पिता के इलाज के लिए खेत रखने पड़े गिरवी, किसान बेटी ने खेती से बदली घर की हालत

पंजाब की युवा महिला किसान गुरप्रीत कौर अपनी जमीन गिरवी पड़ जाने पर ठेके की खेती से ला रही हैं घर-परिवार में खुशहाली...

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पंजाब में एक ओर कर्ज की मार से किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, दूसरी ओर महिला किसान उनके खेत-खलिहानों की ताकत बन रही हैं। एक ऐसी ही युवा किसान हैं गुरप्रीत कौर, जो अपनी जमीन गिरवी पड़ जाने पर ठेके की खेती से अपना घर-परिवार खुशहाल कर रही हैं।

सांकेतिक तस्वीर (फोटो साभार - शटरस्टॉक)
सांकेतिक तस्वीर (फोटो साभार - शटरस्टॉक)
आज वह अपने खेत के एक हिस्से में स्वयं सब्जियों की खेती करती हैं और फिर उसे ले जाकर गांव-गांव बेच आती हैं। जब खेतबाड़ी के काम से फुर्सत हो तो किस्त पर ऑटो ले आती हैं। उसका अन्यत्र कमाई में इस्तेमाल करती हैं।

पंजाब में किसानी के दो रंग हैं सुखद और दुखद। एक खबर आती है कि कर्ज के दंश ने एक और जिंदगी छीन ली। मुक्तसर के गांव वणवाला में आर्थिक तंगी से गुजर रहे दो बेटियों के बाप खेत मजदूर गुरमीत सिंह ने कर्ज लेकर बड़ी बेटी विदा करने के बाद नहर में कूदकर जान दे दी। उसे दूसरी बेटी की शादी एक माह बाद करनी थी। जिन लोगों से उनके पति ने कर्ज लिया था, वे उसे लगातार परेशान कर रहे थे। अब आइए, हम इसी सूबे के उस मालवा इलाके का जरा हाल जानते हैं, जहां किसानों की आत्महत्याएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। पिछले सात वर्षों में इसमें 16,606 किसान और खेत मजदूर मौत को गले लगा चुके हैं, जिनमें से 5,500 किसानों और खेत मजदूरों की आत्महत्याओं से संबंधित सारा रिकार्ड पंजाब सरकार और जिला प्रशासन के लिखित संज्ञान में है।

ये किसान मक्के की फसल खराब होने, बासमती की लाखों बोरियां मंडियों में पड़ी रहने, बढ़ते कर्ज़, छोटी होती जोत, मंडियों में साहूकारों द्वारा ब्याज की ऊंची वसूली आदि की वजह से जान दे रहे हैं। इन्हीं हालातों के बीच जब मुक्तसर के गांव दोदा की एक महिला किसान कुछ खास कर गुजरती है और उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने हाथों से 'कृषि कर्मण अवॉर्ड' से सम्मानित करते हैं, तब ऐसी उम्मीदों की भी किरण फूट निकलती है, जिसमें असफल होने के सवाल और कामयाबी के जवाब भी, दोनों सामने आ जाते हैं। दोदा की वह महिला किसान हैं गुरप्रीत कौर। मर्दों की वेशभूषा में कुर्ता, पायजामा, पगड़ी ओढ़े हुए गुरप्रीत ऐसे परिवार से ताल्लुक रखती हैं, जिसमें बीमार पिता बलजीत सिंह के दवा-इलाज के लिए खेत गिरवी पड़ जाते हैं, लेकिन वह हिम्मत हारने की बजाय वक्त से दो-दो हाथ करती हुई अन्य किसान परिवारों के लिए एक नई नजीर बनकर सामने आती हैं।

आज वह अपने खेत के एक हिस्से में स्वयं सब्जियों की खेती करती हैं और फिर उसे ले जाकर गांव-गांव बेच आती हैं। जब खेतबाड़ी के काम से फुर्सत हो तो किस्त पर ऑटो ले आती हैं। उसका अन्यत्र कमाई में इस्तेमाल करती हैं। खेत में सब्जी न हो तो उस पर बाजार से सब्जियां लाद लाती हैं और गांव-गांव बेचने लगती हैं। उनके इसी उद्यमी हुनर ने पिता को बीमारी से उबार लिया। आज उनका दादी, मां-बाप, भाई-बहन पूरा परिवार पूरी खुशहाली से जीवन बसर कर रहा है।

