शहरी स्लम बस्तियों में रहने वाली महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता में मदद कर रहा है ‘सुखीभव:’

सुखीभव: बेंगलुरु के शहरी स्लम इलाकों में महिलाओं के साथ काम करता है। ये उनको मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता की जानकारी देता है साथ ही उनको मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता से जुड़े उत्पाद भी देता है।

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स्वच्छता किसी भी इंसान के लिये काफी महत्व रखती है, लेकिन क्या आप यकीन करेंगे कि हमारे देश में ज्यादातर महिलाएँ मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता कैसे रखी जाये ये तक नहीं जानती और जो महिलाएँ जानती भी हैं तो उनमें ज्यादातर आर्थिक दिकक्तों की वजह से ऐसा नहीं कर पाती। वो आज भी मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता के लिए पुराने तरीकों पर निर्भर रहती हैं, जो उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है। दरअसल इसकी प्रमुख वजह है जागरूकता की कमी और आर्थिक कारण हैं। वित्तीय और शैक्षिक पहलू के अलावा सालों पुराना सांस्कृतिक टैबू भी भारत जैसे विकासशील देशों में इसके लिये जिम्मेदार है। जहां की मुख्यधारा तक इसको लेकर जागरूकता नहीं पहुंची है।

सुखीभव: की शुरूआत

दिलीप पट्टूबाला जब बिज़नेस मैनेजमेंट का कोर्स कर रहे थे, उस वक्त उन्होंने सामुदायिक सेवा का काम भी शुरू कर दिया था। इस दौरान वो रक्तदान शिविर, स्लम बस्तियों में रहने वाले लोगों के विकास और दूसरे काम करने लगे थे। इस तरह उनका रूझान सामाजिक कार्यों के विकास में बढ़ता गया। दिलीप ‘अक्षय पात्रा फाउंडेशन’ और ‘हेल्पऐज इंडिया’ जैसे संगठनों के लिए भी काम कर चुके थे। दिलीप ने कैंब्रिज के एंग्लिया रस्किन विश्वविद्यालय से समाज कल्याण और सामाजिक नीति में मास्टर्स किया और उसके बाद लंदन में ‘रेड क्रॉस सोसायटी’ के लिए काम किया। इसके बाद जब वो बेंगलुरु लौटे तो यहाँ आकर वो ऑस्ट्रेलियन स्टार्टअप ‘पॉलीनेट एनर्जी’ के साथ जुड़ गये। ताकि बेंगलुरु की स्लम बस्तियों में ऊर्जा की कमी को दूर करने के लिए काम कर सकें।

एक दिन जब मैं काम कर रहा था, तो मेरे एक ऑस्ट्रेलियाई साथी ने मेरे से शहरी मलिन बस्तियों में रहने वाली महिलाओं की मासिक धर्म स्वच्छता की स्थिति के बारे में पूछा। तो दूसरे आदमियों की तरह मैंने भी इस बारे में कभी नहीं सोचा था, इसलिए मैं उसके सवालों का जवाब नहीं दे पाया।

जिज्ञासा के कारण वो अपने डेस्कटाप में रिसर्च पर जुट गये और उन्होंने जो पढ़ा उसे समझना काफी मुश्किल था। उनके मुताबिक “शहरी मलिन बस्तियों में मासिक धर्म स्वच्छता को लेकर 45 करोड़ महिलाओं में से केवल 12 प्रतिशत को ही इसकी जानकारी है।”ये बात दिलीप के लिए काफी हैरान करने वाली थी। इसलिए उन्होने सच्चाई का पता लगाने के लिए अपनी एक पुरानी दोस्त सहाना भट्ट से इस बारे में बात की। सहाना ने मीडिया लॉ में मास्टर्स किया हुआ था और वो ‘जनाग्रह’ नाम की कंपनी के लिए काम कर रही थीं। इसके बाद दोनों ने सब काम छोड़ सच्चाई का पता लगाने के बारे में सोचा। इसके लिए सबसे पहले दोनों ने सुविधाओं से वंचित करीब 250 महिलाओं पर सर्वे किया ताकि हक़ीक़त का पता लगाया जा सके। सर्वे की रिपोर्ट उन दोनों की सोच से कहीं ज्यादा खराब थी। दोनों के लिए ये बात हज़म करना मुश्किल था कि आज के दौर में भी सर्वे में शामिल 82 प्रतिशत महिलाएँ मासिक धर्म के दौरान काफी गंदे तरीकों का सहारा ले रही थीें। इनमें राख, मिट्टी, प्लास्टिक, अखबार और पत्ते शामिल थे।

जो जानकारी इनके हाथ लगी वो काफी हैरान करने वाली थी। तब दिलीप और सुहाना इस समस्या के समाधान की ज़रूरत महसूस करने लगे। इसके लिए दोनों ने साल 2013 में मिलकर सुखीभव: की नींव रखी। जिसने जून, 2014 में काम करना शुरू कर दिया।

