आकाशवाणी पर गूंज रही महिलाओं के मन की बात

सामुदायिक रेडियो से गांव की महिलाओं में आ रहा बदलाव...

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देश के विभिन्न क्षेत्रों में 'सामुदायिक रेडियो' महिलाओं के सामाजिक-मानसिक विकास में जबर्दस्त भूमिका निभा रहे हैं। वह आंध्र प्रदेश के पस्तापुर गाँव का सामुदायिक रेडियो हो या हरियाणा का 'अल्फाज-ए-मेवात', घरेलू हिंसा से लेकर अपने रोजी-रोजगार तक के मसले ये महिलाएं अब कम्युनिटी रेडियो पर उठाने लगी हैं। इस तरह गांव-गांव में उनके मन की बातें पुरजोर तरीके से गूंजने लगी हैं।

कम्यूनिटी रेेडियो से जुड़ी महिलाएं
कम्यूनिटी रेेडियो से जुड़ी महिलाएं
राजधानी दिल्ली से मात्र लगभग अस्सी किलो मीटर की दूरी पर हरियाणा के मुस्लिम बहुल मेवात क्षेत्र में अल्फाज-ए-मेवात नाम का सामुदायिक रेडियो महिलाओं की आवाज बुलंद कर रहा है। यह रेडियो स्टेशन 2012 में शुरू हुआ था। 

हमारे देश में सामुदायिक रेडियो महिलाओं की सशक्त आवाज का एक प्रभावी माध्यम बन रहा है। हरियाणा के मेवात क्षेत्र में महिलाएं सामुदायिक रेडियो पर घरेलू हिंसा, शिक्षा और मासिक धर्म से जुड़े मुद्दों पर बिना हिचक अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं। आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद से लगभग सौ किलोमीटर दूर पस्तापुर गाँव में सामुदायिक रेडियो ग़रीब महिलाओं के लिए खेतीबाड़ी की सूचना देने का कारगर माध्यम बन गया है।

भारत सरकार दो साल पूर्व दिसम्बर 2016 तक देश में 519 सामुदायिक रेडियो को लाइसेंस प्रदान कर चुकी थी। लक्ष्य इनकी संख्या ढाई हजार तक पहुंचाने का है। वर्ष 2005 में सरकार ने सामुदायिक रेडियो के दिशा-निर्देश तय किये थे। देश में सामुदायिक रेडियो के लिए वैधता-अभियान की शुरुआत 1990 में हुई थी। फरवरी 1995 में सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के तुरंत बाद कि वायुतरंगें सार्वजनिक संपत्ति हैं, कुछ कठोर शर्तों के साथ इसे शुरू करने की अनुमति सिर्फ शैक्षिक (परिसर) रेडियो स्टेशनों को ही मिली। अन्ना (एफएम) भारत का प्रथम परिसर 'सामुदायिक' रेडियो है, जो 01 फ़रवरी 2004 को आरंभ हुआ था।

इसके दो साल बाद ही भारत सरकार ने नए सामुदायिक रेडियो दिशानिर्देश की अधिसूचना जारी की, जिससे गैर-सरकारी संगठनों और अन्य नागरिक सामाजिक संगठनों को सामुदायिक रेडियो स्टेशन खोलने की अनुमति मिल गई। पहला समुदाय आधारित रेडियो स्टेशन 15 अक्टूबर 2008 को तब बाकायदा आरंभ हुआ, जब पस्तापुर गांव का 'संगम रेडियो' सुबह 11 बजे शुरू किया गया। इसका लाइसेंस आंध्र प्रदेश के 75 गांवों में महिलाओं के समूहों के साथ काम करने वाले एक गैर-सरकारी संगठन डेक्कन विकास सोसायटी (डीडीएस) को दिया गया। मध्य प्रदेश के ओरछा में 23 अक्टूबर 2008 को 'ताराग्राम' में भारत का दूसरा गैर-सरकारी संगठन संचालित सामुदायिक रेडियो स्टेशन 'रेडियो बुंदेलखंड' नाम से आरंभ हुआ। उसके बाद से तो सामुदायिक रेडियो स्टेशनों के खुलने का एक लंबा सिलसिला सा चल पड़ा, जो आज भी बदस्तूर जारी है।

