फुटबॉल खेलना सिखाते हुए टूटू सर ने कई लड़कियों की ज़िंदगी से दूर की है गरीबी, मायूसी और बेबसी

उम्दा 'खिलाड़ी' बनाकर टूटू सर ने संवारी है कई लड़कियों की ज़िंदगी ... गाँव-जंगल के आदिवासी इलाकों और शहर की झुग्गी-बस्तियों में रहने वाली कई लड़कियों को खेल के मैदान पर लाकर उन्हें कामयाबी की ऊंची उड़ान भरना भी सिखाया है इस श्रमजीवी और त्यागमूर्ति ने     

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टूटू सर के नाम से मशहूर नंदकिशोर पटनायक कामयाबी की एक ऐसी कहानी के नायक हैं जिसमें हार न मानने की जिद है, दूसरों की भलाई के लिए किया त्याग है, निस्स्वार्थ प्रेम है, रोमांच है। ये कहानी लाजवाब है। टूटू सर खेल की दुनिया के वो शख्सियत हैं जिन्होंने कभी खो-खो खेलने वाली लड़कियों से उड़ीसा की पहली महिला फुटबॉल टीम बनाई और फिर उसे ट्रेनिंग देते हुए देश की सिरमौर फुटबॉल टीम बना दिया। 

जब टूटू सर ने उड़ीसा की पहली महिला फुटबॉल टीम बनाने की कोशिश शुरू की थी तब वक्त ऐसा था कि उड़ीसा में लड़कियाँ फुटबॉल के मैदान की ओर रुख़ भी नहीं करना चाहती थीं। फुटबॉल को केवल लड़कों का खेल ही समझा जाता था। टूटू सर ने अपनी मेहनत और त्याग के बल पर उड़ीसा में महिला फुटबॉल खिलाड़ियों की एक फौज तैयार की है। उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि इन दिनों उड़ीसा की महिला फुटबॉल टीम देश की सबसे उम्दा टीमों में शुमार है। उड़ीसा में सैकडों लड़कियाँ फुटबॉल के मैदान पर न केवल खेलती दिखाई दे रही हैं, बल्कि फुटबॉल के ज़रिये अपना कैरियर भी संवार रही हैं।

टूटू सर से फुटबॉल सीखने वाली कई सारी लड़कियों ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने राज्य उड़ीसा का नाम रोशन किया है। इतना ही नहीं टूटू सर की वजह से उड़ीसा की युवतियों और महिलाओं की सोच में भी सकारात्मक बदलाव आया है। युवतियों और महिलाओं ने ये जान लिया है कि खेल-कूद में भी उनके लिए पुरुषों के समान ही कामयाबी और तरक्की के अवसर हैं। उड़ीसा में आये इस बड़े बदलाव का श्रेय टूटू सर यानी नंदकिशोर पटनायक को भी जाता है।

लाजवाब कहानी के नायक नंदकिशोर पटनायक का जन्म उड़ीसा के मयूरभंज जिले में हुआ। 16 मार्च, 1956 को जन्मे नंदकिशोर का परिवार सीधा-सादा मध्यमवर्गीय परिवार था। पिता अनिल चंद्र पटनायक सरकारी कर्मचारी थे, माँ सुरभि गृहिणी थीं। अनिल चंद्र और सुरभि को कुल सात संतानें हुईं, जिनमें नंदकिशोर का नंबर दूसरा था। नंदकिशोर का मकान जहाँ था वहां आसपड़ोस में फुटबॉल को काफी जोर था। कई सारे युवा और बच्चे हर दिन मैदान पर जाकर फुटबॉल खेलते थे। नंदकिशोर ने एक बेहद ख़ास मुलाक़ात में बताया कि जब से उन्होंने होश संभाला है तभी से वे फुटबॉल खेल रहे हैं। 

पांच साल की नन्हीं उम्र में ही नंदकिशोर मैदान में आ गए थे। फुटबॉल की दीवानगी उन पर कुछ इस तरह से सवार थी कि हमउम्र बच्चों के साथ खेलने को न मिलने पर वे बड़े बच्चों यानी अपनी उम्र से कहीं ज्यादा बड़े बच्चों के साथ फुटबॉल खेलने लग जाते थे। उम्र में छोटे थे, दूसरे खिलाड़ियों की तुलना में कद भी बहुत छोटा था, लेकिन फुटबॉल की दीवानगी और गोल करने का जोश किसी से कम नहीं था।नंदकिशोर बचपन से ही बहुत चुस्त थे, उनमें गज़ब की फुर्ती थी। दूसरे बड़े खिलाड़ियों की तुलना में वे मैदान पर तेज़ दौड़ते थे। कुछ ही दिनों में अपनी प्रतिभा की वजह से फुटबाल-प्रेमियों के बीच नंदकिशोर काफी मशहूर हो गए। बचपन में सभी उन्हें प्यार से ‘टूटू’ कहकर बुलाते थे। ‘टूटू’ उनका उपनाम बन गया था। 

