एचआईवी पीड़ितों को पार्टनर खोजने के लिए IIM की मदद, बनाया मैरिज पोर्टल

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एचआईवी पॉजिटिव लोगों की एक मुश्किल आसान की है आईआईएम अहमदाबाद और सूरत के एक ग्रुप ने। अब ऐसे लोगों को पार्टनर ढूंढ़ने के लिए ज्यादा मशक्कत करने की जरूरत नहीं है। 

सांकेतिक तस्वीर, साभार Shutterstock
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IIM-A के निदेशक एरोल डिसूजा ने कहा कि यह वेबसाइट एक प्रगतिशील कदम है। उन्होंने कहा कि फील्ड सर्वे में एचआईवी पीड़ित लोगों से जुड़े जो आंकड़े दिखाए जाते हैं वास्तविकता में पीड़ितों की संख्या कहीं ज्यादा है।

हमारे आस पास छोटी-छोटी चीजों को लेकर इतनी धारणाएं और गलतफहमियां फैला दी जाती हैं कि फिर किसी बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति का सामान्य रह पाना मुमकिन नहीं हो पाता। और फिर जब बात एचआईवी की हो तो लोगों की भौहें तन जाती हैं। लंबे समय तक लोगों में यह धारणा बनी रही कि एचआईवी पीड़ित व्यक्ति से हाथ मिलाने या उससे छूने पर भी यह रोग हो सकता है, जबकि हकीकत में ऐसा कुछ नहीं होता। इस गलत धारणा को दूर करने के लिए सरकार द्वारा काफी प्रचार किया गया। तब जाकर कहीं लोगों में जागरूकता आ पाई। हालांकि अभी भी एचआईवी पॉजिटिव लोगों के साथ सामान्य व्यवहार मुश्किल से ही होता है।

एचआईवी पॉजिटिव लोगों की एक मुश्किल आसान की है आईआईएम अहमदाबाद और सूरत के एक ग्रुप ने। अब ऐसे लोगों को पार्टनर ढूंढ़ने के लिए ज्यादा मशक्कत करने की जरूरत नहीं है। सूरत के श्री राम कृष्ण ग्रुप और गुजरात स्टेट नेटवर्क ऑफ पीपल लिविंग विद एचआईवी/एड्स (GNSP) ने मिलकर एक ऐसा पोर्टल विकसित किया है जहां से एचआईवी पीड़ित लोग आसानी से अपना लाइफ पार्टनर खोज सकते हैं। यह काम GNSP द्वारा किया जा रहा है और इसे एसआरके नॉलेज फाउंडेशन से वित्तीय सहायता मिल रही है। वहीं टेक्निकल सपॉर्ट आईआईएम अहमदाबाद जैसा संस्थान दे रहा है।

IIM-A के निदेशक एरोल डिसूजा ने कहा कि यह वेबसाइट एक प्रगतिशील कदम है। उन्होंने कहा कि फील्ड सर्वे में एचआईवी पीड़ित लोगों से जुड़े जो आंकड़े दिखाए जाते हैं वास्तविकता में पीड़ितों की संख्या कहीं ज्यादा है। GNSP के संस्थापक दक्षा पटेल कहती हैं कि भारत में लगभग 16 लाख लोग एचआईवी से पीड़ित हैं। उन्होंने बताया कि 68,000 लोग नियमित रूप से एंटीरेट्रोवायरल थेरेपे सेंटर पर अपना इलाज कराने पहुंचते हैं।

यह तो सरकारी सेंटर पर पहुंचने वालों का आंकड़ा है। ऐसे लोगों की संख्या काफी ज्यादा है जो प्राइवेट संस्थानों में अपना इलाज करवाते हैं। हालांकि शुरुआती दौर में ही पहचान हो जाने पर आधुनिक इलाज से एड्स होने का खतरा कम किया जा सकता है। इसीलिए शादी-विवाह के लिए भी डिमांड लगातार बढ़ रही है। लेकिन ऐसे लोगों को अपना पार्टनर खोजने में काफी मुश्किल होती है। इसीलिए इस वैवाहिक पोर्टल की स्थापना की गई। हालांकि यह पोर्टल बाकी साधारण पोर्टल्स से अलग काम करता है। GSNP ने अभी तक एचआवी के साथ रहने वाले दूल्हा और दूल्हनों की छह बार बड़ी बैठकें आयोजित की हैं।

GSNP ने अभी तक 245 शादियों में अहम भूमिका भी निभाई है। यह संगठन बीते एक दशक एचआईवी पीड़ितों के लिए काम कर रहा है और इस पोर्टल पर लगभग 1900 लोग अपना रजिस्ट्रेशन करवा चुके हैं। दरअसल यह रसिक भुवा का मामला था जिसके बाद इस पोर्टल को बनाया गया। रसिक कहते हैं, 'मेरी सगाई के कुछ ही बाद जांच से पता चला कि मुझे एचआईवी है।' इसके बाद उन्होंने अपने स्वास्थ्य का हवाला देते हुए शादी तोड़ दी। इसके बाद उन्हें एक ऐसी ही लड़की मिली जो कि एचआईवी पॉजिटिव थी और दोनों ने फिर शादी कर ली।

वे बताते हैं कि अभी भी कई सारे ऐसे लोग हैं जो अपने स्वास्थ्य के बारे में परिवार को नहीं बताते हैं। इससे बीमारी खत्म नहीं होती और दूसरे इंसान को भी नुकसान उठाना पड़ जाता है। वे बताते हैं कि शहर के लोग तो फिर भी समझ जाते हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों की हालत और बेकार है। इसलिए उन्हें बैंक कर्मचारी या सरकारी अधिकारी बनकर गांवों में लोगों को समझाने जाना पड़ता है।

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