रॉकेट साइंस के क्षेत्र में भारत को शिखर पर पहुंचाने वाली भारत की मिसाइल महिला टेसी थॉमस

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टेसी जब स्कूल में पढ़ा करती थीं तो उन दिनों नासा का अपोलो यान चांद पर उतरने वाला था। इन्हें रोजाना उस यान के बारे में सुनकर प्रेरणा मिल रही थी कि ये भी एक दिन ऐसा एक राकेट बनाये जो इसी तरह आसमान की ऊंचाई को छू सकेंगी। 

टेसी थॉमस और अग्नि मिसाइल (फाइल फोटो)
टेसी थॉमस और अग्नि मिसाइल (फाइल फोटो)
टेसी थॉमस ने केरल के कालिकट में स्थित त्रिचुर इंजिनियरिंग कॉलेज से बी. टेक. किया और इसके बाद गाइडेड मिसाइल के क्षेत्र में एमटेक करने के लिए पुणे आ गईं। वहां पर डिफेन्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस टेक्नोलॉजी से अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की।

आज भारत अंतर इंटर कॉन्टिनेंटल मिसाइल सिस्टम (ICBM ) की क्षमता से लैस ऐसा विश्व में पांचवा देश है जो 5,000 कि. मी. तक अपनी मिसाइल की मार से किसी भी शत्रु को उसके घर में ही ढेर कर सकता है। 

बनने को तो वे आईएएस ऑफिसर भी बन सकती थीं, उन्होंने सिविल सर्विस का एग्जाम भी दिया था, लेकिन मन तो मिसाइल और रॉकेट में लगता था इसलिए वे भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन से जुड़ गईं। हम बात कर रहे हैं भारत की मिसाइल महिला के नाम से मशहूर रॉकेट साइंटिस्ट टेसी थॉमस की। टेसी ने भारत के कई अंतरिक्ष प्रॉजेक्ट्स की सफलता में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अग्नि मिसाइल के अनेक उन्नत एवम परिष्कृत संस्करणों के लिए रिसर्त और डेवलेपमेंट की जिम्मेदारी निभाने वाली टेसी थॉमस को कम लोग जानते होंगे, लेकिन उनकी प्रेरणादायक कहानी को जानना बेहद जरूरी है।

भारत की 3500 कि. मी. तक मार करने वाली अग्नि- 4 मिसाइल के सफल परीक्षण के बाद से ही रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन {DRDO} की इस महिला वैज्ञानिक डॉ. टेस्सी थॉमस को अग्नि पुत्री के नाम सम्बोधित किया जाने लगा था। टेसी ने अग्नि-5 की प्रोजेक्ट डायरेक्टर के रूप में अग्नि-5 की स्ट्राइक रेंज 5,000 किलोमीटर की मिसाइल का सफल परीक्षण कर दिखाया था। उनके परिश्रम का लोहा पूरी दुनिया मानती है। वे किसी भी भारतीय मिसाइल प्रॉजेक्ट में काम करने वाली पहली महिला हैं। उन्होंने 1988 में डीआरडीओ जॉइन किया था। उन्होंने भारत के मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम में काफी योगदान दिया है।

डॉ. टेसी थॉमस का जन्म अप्रेल 1964 में केरल के एक कैथोलिक ईसाई परिवार में हुआ था। उनके पिता विदेश सेवा में अधिकारी थे जबकि मां घर का काम संभालती थीं। टेसी जब स्कूल में पढ़ा करती थीं तो उन दिनों नासा का अपोलो यान चांद पर उतरने वाला था। इन्हें रोजाना उस यान के बारे में सुनकर प्रेरणा मिल रही थी कि ये भी एक दिन ऐसा एक राकेट बनाये जो इसी तरह आसमान की ऊंचाई को छू सकेंगी। कौन जानता था कि इतने बड़े सपने देखने वाली वो छोटी सी बच्ची अपने सपने को साकार कर देगी। टेसी ने अग्नि-5 की सफलता से अपनी मेहनत, लगन और प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए न केवल अपने सपने को साकार किया बल्कि पूरे देश को गौरान्वित किया।

टेसी थॉमस ने केरल के कालिकट में स्थित त्रिचुर इंजिनियरिंग कॉलेज से बी. टेक. किया और इसके बाद गाइडेड मिसाइल के क्षेत्र में एमटेक करने के लिए पुणे आ गईं। वहां पर डिफेन्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस टेक्नोलॉजी से अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की। उस वक्त उनकी उम्र सिर्फ 20 साल थी। इसके बाद सन 1988 में डीआरडीओ का एग्जाम देकर भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान में अपना योगदान देने लगीं। अभी तक ये क्षेत्र पुरुषों के आधिपत्य वाला क्षेत्र रहा है, लेकिन टेसी ने उस स्टीरियोटाइप को तोड़ने में अहम भूमिका निभाई है जो ये मानता आ रहा है कि ये काम सिर्फ पुरुषों के लिए है।

टेसी को अग्नि मिसाइल प्रॉजेक्ट को लीड करने की जिम्मेदारी मिली थी, लेकिन 2006 में अग्नि-3 मिशन फेल हो गया। इसके बाद उस मिशन की काफी आलोचना हुई थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपने काम पर वह पूरे फोकस के साथ लगी रहीं। उन्होंने कड़ी मेहनत, लगन, निष्ठा और मेधा की बदौलत फिर से प्रयास किया और अग्नि-5 मिसाइल को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया। आज भारत अंतर इंटर कॉन्टिनेंटल मिसाइल सिस्टम (ICBM ) की क्षमता से लैस ऐसा विश्व में पांचवा देश है जो 5,000 कि. मी. तक अपनी मिसाइल की मार से किसी भी शत्रु को उसके घर में ही ढेर कर सकता है। यह मिसाइल अपने नागरिको को सुरक्षित रखने में सक्षम है। इसका सारा श्रेय डॉ. टेसी थॉमस को ही जाता है।

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