आधुनिक रामकथा के सर्वश्रेष्ठ उन्नायक हैं नरेंद्र कोहली 

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डॉ नरेन्द्र कोहली हिंदी में अपने ढंग के अलग तरह साहित्यकार है। मिथकीय धरातल पर उन्होंने रचना की नई दिशा की खोज करने के साथ ही उसकी सार्थकता को स्थापित किया है। 

 नरेंद्र कोहली ने छह वर्ष की आयु से ही लिखना प्रारम्भ कर दिया था लेकिन 1960 के बाद से उनकी रचनाएँ प्रकाशित होने लगीं। समकालीन लेखकों से वह भिन्न इस प्रकार हैं कि उन्होंने जानी-मानी कहानियों को बिल्कुल मौलिक तरीके से लिखा। उनकी रचनाओं का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ।

नरेन्द्र कोहली ने रामकथा को न तो साम्प्रदायिक दृष्टि से देखा है न ही पुनरुत्थानवादी दृष्टि से। मानवतावादी, विस्तारवादी एकतंत्र की निरंकुशता का विरोध करने वाली यह दृष्टि प्रगतिशील मानवतावाद की समर्थक है। 

डॉ नरेंद्र कोहली कोहली ने सांस्कृतिक राष्ट्रवादी साहित्यकार हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय जीवन-शैली एवं दर्शन का सम्यक् परिचय करवाया है। वैसे तो उन्होंने साहित्य की सभी स्थापित विधाओं उपन्यास, व्यंग्य, नाटक, कहानी, संस्मरण, निबंध, आलोचना आदि पर लेखनी चलाई है, शताधिक श्रेष्ठ ग्रंथों का सृजन किया है लेकिन 'महाकाव्यात्मक उपन्यास' विधा को प्रारंभ करने का उन्हें विशेष श्रेय जाता है। पौराणिक एवं ऐतिहासिक चरित्रों की गुत्थियों को सुलझाते हुए उनके माध्यम से आधुनिक सामाज की समस्याओं एवं उनके समाधान को समाज के समक्ष प्रस्तुत करना उनकी अन्यतम विशेषता है।

वैसे तो नरेंद्र कोहली ने छह वर्ष की आयु से ही लिखना प्रारम्भ कर दिया था लेकिन 1960 के बाद से उनकी रचनाएँ प्रकाशित होने लगीं। समकालीन लेखकों से वह भिन्न इस प्रकार हैं कि उन्होंने जानी-मानी कहानियों को बिल्कुल मौलिक तरीके से लिखा। उनकी रचनाओं का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। ‘दीक्षा’, ‘अवसर’, ‘संघर्ष की ओर’ और ‘युद्ध’ नामक रामकथा श्रृंखला की कृतियों में कथाकार द्वारा सहस्राब्दियों की परंपरा से जनमानस में जमे ईश्वरावतार भाव और भक्तिभाव की जमीन को, उससे जुड़ी धर्म और ईश्वरवाची सांस्कृतिक जमीन को तोड़ा गया। रामकथा की नई जमीन को नए मानवीय, विश्वसनीय, भौतिक, सामाजिक, राजनीतिक और आधुनिक रूप में प्रस्तुत किया गया।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, अमृतलाल नागर, यशपाल, जैनेन्द्र कुमार आदि ने नरेन्द्र कोहली की खुले शब्दों में तारीफ़ की है। जैनेन्द्र कुमार कहते हैं - 'मैं नहीं जानता कि उपन्यास से क्या अपेक्षा होती है और उसका शिल्प क्या होता है। प्रतीत होता है कि उनकी रचना उपन्यास के धर्म से ऊंचे उठकर कुछ शास्त्र की कक्षा तक बढ़ जाती है।' भगवतीचरण वर्मा लिखते हैं- 'मैंने नरेंद्र कोहली में वह प्रतिभा देखी है जो उनको हिन्दी के अग्रणी साहित्यकारों में ला देती है। राम कथा के आदि वाले अंश का कुछ भाग उन्होंने ('दीक्षा' में) बड़ी कुशलता के साथ प्रस्तुत किया है। उसमें औपन्यासिकता है, कहानी की पकड़ है।'