टूटू का खेल इतना लुभावना था कि उसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग मैदान पर आने लगे थे। टूटू जैसे ही मैदान पर उतरते आसपड़ोस के गली-मोहल्ले में खबर फ़ैल जाती कि “टूटू खेल रहा है।” बस फिर क्या था, लोग अपने कामकाज को बीच में छोड़कर नन्हें टूटू का शानदार खेल देखने के लिए मैदान की ओर चले आते। युवाओं के बीच एक छोटे से बालक को खेलता देख लोगों को भी खूब मज़ा आता। लोग टूटू के गेंद पर नियंत्रण और मैदान पर उनकी फुर्ती से बहुत प्रभावित थे। मैदान पर सबसे कम उम्र का खिलाड़ी होने के कारण वे दर्शकों के चहेते भी थे। कई बार तो इतनी छोटी उम्र के बच्चे को फुटबॉल खेलता देख, दर्शक कभी उनके गाल खींचते तो कभी सर पर हाथ फेरते, तो कभी पीठ थपथपाकर शाबाशी देते। टूटू टीम में सबसे कम उम्र के खिलाड़ी होने के बावजूद ‘सेंटर फॉरवर्ड’ की पोजीशन पर खेलते। टीम के दूसरे खिलाड़ियों को भी टूटू की काबिलियत और मौकों को गोल में तब्दील करने के हुनर पर बहुत भरोसा था। टूटू ने भी कभी भी अपनी टीम को निराश नहीं किया। टूटू की लोकप्रियता कुछ इस तरह की हो गयी थी कि लोग कहने लगे – जिस टीम में टूटू है उसे हराना मुश्किल है। ऐसा भी नहीं था कि किसी ने टूटू को फुटबॉल खेलना सिखाया था। दूसरे खिलाड़ियों को कैसे छकाना है, मौकों को कैसे गोल में तब्दील करना है, ये बात भी किसी ने टूटू को नहीं बतायी थी। दूसरे खिलाड़ियों को मैदान पर खेलता देखकर ही टूटू सब कुछ सीख गए थे।फुटबॉल का जादू टूटू के सर चढ़कर बोलने लगा था। जैसे ही उन्हें मौका मिलता वे मैदान की तरफ दौड़ते और फुटबॉल से खेलने लग जाते।

बचपन में उन्हें पढ़ाई से नफरत-सी हो गयी थी। उन्हें लगता कि जीवन में सिर्फ खेल ही खेल होता तो कितना अच्छा होता। स्कूल जाने के बजाय मैदान पर जाना होता तो कितना अच्छा होता। एग्जाम के बजाय मैच होता तो कितना मज़ा आता। बेमन से ही सही टूटू स्कूल भी जाने लगे। उनके माता-पिता ने उन्हें समझाया कि आगे चलकर फुटबॉल उन्हें रोटी नहीं देगा और ज़िंदगी की सभी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पढ़ना-लिखना ज़रूरी है। माता-पिता की बात मानकर टूटू पढ़ाई-लिखाई में भी अपना मन लगाने लगे।

स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ फुटबॉलभी चलता रहा। टूटू ने बचपन में कई सारे फुटबॉल टूर्नामेंटों में हिस्सा लिया। वे हमेशा अपने स्कूल - शरतचंद्र विद्यापीठ की फुटबॉल टीम का अहम हिस्सा रहे। कोई मैच नहीं छोड़ा। लेकिन, कॉलेज आते-आते टूटू पर क्रिकेट का भुखार सवार हो गया। उन दिनों भारत-भर में क्रिकेट की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही थी। शहर, गाँव, कसबे, मोहल्ले सभी जगह क्रिकेट की धूम थी। टूटू पर क्रिकेट के भुखार का कुछ इस तरह असर हुआ कि उन्होंने फुटबॉल बंद करने और क्रिकेट खेलना का मन बना लिया। टूटू ने बताया, “उन दिनों मैं सुनील गावस्कर का दीवाना हो गया था। मैं भी सुनील गावस्कर की तरह ही बनाना चाहता था। मैं क्रिकेट भी अच्छा खेलता था। बोलिंग, बैटिंग –दोनों करता था। सुनील गावस्कर की तरह ही मैं भी अपनी टीम का ओपनिंग बैट्समैन था।” ये वो दिन थे जब सुनील गावस्कर ‘नेशनल हीरो’ हुआ करते थे। उनकी लोकप्रियता परवान चढ़ चुकी थी। मैदान पर उनके जलवे थे। टूटू भी सुनील गावस्कर की तरह ही छोटी कद-काटी के थे, शायद यही वजह भी थी कि वे सुनील गावस्कर की तरह बनने के सपने देखने लगे। टूटू ने अपने कॉलेज की क्रिकेट में जगह भी बना ली और फुटबॉल छोड़कर क्रिकेट खेलने लगे। टूटू बताते हैं, “मेरा एक दोस्त था, उसका नाम भवानी है। वो मेरे पीछे पड़ा रहता था कि मैं फुटबॉल खेलूँ। वे मेरे घर आता और मुझे ज़बरदस्ती मैदान लेकर जाता था। उसकी जिद की वजह से मैं फुटबॉल खेलता रहा। उसे लगता था कि मैं फुटबॉल के लिए ही बना हूँ और मेरे जैसा खिलाड़ी पूरे राज्य में नहीं है। अगर वो नहीं होता तो शायद मेरा फुटबॉल से दूर हो जाता।” करीब दो साल तक टूटू पर क्रिकेट का भुखार सवार रहा। इन दो सालों में वे ज्यादातर समय क्रिकेट ही खेले। जब कोई क्रिकेट नहीं खेल रहा होता तब वे टाइम पास के लिए फुटबॉल खेल लिया करते थे।

