जड़ी-बूटियों की खेती से मालदार हुए हरियाणा और राजस्थान के किसान

हरियाणा-राजस्थान के किसानों की तरह करें जड़ी-बूटी की खेती, बन जायेंगे करोड़पति...

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कोलियस, सफ़ेद मुसली, लेमनग्रास, श्यामा तुलसी, जामारोजा, आम्बा हल्दी, लाल चंदन, मुलेठी, सर्वगंधा, शंख पुष्पी आदि की दवा निर्माता कंपनियों को भारी तलब है। किसान तो किसान, अब पुलिस भी इसी चक्कर में बंजर जमीन पर दुर्लभ जड़ी-बूटियां उगाने लगी है। इस सफलता से चमत्कृत वैज्ञानिक औषधीय पादपों को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग कर रहे हैं।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान, उत्तर प्रदेश में अब तो हजारों किसानों का तेजी से औषधीय खेती-बाड़ी में लगातार रुझान बढ़ता जा रहा है। वे व्यापक स्तर पर औषधीय पौधों और सुगंधित पौधों की खेती कर रहे हैं।

कई बार कामयाबियां सफलता का पाठ तो पढ़ाती ही हैं, मशक्कत के सबक के साथ हैरत से भर देती हैं। आजकल महंगी जड़ी-बूटियों की खेती से मालामाल हो रहे किसानों की दास्तान तो कुछ ऐसा ही संदेश देती है। किसान तो खेती करने के लिए अभिशप्त है, जब पुलिस इसमें हाथ आजमाने लगे, फिर तो बात ही कुछ और। जैसे उत्तराखंड में चमोली की पुलिस, जिसने सुरक्षा का जिम्मा संभालते हुए अपने हर्बल गार्डन में बासठ तरह की जड़ी-बूटियां उगाई हैं। दुर्लभ जड़ी- बूटियों से महकते में थुनेर, तुलसी, कुटकी, रोजमेरी, काशनी, सूरजमुखी, कालमेघ, अजवाइन, तिलपुष्पी, पुदीना, हल्दी, आंवला, मकोई, बहेड़ा, अश्वगंधा, लेमनग्रास, जंबु फरण, सतावर, वन तुलसी, पीप्पली, अजमोद, लेवेंडर, कड़ी पत्ता, इसबगोल, केशर, वकायन, स्वीविया, पत्थरचट्टा, राम तुलसी, श्याम तुलसी, लेमन तुलसी के पौधे लहलहा रहे हैं।

इससे पहले इस गार्डन की जमीन बंजर पड़ी थी। एक ओर बेरोजगारी की तड़प और किसानी में घाटे का रोना है, दूसरी तरफ रोपड़ (हरियाणा) के उद्यमी किसान नरिन्दर सिंह अपनी मेहनत से मिसाल बन गए हैं। नरिंदर रोपड़ के डकाला गांव के रहने वाले है। वह भी जड़ी-बूटियों की खेती कर सालाना तीन करोड़ के टर्नओवर वाला किसान बन गए हैं। उनका उत्पाद विदेशों तक धूम मचा रहा है। हर्बल खेती करने वाले किसानों की सफलता का रहस्य ये भी है कि आजकल लोग रासायनिक सौंदर्य प्रसाधनों और रासायनिक दवाइयों की जगह हर्बल सौंदर्य प्रसाधनों और हर्बल औषधि के इस्तेमाल को प्राथमिकता दे रहे हैं।

उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान, उत्तर प्रदेश में अब तो हजारों किसानों का तेजी से औषधीय खेती-बाड़ी में लगातार रुझान बढ़ता जा रहा है। वे व्यापक स्तर पर औषधीय पौधों और सुगंधित पौधों की खेती कर रहे हैं। अकेले मध्य प्रदेश में ही लगभग 25 तरह के औषधीय पौधों तथा सुगंधित पौधों की खेती हज़ारों एकड़ क्षेत्रफल में हो रही है। यहां तक दावा किया जा रहा है कि पूरे देश में मध्यप्रदेश में ही सबसे ज़्यादा औषधीय और सुगंधित पौधों की खेती हो रही है। इससे तमाम दवा निर्माता कंपनियों का रुख गांवों की ओर हो चला है। कोलियस, सफ़ेद मुसली, लेमनग्रास, श्यामा तुलसी, जामारोजा, आम्बा हल्दी, लाल चंदन, मुलेठी, सर्वगंधा, नीम, जामुन गुठली, सोठ, ब्राम्ही और शंख पुष्पी ऐसी ही औषधीय वनस्पतियां हैं, जिनकी कंपनियों को भारी डिमांड है।

