हाजी अली दरगाह मज़ार के हिस्से में महिलाओं के प्रवेश: अदालत ने दी अनुमति पर 6 सप्ताह तक रोक

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एक ऐतिहासिक फैसले में बंबई उच्च न्यायालय ने हाजी अली दरगाह के मज़ार के हिस्से में महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध आज हटा लिया। अदालत ने कहा कि यह संवैधानिक अधिकारों का हनन करता है और ट्रस्ट को सार्वजनिक इबादत स्थल में महिलाओं के प्रवेश को रोकने का अधिकार नहीं है।

न्यायमूर्ति वी एम कानाडे और न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे ने कहा, ‘‘हम कहते हैं कि दरगाह ट्रस्ट द्वारा हाजी अली दरगाह के मज़ार के हिस्से में महिलाओं के प्रवेश को रोकना संविधान के अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है। महिलाओं को पुरषों की तरह ही मज़ार के हिस्से में प्रवेश की इजाजत होनी चाहिए।’’ इन अनुच्छेदों के तहत किसी व्यक्ति को कोई भी धर्म मानने, उसका आचरण और प्रचार करने का मौलिक अधिकार है। ये धर्म, लिंग और अन्य आधार पर भेदभाव पर रोक भी लगाते हैं।

अदालत ने हालांकि हाजी अली दरगाह ट्रस्ट की याचिका पर आदेश पर छह सप्ताह के लिए रोक लगा दी। ट्रस्ट उच्च न्यायालय के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देना चाहता है। पीठ ने दो महिलाओं जकिया सोमन और नूरजहां नियाज की जनहित याचिका को मंजूर कर लिया, जिसमें साल 2012 से दरगाह के मज़ार के हिस्से में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को चुनौती दी गई थी। ये महिलाएं एनजीओ भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन से जुड़ी हैं।

अदालत ने कहा, ‘‘राज्य सरकार और हाजी अली दरगाह ट्रस्ट उस पूजन स्थल पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उचित कदम उठाएगा।’’ 

हाजी अली दरगाह न्यास इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देना चाहता है और न्यास की ओर से दायर याचिका के कारण अदालत ने अपने इस आदेश पर छह हफ्ते के लिए रोक लगा दी है।

न्यायमूर्ति वी एम कानाडे और न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे की खंडपीठ ने कहा, ‘‘हाजी अली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश पर लगाया गया प्रतिबंध भारत के संविधान की धारा 14, 15, 19 और 25 का विरोधाभासी है।’’ इन धाराओं के तहत किसी भी व्यक्ति को कानून के तहत समानता हासिल है और अपने मनचाहे किसी भी धर्म का पालन करने का मूलभूत अधिकार है। ये धाराएं धर्म, लिंग और अन्य आधारों पर किसी भी तरह के भेदभाव पर पाबंदी लगाती हैं और किसी भी धर्म को स्वतंत्र रूप से अपनाने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की पूरी स्वतंत्रता देती हैं।

दरगाह के मजार वाले हिस्से :गर्भगृह: में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को जाकिया सोमन और नूरजहां नियाज ने चुनौती दी थी। खंडपीठ ने उनकी याचिका को भी स्वीकार कर लिया है। उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘राज्य सरकार और हाजी अली दरगाह न्यास को दरगाह में प्रवेश करने वाली महिलाओं की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम सुनिश्चित करना होगा।’’ इस साल जून में उच्च न्यायालय ने याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था।

इस याचिका में कहा गया है कि कुरान में लैंगिग समानता अंतर्निहित है और पाबंदी का फैसला हदीस का उल्लंघन करता है,  जिसके तहत महिलाओं के मज़ारों तक जाने पर कोई रोक नहीं है। महाराष्ट्र सरकार ने पहले अदालत में कहा था कि हाजी अली दरगाह के मज़ार वाले हिस्से में महिलाओं के प्रवेश पर रोक तभी होनी चाहिए जब कि कुरान में ऐसा उल्लेख किया गया हो।

