देश के पहले नेत्रहीन आईएएस अधिकारी की लेखनी से सामने आया चुनौतियों का इतिहास'आई पुटिंग दि आई इन आईएएस'

नेत्रहीनता उनके लिए अभाव का नहीं बल्कि संघर्ष की प्रेरणा है। राजेश सिंह ने लंबा संघर्ष जिया और उसमें कामयाब रहे। अपनी तरह के लाखों नेत्रहीनों ही नहीं बल्कि आँख वालों लिए भी प्रेरणस्रोत बने। उसी प्रेरणा के संचार के उद्देश्य से लिखी संघर्ष की गाथा एक किताब'आई पुटिंग दि आई इन आईएएस'

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'आई पुटिंग दि आई इन आईएएस'...देखने की चुनौती का सामना करने वाले देश के पहले नेत्रहीन आईएएस अधिकारी की संघर्षपूर्ण यात्रा का वृत्तांत है। हालाँकि यह लेखक के जीवन पर आधारित पुस्तक ज़रूर है, लेकिन यह आत्मकथा से कहीं अधिक उस जीवन की चुनौतियों को प्रतिबिंबित करने वाली कहानी है।

राजेश 2011 में आईएएस के रूप में नियुक्त हुए थे। राजेश पटना ज़िले के जिस धनरुआ गाँव से आते हैं, वह विशेष प्रकार के लड्डुओं के लिए प्रसिद्ध है। बचपन में क्रिकेट खेलते हुए एक हादसे में उनकी आँखों की रोशनी चली गई थी। इसके बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और यूपीएससी की परीक्षा पास कर आईएएस बने, लेकिन नेत्रहीन होने की वजह से सरकार ने उनकी नियुक्ति का विरोध किया।

 राजेश सिंह के मुताबिक़ उनकी मुलाक़ात तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की बेटी डॉ उपेंद्र सिंह से हुई, जो वे सेंट स्टीफंस कॉलेज मे पढ़ाती थीं और उन्होंने राजेश सिंह को प्रधानमंत्री से मिलवाया। इसके बाद वे सुप्रीम कोर्ट गए। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर और अभिजीत पटनायक के बेंच ने सरकार को राजेश सिंह की नियुक्ति करने का निर्देश दिया। झारखंड कैडर के आईएएस राजेश सिंह भारत सरकार ने पहले असम में पोस्टिंग दी। भाषाई दिक्कतों के कारण उन्होंने ट्रांसफर का अनुरोध किया। फिर उनका झारखंड में स्थाई कैडर ट्रांसफर किया गया। अब वे अपनी नौकरी के साथ दिव्यांगों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ बनाने में लगे हैं। उनपर बनायी जाने वाली डाक्युमेंट्री फिल्म में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास और मुख्य सचिव राजबाला वर्मा भी दिव्यांगों को संदेश देते नज़र आएंगे।

फोटो दि हंस इंडिया
फोटो दि हंस इंडिया

राजेश सिंह का आईएएस बनना आसान नहीं रहा है। 2006 में जब उन्होंने सिविल परीक्षा पास की तो वह एक परीक्षा ही नहीं थी, बल्कि एक बड़ी जंग थी, जिसे वो जीत चुके थे। वे पहले नेत्रहीन आईएएस अधिकारी नियुक्त हुए थे। एक लंबी लड़ाई के बाद जब उच्चत न्यायाल ने हस्तक्षेप किया तो वे अपने हक की कानूनी लड़ाई में कामयाब हो गये थे।

राजेश बताते हैं, 'प्रारंभ में संपूर्ण व्यवस्था को राज़ी करने बड़ा मुश्किल काम था। एक शतप्रतिशत नेत्रहीन व्यक्ति को आईएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) अधिकारी के रूप में शामिल करने में कई बाधाएँ थीं, लोग हिचकिचाते थे। आखिरकार जब उच्चतम न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि नेत्रदृष्टि और दृष्टिकोण में फर्क है। आईएएस बनने के लिए दृष्टिकोण की ज़रूरत है, दृष्टि की नहीं।'
सुमित्रा महाजन और राजेश सिहं,  फोटो दि बयूरोक्रेट न्यूज़
सुमित्रा महाजन और राजेश सिहं,  फोटो दि बयूरोक्रेट न्यूज़

राजेश सिंह यह किताब अपने प्रोबेशन के दौरान लिखी है। पिछली फरवरी में सुमित्रा महाजन ने इसका लोकार्पण किया। राजेश सिंह की यह पुस्तक उनकी अपनी जीवन यात्रा पर आधारित कहानियों का संकलन है, जिसे लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने दिल्ली में लोकार्पित किया। पटना के एक ऐसे युवक की कहानियाँ जो देखने की शक्ति की चुनौतियों का सामना कर रहा है। वह अपनी सिविल सर्विस परीक्षाओं में आने वाली बाधाओं से पूरे झुझारुपन के सात लड़ता है।

सुमित्रा महाजन लोकार्पण के समय कहा था, 'दिव्यांग और कमज़ोर वर्गों से आने वाले लोगों की रचनात्मकता, क्षमता और कौशल व्यर्थ नहीं जाना चाहिए। हमें एक बहुलतावादी समाज में इन क्षेत्रों से आने वाली प्रतिभाओं के प्रति अधिक संवेदनशील होने की आवश्यकता है।'

राजेश सिंह झारखंड सरकार में महिला एवं बाल कल्याण तथा सामाजिक सुरक्षा विभाग में संयुक्त सचिव हैं। वे एकीकृत बाल सुरक्षा योजना के परियोजना निदेशक भी हैं।

राजेश सिंह- फोटो दि ब्यूरोग्रेट न्यूज
राजेश सिंह- फोटो दि ब्यूरोग्रेट न्यूज
राजेश बताते हैं, 'असली चुनौती सीविल परीक्षा की तैयारी करना नहीं थी, बल्कि परीक्षा के बाद सहमति बनाने के लिए लड़ी गयी कानूनी लड़ाई की थी। मैं बहुत खुश क़िस्मत था कि मेरे कई दोस्त मेरे साथ थे। कई कानूनी उलझनों से मुझे गुज़रना पड़ा। इसे अच्छे या बुरे लोगों की बात नहीं है, लेकिन इस बात को समझा जा सकता है कि दृष्टिहीन लोगों को अपरिहार्य राष्ट्रीय परिसंपत्ति किस दृष्टि से देखा जाता है।'

दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक और जेएनयू से स्नातकोत्तर की उपाधि अर्जित करने वाले राजेश सिंह जूनियर रिसर्च फेलो भी रहे। उनका मानना है कि जेएनयू अपने विचारों और विचारधाराओं को साकार करके आज़माने की बड़ी प्रयोगशाला है, लेकिन राष्ट्रविरोधी तत्वों को जगह नहीं मिलनी चाहिए। 'जेएनयू हमेशा बहुत अच्छी जगह रही है। यह कई विचारों और विचारधाराओं की प्रयोगशाला रही है। हाँ यहाँ यदि कोई राष्ट्रविरोधी नारे लगते हैं तो मैं उसकी आलोचना करता हूँ। मैं यह बेहिचक कहना चाहूँगा कि जेएनयू ने मुझे बहुत कुछ दिया है। इसने मेरे व्यक्तित्व, मेरी दृष्टि को संवारा है। और यहाँ जिस तरह की समानता है, वह देश में कहीं भी नहीं मिलेगी।'


प्रस्तुति-एफ एम सलीम

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