'कानून' की व्यवस्था को ढूंढते सवालों-जवाबों के छह माह

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उ.प्र. की सत्तारूढ़ केसरिया सरकार ने अपने हिस्से के छह माह से अधिक का वक्त पूरा कर लिया है। यूं तो छह माह का वक्त दशकों से बिगड़ी व्यवस्था को मुकम्मल करने के लिये बेहद कम है लेकिन किंतु परिवर्तन की बुनावट की भविष्यगामी दिशा और दशा को प्रकट करने के लिये पर्याप्त है।

दीगर है कि 2017 के विधान सभा चुनावों के वक्त सूबे की बिगड़ती कानून-व्यवस्था का आलम, मुख्य मुद्दों में एक था। 'यूपी में है दम, क्योंकि जुर्म यहां है कम', का नारा मजाक बन कर रह गया था।

 सत्ता पर काबिज भाजपा दल ने उस वक्त अपनी सरकार बनने पर कानून-व्यवस्था को चाक-चौबंद करने का वादा किया था। क्या वह वादा पूरा हो सका? 

उ.प्र. की सत्तारूढ़ केसरिया सरकार ने अपने हिस्से के छह माह से अधिक का वक्त पूरा कर लिया है। यूं तो छह माह का वक्त दशकों से बिगड़ी व्यवस्था को मुकम्मल करने के लिये बेहद कम है लेकिन किंतु परिवर्तन की बुनावट की भविष्यगामी दिशा और दशा को प्रकट करने के लिये पर्याप्त है। दीगर है कि 2017 के विधान सभा चुनावों के वक्त सूबे की बिगड़ती कानून-व्यवस्था का आलम, मुख्य मुद्दों में एक था। 'यूपी में है दम, क्योंकि जुर्म यहां है कम', का नारा मजाक बन कर रह गया था। सत्ता पर काबिज भाजपा दल ने उस वक्त अपनी सरकार बनने पर कानून-व्यवस्था को चाक-चौबंद करने का वादा किया था। क्या वह वादा पूरा हो सका? 

आइये देखते हैं एक योगी की हुकूमत में कानून का इकबाल कैसा होता है? क्या एक योगी की नुमाइन्दगी में महफूज, महसूस कर रही है सूबे की आधी आबादी! क्या वाकई में अपराधी आतंकित और आम जन आनन्दित हैं। अपराधियों के लिए अब तक सफारी जोन बना सूबा क्या अब आम अवाम के लिए सेफ है या आज भी हुकूमत का इकबाल दूर किसी पेड़ पर क्षत-विक्षत अवस्था में उल्टा टंगा नजर आ रहा है? अपनी सरकार के छह माह के क्रान्तिकारी लेखे-जोखे में योगी ने प्रदेश में कानून व्यवस्था में सुधार का दावा किया है लेकिन कसीदा पढ़ते आंकड़ों की सरपरस्ती में सरकार का दावा निरपेक्ष पड़ताल की मांग करता है।

दरअसल सूबे में भाजपा सरकार के काबिज होने से पहले और मौजूदा वक्त की कानून-व्यवस्था में सबसे बड़ा अन्तर यह दिख रहा है कि आज अपराधियों के दुस्साहस को खाकी की खुद्दारी ललकार रही है। खाक में पड़े पुलिस के मनोबल को नये निजाम ने ताकत बख्शी है। आंकड़े बताते हैं कि यूपी पुलिस ने फिर से अपराधियों को मारना शुरू कर दिया है। 

लेकिन यह भी काबिल-ए-गौर है कि वर्तमान केसरिया सरकार के लगभग 70 दिन गुजर जाने तक सूबे में कानून, गुनहगारों के सामने हांफता नजर आ रहा था, व्यवस्था अपनी लुटी हुई अस्मत के साथ दूर खड़ी इस खौफनाक दौर के गुजरने का इन्तजार कर रही थी। सहारनपुर जलता रहा और पांच घंटे तक पुलिस खुद को बचाती रही। प्रारम्भिक दो माह के वक्त में तो सूबे की आवाम ने कभी कानून के मुहाफिजों को बलवाइयों के सामने अपनी हिफाजत के लिए भागते देखा तो कभी पीडि़त को विरोध करने की सजा के तौर पर अपराधियों की गोली का शिकार बनते देखा। अपराधी बारी-बारी से अस्मतरेजी करते रहे और 15 मिनट के फॉसले पर खड़ी पुलिस दो घंटे में पहुंचने के कारण बताती रही।

