पिंक सिटी मे अनूठी सांस्कृतिक पहल, शराब से नहीं दूध से करते हैं नव वर्ष की शुरूआत

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एक अच्छा और सही काम किस तरह जन समर्थन अर्जित करता है, इसका एक उदाहरण है राजस्थान की राजधानी जयपुर में "शराब से नहीं दूध से करें नव वर्ष की शुरुआत"। तेरह साल पहले, पहली बार जनसहयोग से 500 लीटर दूध से यह शुभ प्रारंभ किया गया था। यह सही है कि इस तरह के अभियानों की सीमा है। शराब की संस्कृति के पैरोकार काफी सशक्त हैं। यहां शराब बंदी के लिए राजस्थान के गांधी कहे जाने वाले गोकुल भाई भट्ट, सिद्धराज ढढ्ढा जैसे स्वतंत्रता सैनानी ताजिंदगी संघर्ष करते रहे। जनता पार्टी के पूर्व विधायक गुरूशरण छाबड़ा ने तो अनिश्चित कालीन अनशन करते हुए हाल ही में प्राण त्यागे। कच्ची बस्तियों में शराब से तबाह बेवाएं और बच्चों की निरीह अवस्था आज भी देखी जा सकती है। इसके बावजूद यह प्रयास समानांतर संस्कृति का सकारात्मक उदाहरण है।

एक दशक से अधिक समय बीत गया। राजस्थान में सर्वोदय के अनुयायियों और छात्र-छात्राओं की पहल पर एक अभिनव सांस्कृतिक पहल ली गई । आज वह अभियान के रूप में परिवर्तित हो गई है। एक अच्छा और सही काम किस तरह जन समर्थन अर्जित करता है, यह इसका उदाहरण है। इसके लिए निस्वार्थ दृढ़ता और अविचल भाव से लगे रहना होता है। "शराब से नहीं दूध से करें नव वर्ष की शुरुआत" अब गांधीवादी या नैतिकतावादियों का ही नारा नहीं रह गया है। इसको सजीव देखना चाहते हैं तो नए साल पर देखें जयपुर में लगभग हर बाजार, मोहल्ले आैर मुख्य सड़कों पर बैनर लगे मिल जाएंगे। नए साल पर नौजवान युवक-युवतियां, वयस्क महिलाएं और पुरुष, वृद्धजन स्टॉल सजाए, दूध पिलाते यह संदेश देते नजर आ जाएंगेे,"शराब बरबाद करती है, दूध पुष्ट करता है।" वह तेरह साल पहले, जब इसकी शुरुआत हुई थी उससे पहले नए साल पर राजस्थान विश्वविद्यालय के बाहर शराब में धुत्त युवकों के कारण जवाहरलाल नेहरू रोड पर जेडीए सर्किल से गांधी सर्किल का रास्ता इतना खतरनाक हो जाता था कि लोग रास्ता काट कर निकल जाने में ही भलाई समझते थे। कुछ ऐसे ही माहौल में संत विनोबा द्वारा स्थापित प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र, बापू नगर के तात्कालीन महासचिव धर्मवीर कटेवा और अन्य सर्वोदयियों ने तय किया कि देश की युवा पीढ़ी को नशे की गर्त में ले जाने वाली इस बुराई के विरोध में सक्रियता की आवश्यकता है।