महाराष्ट्र के तत्कालीन महाअधिवक्ता श्रीहरि अनेय ने तर्क दिया था कि किसी विशेषज्ञ द्वारा कुरान की व्याख्या के आधार पर महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। दरगाह न्यास ने अपने फैसले का यह कहते हुए बचाव किया था कि कुरान में यह उल्लेख है कि किसी भी महिला को पुरूष संत की दरगाह के करीब जाने की अनुमति देना गंभीर गुनाह है।

न्याय की ओर से पेश अधिवक्ता शोएब मेमन ने पहले कहा था, ‘‘सउदी अरब में मस्जिदों में महिलाओं को प्रवेश करने की इजाजत नहीं है। इबादत करने के लिए उनके लिए अलग स्थान की व्यवस्था है। हमने (न्यास) उनके प्रवेश पर रोक नहीं लगाई है। यह नियम केवल उनकी सुरक्षा के लिए है। न्यास केवल दरगाह का प्रबंध ही नहीं देखता है बल्कि धर्म से संबंधित मामलों को भी देखता है।

बीते अप्रैल महीने में उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार को आदेश दिया था कि वह धार्मिक स्थल पर महिलाओं के प्रवेश को लेकर होने वाले भेदभाव को रोकने की खातिर कानून का पालन सुनिश्चित करने के लिए आगे बढ़कर कदम उठाए।

याचिकाकर्ता जाकिया सोमान ने कहा कि इस फैसले से वे बेहद खुश हैं

 इस आदेश के बाद राज्य के अहमदनगर जिले में स्थित शनि शिंगनापुर मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं को प्रवेश करने की इजाजत दे दी गई थी। हाजी अली दरगाह मामले की एक याचिकाकर्ता जाकिया सोमान ने कहा कि इस फैसले से वे बेहद खुश हैं। उन्होंने कहा, ‘‘हम बेहद खुश और अभिभूत हैं। वहां प्रवेश करने के अहसास को महसूस करने का हम बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। यह ऐतिहासिक फैसला है और हम पूरे दिल से इसका स्वागत करते हैं और हम आभारी हैं क्योंकि मुस्लिम महिलाओं, आम मुस्लिम महिलाओं को न्याय मिला है। जिस तरह यह फैसला आया है उससे हम बेहद खुश हैं।’’ अदालत द्वारा आदेश पर फिलहाल के लिए रोक लगाए जाने पर उन्होंने कहा, ‘‘हम तो पहले ही जीत चुके हैं। हम लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले लोग हैं और हम समझते हैं कि फैसले को चुनौती देना और उच्च अदालत में जाना दूसरे पक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है।’’ उन्होंने आगे कहा, ‘‘उनकी तरह हम उनके लोकतांत्रिक अधिकारों के रास्ते में नहीं आएंगे। लेकिन बंबई उच्च न्यायालय का फैसला हमारे पक्ष में है। भारत के संविधान और कुरान में लैंगिक समानता के जो नियम हैं उन्हें इस फैसले के जरिए कायम किया गया है। यह देशभर की महिलाओं की जीत है और कोई भी इसे उनसे नहीं छीन सकता है।’’

ट्रस्ट ने दावा किया था कि प्रतिबंध उच्चतम न्यायालय के आदेश को ध्यान में रखते हुए लगाया गया था, जिसमें इबादत स्थलों पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न नहीं हो इस बात को सुनिश्चित करने के लिए सख्त निर्देश जारी किए गए थे। अदालत ने कहा कि ट्रस्ट की यह दलील पूरी तरह अनुपयुक्त, गलत समझ पर आधारित और संदर्भ से परे है।,

अदालत ने कहा, ‘‘ट्रस्ट महिलाओं की यौन उत्पीड़न से सुरक्षा सुनिश्चित करने के नाम पर प्रतिबंध को उचित नहीं ठहरा सकता और हाजी अली दरगाह के मजार में महिलाओं के प्रवेश को नहीं रोक सकता।’’ अदालत ने कहा कि ट्रस्ट को महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने की हमेशा स्वतंत्रता है। लेकिन ऐसा मजार तक प्रवेश पर रोक लगाकर नहीं बल्कि कारगर कदम उठाकर और उनकी सुरक्षा के लिए प्रावधान करके किया जाना चाहिए। मिसाल के तौर पर महिलाओं और पुरषों की अलग कतार लगाई जानी चाहिए, जैसा पहले होता था।

