निराश्रितों और बेसहारा को मुख्यधारा में शामिल होने में सहायता करतीं 81 वर्षीय मलयालम कवियत्री सुगथाकुमारी

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वह स्थान बेसहारा और निराश्रित लोगों की देखभाल करने वाले अन्य साधारण गृहों से काफी जुदा है। तिरुवनंतपुरम में एक ऐसी जगह है जहां बलात्कार के शिकार, घरेलू हिंसा के शिकार और नशाखोरी की आदत से मुक्ति पाने वाले लोग अपने पुराने समय की भयावह यादों को भुलाने का प्रयास करने के साथ शिक्षा प्राप्त करते हैं, नौकरी पाने में सफल होते हैं और एक बिल्कुल नए आत्मविश्वास के साथ मुख्यधारा के जीवन का हिस्सा बनते हैं।

1980 के दशक में प्रख्यात कवियत्री और सामाजिक कार्यकर्ता सुगथाकुमारी के मार्गदर्शन में वंचितों के लिये स्थापित किया गया ‘अभय’ नाम का यह संगठन अगले महीने अपनी स्थापना के 30 वर्ष पूरे करने की तैयारी कर रहा है। इतने वर्षों तक समाज की सेवा करने के बाद यह संगठन सैंकड़ों व्यथित लोगों जिनमें देश के कई सनसनीखेज सेक्स स्कैंडल की शिकार भी शामिल हैं, के जीवन में दोबारा खुशियां लाने का दावा कर सकता है।

इस नेक काम को करने के दौरान पैसे और पर्याप्त सुविधाओं की भारी कमी के बावजूद अभय की संस्थापक सचिव सगथाकुमारी कहती हैं कि वहां रहने वाले लोगों के चेहरे पर आने वाली आशा और विश्वास की चमक उनकी संस्था की सफलता का वास्तविक प्रमाण है।‘सरस्वती सम्मान’ से सम्मानित इस प्रख्यात लेखिका का कहना है कि आने वाले समय में उनका इरादा प्रदेश के 14 जिलों में मानसिक रूप से बीमार लोगों के लिये पुनर्वास केंद्र खोलने का है और इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए वे राज्य सरकार को प्रस्ताव दे चुकी हैं।

वे कहती हैं, 

‘‘30 वर्ष बीत चुके हैं और इस अवधि में हम सैंकड़ों परित्यक्त, वंचितों, उपेक्षित, बहिष्कृत और जाति से बाहर किये गए लोगों को अभय (शरण) दे चुके हैं। तमाम कमियों के बावजूद हम काफी बड़ी संख्या में लोगों को उनके जीवन की मुश्किलों से लड़ने और उन्हें मुख्यधारा के जीवन में वापस आने का समर्थन और विश्वास दे पाने में सफल रहे हैं।’’

वर्ष 1985 में केरल के विभिन्न सरकारी अस्पतालों में बेहद बुरी हालत से गुजर रहे मानसिक रोगियों के लिये गहरी चिंता के बीच स्थापित हुआ ‘अभय’ प्रारंभिक दौर में सिर्फ उनके लिये एक पुनर्वास केंद्र की परिकल्पना के रूप में सामने आया था। अब यह एक ऐसी बहु-इकाई संस्था का रूप ले चुका है जो मानसिक रोगियों को पुनर्वास प्रदान कर रहा है, नशा मुक्ति केंद्र के रूप में काम कर रहा है, वंचित लड़कियों को शरण दे रहा है, काम करने वाली महिलाओं को रहने की जगह उपलब्ध करवा रहा है।

सुगथाकुमारी, जिन्हें उनके सहयोगी प्यार से ‘टीचर’ कहकर पुकारते हैं, एक दिन अचानक तिरुवनंतपुरम के मानसिक अस्पताल जा पहुंची और ‘अभय’ का जन्म हुआ। सुगथाकुमारी कहती हैं, ‘‘हमारे हस्तक्षेप से पहले केरल के मानसिक अस्पताल दुनिया से अलग-थलग पागलखानों जैसे थे। अस्पतालल की अपनी यात्रा के दौरान मैंने जो देखा उसका बयान करने के लिये मेरे पास शब्द नहीं हैं। अधनंगे और घायल मरीज दर्द और भूख-प्यास के कराह रहे थे। उन्हें बेहद गंदे कमरों में बंद करके रखा गया था। उनमें से कईयों ने मेरे पैर पकड़ लिये और मुझसे रोते हुए खाना मांगा।’’

