ठेले पर मोमबत्तियां बेचने वाले नेत्रहीन भवेश बने करोड़ों के मालिक...एक दुर्लभ सच

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फेरीवाले से कई करोड़ की कंपनी का मालिक : भवेश भाटिया की कहानी...


अंधा होना

भवेश भाटिया जन्म से अंधे नहीं थे। बड़ा होने तक उनकी आंखों में थोड़ी रोशनी थी। रेटिना मस्कुलर डिटेरियरेशन नामक रोग से ग्रस्त भवेश को हमेशा पता था कि उनकी नजर समय के साथ कमजोर पड़ती जाएगी। लेकिन जब वह 23 वर्ष के थे तो उनकी आंखों की रोशनी पूरी तरह चली गई और आने वाले बुरे दिनों के लिए कोई तैयारी भी नहीं की जा सकी।

वह उस समय होटल मैनेजर के रूप में काम कर रहे थे और अपनी कैंसर से पीडि़त मां के इलाज के लिए पैसे बचाने का प्रयास कर रहे थे। अपनी मां को बचाने की उनकी अधीरता महज संतानोचित प्रेम नहीं थी। वह उसके अस्तित्व की रीढ़ थी और वह उसके निःशक्तता वाले जीवन को आगे बढ़ाने के लिए उसका होना बहुत जरूरी था।

भवेश भाटिया
भवेश भाटिया

45 वर्षीय भवेश याद करते हैं, 

"स्कूल में मुझे बुरी तरह तंग किया जाता था। एक दिन घर लौटने के बाद मैंने उनसे कहा कि मैं अगले दिन से स्कूल नहीं जाऊंगा। सब कोई मिलकर मेरे ऊपर ‘अंधा लड़का, अंधा लड़का’ चिल्लाकर फब्तियां कसते हैं। मुझ पर दबाव देने या मेरी मांग मान लेने के बजाय उन्होंने मेरा सिर सहलाते हुए कहा कि लड़के निर्दयी नहीं हैं। वे तुम्हारा मित्र बनना चाहते हैं लेकिन तुम उनसे इतने भिन्न हो इसलिए वे तुमसे अलग रहते हैं। उन्होंने मुझे बताया कि तंग करना तुम्हारा ध्यान आकर्षित करने का उनका तरीका है। मैं बहुत मुश्किल से उनकी बात का विश्वास कर पाया। अगले दिन, तंग करने की कोशिशों के बावजूद मैंने उनसे दोस्ती की पेशकश की। हमलोग जिंदगी भर के लिए दोस्त बन गए।"

वह बताते हैं, 

"जीवन का यह शुरुआती सबक मेरे व्यवसाय का भी निर्देशक सिद्धांत है। मेरी गरीबी और निःशक्तता ने मेरे सामने अपार चुनौतियां प्रस्तुत कीं। लेकिन उनके विवेक के कारण ही मैं सही निर्णय कर पाता हूं।"

इसीलिए मां को खोने की आशंका के बीच आंखों की रोशनी का चला जाना उनके लिए संघातक आघात था। उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। उनके पिताजी उनकी मां के इलाज पर अपनी सारी बचत पहले ही फूंक चुके थे। बिना नौकरी और नौकरी की संभावना के बिना वे उनकी देखरेख नहीं कर सकते थे। अतः शीघ्र ही वह चल बसीं।

भवेश कहते हैं 

"मैं उनके बिना अकिंचन हो गया था। उन्होंने खुद को काफी शिक्षित ही नहीं किया था, मेरे अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए अथक परिश्रम भी किया था। मैं ब्लैकबोर्ड नहीं पढ़ पाता था। वह मेरे पाठों को को याद कराने के लिए घंटों जूझा करतीं। उनका यह व्यवहार मेरे पोस्ट ग्रेजुएशन करने तक जारी रहा।" 

भवेश उनके लिए खुद को कुछ सार्थक बनना चाहते थे। उनके आरंभ करते ही मां का चला जाना उन्हें दुनिया का सबसे बड़ा अन्याय महसूस हुआ।