किन्तु उसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ललकार कि, जो जिस भाषा में समझेगा, उसे उसी भाषा में समझाया जाएगा। जो नहीं मानेंगे उन्हें ठोक दिया जाएगा। अपराधियों को गोली का जवाब पुलिस गोली से ही देगी, ने पुलिस बलों के हौसलों को पंख लगा दिए। सरकार ने पुलिस को अपराधियों के साथ सीधी मुठभेड़ के लिए ललकारने, अपराधियों पर इनामी राशि बढ़ाने और सख्ती के लिए नया कड़ा कानून बनाने की पहल की। पुलिस के बढ़े मनोबल से मिले परिणाम को गर आंकड़ों की जुबान में बयान किया जाए तो 20 मार्च, 2017 से 14 सितम्बर, 2017 के मध्य यूपी पुलिस और बदमाशों के मध्य 420 मुठभेड़ हुईं जिसमें 17 खूंखार, इनामी बदमाशों को मौत की नींद सुला दिया गया तो पुलिस की गोली से 86 बदमाश घायल भी हुए। पुलिस की इस कार्रवाई से अपराधियों में दहशत फैल गई है। 

दीगर है कि छह माह में 868 इनामशुदा बदमाशों को मिला कर कुल 1106 अपराधियों को सलाखों के पीछे बन्द किया गया तो 69 अपराधियों की सम्पत्तियां भी जब्त हुईं और 54 अपराधियों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून एनएसए लगाया गया है। खाकी के वकार को बुलन्द करने की मुहिम में करीब 90 पुलिसकर्मी भी गोली लगने से घायल हुए हैं, जबकि दरोगा जय प्रकाश सिंह ने चित्रकूट में सर्वोच्च बलिदान देते हुये शहादत पायी। आज एनकांउटर योगी सरकार का अचूक हथियार बन गया है। खबर है कि महाराष्ट्र के मकोका की तर्ज पर यूपीकोका कानून विधानसभा के अगले सत्र में रखा जा सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि मकोका कानून बन जाने से अपराधियों पर शिकंजा कसने में पुलिस को और मदद मिलेगी।

कानून और व्यवस्था में सकारात्मक परिवर्तन की सुगबुगाहट महसूस होने लगी है किंतु अब भी कानून का आपराधिक व्यवस्था के सम्मुख हांफना बन्द नहीं हुआ है। आधी आबादी के हिस्से के सूरज को तो आज भी अपराधियों के ग्रहण ने प्रकाशहीन कर रखा है। लखीमपुर खीरी में महिला का सरेआम हाथ काटने की घटना, बरेली में दो बहनों को घर में घुस कर जिन्दा जलाया जाना, गाजियाबाद में नर्स का अपहरण कर गैंगरेप होना, कानपुर देहात के रनियां कस्बे की तीन लड़कियों योगिता, हिमानी और लक्ष्मी का अब तक लापता रहना और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में छेड़छाड़ और लाठीचार्ज आदि ऐसी अनेक प्रतिनिधित्व करती घटनाएं हैं जो 'महिला सुरक्षा' के सरकारी दावे को सिरे से खारिज करती हैं। बहरहाल, उत्तर प्रदेश में भाजपा के सत्ता में आने के बाद महिलाओं के साथ घटी उपरोक्त वणित घटनाओं के अलावा भी तमाम ऐसी घटनाएं हैं जो किसी के भी रोंगटे खड़े कर देंगी लेकिन, यहां इन घटनाओं को केवल इसलिए लिया गया है कि ये बताती हैं कि योगी निजाम में भी महिलायें घर के अन्दर और बाहर, कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। साथ ही ये घटनाएं महिलाओं को लेकर