गांधी विचारधारा और नशे के विरोध में चेतना राजस्थान में स्वतंत्रता की चेतना के साथ जुड़ी हुई है। राजस्थान ब्रिटिश भारत का अंग नहीं था, ब्रिटेन संरक्षित रियासतों में बटा हुआ था। यह वह सामंती प्रदेश है, जहां राजकीय भोज में अफीम चटाना, राजवंश अपनी शान समझते हैं। कांग्रेस का कार्यक्षेत्र और उसके नेतृत्व में आजादी का आंदोलन ब्रिटिश भारत में सीमित था। ऐसे में राजस्थान में आजादी के आंदोलन की चेतना जिन रचनात्मक प्रयासों के रूप में प्रारंभ हुई उनमें खादी, नशाबंदी, अस्पृश्यता निवारण, हरिजन(दलित) उत्थान, शिक्षा का प्रचार-प्रसार और किसान एवं जनजातियों के सामंतवाद विरोधी आंदोलन प्रमुख थे। धर्मवीर कटेवा भी क्योंकि शेखावाटी सामंतवाद विरोधी शहीद परिवार परंपरा और गांधीवादी पृष्ठभूमि से संबंधित हैं, इसलिए उनकी यह पहल अत्यंत स्वाभाविक थी। राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्र नेता महेन्द्र शर्मा ने राजनीति से इतर युवाओं में जनचेतना, चरित्र निर्माण और सांस्कृतिक कार्य के लिए 'राजस्थान युवा छात्र संस्था' का निर्माण किया। इस संस्था ने 'इंडियन अस्थमा सोसायटी' के साथ मिलकर विश्वविद्यालय के गेट पर स्टॉल लगाकर एक मुहिम चलाई-शराब से नहीं दूध से करेंगे नव वर्ष की शुरुआत।

योरस्टोरी को महेन्द्र बताते हैं 

"उस समय लोगों की समझाइश कर उन्हें बुलाकर दूध पीने के लिए आग्रह करना होता था। पहली बार बमुश्किल 300 लीटर दूध ही पिला सके। शेष बच गया। अब स्थिति यह है कि पिछली बार लगभग 15 हजार सकोरे और 20 हजार थर्माकोल के ग्लास दूध यहां इस केंद्र में पिलाया गया और हर साल यह तादाद 500 लीटर बढ़ ही जाती है। जन प्रतिनिधि किसी दल या संस्था के हाें, यहां इस अभियान में सम्मिलित होते हैं। अब तो 'राजस्थान कॉपरेटिव डेयरी फेडरेशन' हर साल इसमें सहभागी रहने लगा है। वह वितरण के लिए दुग्ध में सहयोग प्रदान करताहै। इसके अलावा स्वत:स्फूर्त रूप में विभिन्न मॉल से लेकर व्यापार संघ, मोहल्ला कमेटियां भी नव वर्ष पर 31 दिसंबर शाम से 1 जनवरी के प्रारंभ तक दुुग्ध वितरण से यह संदेश देते हैं।" 

इस अभियान ने गुलाबी नगर की फिजा को कुछ इस तरह से बदला है कि जहां अन्य शहरों में नव वर्ष पर लड़कियां इस डर से घर से नहीं निकलती हैं कि शराब में धुत कोई उनके साथ अभद्रता नहीं करे, वहां- शराब नहीं दूध से करें नव वर्ष का प्रारंभ, संदेश बन गया है।

युवा जिस उत्साह और भाव से इस अभियान में सम्मिलित होते हैं उसे देखकर इस प्रयास की सार्थकता को समझा जा सकता है। नए वर्ष पर हर साल सभी शहरों में जितनी शराब बिकती और पी जाती है, साल भर के कोटे के बराबर होती है। यह सही है कि इस तरह के अभियानों की सीमा है। शराब की संस्कृति के पैरोकार इतने सशक्त हैं कि यहां शराब बंदी के लिए गोकुल भाई भट्ट, सिद्धराज ढढ्ढा ताज़िंदगी आंदोलन करते रहे। जनता पार्टी से 1977 में विधायक रहे गुरूशरण छाबड़ा ने तो शराबबंदी के लिये अनिश्चित-कालीन अनशन करते हुए हाल ही में प्राण त्यागे हैं। कच्ची बस्तियों में शराब से तबाह बेवाएं और बच्चों की निरीह अवस्था आज भी देखी जा सकती है। इसके बावजूद यह प्रयास समानांतर संस्कृति का सकारात्मक उदाहरण है।