क्षति

अपनी मां, अपनी नजर और अपनी नौकरी के चले जाने के दुख से वह टूट गए थे लेकिन जिस चीज ने उन्हें सांत्वना दी, वह अपनी मां द्वारा मिली सर्वोत्तम सलाह थी। "उन्होंने मुझसे कहा था - अगर दुनिया नहीं भी देख पाओगे तो क्या हुआ? कुछ ऐसा करो कि दुनिया तुम्हें देखे।" इसीलिए आत्मदया में डूबने-उतराने के बजाय भवेश उस मोहक ‘कुछ’ की तलाश में लग गए जो उन्हें दुनिया की नजरों में देखने के काबिल बना देती।

भवेश बताते हैं- 

"बचपन से ही मेरी रुचि अपने हाथों से चीजें बनाने में थी। मैं पतंगें बनाया करता था, मिट्टी के साथ प्रयोग किया करता था, खिलौने और छोटी मूर्तियां आदि गढ़ा करता था। मैंने मोमबत्ती निर्माण में हाथ आजमाने का फैसला किया क्योंकि उसमें मेरे लिए आकार और गंध की संवेदना का उपयोग करने की गुंजाइश थी। लेकिन मुख्यतः इसलिए भी कि मैं प्रकाश के प्रति आकर्षित हूं और हमेशा से रहा हूं," 

ज्वलंत जुनून के सिवा कोई संसाधन नहीं होने के कारण भवेश समझ नहीं पा रहे थे कि शुरुआत कैसे की जाय। 

"मैंने 1999 में मुंबई के नेशनल एसोसिएशन ऑफ ब्लाइंड से प्रशिक्षण लिया। वहां उनलोगों ने सिखाया कि सादा मोमबत्ती कैसे बनाई जाती है," वह याद करते हैं। "मैं रंगों, सुगंधों और आकारों से खेलना चाहता था लेकिन रंग और सुंगध मेरे बजट से बाहर थे।" 

इसलिए रात भर जागकर वे मोमबत्तियां बनाते थे और दिन में उन्हें महाबालेश्वर के स्थानीय बाजार के एक कोने में ठेले पर बेचते थे। 

"ठेला एक मित्र का था और उसने मुझे पचास रुपए रोज पर उपयोग करने के लिए दिया था। हर दिन मैं अगले दिन के लिए सामानों की खरीद के वास्ते पचीस रुपए अलग रख दिया करता था।’’ 

यह जीवित रहने का एकमात्र और कमरतोड़ जरिया था। ‘‘लेकिन मैं कम से कम वह तो कर पा रहा था जो करना चाहता था,’’ भवेश सहानुभूति की किसी अभिव्यक्ति को दृढ़तापूर्वक नकारते हुए कहते हैं।

भाग्य का मौका

तभी एक दिन अप्रत्याशित रूप से चीजें बदलने लगीं। इसकी शुरुआत तब हुई जब एक महिला उसके ठेले के सामने मोमबत्तियां खरीदने के लिए रुकीं। वह उसके सौम्य व्यवहार और जीवंत हंसी से प्रभावित हुईं। वे लोग तत्काल मित्र बन गए और घंटों बातें करते रहे। इसे पहली नजर का प्रेम कहा जा सकता है। लेकिन यह दो आत्माओं के बीच संपर्क से बढ़कर भी कुछ था।

उनका नाम नीता था। भवेश ने उनसे विवाह करने का इरादा कर लिया था। वह भी उनसे मिलकर लौटते समय हर रोज उनसे बात करने और साथ जिंदगी बिताने के लिए सोचा करती थीं। नीता को गरीब और अंधे मोमबत्ती बनाने वाले से शादी के फैसले के कारण घर वालों के विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने पक्का इरादा कर लिया था और जल्द ही महाबलेश्वर के खूबसूरत हिल स्टेशन में छोटे से मकान में उनके साथ जीवन जिंदगी जीने की राह पर बढ़ गईं।

नीता जबर्दस्त आशावादी थीं। भवेश नया बर्तन नहीं खरीद सकते थे इसलिए उन्हीं बर्तनों में वह मोम पिघलाते थे और नीता खाना पकाती थीं। उन्हें चिंता होती थी कि इससे शायद पत्नी के दिल को चोट पहुंचती होगी। लेकिन वह उनकी चिंता पर हंसती थीं। उन्होंने एक दोपहिया खरीदा जिससे वह अपने पति को मोमबत्तियां बेचने के लिए शहर ले जा सकें। बाद में परिस्थितियों में सुधार हुआ तो उन्होंने वैन चलाना भी सीखा ताकि बड़ी मात्रा में मोमबत्तियों को ले जाया जा सके। "वह मेरी जिंदगी की रोशनी है," भवेश मुस्कुराते हुए कहते हैं।