लेकिन, इंटर कॉलेज में उन्हें फिर से फुटबॉल के मैदान को अपना बनाना पड़ा। महाराजा पूर्णचंद्र कॉलेज की फुटबॉल टीम कमज़ोर थी और ‘पीईटी’ चाहते थे कि टूटू कॉलेज की टीम का हिस्सा बनें और उसे मजबूती दें। ‘पीईटी’ की जोर-ज़बरदस्ती के आगे टूटू की एक न चली और वे कॉलेज की फुटबॉल टीम के 'स्ट्राइकर' बन गए। एक फिर जब टूटू 'स्ट्राइकर' बनकर फुटबॉल के मैदान पर लौटे तो गेंद से उनके पैरों की दोस्ती फिर से परवान चढ़ने लगी। ये दोस्ती इस बार कुछ इस तरह से मज़बूत हुई कि टूटू पर चढ़ा क्रिकेट का भुखार उतर गया। टूटू अब ये फैसला कर चुके थे कि वे फुटबॉल के सिवाय कोई दूसरा खेल नहीं खेलेंगे। उन्होंने फुटबॉल को ही अपना जीवन मान लिया। इसके बाद, एक के बाद एक करते हुए टूटू ने कई टूर्नामेंट खेले। उड़ीसा की जूनियर फुटबॉल टीम में भी उन्हें आसानी से जगह मिल गयी। जब यूनिवर्सिटी पहुंचे तब भी वे चयनकर्ताओं और कोच की पहली पसंद थे।

बतौर खिलाड़ी टूटू की लोकप्रियता और ख्याति दिनबदिन बढ़ने लगी थी। अब वे राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बनने के सपने देखने लगे थे। सभी को भरोसा था कि जल्द ही टूटू राष्टीय फुटबॉल टीम में अपनी जगह बना लेंगे। लेकिन, इसी बीच एक हादसे ने उन्हें पूरी तरह से हिला कर रख दिया ये हादसा इतना भयानक था कि टूटू का दुबारा मैदान पर उतर पाना भी मुश्किल जान पड़ रहा था। हुआ यूँ था कि एक मैच के दौरान अपने प्रतिद्वंद्वियों को चकमा देने की कोशिश में वे चोटिल हो गए। ज़ख्म बहुत गहरा था। पाँव पर बहुत गहरी चोट लगी थी। टूटू को मैदान से सीधे अस्पताल ले जाया गया। उनके ज़ख़्मी पाँव पर पट्टी बांधी गयी। चोट इतनी गहरी थी कि पूरे चार महीने तक पाँव पर पट्टी बंधी रही। पट्टी से बंधे अपने पाँव को देखकर टूटू बहुत मायूस होते थे। उन्हें लगता था कि बतौर फुटबॉल खिलाड़ी उनका करियर ख़त्म हो चुका है। लेकिन, जब ज़ख्म भर गया और पट्टी खोली तब तब टूटू के मन में उम्मीद फिर से जगी। पाँव में थोड़ी ताकत आते ही टूटू मैदान पर वापस लौटे और धीरे-धीरे फिर से अपनी लय पकड़ ली। एक बार फिर टूटू प्रतिद्वंद्वियों के लिए परेशानियां खड़ी करने लगे। एक बार फिर से टूटू फुटबॉल के मैदान में कुछ ऐसे रम गये थे कि उन्हें खुद भी पता ही नहीं चला कि कब फुटबॉल उनके जीवन में इतना गहरा समा गया। एक के बाद एक टूर्नामेंटों में खेलते और बेहतर परफॉर्म करते हुए उन्होंने कुछ ही दिनों में अपनी पहचान एक बेहतरीन फुटबॉल खिलाड़ी के रूप में बना ली।

एक बार फिर उनके जीवन ने करवट की। इस बार का घटनाक्रम भी उनके लिए नयी सौगात और मौका लेकर आया। टूटू उन दिनों उड़ीसा भर में मशहूर महताब चैलेंज शील्ड के लिए हो रहे टूर्नामेंट खेल रहे थे। वे एक निजी क्लब की टीम का हिस्सा थे। टूटू की टीम सेमीफाइनल में हारकर टूर्नामेंट से बाहर हो गयी। लेकिन, इस टूर्नामेंट में टूटू ने जिस तरह से गोल दागे थे उसे देखकर कई लोग उनके दीवाने हो गए। स्थानीय अकाउंटेंट जनरल ऑफिस के कुछ अफसरों ने भी टूटू का खेल देखा था, वे भी टूटू की मैदान पर कलाबाजी से बेहद प्रभावित हुए थे। अकाउंटेंट जनरल ऑफिस के वेलफेयर ऑफिसर ने टूटू से मिलकर उनसे नौकरी की पेशकश की थी। टूटू ने बताया, “मैच के बाद वेलफेयर ऑफिसर मेरे पास आये और मुझसे पूछा – एजी ऑफिस में नौकरी करोगे? मुझे उनकी बात सुनकर बहुत खुशी हुई थी। उन दिनों बड़ी मुश्किल से सरकारी नौकरी मिलती थी। लोग सरकारी नौकरी के लिए तड़पते थे। मुझे मेरे खेल की वजह से सरकारी नौकरी मिल रही थी, मैं बहुत खुश था।” वेलफेयर ऑफिसर ने टूटू से उनका पता और दूसरी सारी जानकारियाँ लीं और चले गए।