सामुदायिक रेडियो नीति के तहत, कोई भी अलाभकारी 'कानूनी संस्था' - व्यक्तियों, राजनीतिक दलों और उनके सहयोगियों, अपराधी और प्रतिबंधित संगठनों को छोड़कर - एक सीआर लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकती है। ऐसे स्टेशनों के लिए केंद्रीय वित्त सहायता उपलब्ध नहीं है और अन्य स्रोतों से धन जमा करने पर सख्त प्रतिबंध है। केवल वही संगठन आवेदन कर सकते हैं जो कम से कम तीन साल से पंजीकृत हों और जिनका स्थानीय सामुदायिक सेवा का कार्य रिकॉर्ड 'प्रमाणित' हो। सामुदायिक रेडियो स्टेशनों से कम से कम पचास प्रतिशत कार्यक्रम स्थानीय स्तर पर बनाने की अपेक्षा की जाती है और जहां तक संभव हो कार्यक्रम स्थानीय भाषा या बोली में होने चाहिए। सामुदायिक रेडियो पर प्रति घंटे पांच मिनट के विज्ञापन की अनुमति है।

मुद्दत से पस्तापुर गाँव का सामुदायिक रेडियो खासकर क्षेत्र की ग़रीब महिलाओं की आवाज बन रहा है। एक साधारण से घर में बने इसके स्टूडियो से रोजाना कम से कम दो घंटे कार्यक्रमों का प्रसारण होता है। इस गाँव में ज्यादातर ग़रीब दलित महिलाएँ हैं। गाँव की कई महिलाएँ रेडियो कार्यक्रम में अपना योगदान दे रही हैं। एच लक्ष्मम्मा इस सामुदायिक रेडियो के लिए हर महीने क़रीब दस घंटे का कार्यक्रम तैयार करती हैं, जिससे उन्हें क़रीब पांच सौ रुपए मिल जाते हैं। उस पैसे से वह अपने घरेलू सामान खरीद लेती हैं। गाँव की महिलाएं औपचारिक शिक्षा के अभाव में पास के खेतों में मज़दूरी करती हैं। जीवन भर संघर्ष करने वाली इन महिलाओं के लिए रेडियो पर अपनी आवाज़ सुनना एक बड़ी उपलब्धि है।

राजधानी दिल्ली से मात्र लगभग अस्सी किलो मीटर की दूरी पर हरियाणा के मुस्लिम बहुल मेवात क्षेत्र में अल्फाज-ए-मेवात नाम का सामुदायिक रेडियो महिलाओं की आवाज बुलंद कर रहा है। यह रेडियो स्टेशन 2012 में शुरू हुआ था। अब यहां की औरतें इसके रेडियो कार्यक्रमों में सीधे पहल करने लगी हैं। वे अपनी समस्याओं पर खुलकर बातचीत करती हैं। मन पसंद गाने सुनती हैं। इस सामुदायिक रेडियो को स्थापित करने के दौरान सहगल फाउंडेशन बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। मेवात की महिलाओं के साथ काम करना शुरू में बहुत कठिन था। महिलाओं के अंदर अजीब सी झिझक थी। वे रिकॉर्डर के सामने बातें करने से बचती थीं। वे सोचती थीं कि कोई उनकी आवाज सुनेगा तो क्या कहेगा। धर्म गुरुओं ने भी 'मनोरंजन हराम' का नारा देते हुए विरोध किया। बाद में वे भी इस अभियान को साझा करने लगे।

