'संगीत मार्तंड' पंडित जसराज के संघर्ष की अछूती कहानी


"माँ की दवाईयों के लिए जेब में पूरे पैसे नहीं थे तो दुकानदार ने उधार देने से मना कर दिया"

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कहते हैं हर पल किया जाने वाला संघर्ष ही कामयाबी की दशा और दिशा तय करता है। ज़रूरी ये होता है कि संघर्ष कितनी ईमानदारी से किया गया है। जितना बड़ा संघर्ष होता है कामयाबी का मीटर उतना बड़ा और उसका फलक उतना व्यापक होता है। यही वजह है कि हर कामयाबी के पीछे संघर्ष की एक लंबी दास्तान छुपी होती है। संघर्ष की कहानियाँ कभी-कभी किसी को पता चलती है, लेकिन कभी-कभी वो कहानियाँ, वो घटनाएँ कामयाबी के परतों में गुम हो जाती हैं। मुश्किल से ही किसी दिन परतें खुलती जाती हैं और संघर्ष के अनछुए पहलू सामने आते हैं। शास्त्रीय संगीत के आसमान पर सूरज बनकर चमकने वाले, मेवाती घराने में अपनी अलग पहचान बनाने वाले, जिनकी आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है, जिन्होंने 'मूर्छना' की प्राचीन शैली पर आधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी (जसरंगी) अवधारित की और जिनकी आवाज़ सात के सुरों में निखरकर इंद्रधनुष के सात रंगों से मिलकर पूरे विश्व में गूंजती है, ऐसे संगीत मार्तंड पंडित जसराज की कामयाबी में संंघर्ष की कई परतें है।आज उनके घर का एक कमरा भले ही पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी, मास्टर दीनानाथ मंगेशकर अवार्ड जैसे अन्य कई सम्मानों से सुशोभित हो पर इन सबमें धड़कता है उनका संघर्ष, संगीत के लिए निरंतर की गई कठोर तपस्या और इस तपस्या के दौरान घर परिवार की ज़रूरतों के लिए की गई अटूट कोशिश।  

साल भर पंडित जसराज कहीं भी रहें, लेकिन नवंबर के अंतिम सप्ताह में वे हैदराबाद ज़रूर आते हैं और जब वे हैदराबाद आते हैं तो उनके संघर्षों की स्मृतियां भी लौट आती हैं। हैदराबाद में इन स्मृतियों को ताज़ा करने के लिए एक ही जगह है और वह है, उनके पिताजी पंडित मोतीराम की समाधि, जहाँ पर वे घंटों बै‏ठ कर संगीत की उस देन को याद करते हैं, जो उनको अपने पिताजी से मिली थीं। महज चार साल की उम्र थी जब उनके पिता मेवाती घराने के विशिष्ट संगीतज्ञ पंडित मोतीराम जी का निधन हो गया। उम्र भले ही बहुत छोटी थी पर सिर से पिता का साया उठ जाने का दर्द काफी गहरा था। इसका अंदाजा वही लगा सकता है, जिसपर गुज़रती है। यहीं से शुरू हुआ पंडित जसराज के संघर्ष का लंबा दौर।

पंडित जसराज और डॉ अरविंद यादव
पंडित जसराज और डॉ अरविंद यादव

हैदराबाद के अम्बरपेट में पिता की समाधि के पास योर स्टोरी के डॉ अरविन्द यादव से एक बेहद अंतरंग बातचीत के दौरान पंडित जी ने बहुत सारी यादें साझा की। अपनी इस बड़ी कामयाबी के पीछे छुपे तत्वों के बारे में पंडित जसराज स्पष्ट रूप से स्वीकारते हैं कि उनका संघर्ष जारी है, बल्कि हर दिन और हर लम्हे को वो संघर्ष ही मानते हैं।

इसी बातचीत में पंडित जसराज ने साझा किया अपनी मां की दर्दनाक बीमारी और उनके इलाज के लिए हिला देने वाली हकीकत से। यह हकीकत कोलकता की गलियों में माँ की दवाइयों के लिए भटकते युवा जसराज की है। उन दिनों की यादें ताज़ा करते हुए पंडित जसराज कहते हैं, "पिता की सेवा नहीं कर सका था। माँ साथ थीं, लेकिन उन्हें कैंसर ने आ घेरा। पचास के दशक में कैंसर का होना क्या हो सकता है, इसका अंदाज़ा आज लगाना मुश्किल है। डॉक्टर की लिखी दवाइयाँ ढूंढ़ता हुआ पैदल साउथ कोलकता से सेंट्रल कोलकता पहुँचा। बहुत सी दवाई की दुकानों में उस समय वह दवाइयाँ थी ही नहीं। जब आखिरकार एक दुकान पर दवाइयाँ मिली भी तो जेब में उतने रुपये नहीं थे, जितनी महंगी वह दवाइयाँ थीं। जेब से जितने रुपये निकल सकते थे, निकालने के बाद मैंने कहा कि शेष पैसे बाद में दूँगा। दवाई की दुकान वाले का जवाब था कि दवाई की दुकान पर भी कभी उधारी सुनी है?लेकिन उसी वक़्त किसी ने अपना हाथ काँधे पर रखा और दुकान में खड़े व्यक्ति से कहा कि जितने रुपये हैं, ले लो और पूरी दवाइयाँ दे दो बाकी रुपये मेरे खाते में लिख देना।...वे दुकान के मालिक थे। पता नहीं मुझे कैसे जानते थे।"