 टूटू एजी ऑफिस से बुलावे का इंतज़ार करते रहे। दिन बीतते गए लेकिन बुलावा नहीं आया। जब कभी टूटू डाकिये को देखते तो उन्हें लगता कि इस बार डाकिया उनका नाम पुकारेगा और उन्हें ए जी ऑफिस से बुलावे की चिट्टी थमाएगा। लेकिन, कई दिन बीत गए, न बुलावा आया न ही कोई चिट्टी। टूटू कुछ दिनों बाद ये भी भूल गए कि किसी ने उन्हें नौकरी देने की पेशकश की थी। लेकिन, महताब चैलेंज शील्ड टूर्नामेंट के करीब छह महीने बाद टूटू के नाम चिट्टी आयी। चिट्टी ए जी ऑफिस से ही थी। टूटू को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था। चिट्टी पाते ही टूटू की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। वे दौड़े-दौड़े एजी ऑफिस गए और इंटरव्यू के बाद उन्हें नौकरी दे दी गयी। अब टूटू एजी ऑफिस की टीम की ओर से टूर्नामेंट खेलने लगे। टूटू के आने से एजी ऑफिस की टीम काफी तगड़ी हो गयी। फुटबॉल टीम में एक बेहतरीन खिलाड़ी हो इसी मकसद से टूटू को एजी ऑफिस में नौकरी दी गयी थी। सरकारी नौकरी से टूटू बेहद ख़ुश थे। नौकरी के साथ-साथ फुटबॉल भी बेहतरीन ढंग से जारी था।

इसी दौरान कुछ ऐसा हुआ जिसने टूटू यानी नंदकिशोर पटनायक की जीवन की दशा-दिशा पूरी तरह से बदल दी। टूटू को एक फुटबॉल खिलाड़ी से ‘नायक’ बनाने वाला ये घटनाक्रम साल 1993 का है। बीजू पटनायक उन दिनों उड़ीसा के मुख्यमंत्री थे। एक सरकारी दौरे पर वे असम गए हुए थे। उन्हें अपने असम प्रवास के दौरान पता चला कि कुछ ही दिनों बाद असम में राष्ट्रीय महिला फुटबॉल टूर्नामेंट होने वाला है। असम के अधिकारीयों को बीजू पटनायक ने बता दिया कि उड़ीसा की टीम भी इस टूर्नामेंट में हिस्सा लेगी। लेकिन, मुख्यमंत्री बीजू पटनायक को ये नहीं मालूम था कि उड़ीसा की महिला फुटबॉलटीम ही नहीं है। बल्कि उस समय कोई भी महिला या युवती फुटबॉल खेलती ही नहीं थी। बीजू पटनायक उड़ीसा की टीम को राष्ट्रीय महिला फुटबॉल टूर्नामेंट में भेजने का आश्वासन देकर भुवनेश्वर लौट आये।मुख्यमंत्री ने खेल विभाग के अधिकारियों को महिला फुटबॉलटीम असम भेजने के आदेश दिया। सारे खेल अधिकारी जानते थे कि उड़ीसा में महिला फुटबॉलटीम है ही नहीं। चूँकि मुख्यमंत्री का आदेश था वे सभी फुटबॉलटीम बनाने की तैयारी में जुट गए। जिन-जिन लड़कियों से संपर्क किया गया उन सभी ने फुटबॉल खेलने से साफ़ मना कर दिया। उस समय जितने सारे कोच थे उन सभी ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए थे। महिला फुटबॉल टीम बनाने के लिए कोई भी तैयार नहीं हो रहा था। हर जगह से निराश होकर जब खेल विभाग के अधिकारियों से टूटू से संपर्क किया तब उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया।

जिस स्कूल के मैदान में टूटू प्रैक्टिस करते थे, वहां उन्होंने देखा कि एक कोने में कुछ लड़कियां खो-खो खेल रही हैं। टूटू को लगा कि इन लड़कियों से फुटबॉल टीम बनायी जा सकती है क्योंकि इन लड़कियों में काफी फुर्ती है और ये सभी तेज़ दौड़ भी रही हैं। टूटू इन लड़कियों के पास गए और उनसे पूछा कि क्या वे फुटबॉल खेलना चाहेंगी। लड़कियों से फुटबॉल खेलने से साफ़ मना कर दिया। उन दिनों फुटबॉल पुरुषों का खेल माना जाता था और कोई लड़की फुटबॉल का मैच देखने मैदान पर भी नहीं जाती थी। टूटू ने हार नहीं मानी और अलग-अलग तरह से कोशिशें कर उन लड़कियों को मनाने की कोशिश की। लेकिन, एक भी लडकी फुटबॉल खेलने के लिए राजी नहीं हुई। टूटू ने लड़कियों को ये भी बताया कि राज्य की टीम के लिए खेलने का मौका हर किसी को नहीं मिलता और इन लड़कियों को तो सीधे राज्य की टीम में जगह मिल रही थी। टूटू के सारे प्रयास नाकाम रहे थे।