81 वर्षीय कवियत्री कहती हैं कि यह उनके द्वारा किये गए निरंतर संघर्षों का ही नतीजा है कि ऐसे अस्पताल सार्वजनिक जांच के दायरे में आ पाए हैं और राज्य का मानसिक स्वास्थ्य का परिदृश्य एक स्वस्थ परिवर्तन का साक्षी बन पाया है। ‘अभय’ की सेवाओं का विस्तार हुआ है और वर्ष 1992 में शहर के बाहरी इलाके मलायिंकीजू में 10 एकड़ में फैले ‘अभयग्रामम’ की स्थापना हुई।

अभय की बहुमुखी गतिविधियों के मुख्य केंद्र ‘अभयग्रामम’ की आधारशिला तिब्बत के आध्यात्मिक गुरू दलाई लामा द्वारा रखी गई जिनके छू लेने वाले शब्द इतने वर्षों से ऐसे लोगों के लिये प्रेरणा का काम करते रहे हैं।

वे कहती हैं, ‘‘दलाई लामा का कहना था कि इस जमीन को बेघर और सबसे दुभाग्यपूर्ण लोगों के लिये शरण देने दो। मैंने इतने वर्षों तक उनके कहे इन शब्दों को पूरा करने के लिये बहुत कड़ी मेहनत की है।’’ ‘अभय’ के अंतर्गत संचालित होने संस्थानों में ‘कर्म’ है जो इलाज करा चुके और ठीक हो चुके मानसिक रोगियों के लिये है, मानसिक रोगियों के लिये छोटी और लंबी अवधि के लिये ‘श्रद्धा भवनम’ और मानसिक स्वास्थ्य और नशा मुक्ति केंद्र के रूप में काम करने वाला ‘मित्र’ शामिल है।

साथ ही बेसहारा लड़कियों के लिये संचालित होने वाला ‘अभयबाला’, लड़कियों और महिलाओं को रहने के लिये स्थान उपलब्ध करवाने वाला ‘अथानि’, शराब और नशा करने वालों का उपचार करने वाला ‘बोधि’, और मानसिक बीमार रोगियों के लिये ‘पकालवीडू’ शामिल है। इसके अलावा यहां पर महिलाओं के लिये एक 24 घंटे की हेल्पलाइन के अलावा महिलाओं को निःशुल्क कानूनी सहायता भी प्रदान की जाती है।

सुगथाकुमारी कहती हैं कि 200 से भी अधिक व्यक्तियों को शरण देने वाले और 80 से भी अधिक कर्मचारियों से सुसज्जित ‘अभय’ को अपनी गतिविधियों को जारी रखने में धन की कमी से सबसे अधिक भुगतना पड़ता है। वे कहती हैं, ‘‘हम पूरी तरह से सरकारी अनुदान और लोगों से मिलने वाले व्यक्तिगत योगदान पर निर्भर हैं। अब हम चाहते हुए भी सुविधाओं की कमी के चलते और अधिक लोगों को अपने पास रखने में नाकामयाब हो रहे हैं। इसके अलावा हमारे कर्मचारियों को भी समय पर वेतन नहीं मिल पा रहा है।’’

वे कहती हैं, ‘‘अभय एक धार्मिक या सामुदायिक संगठन नहीं है और यही इसकी ताकत और कमजोरी दोनों है। अगर हम इसे किसी भी विशेष धर्म या समुदाय के अधीन कर देते तो हमें कई लाचा रुपये ल गए होते।’’ सुगथाकुमारी अबसे तीन दशक पहले पश्चिमी घाट पर साईलेंट वैली में तैयारी होने वाली एक जल विद्युत परियोजना के प्रस्ताव के खिलाफ एक उग्र पर्यावरण अभियान का नेतृत्व किया था और इसके अलावा वे अरनमुला में हवाई अड्डे के खिालाफ हुए हालिया आंदोलन की भी अगुवा रही हैं। इस कवियत्री का कहना है कि वे अपने ‘बच्चों’ के सपनों को साकार करने का प्रयास करना जारी रखेंगी।


अनुवादक-पूजा