अदालत ने कहा, ‘‘इस तरह के स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी राज्य का कर्तव्य है। संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 25 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों की रक्षा और हाजी अली दरगाह के मजार तक महिलाओं को जाने से वंचित नहीं किया जाए यह भी समान रूप से सुनिश्चित करना राज्य का दायित्व है।’’

इस साल जून में उच्च न्यायालय ने याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था। इस याचिका में कहा गया है कि कुरान में लैंगिग समानता अंतर्निहित है और पाबंदी का फैसला हदीस का उल्लंघन करता है जिसके तहत महिलाओं के मजारों तक जाने पर कोई रोक नहीं है।

महाराष्ट्र सरकार ने पहले अदालत में कहा था कि हाजी अली दरगाह के मजार वाले हिस्से में महिलाओं के प्रवेश पर रोक तभी होनी चाहिए जबकि कुरान में ऐसा उल्लेख किया गया हो। महाराष्ट्र के तत्कालीन महाअधिवक्ता श्रीहरि अनेय ने तर्क दिया था कि किसी विशेषज्ञ द्वारा कुरान की व्याख्या के आधार पर महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को न्याययंगत नहीं ठहराया जा सकता।

दरगाह न्यास ने अपने फैसले का यह कहते हुए बचाव किया था कि कुरान में यह उल्लेख है कि किसी भी महिला को पुरूष संत की दरगाह के करीब जाने की अनुमति देना गंभीर गुनाह है। न्यास की ओर से पेश अधिवक्ता शोएब मेमन ने पहले कहा था, ‘‘सउदी अरब में मस्जिदों में महिलाओं को प्रवेश करने की इजाजत नहीं है। इबादत करने के लिए उनके लिए अलग स्थान की व्यवस्था है। हमने :न्यास: उनके प्रवेश पर रोक नहीं लगाई है। यह नियम केवल उनकी सुरक्षा के लिए है। न्यास केवल दरगाह का प्रबंध ही नहीं देखता है बल्कि धर्म से संबंधित मामलों को भी देखता है।

हाजी अली दरगाह मामले पर उच्च अदालत के फैसले का महिला कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया

मुंबई में हाजी अली दरगाह में मज़ार के हिस्से तक महिलाओं के प्रवेश को मंजूरी देने के बंबई उच्च अदालत के आदेश से तृप्ति देसाई के नेतृत्व वाली शहर की भूमाता रणरागिनी ब्रिगेड की सभी सदस्य बेहद उल्लासित हैं। यह ब्रिगेड सभी धर्मस्थलों पर लैंगिग समानता के लिए लड़ाई का नेतृत्व कर रही है और इस सप्ताहंत में वे हाजी अली दरगाह पर जाएंगी।

यहां अपने कार्यालय के बाहर इस फैसले पर खुशी मना रही तृप्ति ने कहा, ‘‘हम उच्च अदालत के फैसले का स्वागत करते हैं। यह दरगाह में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी लगाने वाले लोगों के चेहरों पर करारा तमाचा है। महिला शक्ति के लिए यह जीत बहुत बड़ी है।’’ तृप्ति ने कहा, ‘‘यह फैसला मील के पत्थर की तरह है। महिलाओं को जो अधिकार मिलने चाहिए, संविधान में उन्हें जो अधिकार दिए गए हैं, वह हमसे किसी तरह छीन लिए गए। यह प्रतिबंध हाजी अली दरगाह में महिलाओं के मजार क्षेत्र में प्रवेश पर लगा था।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हम महिलाओं को दिए गए दोयम दर्जे के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं।’’ तृप्ति के नेतृत्व में महिलाओं का यह समूह 28 अगस्त को हाजी अली पहुंचेगा।

उन्होंने कहा, ‘‘चूंकि उच्च न्यायालय ने हाजी अली दरगाह न्यास की याचिका के आधार पर अपने आदेश पर छह हफ्ते के लिए रोक लगा दी है इसलिए 28 अगस्त को हम उस स्थान तक ही जाएंगे जहां तक महिलाओं को जाने की अनुमति है।’’ बीते अप्रैल में तृप्ति ने दरगाह की मजार तक महिलाओं के जाने पर पाबंदी के खिलाफ बड़ा अभियान छेड़ा था लेकिन अंतिम समय पर विभिन्न संगठनों के विरोध के चलते वे वहां प्रवेश नहीं ले पाई थीं।

महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले महिला अधिकार समूह भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन बीएमएमए की सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता बीबी खातून ने भी इस फैसले पर प्रसन्नता जाहिर करते हुए कहा, ‘‘सबसे पहले तो मैं उच्च अदालत के न्यायमूर्ति कानाडे सर का शुक्रिया अदा करती हूं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘अपने इस अधिकार को पाने के लिए कभी न कभी लड़ाई छेड़ चुकी सभी महिलाएं समाज के डर से अपने कदम वापस खींच चुकी थीं। उन्हें डर लगता था कि समाज क्या कहेगा। लेकिन अब समाज जो कुछ भी कहना चाहता है उसे कहने दीजिए, लेकिन हम वही करेंगे जो हम करना चाहते हैं।’’ बीबी खातून ने कहा, ‘‘सूफी संतो को जन्म देने वाली भी महिलाएं ही हैं तो फिर हमारे प्रवेश :दरगाह के मजार वाले क्षेत्र में: पर रोक क्यों है? अगर फैसला हमारे पक्ष में नहीं आता तो हम उच्चतम न्यायालय की शरण में जाते। लेकिन आज हम बहुत खुश हैं क्योंकि न्यायालय ने हमारा पक्ष लिया है।’’ हाजी अली दरगाह में बिना किसी भेदभाव के प्रवेश देने का मसला सबसे पहले बीएमएमए ने उठाया था। इस संगठन ने ‘‘महज लैंगिक आधार पर घोर भेदभाव’’ किए जाने के खिलाफ अगस्त 2014 में बंबई उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी।

दरगाह न्यास ने अपने फैसले का यह कहते हुए बचाव किया था कि कुरान में यह उल्लेख है कि किसी भी महिला को पुरूष संत की दरगाह के करीब जाने की अनुमति देना गंभीर गुनाह है। जबकि पुरूषों को न केवल दरगाह तक जाने की स्वतंत्रता है बल्कि उन्हें मजार को छूने की भी इजाजत है।

दरगाह जाना महिलाओं के लिए वांछनीय नहीं है :आबिद रसूल खान

तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष आबिद रसूल खान ने महिलाओं के दरगाह जाने से परहेज करने का आज समर्थन किया क्योंकि वहाँ कब्र होते हैं, लेकिन वो दरगाहों में महिलाओं के प्रवेश पर किसी भी तरह के प्रतिबंध के खिलाफ हैं।

उन्होंने कहा कि महिलाओं को इन दरगाहों की यात्रा करते समय मर्यादा कायम रखनी चाहिए। उन्होंने बंबई उच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसले की पृष्ठभूमि में यह बात कही, जिसमें मुंबई में हाजी अली दरगाह के मज़ार वाले भाग में महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया गया। अदालत ने कहा कि यह महिलाओं के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।

खान ने कहा कि इस्लाम कहता है कि महिलाओं का कब्रगाह में जाना जरूरी नहीं है, लेकिन इसपर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं है।

खान ने कहा, ‘‘यह धार्मिक दायित्व अधिक है, जहां कुछ कहा गया है कि ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। उसके बाद यह करने का विकल्प उस व्यक्ति का है।’’ उन्होंने पीटीआई  से कहा, ‘‘मेरा कहना है कि महिलाएं जो दरगाह जाना चाहती हैं और प्रार्थना करना चाहती हैं वो अपने घर से भी प्रार्थना कर सकती हैं, क्योंकि अल्लाह सबकी प्रार्थना सुनता है। ऐसी बात नहीं है कि किसी खास स्थान से ही प्रार्थना की जानी चाहिए।’’ खान ने कहा, ‘‘लेकिन इसके बावजूद वो जाना चाहती हैं तो जा सकती हैं, क्योंकि तब यह उनकी पसंद है और उन्हें वहां जाने की अनुमति होनी चाहिए। हमें उन्हें ऐसा करने से नहीं रोकना चाहिए।’’- पीटीआई

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