जागरूकता और सूक्ष्म उद्यम

सुखीभव: बेंगलुरु के शहरी स्लम इलाकों में महिलाओं के साथ काम करता है। ये उनको मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता की जानकारी देता है साथ ही उनको मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता से जुड़े उत्पाद भी देता है जैसे सैनिटरी पैड।

सर्वेक्षण से प्राप्त नतीजों को हासिल करने के बाद टीम ने चार महीने तक इसके पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चलाया। इस दौरान 12 अलग अलग उत्पादों का परीक्षण किया गया। इससे सुखीभव: को ये फैसला लेने में आसानी हुई की उसे किन उत्पादों को, कैसे बेचना चाहिए।

कैसे होता है काम

 जागरूकता सत्र की शुरूआत में 25 मिनट का इंटरेक्टिव वीडियो दिखाया जाता है।

टीम ने सैनिटरी पैड के उत्पादकों के साथ समझौता किया हुआ है, जिसके तहत ये उनको कम दाम में सैनिटरी पैकेट देते हैं। उदाहरण के लिए 8 पैड वाला सैनिटरी पैक जिसकी कीमत 45 रुपये है वो सुखीभव: को 25 रुपये में मिल जाता है।

 टीम के सदस्यों ने ऐसी महिलाओं की पहचान की है, जो इन इलाकों में रहती हैं और आज वो छोटे उद्यमी के तौर पर काम कर रही हैं। इन महिलाओं को जागरूकता सत्र बुलाने और सैनिटरी पैड बांटने के बारे में सिखाया गया है। 

सुखीभव: इन महिलओं को तीन महीने की ट्रेनिंग देता है। इस दौरान ये महिलाएँ अपने लिए एक नेटवर्क तैयार करती हैं। साथ ही इनको लघु उद्यमी के तौर पर स्थापित करने में मदद की जाती है। इस तरह हर पैकेट में इन महिलाओं को 5 रुपये की आमदनी होती है।

अब तक सुखीभव:सस्ते सेनेटरी पैड के ज़रिए 72 सौ से ज्यादा महिलाओं को हर महीने अपने साथ जोड़ रहा है। अब तक ये 11,800 महिलाओं को शिक्षित भी कर चुका है। दक्षिण बेंगलुरु में 18 महिलाएँ लघु उद्यमी के तौर पर इनके साथ काम कर रही हैं।

यूएन हैबीटेट का इंडियन यूथ फंड, देशपांडे फाउंडेशन, नैसकॉम फाउंडेशन, टाटा सोशल एंटरप्राइज चैलेंज और आईआईएम-बी भी सुखीभव:के इस काम के लिए उन्हें सम्मानित कर चुका है।

राजस्व मॉडल, सहयोग, और रास्ते में आने वाली रूकावटें

दिलीप का कहना है कि मामूली मुनाफ़े से वो लंबे वक्त तक टिक सकते हैं, ये लोग शुरूआत से ही सैनिटरी पैड को जितना संभव हो उतने कम दामों में बेच रहे हैं।

किसी भी सामाजिक उद्यम के लिए सहयोग एक महत्वपूर्ण सफलता का कारक होता है। सहाना का कहना है कि वो हर समुदाय में ऐसे सहयोगी की तलाश कर रहे हैं। अब तक इन लोगों ने मिटू फाउंडेशन, रजा एजुकेशन सोसायटी, पसंद, सरल डिज़ाइन और मंत्रा फॉर चेंज के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

दिलीप और सहाना का मानना है कि सामाजिक कलंक के खिलाफ लड़ना आसान नहीं होता और ये उनके लिये प्रमुख चुनौती भी है।

दिलीप को साल 2016 के लिये अक्यूमैन फैलोशिप मिल चुकी है, जबकि सुखीभव: की दूसरी सह-संस्थापक सहाना मार्केटिंग में एमबीए कर रही हैं।

दोनों तमाम व्यस्तताओं के बावजूद सुखीभव: को काफी आगे तक ले जाना चाहते हैं दिलीप का कहना है कि “हम अगले पांच सालों के दौरान दस लाख महिलाओं के साथ काम करना चाहते हैं।”

अगस्त, 2016 से सुखीभव: बेंगलुरु में पूरी तरह काम करना शुरू कर देगा। आने वाले महीनों में इनकी योजना हुबली और धारवाड़ जैसे ग्रामीण इलाकों में काम करने की है। इसके अलाव पुणे में भी ये लोग अपने काम शुरू करने जा रहे हैं। इनको उम्मीद है कि अगले साल जनवरी में ये तीसरे शहर में भी काम करना शुरू कर देंगे।

दिलीप का कहना है कि “सुखीभव:की मदद से मैं वो दिन देखना चाहता हूं जब हर महिला मासिक धर्म से जुड़ी स्वच्छता को लेकर जागरूक हो और इसका लाभ हर महिला तक पहुंचे। बावजूद इसके मेरा मानना है कि ये मेरे काम का अंत नहीं है। मैं इससे मिलते जुलते दूसरे काम भी करना चाहता हूं जिनके बारे में ज्यादा बात नहीं की जाती। परिवार नियोजन हमारा अगला प्रोजेक्ट होगा।”

मूल-सिंध्या सिन्हा

अनुवाद- गीता बिष्ट