मशरूम की खेती से अच्छा खासा मुनाफा कमा रहे ये युवा किसान

करें इसकी खेती कमाएं लाखों...

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घर में ही मशरूम की खेती कर बिहार की नीतू कुमारी सालाना लाखों रुपए कमा रहीं तो उत्तराखंड की मशरूम लेडी दिव्या रावत मलेशिया की एक कंपनी से करार कर मशरूम के तरह-तरह के प्रोडक्ट बनाने जा रही हैं। उधर, हरियाणा के युवा किसान जितेंदर मलिक ने मशरूम की खेती के लिए ऐसी मशीनें इज़ाद की हैं, जिससे इस काम में मेनपॉवर सिमट जाने से मुनाफा बढ़ गया है। पांचवीं पास राजस्थान के मोटाराम तो मशरूम से सालाना पंद्रह लाख रुपए तक की कमाई रहे हैं।

 उत्तराखंड की मशरूम लेडी दिव्या रावत की सफलता से तो पूरा देश वाकिफ हो चुका है। उन्होंने अपना काराबोर बढ़ाने के लिए अब मलेशिया की एक कंपनी के साथ करार किया है। 

बिहार में कृषि वैज्ञानिकों ने मशरूम उत्पादन की नई तकनीक विकसित की है। इससे राज्य में हर साल साढ़े हजार टन मशरूम का उत्पादन हो रहा है। अब तक राज्य के करीब पचास हजार परिवारों को मशरूम उत्पादन से जोड़ा जा चुका है। बिहार की महिलाएं भी अब मशरूम उत्पादन में मशगूल होने लगी हैं। महिला सशक्तीकरण योजना का लाभ उठाती राज्य के बांका क्षेत्र के गांव झिरवा की नीतू कुमारी एक ऐसी ही जागरूक महिला हैं। अपनी कड़ी मेहनत से वह कृषि क्षेत्र की सफल उद्यमी बन गई हैं।

उन्होंने कुछ साल पहले कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण लेकर अपने घर के एक छोटे से कमरे में पहले पांच बैग में मशरूम की खेती शुरू की। उन्होंने शुरू में स्टरलाइट कर मशरूम तैयार किया, लेकिन कीमत और परेशानी ज्यादा होने की वजह से उससे कोई मुनाफा नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने सबौर कृषि महाविद्यालय से बीज बनाने की तकनीक का प्रशिक्षण लिया। अब वह ढाई हजार बैग में मशरूम की खेती कर रही हैं, जिससे प्रति माह उनकी 15 से 20 हजार, सालाना लगभग ढाई लाख रुपए की घर बैठे कमाई हो रही है। उनका मशरूम देवघर, भागलपुर, रांची, सुपौल तक सप्लाई हो रहा है।

इस सफलता के लिए नीतू कुमारी को पिछले साल महिन्द्रा एंड महिन्द्रा कंपनी की ओर से 51 हजार रुपए का कृषि प्रेरणा सम्मान भी मिला। इसके अलावा उनको केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह एवं बिहार के कृषि मंत्री प्रेम कुमार भी उनको सम्मानित कर चुके हैं। उत्तराखंड की मशरूम लेडी दिव्या रावत की सफलता से तो पूरा देश वाकिफ हो चुका है। उन्होंने अपना काराबोर बढ़ाने के लिए अब मलेशिया की एक कंपनी के साथ करार किया है। दिव्या की कंपनी सौम्या फूड प्राइवेट लिमिटेड और मलेशियाई कंपनी गैनो फार्म उत्तराखंड में मशरूम उत्पादन को आगे बढ़ाने के लिए एक साथ काम करेंगी। इसमें मलेशियाई तकनीक का सहयोग लिया जाएगा। राज्य की पर्वतीय महिलाओं को भी इससे जोड़ा जाएगा। मशरूम से चिप्स, शहद, तेल, दवा और परफ्यूम बनाया जाएगा। इसे लेकर दिव्या और गैनो फार्म की मालिक पैगी चैंग पो ने पिछले दिनो राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत से मुलाकात की। उन्होंने मुख्यमंत्री को बताया कि अभी वह 15 तरह के मशरूम का उत्पादन कर रही हैं।

