सिनेमा हॉलों में राष्ट्रगान पर फिल्मी हस्तियों की राय जुदा-जुदा

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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा है कि देशभक्ति साबित करने के लिए सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के समय खड़ा होना जरूरी नहीं हैं। कोर्ट ने इसके साथ ही केंद्र सरकार से कहा कि सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाने को नियंत्रित करने के लिए नियमों में संशोधन पर विचार किया जाए।

सांकेतिक तस्वीर (साभार- सोशल मीडिया)
सांकेतिक तस्वीर (साभार- सोशल मीडिया)
अभिनेता अनुपम खेर ने कहा कि यदि लोग रेस्तरां में इंतजार कर सकते हैं, सिनेमाघरों में टिकट के लिए लंबी कतारों में खड़े हो सकते हैं, या पार्टी के आयोजन स्थलों पर खड़े हो सकते है, तो फिर वे सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के लिए महज 52 सेकंड तक खड़े क्यों नहीं हो सकते?

अभिनेत्री विद्या बालन कहती हैं कि सिनेमाघरों में फिल्म से पहले राष्ट्रगान नहीं बजाया जाना चाहिए। देशभक्ति थोपी नहीं जा सकती। आप स्कूल में नहीं हैं, जहां आप दिन की शुरुआत राष्ट्रगान से करते हैं। 

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजने संबंधी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी करते हुए कहा कि नागरिकों को अपनी आस्तीनों पर देशभक्ति लेकर चलने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, अदालतें जनता में देशभक्ति नहीं भर सकती हैं। इस पर देशभर में तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आने लगीं। कुछ लोगों ने सुप्रीम कोर्ट की राय को जायज ठहराया तो वहीं कुछ लोगों ने इस पर सवाल खड़े कर दिए। इस कड़ी में अभिनेता अनुपम खेर ने कहा कि यदि लोग रेस्तरां में इंतजार कर सकते हैं, सिनेमाघरों में टिकट के लिए लंबी कतारों में खड़े हो सकते हैं, या पार्टी के आयोजन स्थलों पर खड़े हो सकते है, तो फिर वे सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के लिए महज 52 सेकंड तक खड़े क्यों नहीं हो सकते?

खेर ने सिनेमाघरों के अंदर राष्ट्रगान को अनिवार्य रूप से बजाए जाने के विरोध पर कहा है कि कुछ लोगों की नजर में राष्ट्रगान के समय खड़े होना अनिवार्य नहीं होना चाहिए, लेकिन मेरे लिए राष्ट्रगान के लिए खड़े होना उस व्यक्ति की परवरिश को दिखाता है। हम जिस तरह से अपने पिता या शिक्षक के सम्मान में खड़े होते हैं, ठीक उसी तरह राष्ट्रगान के लिए खड़ा होना अपने देश के प्रति सम्मान को दर्शाता है। खेर के बयान से सिनेमाघरों में राष्ट्रगान को अनिवार्य रूप से बजाए जाने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर एक बार फिर चर्चाएं सरगर्म हो गई हैं।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीश पिछले साल दिसंबर में फैसला दे चुके हैं कि भारत के सभी सिनेमाघरों को फ़ीचर फ़िल्म शुरू होने के पहले राष्ट्रगान बजाना है और हॉल में मौजूद सभी लोगों की ज़िम्मेदारी है कि वे राष्ट्रगान के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए खड़े हों। सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बजने से पहले वहाँ घुसने और वहाँ से निकलने के रास्ते बंद होने चाहिए ताकि कोई किसी तरह का व्यवधान पैदा न कर सके जो राष्ट्रगान का अपमान करने के समान होगा। राष्ट्रगान के समाप्त होने के बाद दरवाज़े खोले जा सकते हैं। जब राष्ट्रगान बज रहा हो तो स्क्रीन पर राष्ट्रध्वज ही दिखाया जाना चाहिए। राष्ट्रगान का कोई भी संक्षिप्त संस्करण किसी भी कारण से बनाने और उसका प्रदर्शन करने की अनुमति किसी को नहीं है। फैसला आने के बाद से लोग सवाल पूछने लगे थे कि विकलांगों के लिए क्या प्रावधान है, दुर्घटना की स्थिति में क्या होगा अथवा आदेश का पालन न करने वाले लोगों के लिए दंड के क्या प्रावधान हैं?