अब तो गांव दोदा ही नहीं, बल्कि दूर-दूर तक गुरप्रीत कौर की सफलता की नजीरें दी जाने लगी हैं। वह भी ऐसे वक्त में, जबकि उस क्षेत्र में आए दिन किसान खुदकुशियां करते जा रहे हैं। गुरप्रीत के परिवार के पास सिर्फ ढाई एकड़ जमीन थी। पिता बीमार हुए तो उन्होंने उसे गिरवी रख दिया। उस वक्त में उनके पास और कोई विकल्प नहीं था। इसके बाद उन्होंने बटाई (ठेके) पर खेत ले लिए और उसमें खेतीबाड़ी करने लगीं। किशोर वय में गुरप्रीत अपने पिता के लिए खेतों पर खाना लेकर जाया करती थीं। इसके साथ ही वहां खेती में भी पिता का हाथ बंटाती थीं। उस समय उनकी उम्र लगभग बारह-तेरह साल की रही होगी।

जब बीए द्वितीय वर्ष में वह अठारह-उन्नीस वर्ष की हुईं, उनके पिता के फेफड़ों में पानी भर गया। उन्होंने चारपाई पकड़ ली। घर-गृहस्थी चरमरा उठी। पूरे परिवार को रोजी-रोटी के संकट ने घेर लिया। गुरप्रीत के अलावा घर में और कोई था नहीं, जो कहीं से घर-गृहस्थी चलाने का कोई संसाधन बनाता। परिवार के कुल छह प्राणियों की जीविका अब कैसे चले, यह गंभीर सवाल था। एक तो कोई रोजी-रोजगार नहीं, दूसरे पिता के इलाज के लिए पैसे की दरकार, साथ छोटी बहन की शादी का भी तनाव। इस तरह से आर्थिक तंगी में जब पूरा परिवार जूझ रहा था और घर की ढाई एकड़ जमीन भी बंधक पड़ गई तो गुरप्रीत ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और उन्होंने तय किया कि सिवाय किसानी करने के उनके सामने और कोई विकल्प नहीं है। वह ठेके पर जमीन लेकर उसमें धान की खेती के साथ एक हिस्से में सब्जियां भी उगाने लगीं।

इस तरह परिवार के दिन बहुरने लगे। सब्जियों की बेच-बिक्री से रोजाना चार पैसे की आमदनी होने लगी। उन्हीं पैसों के बूते गुरप्रीत ने दवा इलाज कराकर पिता की सेहत चंगी कर ली। लेकिन ये सब होना इतना आसान भी नहीं रहा। उनका पूरा भविष्य घर में सिमट कर रह गया। हां, उनका पढ़ाई-लिखाई का हुनर जरूर काम आया, जिससे उन्हें अपना टूटता परिवार बचाने में बड़ी मदद मिली। इसी तरह फिरोजपुर के गांव धीरापतरा की राजवंत कौर किसानों की प्रेरणास्रोत बनी हैं। वह डेयरी का काम कर रही हैं। कामयाबी के लिए इन्हें केंद्र सरकार अवार्ड नवाज चुकी है। राजवंत तो अपनी बीस-पचीस एकड़ की खेती और डेयरी से हर महीने एक लाख रुपए से अधिक की कमाई कर ले रही हैं।

उनकी एक गाय तो रोजाना सत्तर-बहत्तर लीटर दूध देती है। वह फॉर्मर हेल्प सोसायटी भी चलाती हैं। हमारे कृषि प्रधान प्रदेश पंजाब में जब महिलाएं इस तरह आगे बढ़कर हालात से लड़ रही हैं, निश्चित रूप से वह उन परिवारों के लिए एक बड़ी प्रेरक ताकत बन रही हैं, जिनके मुखिया कर्ज के बोझ अथवा अन्य कारणों से आत्महत्या कर ले रहे हैं। उल्लेखनीय है कि हमारे देश में 60 से 80 प्रतिशत महिलाएं खेती के काम में लगी रहती हैं। जमीन का मलकाना हक की बात होती है तो सिर्फ 13 प्रतिशत महिलाओं के पास ऐसे अधिकार पाए गए हैं। पंजाब में ऐसी भी कई महिला किसान हैं, जो खुद तो किसानी का पूरा काम करती हैं और उनके पति शराब पीते रहते हैं। जमीन, जायदाद में उन्हें कोई अधिकार नहीं मिला है।

बाजार में होने वाला शोषण भी उन्हें फसल कि अच्छी कीमत दिलाने से दूर कर देता है। महिला किसान सिर्फ खेती नहीं बल्कि घर संभालने से लेकर पशु पालन तक का भी काम करती हैं। इन्हीं महिला किसानों का योगदान देखते हुए 15 अक्टूबर को हर साल महिला किसान दिवस मनाया जाता है। 11 करोड़ 87 लाख किसानों की कुल आबादी में से 30.3 प्रतिशत महिला किसान हैं। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि महिला किसानों के जितने भी अधिकार हैं, उन्हें मिलने चाहिए। पुरुष कौशल वाले काम ज्यादा करते हैं, जबकि महिला किसान मेहनत वाले काम करती हैं। संयुक्त राष्ट्र की नजर में भी महिला किसानों का श्रम पुरुषों की तुलना में दोगुना होता है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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