इसी बीच जब मुख्यमंत्री ने खेल अधिकारियों से महिला टीम की तैयारी के बारे में पूछा तब अधिकारियों ने जवाब में कहा कि अभी टीम तैयार नहीं है। इस जवाब से नाखुश बीजू पटनायक ने कहा कि वे टीम को हवाई जहाज़ से भी भेजने के लिए तैयार हैं। चूँकि टूर्नामेंट शुरू होने में काफी कम समय बचा था और मुख्यमंत्री वहां असम में भरोसा देकर आये थे कि उड़ीसा की टीम भी राष्ट्रीय महिला फुटबॉल टूर्नामेंट में हिस्सा लेगी, उनके लिए टीम भेजना प्रतिष्टा की बात बन गयी थी। उन दिनों बीजू पटनायक की गिनती देश के कद्दावर नेताओं में होती थी। वे काफी सक्रीय और प्रगतिशील नेता थे। बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने विकास के कई बड़े काम किये थे। वे महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार और अवसर देने के पक्षधर थे। इसी वजह से वे चाहते थे कि राष्ट्रीय महिला फुटबॉलटूर्नामेंट में उनके राज्य की टीम भी हिस्सा ले। इसी लिए वे टीम भिजवाने की अपनी जिद पर अड़े रहे। टूटू को जब मालूम हुआ कि मुख्यमंत्री ने हवाईजहाज़ से खिलाड़ियों को भेजने की बात कही है तब वे फिर उन खो-खो वाली लड़कियों के पास पहुंचे। लड़कियों को टूटू ने बताया कि अगर वे फुटबॉल खेलने के लिए तैयार हो गयीं तो उन्हें हवाईजहाज़ में सफ़र करने का मौका मिलेगा। उन दिनों लोग हवाई जहाज़ में सफ़र के सपने को भी बहुत बड़ा सपना मानते थे। हवाईजहाज़ में सफ़र की बात सुनकर उन लड़कियों का दिल भी मचल गया। कई लड़कियां फुटबॉल के लिए तैयार हो गयीं। टूटू ने इन लड़कियों को फुटबॉल खेलना सिखाना शुरू किया।

टूटू के लिए लड़कियों से फुटबॉल की प्रैक्टिस करवाना आसान नहीं था। किसी भी लड़की को फुटबॉल के नियम नहीं मालूम थे, तकनीक तो दूर की बात थी। कई लड़कियों में काफी हिचक थी। वो खो-खो तो आसानी से खेल लेती थीं लेकिन फुटबॉल को मारने से वे कतरा रही थीं। `लड़कियों को फुटबॉल खेलना सिखाने के लिए टूटू ने काफी पसीना बहाया। किसी तरह से टीम बनकर तैयार हुई और मुख्यमंत्री के आदेश अनुसार टीम को फ्लाइट से असम भेजा गया। सभी लड़कियों बहुत खुश हुई जब वे पहली बार हवाई जहाज़ में बैठीं। उनके खुशी की कोई सीमा नहीं रही जब विमान ने आसमान में उड़ान भरी। वैसे भी ये उड़ान कोई मामूली उड़ान नहीं थी। ये उड़ान थी उम्मीदों की, नए सफ़र की। इसी उड़ान से शुरू ही एक ऐतिहासिक कहानी की, कहानी कामयाबी की।

फ्लाइट से असम पहुंचे के बाद लड़कियां फुटबॉल के मैदान पर आयीं। सभी लड़कियों के लिए फुटबॉल नया खेल था इसी वजह से राष्ट्रीय महिला फुटबॉल टूर्नामेंट के पहले मैच में ही उड़ीसा की टीम 26 गोल से हार गयी। दूसरे मैच में प्रतिद्वंद्वी टीम ने उड़ीसा की टीम को 16-0 से रौंदा। तीसरे मैच में उड़ीसा की टीम ने 10 गोल खाए। लगातार टीम मैच हारने के बाद उड़ीसा की टीम टूर्नामेंट से बाहर हो गयी और खाली हाथ वापस भुवनेश्वर लौटी। भुवेनश्वर लौटने के बाद सारी लड़कियां अपने-अपने घर वापस चली गयीं और कई दिन तक मैदान पर नहीं आयीं। टूटू जोकि अब एक खिलाड़ी से कोच बन गए थे वे भी टूटू से टूटू सर को गए। टूटू सर लड़कियों के घर गए और उन्हें मैदान पर वापस लेकर आये। लड़कियों ने फिर से प्रैक्टिस शुरू की। इस बार कई लड़कियों से मन लाकर अभ्यास किया। रोज़ाना 6-6 घंटों की प्रेक्टिस से लड़कियों के प्रदर्शन में जल्द ही निख़ार आने लगा। लड़कियों का उत्साह देखर टूटू सर के मन में नयी उम्मीदें जगी। उन्हें लगा कि अगले राष्ट्रीय महिला फुटबॉल टूर्नामेंट में उड़ीसा की टीम शानदार खेल खेलेगी।