संघर्ष

कहने की बात नहीं है कि नीता के जिंदगी के आने के बाद उनके लिए संघर्ष आसान हो गया था। बोझ उठाने के लिए एक संगिनी थी इसलिए बोझ अब उतना भारी नहीं लगता था। 

"आंख वाले लोग स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे कि कोई अंधा आदमी अपने पांव पर खड़ा हो सकता है। एक बार कुछ उपद्रवी लोगों ने मेरी सारी मोमबत्तियां ठेले से उठाकर नाली में फेक दिया। जहां भी मैं मदद के लिए गया, मुझे कहा गया, ’तुम अंधे हो। तुम भला क्या कर सकते हो?’ मैंने प्रोफेशनल मोमबत्ती निर्माताओं और अन्य संस्थाओं से मार्गदर्शन पाने की कोशिश की। लेकिन किसी ने मदद नहीं की।" 

ऋण संबंधी आवेदनों को तो सिरे से नकार ही दिया जाता था, अमौद्रिक अनुरोधों पर भी आक्रामक प्रतिक्रिया मिलती थी। वह मोमबत्ती निर्माण पर विशेषज्ञों की सलाह लेना चाहते थे लेकिन उन्हें डांट-फटकार और अपमान मिलता था।

"इसलिए मैं अपनी पत्नी के साथ मॉल में जाता और वहां रखे गए विभिन्न प्रकार की कीमती मोमबत्तियों को छूता और महसूस करता," भवेश याद करते हैं। वह जो भी महसूस करते थे उसको अपनी प्रतिभा और सृजनात्मकता से संवारकर वह अधिक प्रकार की मोमबत्तियां बनाने लगे। टर्निंग पाइंट तब आया जब उन्हें सतारा बैंक से पंद्रह हजार रुपए का ऋण स्वीकृत हुआ जहां अंधे लोगों के एक विशेष योजना चल रही थी। "उससे हमलोगों ने पंद्रह किलो मोम, दो डाई और पचास रुपए में एक ठेला लिया," भवेश कहते हैं। उसी के सहारे उन्होंने कई करोड़ रु. का कारोबार खड़ा कर लिया जिसके देश-दुनिया में प्रतिष्ठित कॉर्पोरेट ग्राहक हैं और दो सौ कर्मचारियों की समर्पित टीम भी जिसमें सारे के सारे दृष्टिबाधित हैं।

सफलता का एकमात्र रहस्य

भवेश बताते हैं, 

"अब, जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो महसूस करता हूं कि मेरे ऋण मांगने पर इतने सारे लोगों ने मुझे इस कारण दुत्कार दिया कि दुनिया में निर्मम तरीके से कारोबार चलता है। हर कोई अपने दिमाग से सोचता है, दिल से नहीं। मैंने महसूस किया सफल व्यापार चलाने का एकमात्र तरीका दिल से सोचना है। इसमें समय लगेगा - काफी समय। लेकिन अगर आप अपने दिल के कहे के अनुसार कर रहे हैं, तो आपने जो लक्ष्य तय किया है, उसे हासिल करके रहेंगे।"

एक समय ऐसा भी था जब भवेश अगले दिन के मोमबत्ती के लिए मोम खरीदने के लिए पच्चीस रुपए अलग रख दिया करते थे। आज सनराइज कैंडल्स 9000 डिजाइन वाली सादा, सुगंधित और सुगंध चिकित्सा की मोमबत्तियां बनाने के लिए पच्चीस टन मोम का उपयोग रोज करता है। वे अपना मोम यूके से खरीदते हैं। उनके ग्राहकों में रिलायंस इंडस्ट्रीज, रनबैक्सी, बिग बाजार, नरोदा इंडस्ट्रीज और रोटरी क्लब आदि कुछ प्रमुख नाम हैं।

