नेत्रहीन लड़कियों को थियेटर से जोड़कर समाज बदलने की कोशिश में है फहद खान

थियेटर के जरिये नेत्रहीन लड़कियों की कहानी कई सफल नाटकों का किया मंचन

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उन्होने स्कूली पढ़ाई तो की थी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर उरई में, लेकिन उनका सपना था समाज में समानता लाने के लिये काम करना। थियेटर करने के शौकिन फहद खान जब दिल्ली आये तो उनको अपने सपने तब हकीकत में बदलते हुए दिखाई दिये जब वो नेत्रहीन लड़कियों के साथ मिलकर थियेटर करने लगे। उनके इन सपनों में और रंग भरे ‘अंतराल’ थियेटर ने। जिसके वो सह-संस्थापक भी रह चुके हैं। ‘थियेटर फॉर चेंज’ थ्योरी पर विश्वास करने वाले फहद खान सैकड़ों नेत्रहीन लड़कियों को ना सिर्फ थियेटर से जुड़ी बारिकियां सिखा चुके हैं बल्कि उनकी कहानी, उन्ही की जुबानी के जरिये शांति और समानता का संदेश दे रहे हैं। तो दूसरी ओर वो ‘अंतराल’ थियेटर की मदद से छात्र से लेकर कारोबारियों तक को एक सूत्र में पिरोने का काम कर रहे हैं।

फहद खान जब बुंदेलखंड के उरई में पढ़ाई कर रहे थे तो उसी दौरान वो ‘इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन’ से जुड़ गये। इस दौरान इनका ध्यान समाज में फैली असमानता की ओर गया। धीरे धीरे फहद खान को लगने लगा कि उनको ना सिर्फ थियेटर, बल्कि समाज में पीछे छूट रहे दूसरे लोगों के लिए कुछ करना है। दिल्ली आने के बाद फहद ने सामाजिक कार्य में अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई की। हालांकि तब वो चाहते तो दूसरे विषयों में भी ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर सकते थे, लेकिन सामाजिक कार्यों के प्रति अपनी रूची को देखते हुए उन्होने इस विषय को चुना। ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान फहद का ‘नेशनल एसोसिएशन फॉर ब्लाइंड’ के सेंटर में जाना हुआ। जहां पर उन्होने देखा की वहां पर नेत्रहीन लड़कियां पढ़ रही हैं, कंम्प्यूटर चला रही हैं, अपनी जिंदगी से जुड़े हर काम कर रही हैं। फहद इस बात से काफी प्रभावित हुए और उनको खुशी हुई की नेत्रहीन इंसान भी अपनी जिंदगी आम लोगों की तरह जी रहा है।

धीरे-धीरे फहद ने वॉलंटियर के तौर पर जुड़ कर ऐसी नेत्रहीन लड़कियों के साथ थियेटर करना शुरू किया। हालांकि इससे पहले वहां पर थियेटर को लेकर ज्यादा काम नहीं होता था। इसके बाद वो यहां पर टीचर बन गये। इसके बाद फहद नेत्रहीन लड़कियों की रोजमर्रा की परेशानियों को थियेटर के जरिये लोगों के सामने कहानी के तौर पर पेश करने लगे। इन्होने अपने ड्रामा के जरिये समाज में समानता और शांति के संदेश देना शुरू किया। फहद का कहना है कि “ध्वनि वो जरिया है जिसको सुनकर नेत्रहीन लोग थियेटर के जरिये अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। हम उनको इस बात को लेकर ट्रेंड करते है कि कब उनका चेहरा दर्शकों की तरफ होगा, स्टेज में जहां पर वो खड़े हैं वहां से कौन सी चीज कितने कदम की दूरी पर होगी।”

फहद नेत्रहीनों लड़कियों की मदद से अब तक कई ऐसे नाटकों का मंचन कर चुके हैं जिनको उन्होने खुद लिखा। इनके लिखे नाटकों की खास बात ये होती है कि ये नाटक नेत्रहीनों की रोजमर्रा की दिक्कतों से जुड़े होते हैं। फहद के मुताबिक समाज में नेत्रहीनों को लेकर आज भी रवैया कितना उदासीन है इसका उदाहरण है कि ज्यादातर सामान्य लोग नेत्रहीन लोगों को दोस्त बनाने से कतराते हैं, क्योंकि सामान्य इंसान की सोच रहती है कि कहीं नेत्रहीन उन पर निर्भर ना हो जाये। वो जोर देकर कहते हैं कि जब तक हम इन लोगों के साथ खड़े नहीं होंगे तब तक समाज में समानता की बात करना बेमानी है।