यशपाल का कहना है कि नरेंद्र कोहली ने राम कथा, जिसे अनेक इतिहासकार मात्र पौराणिक आख्यान या मिथ ही मानते हैं, को यथाशक्ति यथार्थवादी तर्कसंगत व्याख्या देने का प्रयत्न किया है। अहिल्या के मिथ को भी कल्पना से यथार्थ का आभास देने का अच्छा प्रयास है। हजारीप्रसाद द्विवेदी लिखते हैं- 'रामकथा को नरेंद्र कोहली ने एकदम नयी दृष्टि से देखा है। 'अवसर' में राम के चरित्र को नयी मानवीय दृष्टि से चित्रित किया है। इसमें सीता का जो चरित्र चित्रित है, वह बहुत ही आकर्षक है। सीता को कभी ऐसे तेजोदृप्त रूप में चित्रित नहीं किया गया था। साथ ही सुमित्रा का चरित्र बहुत तेजस्वी नारी के रूप में उकेरा है। मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि यथा-संभव रामायण कथा की मूल घटनाओं को परिवर्तित किये बिना उसकी एक मनोग्राही व्याख्या की गई है।

डॉ नगेन्द्र लिखते हैं- दीक्षा में प्रौढ़ चिंतन के आधार पर रामकथा को आधुनिक सन्दर्भ प्रदान करने का साहसिक प्रयत्न किया गया है। बालकाण्ड की प्रमुख घटनाओं तथा राम और विश्वामित्र के चरित्रों का विवेक सम्मत पुनराख्यान, राम के युगपुरुष/युगावतार रूप की तर्कपुष्ट व्याख्या विशेष उपलब्धियाँ हैं। धर्मवीर भारती लिखते हैं- यूं ही कुतूहलवश 'दीक्षा' के कुछ पन्ने पलटे और फिर उस पुस्तक ने ऐसा परिचय कराया कि दोनों दिन पूरी शाम उसे पढ़कर ही ख़त्म किया। चार खंडों में पूरी रामकथा एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है। इसमें सीता और अहिल्या की छवियों की पार्श्व-कथाएँ बहुत सशक्त बन पड़ी हैं।

अमृतलाल नागर के शब्दों में उनकी कृति नायक के चित्रण में सश्रद्ध भी हैं और सचेत भी, प्रवाह अच्छा है। कई बिम्ब अच्छे उभरे, साथ साथ निबल भी हैं, पर होता यह चलता है कि एक अच्छी झांकी झलक जाती है और उपन्यास फिर से जोर पकड़ जाता है। इस तरह रवानी आद्यांत ही मानी जायगी। कवि बाबा नागार्जुन लिखते हैं- प्रथम श्रेणी के कतिपय उपन्यासकारों में अब एक नाम और जुड़ गया- दृढ़तापूर्वक मैं अपना यह अभिमत नरेंद्र कोहली तक पहुंचाना चाहता हूँ। रामकथा से सम्बन्धित सारे ही पात्र नए-नए रूपों में सामने आये हैं, उनकी जनाभिमुख भूमिका एक-एक पाठक-पाठिका के अन्दर (न्याय के) पक्षधरत्व को अंकुरित करेगी यह मेरा भविष्य-कथन है।

