कला की 'पूजा' और नई प्रतिभाओं की 'खोज' के लिए बड़ा मंच

- 'खोज' ने खोजा कला संरक्षण और विकास का नया रास्ता - 'खोज' के मंच पर साथ आए कई नए व पुराने कलाकार - विभिन्न पुरानी व दुर्लभ कलाओं को संजोने का मंच देती है 'खोज'

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कई बार ऐसा भी होता है कि हमारा मन व रुचि किसी और काम में होती हैं और व्यवसायिक रूप से हम अपने लिए किसी और क्षेत्र को चुन लेते हैं। लेकिन जब सच का अहसास होता है तब जाकर हम मन की बात सुनते हैं। पूजा सूद की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

पूजा ने गणित में ग्रेजुएशन किया और फिर मार्केटिंग में एमबीए। लेकिन मन हमेशा से कला क्षेत्र से जुड़ा हुआ था। भारतीय कला, साहित्य व संस्कृति हमेशा उन्हें अपनी ओर खींचती रही। कॉलेज के दिनों में भी पूजा अंग्रेजी साहित्य की कक्षाओं को कभी मिस नहीं करती थीं।

शादी और बच्चे होने के बाद पूजा ने आर्ट हिस्ट्री भी पढ़ी लेकिन यह ज्ञान उन्होंने केवल अपनी खुशी और शौक की वजह से लिया। कला के बारे में गहराई से जानने के बाद पूजा को अहसास हुआ कि जब उनकी कला में इतनी गहरी रुचि है तो उन्हें इस क्षेत्र में कुछ काम करना चाहिए।

पूजा को पहला ब्रेक दिल्ली की आयशर गैलरी से मिला जहां उन्होंने बतौर आर्ट क्यूरेटर काम किया, साथ ही वहां के प्रशासनिक काम को भी संभाला। यहां वे पैसे के लिए नहीं बल्कि अपनी खुशी के लिए काम कर रही थीं। यहां उन्होंने तीन साल काम किया। इस दौरान उन्होंने आर्ट गैलरी को मैनेज करना सीखा। कला प्रदर्शनियों को कैसे आयोजित किया जाता है इसे जाना व समझा। आयशर में उनका कार्य सराहनीय रहा। वो अलग-अलग कला और कलाकारों को एक मंच पर लेकर आईं चाहे सिरामिक आर्ट या टेक्सटाइल आर्ट हो या फिर आर्टिस्ट शीबा छाछी की बेहतरीन मीना कुमारी की पेंटिंग्स की प्रदर्शनी हो। पूजा ने फूड से जुड़ा 'द रेसिपी शो' भी आयोजित किया। साल 1997 में भारत और पाकिस्तान के कलाकारों को एक मंच पर लाकर एक प्रदर्शनी का आयोजन किया जिसका नाम था - मैपिंग्स शेयर्ड हिस्ट्रीज..अ फ्रिजाइल सेल्फ।

'खोज' शुरु करने का आइडिया भी ब्रिटिश कला संग्राहक रोबर्ट लोडर से आयशर की एक सभा में विचार-विमर्श के दौरान आया। खोज की शुरुआत 1997 में की गई। इसके कोर ग्रुप में भारती खेर, सुबोध गुप्ता, मनीशा पारेख, अनीता दुबे, प्रतिपाल और पूजा सूद थे।कोर ग्रुप के सभी सदस्य अच्छे दोस्त हैं। काम को बोझ समझकर नहीं बल्कि खूब आनंद के साथ करते हैं। 'खोज' को हमेशा कलाकारों का साथ व सहयोग मिला। हर उम्र के कलाकारों ने जो कि देश के अलग-अलग जगहों से रहे हैं शुरुआती दौर में बहुत मदद की। इसकी बड़ी वजह यह थी कि खोज का मकसद लाभ कमाना नहीं था बल्कि कलाकारों को एक मंच प्रदान करना था।

खोज को खड़ा करने में सबसे बड़ी चुनौती थी फंड जुटाना। जब-जब भी पैसे की कमी हुई पूजा सूद कलाकारों के समूहों के पास जातीं और उन्हें मदद मिल जाती। सन 2011 में 40 प्रसिद्ध कलाकारों ने अपनी कला कृतियों को बेचकर खोज के लिए फंड की व्यवस्था की जो कि अपने आप में बहुत बड़ी बात है।

'खोज' ने दिल्ली स्थित साउथ एक्स में एक छोटे से ऑफिस से काम की शुरूआत की। ऑफिस के लिए फर्नीचर का इंतजाम भी पूजा ने अपने रिश्तेदारों से उनका पुराना फर्नीचर लेकर किया। आज खोज के पास अपनी बिल्डिंग है। आर्टिस्टों के रुकने के लिए कमरे हैं। एक लाइब्रेरी है। लिविंग एरिया, किचन, प्रोजेक्ट स्पेस, रीडिंग स्पेस, कैफे, मीटिंग रूम आदि सुविधाओं से संपन्न ऑफिस है।

खोज का मुख्य मकसद है कलाकारों को प्रमोट करना और उन्हें निरंतर नए-नए कार्यों के लिए प्रेरित करना, उनके कार्यों को सही मंच तक पहुंचाना, कलाकारों को पुरानी मान्यताओं और बंधे बंधाए नियमों से छुटकारा पाने के लिए प्रेरित करना और कला के अभ्यास के दौरान एक चर्चा करने वाली जगह पर साथ काम करके उन्हें नए प्रयोग करने का माहौल देना। समय-समय पर खोज द्वारा आयोजित प्रदर्शनियों का उद्देश्य कला की विभिन्न शैलियों जैसे कि डिजाइन, मीडियम, शिल्प, वास्तुकला आदि में काम करने वाले विभिन्न कॉलेज के छात्रों को एक साथ जोड़कर एक नेटवर्क बनाना है। 

आज पूजा सूद 'खोज इंटरनेशनल आर्टिस्ट एसोसिएशन की डायरेक्टर हैं। न सिर्फ देशभर के कलाकारों बल्कि दक्षिण एशिया के देशों के कलाकारों को एक मंच पर लाने के लिए भी पूजा ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। इसके लिए उन्होंने 'साना' South Asian Network for the Arts की स्थापना की। जिसके तहक विभिन्न आयोजनों को फलीभूत किया। पूजा की ये कोशिशें नए और युवा कलाकारों के लिए वरदान है जिन्हें इस बात का अंदाजा है कि 'खोज' उनकी प्रतिभा को एक स्वर ज़रूर देगी।

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