सनराइज कैंडल्स चलाने के लिए दृष्टिबाधित लोगों को काम में लगाने के बारे में भवेश कहते हैं, "हमलोग अंधे लोगों को सिखाते हैं जिससे कि वे हमारी इकाई को महज सहायता न करके काम समझ सकें जिससे किसी दिन लौटकर अपना कारोबार भी खड़ा कर सकें।" जहां वह कंपनी के सृजनात्मक पक्षों पर ध्यान केंद्रित करना पसंद करते हैं, वहीं नीता उद्यम की प्रशासनिक जिम्मेवारियों की देखरेख करती हैं। वह स्वावलंबी बनने के लिए अंधी लड़कियों को व्यावसायिक प्रशिक्षण भी देती हैं।

खिलाड़ी

कोई भी सोचेगा कि खाक से कई करोड़ का कारोबार खड़ा करने में, खास कर भवेश को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा उसे देखते हुए, उनका पूरा समय लग जाता होगा। लेकिन वह एक नैसर्गिक खिलाड़ी हैं और अपनी क्षमताओं को पेशेवराना ढंग से तराशने के लिए वह पर्याप्त समय देते हैं।

भवेश कहते हैं, "मैं बचपन से ही खेलकूद में सक्रिय रहता था। बद्धमूल धारणाओं के विपरीत, अंधापन का मतलब शरीर से कमजोर होना नहीं है। मुझे अपने खिलाड़ीपन पर गर्व है।" सनराइज कैंडल्स खड़ा करने के दौरान लंबे समय तक वह खेलकूद से दूर रहे लेकिन अब, जब कारोबार अपने पूरे उत्कर्ष पर है, वह अपने दैनिक प्रशिक्षण के मामले में कठोर हैं। 

"मोमबत्ती का कारोबार जमा लेने के बाद मैंने फिर से स्पोर्ट्स (शॉर्टपुट, डिस्कस, और जेवलिन थ्रो) की प्रैक्टिस शुरू कर दी। पारालिंपिक स्पोर्ट्स में मिले कुल 109 मेडल मेरे पास हैं। अपने रियाज के दौरान मैं रोज 500 दंड करता हूं, 8 किलोमीटर दौड़ता हूं और अपने कारखाने में स्थापित जिम का उपयोग करता हूं। दौड़ने के रियाज के लिए मेरी पत्नी 15 फीट लंबी नाइलोन की रस्सी का एक सिरा अपने वैन से बांध देती है और दूसरा सिरा मुझे पकड़ा देती है। फिर वह मेरी गति से वैन चलाती है और मैं साथ-साथ दौड़ता हूं।"

"लेकिन दोस्तों," वह जारी रखते हैं, "मुझे उन्हीं को लेकर डर लगता है। अगर किसी दिन मैं उनसे तेज आवाज में बात करता हूं, तो दूसरे दिन वह वैन की गति बढ़ा देती हैं।"

सपने, लक्ष्य और भविष्य

अभी भवेश की ब्राजील में होने वाले पारालिंपिक 2016 में भाग लेने के लिए तैयारी चल रही है। वह एक और विश्व रिकॉर्ड बनाने के लिए कृतसंकल्प हैं। 

"दुनिया में 21 मीटर की सबसे ऊंची मोमबत्ती बनाने का रिकॉर्ड जर्मनी के नाम है। मेरी योजना उससे ऊंची मोमबत्ती बनाने की है। पिछले अप्रील में हमलोगों ने एक नया कौशल शुरू किया है - श्री नरेंद्र मोदीजी, श्री अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर और 25 अन्य नामचीन व्यक्तियों की मोम की आदमकद मूर्तियां बनाने का।"

भवेश कहते हैं कि उन्होंने जो लक्ष्य तय किए हैं, उनको हासिल कर लेने पर उन्हें अत्यंत संतुष्टि मिलेगी।

"मेरे कई सपने हैं, और भी अनेक लक्ष्य हैं। मैं माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाला दुनिया का पहला अंधा आदमी बनना चाहता हूं। मैं अपने देश के लिए ब्राजील में होने वाले पारालिंपिक 2016 में स्वर्णपदक जीतना चाहता हूं। लेकिन सबसे बढ़कर, मैं सुनिश्चित करना चाहता हूं कि हर अंधा भारतीय अपने पांवों पर खड़ा हो।"