फनी स्पूफ से एजूकेशनल स्टार्टअप तक

3 कजिंस की क्रिएटिविटी का कमाल

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पिछले साल सर्दियों के दौरान जब तीन कजिंस, निखिल कुलकर्णी, किरण और किशोर पाटिल बैठे-बैठे टाइप पास करने के बारे में सोच रहे थे, तो इनमें से एक को अचानक एक विचार आया। उन्होंने सोचा कि क्यों न कुछ मजाकिया वीडियो बनाएं और फिर दोस्तों को भेजें, लेकिन उन्हें ऐसा करने के लिए कोई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म नहीं मिला।

थोड़े परेशान और थोड़े उत्साहित, फुल टाइम नौकरी करने वाले इन युवा इंजीनियरों ने वैकल्पिक प्रोजेक्ट के तौर पर एक डबिंग प्लेटफॉर्म तैयार करने का फैसला किया। तब वो जानते भी नहीं थे कि वो असल में एक शैक्षणिक स्टार्टअप बनाने जा रहे हैं।

थोड़ा पीछे चलते हैं

निखिल के लिए ये पहला प्रोजेक्ट नहीं था जो समाज से जुड़ा था। वह अपने पिछले वेंचर के लिए भी खबरों में रहे थे, LEBTOP (Learning English By Talking On Phone), एक ऐसा प्लेटफॉर्म जो यूजर्स को टेलीफोन कॉल्स पर एक-दूसरे को इंग्लिश सीखने और सिखाने का मौका प्रदान करता है। हालांकि अब ये प्रोजेक्ट जीवंत नहीं है, लेकिन LEBTOP पर अगस्त 2013 और जुलाई 2014 के बीच 20,000 से ज्यादा कॉल्स और 3,500 से ज्यादा यूनिक कॉलर्स आए।

इसी बीच, उद्यमिता का कीड़ा काटने के बाद निखिल ने भाभा एटॉमिक सेंटर में अपनी फुल टाइम नौकरी छोड़ दी और इसके लिए उसने थोड़ी सी तैयारियां भी की थी। वह कम खर्च में 100 दिनों के लिए देश भ्रमण पर निकल गया। इस दौरान उसने सब कुछ किया, विभिन्न आश्रमों में रहा, काठमांडू में विपासना कोर्स कर के वह दुनिया से कटा हुआ रहा, ऑरोविल (पॉन्डिचेरी) में तीन हफ्ते के लिए स्वयंसेवी का काम किया, लेकिन फिर भी कुछ था जो कम था या गायब था।

उसने कहा, “मैं तीन साल तक नौकरी की, उस दौरान मैं दो चीजों के बारे में सोचता रहा- नई चीजें शुरू करना और घूमना। इसलिए सारी तैयारियां और घूमने के बाद एक ही चीज बची थी और वो थी कुछ नया व अच्छा शुरू करना। अलग-अलग विचारों से भरे नोटपैड को मैंने खंगाला और मैं बैंगलोर में अपने कजिंस से मिलने पहुंच गया।”

डुबरू का जन्म

जब ये कजिंस मिले तो इनका मुख्य एजेंडा कुछ रोचक करने की तलाश करना था। निखिल ने जिन-जिन आइडियाज की बात की वो सब नोटपैड में जाकर खत्म हो गए, जबकि ये सभी स्पूफ्स ऑनलाइन के लिए डब वीडियो बनाने पर जाकर ठहर गए।

निखिल का कहना है, “मेरे दोस्त वॉयस-ओवर (पार्श्व आवाज) और बेहद ही खराब लिप-रेड क्रिकेटर्स किया करते थे, ये काफी मजाकिया होता था और हमलोग इसाक खूब लुत्फ उठाया करते थे। तभी मुझे वीडियो मिक्सिंग करने और यूजर ऑडियो बनाने का आइडिया आया।”

अगले छह महीने के अंदर इन लोगों ने वीडियो और ऑडियो सिंकिंग प्लेटफॉर्म डुबरू को तैयार किया, लेकिन इस प्रोडक्ट को विभिन्न भाषाओं में पढ़ाई के कंटेंट के तौर पर तैयार करने और अनुवाद करने का आडिया बाद में आया।

यह प्लेटफॉर्म काम कैसे करता है?