लेकिन, जब टूर्नामेंट के मैचों की तारीकों का ऐलान हुआ तब टूटू सर बहुत हैरान और परेशान हुए। टूर्नामेंट में उड़ीसा की टीम को जगह ही नहीं दी गयी थी। जब ये जानकारी लड़कियों को मिली तब उन्होंने साफ़ कह दिया कि अगर टूर्नामेंट में खेलने का मौका नहीं मिला तो वे फुटबॉलखेलना बंद कर देंगी। लड़कियों की इन बातों से टूटू सर और भी घबरा गए। उन्होंने उड़ीसा की टीम को टूर्नामेंट में जगह न दिए जाने की वजह का पता लगाने की कोशिश शुरू की। टूटू सर भी धुन के बड़े पक्के थे। उन्होंने कोलकाता में अपने एक मित्र को फ़ोन लगाया जोकि इंडियन फुटबॉल अकादमी के जॉइंट सेक्रेटरी देबू दा थे। पहले तो देबू दा ने साफ़ इन्कार कर दिया लेकिन टूटू सर की बार-बार की जा रही गुजारिशों के सामने पिगलकर उन्होंने एक उपाय बताया। देबू दा ने टूटू सर से उड़ीसा फुटबॉल संघ से एक सिफारिशी चिट्टी लाने को कहा। लेकिन, टूटू सर के पास भुवनेश्वर से हल्दिया को चिट्टी पहुंचाने के लिए सिर्फ एक दिन का समय था। चिट्टी पहुँचने पर भी उड़ीसा टीम को टूर्नामेंट में शामिल किये जाने की कोई गारंटी नहीं थी। लेकिन, किसी टीम के न पहुँच पाने की स्थिति में उड़ीसा टीम को जगह मिलने की संभावना थी। इस सुझाव को सुनते ही टूटू सर सीधे उड़ीसा फूटबाल संघ के सचिव के घर पर पहुंचे। उनसे चिट्टी लिखवाई और उसे लेकर हल्दिया के लिए रवाना हुए। समय कम था भुवनेश्वर से हल्दिया की दूरी करीब 500 किलोमीटर थी। परिवहन का कोई साधन तत्काल उपलब्ध नहीं था। उन दिनों भुवेनश्वर से हल्दिया पहुचने के लिए बस या ट्रेन का सफ़र करने से देरी होने की आशंका थी, इसी वजह से टूटू सर ने अपने एक मित्र को साथ लिया और उनकी यामाहा बाइक पर सवार होकर हल्दिया के लिए रवाना हुए। 500 किलोमीटर का सफ़र टूटू सर ने बाइक पर ही पूरा किया। सड़क-मार्ग का ये सफ़र आसान भी नहीं था। रास्ते में कई जगह सड़क काफी खराब थी। रास्ता ऊबड़-खाबड़ था। सफ़र में घने जंगल के बीच से भी गुज़रना पड़ा था। तब टूटू सर खड़गपुर पहुंचे तब बारिश शुरू हो गयी। बारिश भी आम बारिश जैसी नहीं थी, तूफानी बारिश थी। मूसलाधार बारिश के बीच भी टूटू सर ने अपने दोस्त के साथ सफ़र जारी रखा। जब वो हल्दिया के फुटबॉल स्टेडियम पहुंचे रात बहुत हो चुकी थी। बारिश भी नहीं रुकी थी। हर तरह अँधेरा था। बारिश की वजह से बिजली भी कट कर दी गयी थी। हल्दिया के फुटबॉल स्टेडियम में पहले टूटू सर को चौकीदार मिला। वो उन्हें सेक्रेट्री का पता बताने को तैयार ही नहीं हो रहा था। टूटू सर ने चौकीदार की नीयत भांपकर उसके हाथ में जब 200 रूपये थमाए तब वो उन्हें टूर्नामेंट के आयोजन सचिव के पास ले गया। देर रात गए, वो भी मूसलाधार बारिश में किसी का उनके यहाँ आना उन्हें अच्छा नहीं लगा। सचिव ने टूटू सर को जमकर डांटा भी, लेकिन उनके जज्बे और उनकी हिम्मत की प्रशंसा भी की। सचिव ने टूटू सर से सिफारिशी चिट्टी ले ली, जोकि गीली हो चुकी थी और हरमुमकिन कोशिश के बावजूद टूटू सर उसे बारिश के पानी से नहीं बचा पाए थे। सचिव ने टूटू सर से टीम को हल्दिया लाने को कहा। खुशी-भरे मन और नयी उमंग, नए उत्साह के साथ टूटू सर भुवनेश्वर के लिए रवाना हुए। हल्दिया में होने वाले टूर्नामेंट में उड़ीसा टीम की एंट्री के लिये टूटू सर से एड़ी-चोटी का ज़ोर तो लगाया ही था साथ ही अपनी जान को जोखिम में भी डाला था। चौबीस घंटे के भीतर एक हज़ार किलोमीटर का सफ़र आसन नहीं था। कानी नदी, शहर, गाँव, जंगल पार करते हुए उन्हें हल्दिया जाना और आना पड़ा था। रास्ता भी खतरनाक था, ऊपर से सफ़र दुपहिया गाड़ी से था। उन दिनों पूरे इलाके में नक्सलियों और डकैतों का भी खासा ख़ौफ हुआ करता था। सभी ने टूटू सर को रात को इस तरह से सफ़र ने करने की सलाह दी थी। कुछ ही दिनों पहले इसी रास्ते पर डकैतों ने कुछ लोगों लूट लिया था। डकैत इतने ज़ालिम थे कि वे जंगल से तीर चलाकर यात्रियों को घायल करते थे और फिर उनके पास से सारा सामान लूटकर चले जाते थे। सफ़र के दौरान जब टूटू सर और उनके मित्र भोजन करने के लिए एक ढ़ाबे पर रुके थे तब भी लोगों से उनसे रात के समय उस जंगल से न जाने की हिदायत दी थी। लेकिन उनके दिमाग में तो केवल और केवल फुटबॉल था, जिसके लिये वे ये खतरा मोल लेने के लिये भी तैयार थे। डरते-डरते और भगवान का नाम लेकर टूटू सर ने 500 किलोमीटर का वापसी का सफ़र भी रात में ही तय किया। भुवनेश्वर पहुँचने के बाद नंदकिशोर ने अपनी टीम को टूर्नामेंट में ले जाने की जरुरी तैयारियाँ की और टीम के साथ फिर से बस से हल्दिया के लिए रवाना हो गये।