अभिनेत्री विद्या बालन कहती हैं कि सिनेमाघरों में फिल्म से पहले राष्ट्रगान नहीं बजाया जाना चाहिए। देशभक्ति थोपी नहीं जा सकती। आप स्कूल में नहीं हैं, जहां आप दिन की शुरुआत राष्ट्रगान से करते हैं। इसलिए मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि राष्ट्रगान वहां नहीं बजाया जाना चाहिए। उन्हें अपने देश से प्यार है और इसकी रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं लेकिन यह सही नहीं है कि कोई मुझे यह बात बताए। जब मैं राष्ट्रगान सुनती हूं, मैं कहीं भी रहूं, खड़ी हो जाती हूं। मशहूर गायक सोनू निगम कहते हैं कि जहां वह हर देश के राष्ट्रगान का सम्मान करते हैं, उन्हें यह भी लगता है कि सिनेमाघरों और रेस्त्रांओं में इसे नहीं बजाना चाहिए। किसी भी देश के राष्ट्रगान का सम्मान होना चाहिए और लोगों को उन्हें वहीं सम्मान देना चाहिए जो वे अपने राष्ट्रगान को देते हैं।

अगर पाकिस्तान का राष्ट्रगान बजता है और सभी पाकिस्तानी खड़े होते हैं तो मैं भी उस देश और उन लोगों के सम्मान के तौर पर खड़ा हो सकता हूं। सोनू निगम कहते हैं कि कुछ लोगों का कहना है, सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजना चाहिए, कुछ का कहना है कि ऐसा नहीं होना चाहिए। राष्ट्रगान एक प्रतिष्ठित एवं संवेदनशील चीज है और मुझे लगता कि इसे कुछ जगहों - सिनेमाघरों या रेस्त्रांओं में नहीं बजाया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ऐसे भी सवाल उठते रहे हैं कि राष्ट्रगान बजाने और उसके सम्मान में खड़े होने की परंपरा कहां से आई है? क्या संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था है कि लोगों को राष्ट्रगान के सम्मान में खड़ा होना ही चाहिए? नेशनल एसोसिएशन ऑफ मोशन पिक्चर एक्जिबीटर के अध्यक्ष राजन गुप्ता के कथनानुसार भारत में आजादी के कुछ समय बाद तक यह प्रथा सिनेमा हॉलों में जारी थी। फिल्म समाप्त होने के बाद ऐसा होता था लेकिन फिल्म समाप्त होने के बाद ऐसी प्रथा होने के कारण लोग घर जाने की जल्दी में रुकना पसंद नहीं करते थे और एक प्रकार से राष्ट्रगान के समय लोग सिनेमा हॉल से बाहर जाने लगते थे। यह राष्ट्रगान के अपमान के समान था और फिर करीब 40 साल पहले धीरे-धीरे सिनेमाघरों में यह प्रथा अपने आप बंद हो गई।

वह बताते हैं कि भारत पर चीन के आक्रमण के बाद सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाने की प्रथा आई थी। फिर सरकार ने ही एक आदेश दिया था, जिस पर राष्ट्रगान बजाना बंद कर दिया गया। जबकि मनोरंजन कर विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सिनेमाघरों को सरकार की ओर से कभी भी यह आदेश नहीं दिया गया कि राष्ट्रगान बंद कर दिया जाए। यद्यपि एक अन्य जानकारी के मुताबिक हरियाणा में स्थानीय प्रशासन द्वारा सिनेमा हाल में राष्ट्रगान बजाए जाने के लिए नोटिस देकर कहा गया था कि सिनेमा हाल में राष्ट्रगान बजाने से इसका अपमान होता है। इसलिए इसे अब बंद कर दिया जाए। इसके अलावा गृहमंत्रालय द्वारा राज्यों के मुख्य सचिवों को भेजे गए एक पत्र में साफ कहा गया था कि सिनेमाहॉल में जहां फिल्में दिखाई जानी हैं, वहां पर ऐसा करने से फिल्म प्रदर्शन में भी व्यवधान उत्पन्न होगा और इससे लोगों को दिक्कत भी होगी। इससे राष्ट्रगान के सम्मान होने के बजाय ज्यादा भ्रम पैदा होने की उम्मीद है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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