इस बीच पानीपत (हरियाणा) के गांव सीख निवासी किसान जितेंद्र मलिक, जो सिर्फ दसवीं क्लास तक पढ़े हैं, उन्होंने मशरुम की खेती में एक क्रांतिकारी प्रयोग कर डाला है। उन्होंने मशरुम की खेती में मुलायम नमीयुक्त कम्पोस्ट बनाने वाली मशीन का आविष्कार किया है। इससे मेन पॉवर की भारी बचत हो रही है। अब कई मजदूरों का काम ये मशीन अकेले ही कर डालती है। इसके लिए जितेंदर मलिक को हिमाचल सरकार ने सम्मानित भी किया है। वॉलीवॉल और बास्केटबॉल के खिलाड़ी जितेंदर के गांव में ज्यादातर पारंपरिक खेती होती है।

सिर्फ वही मशरुम की खेती कर रहे हैं। वह बचपन में खिलौनों से छेड़छाड़ किया करते थे। आज वही खिलंदड़ी उनका सबसे बड़ा हुनर बन गई है। वह 1996 से मशरूम की खेती कर रहे हैं। इससे पहले उन्होंने हिमाचल में अपने मामा से इसका प्रशिक्षण लिया था। कुछ साल तक तो वह इस खेती से नुकसान उठाते रहे लेकिन जब वह अपनी बनाई मशीन और एक खास तरह की अन्य छन्नी मशीन के सहारे खेती करने लगे तो मशरूम उनके घर की संपन्ना का सबसे बड़ा जरिया बन गया। उन्होंने शेड के लिए बांस गाड़ने का खुद का मैनुअल ड्रिल भी इजाद कर लिया है।

जितेंद्र मलिक ने अपनी मशीनी तैयारियों के क्रम में सबसे पहले एक जैसे छेद करने वाला एक मोबाइल इलेक्ट्रिक मीटर तैयार किया। इससे आठ मजदूरों का श्रम बच गया। इसके बाद वर्ष 2006 से 2008 के बीच उन्होंने दो और ऐसी मशीनें बना लीं, जिससे खेती की लागत और ज्यादा सिमट गई। मशीनी आविष्कार ने उनकी जिंदगी बदल कर रख दी। वह खाद बनाने वाली एक मशीन एक महीने में तैयार कर लेते हैं। एक मशीन बेचने पर उनको लगभग तीन लाख रुपये तक की कमाई हो जाती है। विद्युत चालित यह मशीन कम्पोस्ट को अच्छी तरह मिश्रित करने के साथ ही उसमें नमी भी घोल देती है। इस मशीन में दो मोटरें लगी होती हैं।

इस मशीन के इस्तेमाल से फसल में गांठ पड़ने अथवा पीले फफूंद रोग की आशंका शू्न्य हो जाती है। रोग मुक्त रखने के लिए मशीन नमी और फंगस मारने वाले पदार्थ फसल को स्वयं सप्लाई करती है। अब इस मशीन की खरीदारी के लिए किसान जितेंदर के यहां दस्तक देने लगे हैं। राजस्थान में नानी गांव (सीकर) के मात्र पांचवीं तक पढ़े किसान मोटाराम तो मशरूम की खेती से हर साल पंद्रह-सोलह लाख रुपए कमा रहे हैं। 'मशरूम लेडी' दिव्या रावत की तरह शेखावटी में उनकी 'मशरूम मैन' की पहचान बन गई है। वह इन दिनो, डीजेमोर, ऋषि, सिट्रो, पिंक, साजर आदि विविध किस्मों के मशरूम प्रोडक्ट बाजार को दे रहे हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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