आज नेत्रहीन लड़कियां ना सिर्फ बैंकों में अफसर हैं बल्कि कई सरकारी और गैर सरकारी कंपनियों में ऊंचे औहदों पर भी हैं। बावजूद इसके समाज में ऐसी नेत्रहीन लड़कियों की शादी एक बड़ी समस्या है। फहद के मुताबिक कई ऐसे नेत्रहीन लड़के हैं जिनके परिवार वाले नहीं चाहते कि उनके लड़के की शादी किसी नेत्रहीन लड़की से हो क्योंकि अगर दोनों ही नेत्रहीन होंगे तो वो अपना घर कैसे संभालेंगे। ऐसे में जब उन्होने ये समस्या देखी तो काफी रिसर्च के बाद उन्होने एक नाटक लिखा ‘अहसास’। जिसके ना सिर्फ दिल्ली में बल्कि दूसरे शहरों में भी कई शो किये गये। इसी तरह फहद ने नेत्रहीन लड़कियों की शिक्षा पर एक नाटक लिखा और उसका नाम रखा ‘आजादी’ । इस नाटक के जरिये उन्होने बताने की कोशिश की है कि समाज में नेत्रहीन लड़कियों की पढ़ाई को लेकर आज भी उनके परिवार वाले ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाते, क्योंकि परिवार वाले ये सोचते हैं कि उनकी नेत्रहीन लड़की कैसे पढ़ेगी, कौन उसको स्कूल छोड़ने जाएगा, ये किताबों में अक्षर कैसे देखेगी आदि। उनके इस नाटक का मंचन दिल्ली और आसपास के कई इलाकों में किया जा चुका है।

फहद का कहना है कि “अगर सबको समान रूप से शिक्षा मिले तो समाज में काफी हद तक समानता आ सकती है।” यही वजह है कि फहद के साथ कल तक थियेटर करने वाली कई नेत्रहीन लड़कियां आज कई मल्टीनेशनल कंपनियों में काम कर रही हैं। फहद बताते हैं कि उनके लिखे कई नाटक लोगों के बीच बदलाव लाने में कारगर भी हुए हैं। वो अपने नाटक अहसास का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि “हमारे सेंटर की एक नेत्रहीन लड़की और लड़का दोनों एक दूसरे को पसंद करते थे लेकिन लड़के के घरवाले उनकी शादी के लिये तैयार नहीं हुए। बाद में जब लड़के के घरवालों ने ये नाटक देखा तो उसके बाद ना सिर्फ उनकी सोच में बदलाव आया बल्कि उन्होने अपने लड़के की शादी नेत्रहीन लड़की से करा दी।”

एक ओर फहद नेत्रहीन लड़कियों के साथ काम कर रहे थे तो दूसरी ओर उन्होने साल 2007 में ‘अंतराल’ थियेटर की नींव रखी। ‘अंतराल’ थियेटर के साथ सह-संस्थापक की भूमिका निभाने वाले फहद का ये थियेटर सप्ताहंत में शनिवार और रविवार के दिन चलता है। इसके पीछे वजह थी कि एक ऐसा थियेटर बनाया जाये जहां पर नौकरीपेशा, छात्र और कारोबारी शामिल हों। इस थियेटर के साथ उन्होने उन लोगों को भी जोड़ा जो नेत्रहीन थे और इन लोगों के साथ मिलकर कई नाटक किये हैं। फहद अब तक ‘जिन लाहौर देख्या नईं, वो जम्या नईं’, चैनपुर की दास्तान, चेखव की कहानियां, शंकर शेष का लिखा नाटक ‘एक और द्रोणाचार्य’, युवाओं पर आधारित ‘उड़ने को आकाश चाहिए’, किसानों की समस्या पर आजम कादरी के लिखा नाटक ‘मौसम को ना जाने क्या हो गया’ जैसे नाटकों का सफल निर्देशन कर चुके हैं।