पुलिस, प्रशासन और सरकार के नजरिये की पोल भी खोलती हुई दिखती हैं। इनसे यह भी पता लगता है कि उत्तर प्रदेश में एक छोटे से गांव से लेकर बड़े-बड़े शहरों तक और यहां तक कि एक शिक्षण संस्थान जिसकी दुनिया में एक अलग पहचान है, में भी लड़कियां असुरक्षित हैं। विडम्बना है कि कभी सरकार बेबस दिखती है तो कभी सरकारी नजरिया तंग दिखता है, लेकिन दोनों हालातों में महिला का दामन ही नम दिखता है। जिलों में तो कानून-व्यवस्था की स्थिति और दयनीय है। मुख्यमंत्री के जनता दरबार में रोजाना फरियादियों की बढ़ती भीड़ में भारी संख्या अपराधियों और पुलिस से पीड़ितों की है। चूंकि थानों में रिश्वत का चलन बदस्तूर जारी है और अधिकांश पुलिस कप्तानों की बदमाशों से भी यारी है। सो पीडि़त जनता को कहीं तो अपनी फरयिाद सुनानी है, लिहाजा जनता दरबार में भीड़ तो आनी है। योगी के कड़े रूख से कुछ-कुछ संभलना शुरू हुआ है लेकिन अभी जिलों में जुल्म कम नहीं हुआ है। विस्मय मिश्रित विडंबना है कि जहां एक ओर खाकी की सरपरस्ती तो कहीं खादी के आश्रय में अपराध का ग्राफ रक्तबीज की भांति विस्तार ले रहा है। तो दूसरी ओर योगी सरकार के प्रारम्भिक 15 दिनों की कस्तूरी को कार्यकर्ता और आम जनता मृग बन ढूंढ रही है।

योगी सरकार ने अपनी उपलब्धियों में भू-माफियाओं के खिलाफ चलाए गए अभियान को भी शामिल करते हुए दावा किया है कि एंटी भू-माफिया टास्क फोर्स ने प्रदेश भर में भू-माफियाओं की 35 करोड़ की सम्पत्ति जब्त की है। सरकार ने कहा है कि भू-माफियाओं के कब्जे से 8038.38 हेक्टेयर भूमि मुक्त कराई गई है। भू-माफियाओं पर नकेल तो दिखने लगी है किन्तु उ.प्र. की राजधानी व उसके आस-पास के जनपदों में ऐसी अनेक जमीनें हैं जो कि चिन्हित तौर पर बड़े माफियाओं के कब्जे में हैं लेकिन उन पर शासन की तरफ से कोई भी कार्यवाही नहीं की गई है। राजस्व के दस्तावेज बताते हैं कि केवल राजधानी लखनऊ में ही करीब पांच हजार हेक्टेयर सरकारी जमीन पर भू-माफियाओं का कब्जा है। सरकार इन्हें जानती है, लेकिन इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है, जबकि सरकारी गौरव गाथा के समानान्तर यह तथ्य भी प्रकाश में आया है कि भू-माफियाओं के कब्जे से जमीन मुक्त कराने का टारगेट प्रशासन ने सरकार को झांसे में रखते हुए, किसानों और ग्राम समाज की जमीनें छीन कर उसे भू-माफियाओं के खिलाफ की गई कार्रवाई बता कर अपनी पीठ थपथपाते हुये पूरा किया है।

उल्लेखनीय है कि पुलिस में दर्ज शिकायतों और राजस्व अभिलेखों के मुताबिक यूपी में एक लाख हेक्टेयर से अधिक सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा है। प्रदेश के प्रत्येक थाने में कम से कम 50 भू-माफियाओं के नाम दर्ज हैं। इन माफियाओं से जमीन मुक्त कराने का अभियान सिर्फ डायलागबाजी से पूरा नहीं हो सकता। यद्यपि मथुरा के जवाहरबाग की जमीन और पूर्ववर्ती सरकार के मंत्री गायत्री प्रजापति व शारदा प्रताप शुक्ला के कब्जे से कुछ जमीनें छुड़ा कर योगी सरकार ने भू-माफियाओं पर सख्ती के संकेत अवश्य दिए हैं किन्तु अभी बहुत समर शेष है।

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लेखक / पत्रकार

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