी जूतों का हस्पताल' हरियाणा के जींद शहर में है।

आनंद महिंद्रा देश के एक बड़े उद्योगपति हैं। अब उन पर इस अनोखे ‘स्टार्टअप’ में निवेश धुन समाई है। उन्होंने अपने काम की मार्केटिंग के लिए जो तरीका अपनाया है, एकदम से लाजवाब है। उनके आइडियल ‘डॉक्टर साहब’ भी जूतों की मरम्मत के लिए जर्मन तकनीक के इस्तेमाल का दावा कर रहे हैं। इस पेशे में जर्मन तरीका क्या है, यह अभी पता नहीं चला है। फिलहाल आनंद महिंद्रा उनकी मार्केटिंग स्किल पर फिदा हैं। उन्हे लग गया है कि ये ‘डॉक्टर साहब’ इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में मार्केटिंग का टीचर बन सकते हैं। वह ये भी बताते हैं कि ‘जख्मी जूतों के हस्पताल’ की तस्वीर उन्हें व्हाट्सएप से मिली थी और तब उन्हें नहीं पता था कि ये तस्वीर कहां की है।

उन्हें तलब लगी कि तस्वीर वाले शख्स को ढूंढ निकाले तो बात बने। बात बन चुकी है। यानी अनोखे ‘स्टॉर्टअप’ में निवेश का इरादा परवान चढ़ रहा है। अपनी भाषा में ट्विटर पर आनंद महिंद्रा के शब्द - 'Got it on whatsapp. No clue who or where he is or how old this pic is. If anyone can find him and he’s still doing this work I’d like to make a small investment in his ‘startup’. वैसे भी आज जमाना तरह-तरह के स्टार्टअप का है। कहीं से भी जमा-पूंजी लेकर शुरू हो जाइए, लक्ष्मी बरसने लगेगी। ऐसे में एक सवाल और बनता है, क्या भारत में सरकार से बदहाल मोची समुदाय की माली हालत सुधारने के लिए आरक्षण लाभ अथवा उन्हें जातीय दंश मुक्ति दिलाने की कोई व्यवस्था संभव हो सकती है?

इसी क्रम में लगे हाथ ये भी बता डालने को जी चाहता है कि पटना (बिहार) में भी एक ऐसे ही चमड़ों के 'चिकित्सक' हैं डॉक्टर डोमन दास, जो इंसानों या जानवरों के डॉक्टर नहीं, जूतों के डॉक्टर हैं, जो पिछले 40 सालों से चमड़े की चीड़-फाड़ कर रहे हैं। जूतों की चीड़-फाड़ करने में उनको महारत है। लोग उन्हें डॉक्टर साहब कहते हैं। उन्होंने तो चमड़े का क्लीनिक भी खोल रखा है। उनके बनाए जूते न सिर्फ बड़े-बड़े मंत्री-नेता, अफसर इस्तेमाल करते हैं बल्कि फिल्मों में भी उनके बनाए जूतों की गूंज है। पटना के करबिगहिया में अपने चमड़े के क्लीनिक पर बैठे डॉ. डोमन दास बताते हैं कि बॉलीवुड की कुछ फिल्मों के लिए भी उनके यहां से ख़ास जूते मंगवाए गए हैं।

उन्होंने लैदर टेक्नोलॉजी की ट्रेनिंग ले रखी है। वह तीस साल से इस क्लीनिक पर जमे हुए हैं। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार भी उन्हीं के बनाए जूते पहनते हैं। लगभग पचहत्तर साल की उम्र के आठवीं पास डॉ. डोमन दास बताते हैं कि वह सात साल की उम्र में 1965 से पटना के गांधी मैदान में बूट पॉलिश करने लगे थे। इसके बाद वह पटना जंक्शन स्थित महावीर मंदिर के नज़दीक सड़क पर सोल रिपयेरिंग करने लगे। फिर उन्होंने 1989 में लैदर टेक्नोलॉजी में ट्रेनिंग ली। फिर करबिगहिया पहुंच गए ठीया जमाने। डॉ. डोमन दास के नाम से क्लीनिक खोल दिया। उनके यहां बड़े-बड़े नेता, अफसर आने लगे। धड़ाधड़ ऑर्डर मिलने लगे। इसके बाद तो वह भांति-भांति के स्पेशल किस्म के जूते बनाने लगे। लोकल ही नहीं, एनआरआई तक उनके बनाए जूतों पर फिदा रहते हैं। अब तो दुबई, अमेरिका, इंग्लैंड तक की सड़कों पर उनके जूते करिश्मे दिखा रहे हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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