पिछले टूर्नामेंट के मुकाबले इस बार उड़ीसा की टीम ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया। उड़ीसा की टीम क्वार्टरफाइनल तक पहुँचने में कामयाब रही थी। ये अपने आप में बड़ी कामयाबी थी, जिन लड़कियां ने दो साल पहले फुटबॉलको छुआ तक नहीं तक वे अब क्वार्टरफाइनल तक पहुँच चुकी थीं। साल-दर-साल उड़ीसा टीम का प्रदर्शन बेहतर होता चला गया और 10 साल बाद वो दिन आया जब उड़ीसा की महिला फुटबॉलटीम राष्ट्रीय चैंपियन बनी। चैंपियन बनने से टूटू सर का एक बहुत बड़ा सपना साकार हुआ। हकीकत तो ये है कि अगर टूटू सर ने मेहनत न की होती, अपनी जान जोखिम में न डाली होती और खिलाड़ियों को प्रेरित प्रोत्साहित न किया होता तो शायद उड़ीसा में महिला फुटबॉलटीम ही नहीं खड़ी हो पाती। उड़ीसा में एक चैंपियन टीम बनाने के पीछे टूटू सर का त्याग है, अथक प्रयास है, हार न मानने का ज़ज्बा है, जोखिम उठाने के लिए तैयार रहने वाला मज़बूत दिल है। 

टूटू सर के पास ट्रेनिंग लेने वाली कई सारी लड़कियों ने राज्य, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फुटबॉलमैच खेले हैं और खूब नाम कमाया है।टूटू सर अब भी सक्रीय हैं, न वे कभी रुके हैं न थके हैं। महिला फुटबॉल खिलाड़ियों की फौज में नए सेनानी जोड़ने का उनका काम लगातार अवरोध जारी है। आज भी वे छोटे लक्ष्य निर्धारित कर आगे बढ़ने की योजना बना रहे हैं। उनका अगला लक्ष्य भारतीय महिला फुटबॉल टीम को ओलंपिक में क्वालिफाई करवाना है। बड़ी बात ये भी है कि टूटू सर ने जब उड़ीसा महिला फुटबॉल टीम को कोचिंग देना शुरू किया था उस वक्त महिला फुटबॉल में बंगाल, केरल और मणिपुर जैसी टीमों का दबदबा था। उड़ीसा में महिला फुटबॉल की ख़ास लोकप्रियता ने होने के कारण उन्हें लड़कियों को इस खेल में लाने के लिये भी काफी मेहनत करनी पड़ती थी। अक्सर लड़कियों के माता-पिता और अभिवावक उनसे ये सवाल पूछते थे कि वे अपनी बच्चियों को फुटबॉल खेलने क्यों भेजें..? फुटबॉल में भविष्य क्या है...? फुटबॉल खेलने से हमारी लड़कियों को क्या फायदा मिलेगा? इन्हीं सवालों को ध्यान में रखते हुए टूटू ने एक बेहद प्रैक्टिकल एप्रोच का सहारा लिया। उन्होंने ये बात समझाने की कोशिश कि फुटबॉल में बेहतर प्रदर्शन कर लड़किया बेहतर नौकरी पा सकती हैं। टूटू सर ने अपनी ये बात भी सही साबित कर दिखाई और इसी खेल के दम पर कई लड़कियों को नौकरी मिल गई। कई महिला फुटबॉल खिलाड़ियों को तो सरकारी नौकरी भी मिली। टूटू सर आज गर्व से कहते हैं कि भारतीय टीम में उनकी प्रशिक्षित की हुई कई महिला खिलाड़ी ऐसी भी हैं जो उड़ीसा की झुग्गी-बस्तियों से आती हैं। इस छोटी मगर अहम सफलता से और भी कई लड़कियाँ फुटबॉल की ओर आकर्षित हुईं है और लगातार हो भी रही है। टूटू सर ने ये भी बताया कि संपन्न घरों के मुकाबले, निर्धन और झुग्गी बस्तियों की लड़कियाँ बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। वजह है कि गरीब लडकियों पर उनके माता-पिता पढ़ाई के लिये दबाव नहीं डालते, जबकि संपन्न घरों की लड़कियाँ पढ़ाई के दबाव के चलते मैदान पर अक्सर नियमित नहीं हो पातीं।”

