फीफा क्रेज के बीच जानिए उन संगठनों के बारे में जो युवा फुटबॉलरों की जिंदगी बदल रहे हैं

मिलिए भारत में युवा फुटबॉलर्स की जिंदगी बदलने वाले संगठनों से...

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 देश में फुटबॉल को लेकर युवाओं में काफी जोश देखा गया है। साथ ही अब कई संगठन इन युवा फुटबॉलर्स के हौंसलों को उड़ान दे रहे हैं। भारत भर में संगठन और एनजीओ अगले लियोनेल मेस्सी, क्रिस्टियानो रोनाल्डो या भाईचुंग भूटिया तो तैयार करने के लिए झोपड़ियां, गांवों और नक्सल प्रभावित इलाकों में स्काउटिंग कर रहे हैं।

भारत में दूसरे राज्यों से लेकर के अलग आर्थिक पृष्ठभूमि के बच्चों के फुटबॉल कौशल को सोशल स्टार्टअप और गैर सरकारी संगठन मिलकर निखार रहे हैं। चाहे वह छत्तीसगढ़ राज्य का नक्सली प्रभावित इलाका हो, मुंबई की झोपड़ियों के बच्चे, या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली हरियाणा की लड़कियां

भारतीय फुटबॉल टीम भले ही फीफा वर्ल्ड कप में कभी न खेल पाई हो लेकिन भारतीय फुटबॉल का आने वाला भविष्य काफी उज्ज्वल दिखाई पड़ता है। देश में फुटबॉल को लेकर युवाओं में काफी जोश देखा गया है। साथ ही अब कई संगठन इन युवा फुटबॉलर्स के हौंसलों को उड़ान दे रहे हैं। भारत भर में संगठन और एनजीओ अगले लियोनेल मेस्सी, क्रिस्टियानो रोनाल्डो या भाईचुंग भूटिया तो तैयार करने के लिए झोपड़ियां, गांवों और नक्सल प्रभावित इलाकों में स्काउटिंग कर रहे हैं। दुनिया भर में, फुटबॉल को एकजुटता के सूत्रधार के रूप में देखा जाता है। फुटबॉल कई बाधाओं को तोड़ता है - राजनीतिक, जातीय, सामाजिक-धार्मिक, और यहां तक कि आर्थिक भी। 

हालांकि इस समय सभी की नजरें रूस में जारी फीफा वर्ल्ड कप के 21वें संस्करण पर होंगी जहां बेस्ट टीमें खिताब के लिए भिड़ रही हैं। लेकिन भारत में दूसरे राज्यों से लेकर के अलग आर्थिक पृष्ठभूमि के बच्चों के फुटबॉल कौशल को सोशल स्टार्टअप और गैर सरकारी संगठन मिलकर निखार रहे हैं। चाहे वह छत्तीसगढ़ राज्य का नक्सली प्रभावित इलाका हो, मुंबई की झोपड़ियों के बच्चे, या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली हरियाणा की लड़कियां - स्पोर्ट्स ने सभी बच्चों का विकास किया है और सामाजिक परिवर्तन के लिए एक साधन बना हुआ है।

हम उन संगठनों पर नजर डाल रहे हैं जो इस परिवर्तन को लाने में कारगर साबित हो रहे हैं:

1. भारतीय फुटबॉल फाउंडेशन

2012 में, भारतीय लीजेंड फुटबॉलर भाईचुंग भूटिया ने भारतीय फुटबॉल फाउंडेशन (आईएफएफ) की स्थापना के साथ सात और 19 साल की आयु के युवा फुटबॉलरों को खोजने और तैयार करने का लक्ष्य रखा। भारतीय फुटबॉल फाउंडेशन का लक्ष्य खिलाड़ी और खेल दोनों को लाभान्वित करना है।

भाईचुंग भूटिया कहते हैं "मैं भारत में पेशेवर और युवा फुटबॉल की वर्तमान स्थिति को लेकर चिंतित हूं। मुझे लगता है कि मूलभूत परिवर्तन लाने और युवा प्रतिभा को सर्वोत्तम संभव तरीके से तैयार करने के लिए यह जिम्मेदारी लेना मेरा कर्तव्य है। आईएफएफ इस दिशा में एक कदम है क्योंकि यह युवाओं को सामाजिक अवसरों के बावजूद सबसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को अवसर प्रदान करेगा।"

आईएफएफ का विजन सात से 19 वर्ष की उम्र के फुटबॉलरों को खेल और अन्य विकास में लगातार समर्थन प्रदान करना है। कोच और शिक्षकों को भी प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि इन युवाओं के कौशल को पूरी तरह से निखारा जा सके। अब तक, आईएफएफ के तीन लड़के - सयाक बरई, अनुज कुमार और रोहित कुमार - ने फुटबॉल में भारत का प्रतिनिधित्व किया है।