जिन दिनों इस रेडियो स्टेशन का टेस्ट प्रसारण हो रहा था, गांव के लोग स्टेशन टॉवर की लाल बत्ती देख धावा बोल दिया था। वे शोर मचाते हुए कहने लगे थे कि क्या गांव की जासूसी के लिए कैमरे लगाए गए हैं। उस भीड़ में मेवात के एक मौलाना भी थे। स्टेशन कर्मियों ने तुरंत मौलाना को स्टूडियो में बैठा कर उनसे बातचीत शुरू कर दी। जब मौलाना की बातचीत लोगों को रेडियो पर सुनाई दी तो सब लोग सहज होने लगे। अब तो हजारों महिलाएं कार्यक्रमों के संबंध में इस रेडियो स्टेशन को फोन कॉल्स करती रहती हैं। पहले तो महिलाएं फोन पर गाने की फरमाइश करती थीं, बाद में धीरे-धीरे विभिन्न सामाजिक, घरेलू मुद्दों पर बात करने लगीं। रेडियो स्टेशन जब गांव में स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता और प्रसव से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित करने लगा, गांव वालों में जागरूकता बढ़ने लगी। आज इस स्टेशन की आवाज क्षेत्र के लगभग सवा दो सौ गांवों में गूंज रही है।

मेवात के इस सामुदायिक रेडियो की बदौलत क्षेत्र की महिलाओं में आत्मविश्वास का स्तर अब काफी ऊंचा उठ गया है। खुले में शौच, घरेलू हिंसा, लड़कियों की शिक्षा, मासिक धर्म, यौन शोषण जैसी गंभीर समस्याओं पर रेडियो कार्यक्रमों की सीरिज चलाई जा रही है। महिलाओं को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक किया जा रहा है। गौरतलब है कि मेवात क्षेत्र में घरेलू हिंसा आम बात रही है। यहां की एक कहावत रही है कि जब तक महिला को दो-चार थप्पड़ न लगे, दिन की शुरुआत नहीं होती। अब यहां की महिलाओं को पता चल चुका है कि घरेलू हिंसा एक गंभीर सामाजिक अपराध है। प्रतिरोध में अल्फाज-ए-मेवात उन महिलाओं का साथ दे रहा है। इस मिशन में पुरुषों को भी साथ लेकर चला जा रहा है। उनको अहसास कराया जा रहा है कि घरेलू हिंसा गलत है। उनको महिलाओं के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए। कानूनी सहयोग के लिए पुलिस भी साथ हो चली है।

आज भी इस इलाके में शिक्षा व्यवस्था हालत काफी दयनीय है। लड़कियों की उच्च शिक्षा का कोई माध्यम नहीं है। आठवीं के बाद लड़कियों के सामने आगे पढ़ाई जारी रखने का संकट है। अब उस दिशा में भी इस सामुदायिक रेडियो स्टेशन ने अपनी सशक्त पहल शुरू कर दी है। बात सूचना की हो या विकास की, शिक्षा की हो या चिकित्सा की, सूचना के अधिकार की हो या कानून की, हर सूचना को यह रेडियो जन-जन तक पहुंचा रहा है। नूंह जिले के घाघस गांव स्थित इसके केन्द्र से आसपास के लगभग 220 गांवों में बदलाव की बयार बह रही है।

लोग अपने अधिकारों को लेकर जागरूक होने के साथ ही सरकारी योजनाओं का लाभ अब केवल पात्र ही पा रहे हैं। रिपोर्टिंग एवं कार्यक्रमों के प्रसारण के लिए स्थानीय समुदाय की लड़कियों एवं महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया है, उन्हें जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। इस रेडियो स्टेशन की सफलता का एक राज यह भी है कि यहां के गांवों में आज भी 10 प्रतिशत से कम ही घरों में टीवी देखी जाती है। ऐसे में जो महिलाएं पढ़ना-लिखना नहीं जानतीं, वे रेडियो सुनकर सारी जानकारियाँ पा लेती हैं। चूंकि साक्षरता दर कम है, यहां किशोर वय में ही लड़कियों की शादी कर दी जाती थी। अब रेडियो स्टेशन से इसके प्रति भी जागरूकता बढ़ती जा रही है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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