ख़ुद टूटू सर स्वीकार करते हैं कि उन्होंने प्रोफेशनल फुटबॉल कोचिंग का कोई कोर्स नहीं किया है, लेकिन वे लीडिंग टीमों के खेल और उनके कोचेज़ की टीचिंग टेक्निक्स को बड़े गौर से देखते थे। यहीं नहीं अपने टीम में सुधार के लिये उन्होंने टीवी और इंटरनेट पर विश्व के बेहतरीन टीमों और उनके कोचिंग शेड्यूल का भी बारीके से अध्ययन किया। टूटू सर टूर्नामेंट की तैयारी वाले दिनों में सुबह तीन बजे उठ जाते थे और 5 बजे तक इंटरनेट पर जर्मनी, स्पेन जैसे नामी टीमों की कोचिंग के वीडियो देखा करते थे और फिर मैदान में अपने खिलाड़ियों से उसकी प्रैक्टिस करवाते थे।

अब टूटू सर का मैदान लड़कियों से भरा दिखाई देता है, लेकिन एक समस्या अभी भी वैसी ही थी। लड़कियों में जोश, जूनून और जज़्बा तो दिखने लगा था, अब सवाल ये था कि टीम में गुणात्मक सुधार कैसे लाया जाये, खिलाड़ियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर का कैसे बनाया जाए? टूटू सर फुटबॉल के प्रति किस हद तक समर्पित हैं इसका उदाहरण इस बात से मिलता है कि वर्ष 2011 में एक अंग्रेजी खबरिया चैनल ने ‘रियल हीरो अवॉर्ड’ विजेता के रूप में जब उन्हें पाँच लाख रूपये का पुरस्कार मिला तो उन्होंने पुरस्कार राशि से प्रदेश में महिलाओं के लिये फुटबॉल अकादमी की शुरुआत कर दी।

(टूटू सर से हमारी ये ख़ास मुलाकात भुवनेश्वर के एक स्टेडियम में हुई जहाँ इन दिनों वे लड़कियों को ट्रेनिंग दे रहे हैं। कई लड़कियां ऐसी भी हैं जो टूटू सर को भगवान मानती हैं। भगवान मानने की वजह ये है कि टूटू सर ने उन्हें फुटबॉलखेलना सिखाया, अच्छा खिलाड़ी बनाया, उनकी प्रतिभा को निखारा और हमेशा प्रेरित और प्रोत्साहित किया। टूटू सर की वजह से जो लड़कियां फुटबॉलखिलाड़ी बनीं और आगे चलकर उनकें स्पोर्ट्स कोटा में नौकरी मिली वे सभी टूटू सर को भगवान के समान मानती हैं। टूटू सर की वजह से ही कई लड़कियों खासकर आदिवासी और झुग्गियों में रहे वाली कई लड़कियों के घर-परिवार से गरीबी दूर हुई और उनके जीवन में खुशहाली आयी। टूटू से फुटबॉल खेलना सीखने वाली श्रद्धांजलि सामंतारे ,रंजीता मोहंती, प्रथमा प्रियदर्शिनी, प्रशांति प्रधान,बिष्णुप्रिया महंता , रूनी नायक, मामली दास  जैसी लड़कियों ने  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उड़ीसा और भारत का नाम रोशन किया है। टूटू सर 50 से ज्यादा लड़कियों को राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी बना चुके हैं। टूटू सर की ट्रेनिंग की वजह से ही कई लड़कियों को भारतीय रेलवे, पुलिस, नाल्को जैसी सरकारी संस्थाओं में नौकरियाँ मिल पायी हैं)

(हालिया कुछ सालों में भारत के नामचीन खिलाड़ियों, खेल जगत की बड़ी हस्तियों के जीवन पर आधारित फिल्में बनी हैं। एक मायने में बॉलीवुड में जीवनियों पर आधारित फिल्में यानी बायोपिक बनाने का चलन शुरू हुआ है। महेद्र सिंह धोनी, मोहम्मद अजहरुद्दीन, मिल्खा सिंह, मेरी कोम, मीर रंजन नेगी, महावीर सिंह फोगाट जैसी बड़ी शख्सियतों के जीवन और उनके संघर्ष पर आधारित फिल्में बन चुकी हैं। और भी कई ऐसी ही शख्सियतों पर फिल्में बनाने की योजनाएँ भी हैं। टूटू सर की कहानी भी एक बेहद लोकप्रिय और प्रभावशाली बायोपिक बनने का दमखम है।)

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Dr Arvind Yadav is Managing Editor (Indian Languages) in YourStory. He is a prolific writer and television editor. He is an avid traveler and also a crusader for freedom of press. In last 20 years he has travelled across India and covered important political and social activities. From 1999 to 2014 he has covered all assembly and Parliamentary elections in South India. Apart from double Masters Degree he did his doctorate in Modern Hindi criticism. He is also armed with PG Diploma in Media Laws and Psychological Counseling . Dr Yadav has work experience from AajTak/Headlines Today, IBN 7 to TV9 news network. He was instrumental in establishing India’s first end to end HD news channel – Sakshi TV.

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