भाईचुंग भूटिया फुटबॉल स्कूल के छात्र क्षितिज कुमार सिंह को 2017 में क्लब के साथ ट्रायल के बाद हॉलैंड में एनईसी निजमेजेन अंडर-15 अकादमी टीम का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया है। आईएफएफ में वर्तमान में सात और 19 वर्ष के आयु वर्ग के 150 खिलाड़ी हैं। यह दिल्ली के बाहर से काम करता है, और शहरी, वंचित लड़कों को विभिन्न स्थानीय क्लबों और स्कूलों से स्काउट किए गए लड़कों को वित्तीय सहायता और परामर्श प्रदान करता है।

2. स्लम सॉकर

2001 में, नागपुर के एक रिटायर्ड स्पोर्ट्स टीचर विजय बारसे ने स्लम सॉकर को फुटबॉल के माध्यम से झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों के जीवन को बदलने के उद्देश्य से शुरू किया। इसे एक सिंपल वीकेंड कोचिंग के रूप में शुरू किया गया था लेकिन अब एक फुटबॉल कोचिंग कैंप, शैक्षणिक कक्षाएं, और स्वास्थ्य देखभाल कार्यशालाओं वाला संगठन है। शुरुआती दिनों में झोपड़पट्टी फुटबॉल के नाम से पहचाने जाने वाले इस संगठन का लक्ष्य युवाओं को नशीली दवाओं के दुरुपयोग, सामाज विरोधी गतिविधियों, गरीबी, सामाजिक अलगाव और व्यक्तिगत संघर्ष से बाहर निकालना था।

संगठन कोच ट्रेनिंग प्रोग्राम, आजीविका ट्रेनिंग प्रोग्राम, स्वास्थ्य शिविर, और युवा लीडर प्रोग्राम सहित बच्चों के समग्र विकास के लिए सात प्रोग्राम चलाता है। स्लम सॉकर अपने प्रोजेक्ट एडुकिक के माध्यम से शिक्षा पर विशेष ध्यान केंद्रित करता है, जो समाज के वंचित वर्गों के बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा के प्रचार पर केंद्रित है। स्लम सॉकर के एजेंडे पर महिला फुटबॉल का विकास भी है। पिछले दशक में, स्लम सॉकर ने पूरे देश में वंचित युवाओं के लिए बहुत ही आवश्यक खेल अवसरों और व्यक्तिगत विकास कार्यक्रमों की पेशकश की है।

नागपुर स्थित इस संगठन ने पिछले दशक में देश के छह राज्यों में लगभग 70,000 बच्चों को प्रभावित किया है, जिसमें 2015 में एम्स्टर्डम में आयोजित बेघर सॉकर विश्व कप में भारतीय महिला टीम की कप्तान रीना पंचाल भी शामिल हैं।

3. स्टेयर्स (Stairs)

स्टेयर्स के संस्थापक और प्रतिष्ठित राष्ट्रीय खेल प्रोत्सहन पुरस्कार के प्राप्तकर्ता सिद्धार्थ उपाध्याय, बहुत ही कम आयु से, व्यक्ति के जीवन में खेल के महत्व को जानते और अच्छे से समझते थे। वह जानते थे कि बच्चों की जिंदगी को दिशा देने और टीम की भावना और अनुशासन को बढ़ावा देने में खेल की क्या भूमिका होती है। वह याद करते हैं, "उस समय मैं केवल 20 साल का था। उन दिनों, बच्चे की शिक्षा में खेल का महत्व गायब था, और मैंने अपने पाया कि मेरे आस-पास के लोग टीवी से चिपके रहते हैं। शुक्र है, मैं खेल में सक्रिय था और उस व्यक्ति को देख सकता था जिसने मुझे आकार दिया था।"

स्टेयर्स एक ऐसा मंच प्रदान कराता है जहां समाज के वंचित वर्गों के युवाओं को खेल में अपनी प्रतिभा दिखाने और आजीविका के साधन जुटाने के लिए तैयार किया जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान, बच्चों को चरित्र और व्यक्तित्व निर्माण भी सिखाया जाता है। स्टेयर्स ने अपने कार्यक्रमों को सपोर्ट करने के लिए आसपास के समुदायों को शामिल करने की रणनीति विकसित की है। संगठन स्थानीय समुदाय के लीडर्स के माध्यम से वंचित युवाओं की पहचान करता है। सिद्धार्थ ने 2005 में खेलो दिल्ली कार्यक्रम के लॉन्च के साथ अपना पहला केंद्र स्थापित किया, जहां फुटबॉल, वॉलीबॉल, क्रिकेट और सेपक ताक्रा उनके कार्यक्रम के हिस्से के रूप में खेला गया। अब इस प्रोग्राम को 'यूफ्लेक्स खेलो दिल्ली' के नाम से जाना जाता है। स्टेयर्स युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने और टीमों में उनके चयन को सुविधाजनक बनाने के अवसर प्रदान करने के लिए टूर्नामेंट आयोजित करती है।

