तारे ज़मीन परः चलते-फिरते प्लैनेटेरियम से स्पेस की जानकारी ले रहे गांव के बच्चे

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इस मुहिम के अंतर्गत मोबाइल डिजिटल प्लैनेटेरियम के माध्यम से कर्नाटक के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बच्चों को अंतरिक्ष का अत्याधुनिक वर्चुअल एक्सपीरिएंस दिया जा रहा है।

तारे ज़मीन परः बच्चों के साथ टीम
तारे ज़मीन परः बच्चों के साथ टीम
इन मोबाइल प्लैनेटेरियम्स के माध्यम से सबसे पहले स्टूडेंट्स को ऐस्ट्रोनॉमी के मूल सिद्धांतों पर आधारित एक शॉर्ट फ़िल्म दिखाई जाती है, जिसके माध्यम से उन्हें ग्रहों और तारों से जुड़े अंधविश्वासों के प्रति जागरूक बनाया जाता है।

बेंगलुरु स्थित एक स्टार्टअप, वरनाज़ टेक्नॉलजीज़ ने 'तारे ज़मीन पर' नाम से एक ख़ास मुहिम की शुरुआत की है। इस मुहिम के अंतर्गत मोबाइल डिजिटल प्लैनेटेरियम के माध्यम से कर्नाटक के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बच्चों को अंतरिक्ष का अत्याधुनिक वर्चुअल एक्सपीरिएंस दिया जा रहा है। कंपनी के फ़ाउंडर दिनेश बडागंडी के मुताबिक़, इस मुहिम के माध्यम से बच्चों के बीच अप्लाइड साइंस के प्रति रुचि को बढ़ाया जा सकता है।

कंपनी के पास कुल 6 मोबाइल प्लैनेटेरियम्स हैं, जो गांव-गांव घूमकर अत्याधुनिक माध्यमों से ग्रामीण इलाकों के बच्चों को स्पेस से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां देते हैं। इन प्लैनेटेरियम्स में जेनसेट, पोर्टेबल एसी, जीपीएस, सौर ऊर्जा से चलने वाला यूपीएस, ख़ास तरह का प्रोजेक्टर और अन्य सभी आवश्यक चीज़ें मौजूद होती हैं।

इस वेंचर से पहले भी दिनेश कई व्यवसायों से जुड़े रहे हैं। उत्तरी कर्नाटक में एक बेहद सामान्य परिवार में पैदा हुए दिनेश मानते हैं कि वह भाग्यशाली हैं कि उन्हें सैनिक स्कूल में पढ़ाई करने का मौक़ा मिला। इसके बाद उन्होंने बागलकोट से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और 1997 में कर्नाटक यूनिवर्सिटी (धारवाड़) से एमबीए की डिग्री ली। दिनेश ने एनएच-4 पर गैरेजों में फ़िल्टर बेचने से शुरुआत की थी। एक साल के भीतर उन्हें ज़ेनसर टेक्नॉलजीज़ में वॉक-इन इंटरव्यू देने का मौक़ा मिला और उन्हें एक आईटी कंपनी में नौकरी मिल गई। कुछ समय बाद ही कंपनी ने उनके काम से ख़ुश होकर उन्हें दुबई भेज दिया।

इसके बाद दिनेश यूएस आधारित स्टार्टअप आई सेलरेट से बतौर को-फ़ाउंडर जुड़े रहे। कुछ वक़्त बाद ही उन्होंने यह कंपनी छोड़ दी। इस कंपनी को उन्होंने अपने एक पूर्व साथी ऋषि खोसला के साथ मिलकर शुरू किया था। 2007 में ऋषि ने ही दिनेश को अपनी कंपनी में ईआरपी प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी सौंपी। दिनेश के चार्टेड अकाउंटेंट ने उन्हें कंपनी रजिस्टर कराने का सुझाव दिया और इसके बाद ही दिनेश एक ऑन्त्रप्रन्योर के रूप में इंडस्ट्री में उतरे।