निखिल बताया, “पारंपरिक तौर पर डबिंग करना काफी थका देने वाली प्रक्रिया है। आपको वीडियो डाउनलोड करना पड़ता है, उसे इंपोर्ट करना होता है और इसे सेव और साझा करने से पहले वॉयस ओवर (पार्श्व आवाज) करना पड़ता है। हमने इस प्रक्रिया को ऑनलाइन कर बेहद आसान बना दिया। सच तो ये है कि डुबरू दुनिया का पहला वेब-आधारित वीडियो डबिंग टूल और प्लेटफॉर्म है।”

एक वीडियो को सेलेक्ट करने के लिए यूजर या तो एक यूआरएल का इस्तेमाल कर वीडियो एड कर सकते हैं या फिर पहले से मौजूद किसी वीडियो को वेबसाइट पर एड कर सकते हैं। वॉयस-ओवर (पार्श्व आवाज) जोड़ने के लिए डुबरू टूल को क्लिक करना होगा और क्लिक करने के साथ ही रिकॉर्डिंग शुरू हो जाती है और माइक्रोफोन से आवाज वीडियो सिंक होने लगती है।

वो बताते हैं, “एक बार रिकॉर्डिंग पूरी होने के बाद वीडियो आपकी आवाज के साथ डबिंग इफेक्ट के साथ प्ले होती है। ये ठीक उसी तरह है जैसे आप आवाज बंद कर टीवी देख रहे हों और ईयरफोन को ऑन कर रखा हो।”

फिलहाल इस प्लेटफॉर्म पर 40 से ज्यादा डब किए हुए वीडियो हैं।

असल का ‘मैंने पा लिया’ मोमेंट

निखिल ने आगे जोड़ा, “मैं हमेशा सोचता था कि मुझे भारत में शिक्षा को बेहतर बनाने में योगदान करना चाहिए। मैं सोच रहा था कि डुबरू को हम कहां इस्तेमाल करें, और तभी अचानक मुझे लगा कि हालांकि हम भारतीयों की मातृभाषा अंग्रेजी नहीं है, लेकिन उच्च गुणवत्ता वाले पढ़ने का कंटेंट सिर्फ इंग्लिश में ही उपलब्ध है।”

वो इस बार से हैरान रहते थे कि क्यों अच्छी इंग्लिश नहीं होने से कोई छात्र किसी विषय के महत्वपूर्ण या रोचक बातों को समझने में पीछे रह जाता है, और जल्दी ही उन्हें पता लग गया कि डुबरू इस फासले को भर सकता है।

इस वेंचर में शैक्षणिक क्षेत्र में अहम योगदान देने की क्षमता का फैसला करने वाले निखिल का कहना है. “खान एकेडेमी जैसे कंटेंट बनाने वालों ने बहुत ही उन्नत दर्जे के शैक्षणिक कंटेंट तैयार किए हैं, और ये कंटेंट विकासशील देशों के गरीब बच्चों तक पहुंच रहे हैं। लेकिन उन छात्रों के लिए भी इसकी भाषा और इसका उच्चारण इन विषयों को समझने में दिक्कतें पेश कर रही हैं। डुबरू इस परिस्थिति को संतुलित करने में बिलकुल फिट बैठता है।”

उसने अपने कजिन किरण को पिछले महीने अपनी फूल टाइम नौकरी से थोड़े दिन की छुट्टी लेने के लिए तैयार कर लिया, और उसके बाद से ही तीनों देश भर में ऑनलाइन शैक्षणिक कंटेंट मुहैया कराने वालों के साथ सहयोग कर रहे हैं।

बाजार की चोटी पर

भारतीय शिक्षा पर विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 600,000 गांवों में करीब 200 मिलियन स्कूल जाने वाले बच्चे रहते हैं। इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि द्विभाषीय शैक्षणिक कार्यक्रमों के कई फायदे हैं, जबकि स्थानीय भाषा के शैक्षणिक स्रोतों की मदद लेना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।

निखिल कहते हैं, “इन संख्याओं को देखते हुए, मैं समझ गया था कि हमें कम से कम सरकार द्वारा अधिकृत 22 भाषाओं में संकेंट मुहैया कराने होंगे। ये कोई छोटा काम नहीं है, और हमलोग इसे करने को तैयार हैं।”

भविष्य की ओर नजर

उन्होंने डुबरू को एक वीडियो शेयरिंग कम्युनिटी के तौर पर इस्तेमाल करने की योजना बनाई जहां यूजर्स कंटेंट तैयार कर सकते हैं, और दूसरे लोग इसे डब कर सकते हैं।

जल्दी ही निवेशकों तक पहुंचने की योजना बना रहे निखिल बताते हैं, “कोई भी किसी भी भाषा में वीडियो को ऑनलाइन डब कर सकता है। हमलोग बड़ी संख्या में डब किए हुए अच्छी गुणवत्ता वाले शैक्षणिक कंटेंट की एक लाइब्रेरी बना सकते हैं और इसके जरिए ग्रामीण इलाकों में रहने वालों छात्रों को ऑनलाइन आकर इसका फायदा उठाने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। अगर हर कोई स्थानीय भाषाओं में कंटेंट को डब करने में मदद करे, तो भारत खुद को शिक्षित कर लेगा।”

वो स्वामी विवेकानंद की कही बातों को याद करते हुए कहते हैं, “विचारों को लोगों की उनकी ही भाषा में सिखाई जानी चाहिए। आम लोगों को उनकी अपनी भाषा में शिक्षित करें, उनके सामने विचारों को रखें, उन्हें सूचना मिलने लगेंगी।”

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