पंडित जसराज मानते हैं कि संघर्ष, मेहनत, मशक्कत,रियाज़ सारी चीज़ें जीवन में ज़रूरी हैं, लेकिन उन सब के साथ ऊपर वाले की मेहरबानी भी ज़रूरी है। वही संघर्ष में साथ देता है। पंडित जी ने अपने जीवन में हज़ारों लोगों को ज़मीन से आसमान की राह दिखायी है। उनके अपने जीवन की कई कहानियाँ हैं, जो लोगों को नयी राह दे सकती हैं। एक और घटना का उल्लेख करते हुए पंडित जी बताते हैं, "माँ के लिए दवाइयों का इन्तज़ाम तो हो गया था। डाक्टर ने कहा था कि दिन में दो बार उन्हें इंजेक्शन लगाना होगा। इसके लिए डॉक्टर ने एक विजिट के लिए 15 रुपये मांगे। एक दिन में तीस रुपये जुटा पाना बहुत मुश्किल था, लेकिन सवाल माँ का था मैंने हामी भर दी। जब डॉक्टर साहब जाने लगे तो मैंने उनसे गुजारिश की कि आज शाम को ऑल इंडिया रेडियो सुनिएगा, उसमें मैं गा रहा हूँ। उन्होंने कहा, मुझे गाने में दिलचस्पी नहीं है और मैं अपनी भांजी के घर दावत में जा रहा हूँ। ...मैं मायूस हो गया, लेकिन जब दूसरे दिन डॉक्टर साहब आये तो उनका मूड़ बिल्कुल बदला हुआ था। उन्होंने कहा, ' मैंने तुम्हारा गाना सुना। जानते हो, यह गाना मैंने अपनी भाँजी के घर सुना और भाँजी ने कहा कि इस गाने वाले के पास पैसे नहीं रहते।'... उनकी वह भाँजी गीता राय थी, जो बाद में गायिका गीता दत्त के नाम से मशहूर हुई। डॉक्टर साहब ने उस दिन के बाद नाम मात्र 2 रुपये प्रति विजिट लेने शुरू किए। इस तरह संघर्ष के दिनों में कोई मेरे साथ साथ चलता रहा।"

कहते हैं विनम्रता कामयाबी की कुंजी है। पंडित जी से बातचीत में इसका हम बार-बार इससे रू-ब-रू होते हैं। जब विनम्रता की बात चली तो पंडित जसराज ने कहा "संघर्ष से कामयाबियाँ मिलती हैं, लेकिन उन कामयाबियों को "मैं" की नज़र नहीं करना चाहिए। आदमी को जब अपने पर घमंड आता है तो वह समाप्त हो जाता है। उसके संघर्ष के मायने भी खो जाते हैं।"

पंडित जसराज के बचपन के कुछ दिन हैदराबाद के गली कूचों में गुज़रे हैं। यहाँ का गौलीगुडा चमन और नामपल्ली ऐसे मुहल्ले हैं, जहाँ पंडित जी के बचपन की कई यादें हैं। उन्हें स्कूल के रास्ते की वो होटल भी याद है, जहाँ रुक कर वो बेगम अख्तर की ग़ज़ल...दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे , वरना कहीं तकदीर तमाशा न बना दे सुना करते थे। ...इस ग़ज़ल ने उनका स्कूल छुडवा दिया और फिर वे तबला बजाने लगे। बरसों बाद लाहौर में उन्हें गायक कलाकार के रूप में मंच का मुख्य आकर्षण बनने की सूझी और फिर गायक बनने के लिए भी लंबे संघर्षों का सिलसिला जारी रहा।

पंडित जी मानते हैं कि इस लंबी जिंदगी से कुछ प्रेरणा अगर ली जा सकती है तो यही कि लगातार काम करते रहना चाहिए। गाने का शौक है तो सीखते रहो और रियाज़ करते रहो और उस ऊपर वाले की मेहरबानी का इंतज़ार करो।

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Dr Arvind Yadav is Managing Editor (Indian Languages) in YourStory. He is a prolific writer and television editor. He is an avid traveler and also a crusader for freedom of press. In last 20 years he has travelled across India and covered important political and social activities. From 1999 to 2014 he has covered all assembly and Parliamentary elections in South India. Apart from double Masters Degree he did his doctorate in Modern Hindi criticism. He is also armed with PG Diploma in Media Laws and Psychological Counseling . Dr Yadav has work experience from AajTak/Headlines Today, IBN 7 to TV9 news network. He was instrumental in establishing India’s first end to end HD news channel – Sakshi TV.

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