एक ऐसे ही सफल किसान हैं यमुनानगर (हरियाणा) के धर्मवीर कंबोज। पहले दिल्ली में ऑटो चलाते थे। आजकल जड़ी-बूटियों की खेती से मालामाल हो रहे हैं। इसकी प्रेरणा उनको अपनी मां से मिली। वह भी जड़ी-बूटियां उगाती थीं। धर्मवीर ने पहले अकरकरा नाम की जड़ी-बूटी उगाई। फिर एलोवेरा और स्टीविया की खेती करने लगे। अब वह इनके साथ ही अश्वगंधा, सफेद मूसली, ब्रह्मी, बच्च, एलोवेरा, कालमेघ, गिलोए, तुलसी, आंवले आदि की खेती कर रहे हैं। वर्ष 2009 में उनकी जिंदगी में एक दिन ऐसा भी आया, जब तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने और तीन साल बाद तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पंवार ने उनका सम्मान किया।

इतना ही नहीं, वह एक महीने तक राष्ट्रपति का मेहमान भी रह चुके हैँ। धर्मवीर मल्टी पर्पज फूड प्रोसेसिंग मशीनें भी तैयार कर कई देशों को सप्लाई कर रहे हैं। इसी हुनर से चमकत्कृत होकर तीन साल पहले जिम्‍बाब्‍वे के राष्ट्रपति रॉर्बट मुगांबे ने भी उनको सम्मानित किया था। वह खुद अपने यहां ही एलोवेरा का जूस, जैल, शैंपू आदि बनाने लगे हैं। वह मोबाइल सिंचाई मशीन और सोलर बैटरी से संचालित होने वाली झाड़ू मशीन भी बना चुके हैं। जड़ी-बूटियों की खेती सिर्फ किसानों को मालदार ही नहीं बना रही, बल्कि इससे कई बार अंतरराष्ट्रीय सद्भावना को भी बल मिल रहा है। मसलन, हाल ही में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने राज्य से नेपाल की भौगोलिक परिस्थितियों की तुलना करते हुए वहां की धरोहर जड़ी बूटियों और जैविक खेती के माध्यम से रोजगार को बढ़ावा देने की पहल की है।

हरियाणा के रोपड़ और जमुनानगर की तरह ही जड़ी-बूटी की खेती से अच्छी कमाई कर रहे राजस्थान के एक और कामयाब किसान हैं राकेश चौधरी। वह आसपास के अन्य किसानों के साथ मिलकर तमाम बड़ी कंपनियों को औषधीय उत्पाद मुहैया करा रहे हैं। राकेश ने खुद की हर्बल कंपनी बना ली है। वह लगभग तेरह वर्ष पूर्व औषधीय और सुगंध पौधों की खेती में जुट गए थे। पहले तो उन्होंने स्वयं ऐसी कृषि में घरेलू स्तर पर हाथ डाला, फिर आसपास के किसानों को अपने साथ जोड़ने लगे।

वह किसानों को मुलेठी, स्टीविया, सफेद मूसली, ऐलोवेरा, सोनामुखी, तुलसी, आंवला, बेलपत्र, गोखरू, अश्वगंधा, गुड़हल, लाजवन्ती, कपूर, तुलसी, अकरकरा आदि की खेती करने के लिए प्रोत्साहित करने लगे। वह बिहारीगढ़, नागौर तक जा पहुंचे। इस समय राज्य के लगभग एक दर्जन जिलों के किसान उनकी संगत से औषधीय खेती में जुटे हैं। एक ओर तो इन मेहनती किसानों की सफलता की दास्तानें हैं, दूसरी ओर एक कुकर्मी संत आसाराम, जो रतलाम से 17 किलोमीटर दूर पंचेड़ आश्रम में खुद अफीम की खेती करवाता था। लोगों की नजरों से बचने के लिए वह अफीम को पंचेड़ बूटी कहता था।

उसके वैद्य रहे अमृत प्रजापति ने यह भेद खोला था। खैर, चाहे जो सच्चाई है, औषधीय जड़ी-बूटियों की खेती किसानों को हरित क्रांति का एहसास करा रही है। इसकी सफलता को देखते हुए ही अब जड़ी-बूटियों की खेती पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग होने लगी है। वैज्ञानिक औषधीय पादपों के संवर्धन और संरक्षण के लिए औषधीय पादपों को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने पर जोर दे रहे हैं। उनका मानना है कि इसे आजीविका से जोड़कर ग्रामीणों की आर्थिकी मजबूत की जा सकती है। पूरे विश्व का रुझान आज आयुर्वेद की तरफ है। आयुर्वेद भारत की प्राचीन विधा है, इसके संवर्धन और संरक्षण के लिए व्यापक तैयारियां करनी होंगी। पढ़े-लिखे काश्तकार जड़ी-बूटी के क्षेत्र में अच्छी तरक्की कर सकते हैं। सबसे बड़ी बात तो ये है कि जड़ी-बूटियों की खेती को वन्य जीवों से भी खतरा नहीं है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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