प्रसिद्ध कवि शिवमंगल सिंह 'सुमन' लिखते हैं कि रामकथा की ऐसी युगानुरूप व्याख्या पहले कभी नहीं पढ़ी थी। इससे राम को मानवीय धरातल पर समझने की बड़ी स्वस्थ दृष्टि मिलती है और कोरी भावुकता के स्थान पर संघर्ष की यथार्थता उभर कर सामने आती है। व्याख्या में बड़ी ताजगी है। तारीफ़ तो यह है कि रामकथा की पारम्परिक गरिमा को कहीं विकृत नहीं होने दिया गया है। मैं तो चाहूंगा कि वह रामायण और महाभारत के अन्य पौराणिक प्रसंगों एवं पात्रों का भी उद्घाटन करें। डा विजयेन्द्र स्नातक के शब्दों में डा नरेन्द्र कोहली का हिन्दी साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान है। विगत तीस-पैंतीस वर्षों में उन्होंने जो लिखा है वह नया होने के साथ-साथ मिथकीय दृष्टि से एक नई जमीन तोड़ने जैसा है। कोहली ने व्यंग, नाटक, समीक्षा और कहानी के क्षेत्र में भी अपनी मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया है। मानवीय संवेदना का पारखी नरेन्द्र कोहली वर्तमान युग का प्रतिभाशाली वरिष्ठ साहित्यकार है।

कहा जाता है कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी साहित्य में जो द्वार खोला, उसे नरेन्द्र कोहली ने युग जैसा विस्तार दिया। परम्परागत विचारधारा एवं चरित्रचित्रण से प्रभावित हुए बिना स्पष्ट एवं सुचिंतित तर्क के आग्रह पर मौलिक दृष्ट से सोच सकना साहित्यिक तथ्यों, विशेषत: ऐतिहासिक-पौराणिक तथ्यों का मौलिक वैज्ञानिक विश्लेषण यह वह विशेषता है जिसकी नींव आचार्य द्विवेदी ने डाली थी और उसपर रामकथा, महाभारत कथा एवं कृष्ण-कथाओं आदि के भव्य प्रासाद खड़े करने का श्रेय आचार्य नरेंद्र कोहली को जाता है। संक्षेप में कहा जाए तो भारतीय संस्कृति के मूल स्वर आचार्य द्विवेदी के साहित्य में प्रतिध्वनित हुए और उनकी अनुगूंज ही नरेन्द्र कोहली रूपी पाञ्चजन्य में समा कर संस्कृति के कृष्णोद्घोष में परिवर्तित हुई जिसने हिन्दी साहित्य को नए तरह का अविकल आधार दिया।

नरेन्द्र कोहली ने रामकथा को न तो साम्प्रदायिक दृष्टि से देखा है न ही पुनरुत्थानवादी दृष्टि से। मानवतावादी, विस्तारवादी एकतंत्र की निरंकुशता का विरोध करने वाली यह दृष्टि प्रगतिशील मानवतावाद की समर्थक है। मानवता की रक्षा तथा न्यायपूर्ण समताधृत शोषणरहित समाज की स्थापना का स्वप्न न तो किसी दृष्टि से साम्प्रदायिक है न ही पुनरुत्थानवादी। नरेन्द्र कोहली का अवदान मात्रात्मक परिमाण भी पर्याप्तता से आगे है। 

उन्नीस उपन्यासों को समेटे उनकी महाकाव्यात्मक उपन्यास श्रृंखलाएं गुणवत्ता एवं मात्रा दोनों की दृष्टि से अपने पूर्ववर्तियों से कहीं अधिक हैं। नरेंद्र कोहली को पद्मश्री, उत्तरप्रदेश शासन से राज्य साहित्य पुरस्कार, हिंदी संस्थान पुरस्कार, इलाहाबाद नाट्य संघ पुरस्कार, मानस संगम साहित्य पुरस्कार, साहित्य भूषण, हिंदी अकादमी दिल्ली से शलाका सम्मान, साहित्य सम्मान, साहित्यिक कृति पुरस्कार, राजभाषा विभाग, बिहार सरकार से डॉ. कामिल बुल्के पुरस्कार, चकल्लस पुरस्कार, अट्टहास शिखर सम्मान आदि पुरस्कृत-सम्मानित किया जा चुका है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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