पूरे देश में मौजूद स्टेयर्स के सेंटर्स में 150,000 से अधिक युवा खेल रहे हैं। वर्तमान में संगठन भारत के 6 राज्यों - दिल्ली एनसीआर, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड और उड़ीसा में मौजूद है। पंजाब, और जम्मू-कश्मीर - दो और राज्यों में सेंटर खोलने के लिए योजनाएं चल रही हैं।

4. सुकुमा फुटबॉल अकादमी

जनवरी 2017 में स्थापित, सुकुमा फुटबॉल अकादमी सुकुमा जिला प्रशासन द्वारा फुटबॉल को सशक्तिकरण के माध्यम के रूप में उपयोग करने की एक पहल है। अकादमी का विजन युवाओं को बतौर करियर फुटबॉल चुनने के लिए तैयार करना है। इसके अलावा यह उच्चतम क्षमता वाले पेशेवर खिलाड़ियों को तैयार करने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा प्रदान करता है। साथ ही वैज्ञानिक रूप से उन्नत कोचिंग विधियों का भी उपयोग करता है। जिले के सबसे दूरस्थ क्षेत्रों से 40 प्रतिभाशाली बच्चे अब इस अकादमी में प्रशिक्षित किए जा रहे हैं।

सुकमा फुटबॉल अकैडमी की टीम
सुकमा फुटबॉल अकैडमी की टीम

जिला खेल अधिकारी विरुपक्ष पुराणिक कहते हैं, "यदि आप सुकुमा में चारों ओर देखेंगे, तो हमारे पास कई शैक्षणिक संस्थान हैं जो बहुत आवश्यक क्वालिटी एजुकेशन प्रदान करते हैं। यदि कुछ नहीं था तो वो वह एक अच्छी खेल अकादमी, जो छात्रों के समग्र विकास में मदद करे। अब सुकुमा फुटबॉल अकादमी का उद्देश्य बच्चों को वही मौका देना है।" फ्रेश टैलेंट का पता लगाने के लिए अकादमी ने स्थानीय गैर सरकारी संगठन के साथ सहयोग किया है। अधिकांश बच्चे कृषि घरों से आते हैं, उनका परिवार दैनिक मजदूरी पर निर्भर करता है। कई परिवार नक्सलवाद से काफी प्रभावित होते हैं। 8 से 11 साल के आयु वर्ग के बच्चे, स्थानीय विद्यालयों में अपनी शैक्षिक आवश्यकताओं के लिए भाग लेते हैं। अब अकादमी उनका दूसरा घर बन गई है।

5. अलखपुरा फुटबॉल क्लब

2012 में स्थापित, हरियाणा के भिवंडी गांव में स्थित अलखपुरा फुटबॉल क्लब ने भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए लगभग एक दर्जन महिलाओं को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भेजा है। अपनी लड़कियों पर गर्व करते हुए गांव वाले कहते हैं "हर घर में एक फुटबॉल खिलाड़ी है।" इस परिवर्तन के पीछे गांव के स्कूल के कोच, गोर्धन दास हैं, जिन्होंने लड़कियों को फुटबॉल सिखाना शुरू किया। गोर्धन दास याद करते हुए कहते हैं, "लड़कियां कहती थीं हमें खेल में शामिल करें! हम भी खेलना चाहते हैं! वे सच में खेलना चाहती थीं। इसलिए, मैंने उन्हें हमारे स्पोर्ट्स रूम में एक फुटबॉल दिया।"

लगभग 40-50 युवा लड़कियों ने मजे के लिए बॉल को किक मारना शुरू कर दिया। लगभग दो वर्षों तक, लड़कियों ने खेलना जारी रखा - और बेहतर होती चली गईं। उन्होंने स्वयं से तकनीक सीखना शुरू कर दिया और सही मार्गदर्शन दिए जाने पर उन्होंने अपनी क्षमता का परिचय दिया। सच मायने मे यह भिवंडी की फुटबॉल यात्रा की शुरुआत थी।

दास के बाद कोच के रूप में पदभार संभालने वाली सोनिका बिजार्निया को पास के बरसी में स्थानांतरित कर दिया गया था, उन्होंने कहा: "हमने सीमित संसाधनों के साथ शुरू किया - बहुत कम गेंदें, एक गड्ढों से भरा छोटा सा मैदान था। लेकिन अब, सरकार हमारे ग्राउंड पर सिंथेटिक टर्फ स्थापित करने के लिए तैयार है।" राज्य स्तर पर खेलने वाली लड़कियों को छात्रवृत्तियां मिलती है। जो उनकी प्रगति में मदद करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनके माता-पिता को उनके खेल में विश्वास करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यहां तक कि उनमें से कई को खेल कोटा के माध्यम से सरकारी नौकरियां भी मिली हैं। पिछले साल भारतीय महिला लीग में भाग लेने वाली भिवंडी गांव की संजू यादव 11 गोल के साथ शीर्ष स्कोरर थीं। इस फुटबॉल क्लब ने अंडर -17 श्रेणी में लगातार दो सुब्रतो कप (स्कूलों के लिए राष्ट्रीय चैंपियनशिप) खिताब भी जीते हैं।

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