दिनेश अक्सर अपने परिवार और दोस्तों से मिलने उत्तरी कर्नाटक में घूमने आते रहते थे। इस दौरान उन्होंने देखा कि इस क्षेत्र के युवाओं को इंजीनियरिंग और एमबीए की डिग्रियां लेने के बाद भी बड़े शहरों में अच्छी नौकरियां नहीं मिलती थीं। इस समस्या के समाधान के रूप में उन्होंने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर उत्तर कर्नाटक जॉब असिस्टेंस फ़ोरम (यूकेजेएएफ़) की शुरुआत की, जिसके माध्यम से उन्होंने 2000 स्नातकों को ट्रेनिंग दी और नौकरियां दिलवाईं। इस प्रयास के माध्यम से दिनेश विद्यार्थियों के एक बड़े समूह से जुड़े रहे और उन्हें इस काम में ही एक प्रभावी बिज़नेस आइडिया नज़र आया। उनका मानना था कि ज़्यादातर बिज़नेस स्कूल्स विद्यार्थियों को प्रैक्टिकल ट्रेनिंग नहीं देते और इस वजह से वे पूरी तरह से इंडस्ट्री के लिए तैयार नहीं हो पाते।

दिनेश
दिनेश

दिनेश ने बिज़नेस स्टडीज़ से जुड़े ट्रेनिंग मॉड्यूल्स तैयार करना शुरू किया। कुछ समय बाद वरनाज़ टेक्नॉलजीज़ प्राइवेट लि. के बैनर के अंतर्गत ग्रैजुएशन कर चुके और एमबीए की डिग्री ले चुके युवाओं के लिए एक फ़िनिशिंग स्कूल चालू किया गया। काम के दौरान दिनेश को एहसास हुआ कि स्कूली स्तर पर ही गांवों और शहरों के बीच के अंतर को भरना बेहद ज़रूरी है। विदेश में नौकरी के दौरान दिनेश ने जो भी पैसा बचाया था, उसकी मदद से उन्होंने 'लैब ऑन व्हील्स' की शुरुआत की। लैब ऑन व्हील्स के अंतर्गत पिछले इलाकों में रह विद्यार्थियों को अप्लाइड साइंस के बारे में बताया जाता था। लंबी रिसर्च के बाद डिजिटल प्लैनेटेरियम की शुरुआत की गई। मोबाइल डिजिटल प्लैनेटेरियम से जुड़ी आवश्यक सामग्री जुटाने के लिए दिनेश चीन तक गए।

अपने प्रोग्राम को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने कर्नाटक के आईटी विभाग द्वारा आयोजित एलीवेट 100 प्रोग्राम में हिस्सा लिया और उन्हें 30 लाख रुपए का अनुदान मिला। दिनेश की ईमानदार कोशिशों की बदौलत कर्नाटक साइंस ऐंड टेक्नॉलजी प्रमोशन सोसायटी ने भी उनकी 5 मोबाइल प्लैनेटेरियम्स बनाने और ऑपरेट करने की अर्ज़ी स्वीकार कर ली।

चलती फिरती वैन
चलती फिरती वैन

इन मोबाइल प्लैनेटेरियम्स के माध्यम से सबसे पहले स्टूडेंट्स को ऐस्ट्रोनॉमी के मूल सिद्धांतों पर आधारित एक शॉर्ट फ़िल्म दिखाई जाती है, जिसके माध्यम से उन्हें ग्रहों और तारों से जुड़े अंधविश्वासों के प्रति जागरूक बनाया जाता है। इसके बाद उन्हें विज्ञान के अन्य महत्वपूर्ण सिद्धांतों का व्यावहारिक ज्ञान दिया जाता है। अंत में विद्यार्थियों को प्लैनेटेरियम की सैर कराई जाती है।

तारे ज़मीन पर की लाइब्रेरी में इंडियन स्पेस रिसर्च प्रोग्राम पर आधारित एक ख़ास फ़िल्म भी मौजूद है, जिसे उन्होंने पूर्व इसरो चेयरमैन और स्व. डॉ. यूआर राव के मार्गदर्शन में तैयार किया था। हालिया इसरो चेयरमैन ने नैशनल सायंस डे, 2017 के मौक़े पर दिनेश और उनकी टीम को सम्मानित भी किया था। तारे ज़मीन पर अपना कॉन्टेन्ट इवान्स और सूदरलैंड से लेता है, जो डिजिटल प्लैनेटेरियम के संबंध में वर्ल्ड लीडर्स माने जाते हैं। कॉन्टेन्ट का लाइसेंस मिलने के बाद दिनेश उपलब्ध कॉन्टेन्ट को कन्नड़ भाषा में ट्रांसलेट और डब कराते हैं।

अभी तक तारे ज़मीन पर 3 लाख विद्यार्थियों और 20 हज़ार अन्य लोगों के लिए कार्यक्रमों का आयोजन करा चुका है। दिनेश कर्नाटक में अपने ऑपरेशन्स को और बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। इतना ही नहीं, दिनेश चाहते हैं कि वह अपनी मुहिम को अन्य राज्यों के ग्रामीण इलाकों तक भी पहुंचाएं।

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