भारत में पारंपरिक भवन निर्माण के पारंपरिक तरीके को बदलकर ग्रीन हाउसिंग को बढ़ाने के लिये काम करती क्लोरोअर्थ

लकड़ी, सीमेंट और स्टील के स्थान पर पर्यावरण के अनुकूल सामग्रियों से भवन निर्माण पर कर रहे हैं काम

स्थायी निर्माण को तैयार करने में जियोपाॅलीमर्स का उपयोग करने की दिशा में बढ़ा रहे हैं कदम

आने वाले 3 महीनों के भीतर गैर-शहरी क्षेत्रों में 25 से 30 हजार ऐसे घरों का निर्माण कर स्मार्ट गांव तैयार करने का है इरादा

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‘‘मैं लकड़ी बनाता हूँ।’’ इस बात को लगभग एक वर्ष हो चुका है जब क्लोरोअर्थ (ब्ीसवतवमंतजी) के संस्थापक डेविड जेम्स ने यह बयान दिया था। और आज वे इस मिश्रण में स्टील और सीमेंट को भी जोड़ने की बात करते हैं। क्लोरोअर्थ कृषि और अक्षय स्त्रोतों का प्रयोग कर भवन निर्माण से संबंधित सामग्री तैयार करती है। डेविड का कहना है कि कंपनी का इरादा अपने व्यापार माॅडल का प्रयोग न सिर्फ टिकाऊ उत्पादों को ही तैयार करने का है बल्कि ये वाणिज्यिक और औद्योगिक क्रियकलापों के लिये विभिन्न प्रकार के कृषि उत्पादों को तैयार करने का है।

आज क्लोरोअर्थ अपना पूरा ध्यान हरितग्रह (ळतममद भ्वनेपदह) के क्षेत्र में विश्व में अग्रणी स्थान पाने में लगा रहा है। डेविड का कहना है कि यही वजह है कि अब ये अपना सारा ध्यान सिर्फ लकड़ी पर ही नहीं दे रहे हैं बल्कि अब उनका मिशन लकड़ी के अलावा दो अन्य सामग्रियों, सीमेंट और स्टील को भी बदलने का विचार कर रहे हैं। डेविड के दिमाग में यह विचार बीते वर्ष तब आया जब उनके एक सहकर्मी ने दीर्घकालिक सामग्री का प्रयोग करते हुए 20 हजार से 30 हजार घरों के निर्माण के लिये उनसे संपर्क किया।

बी2बी कंपनी से बी2जी कंपनी तक का सफर

डेविड कहते हैं कि अपने इस विचार को अमली जामा पहनाते हुए उन्होंने क्लोरोअर्थ को बी2बी से बी2जी (बिजनस टू गवर्नमेंट) कंपनी बनाने की दिशा में काम करना प्रारंभ किया। उनकी यह कंपनी अब सरकार के साथ गठजोड़ करने पर अपना सारा ध्यान केंद्रित कर रही है ताकि देशभर में उनके द्वारा तैयार की गई सामग्रियों का प्रयोग किया जा सके।

डेविड बताते हैं, ‘‘निर्माण कार्यों में सीमेंट प्रयोग करने पर न सिर्फ पानी का बहुत अधिक उपयोग होता है बल्कि इसके फलस्वरूप बहुत सी ग्रीन हाउस गैसों का भी उत्सर्जन होता है। अगर हम इसे किसी ऐसी चीज से प्रतिस्थापित कर सकें जो कम विशाक्त होने के साथ-साथ संरचनात्मक मजबूती में सीमेंट को टक्कर दे सके तो निर्माण की लागत को एक डाॅलर से कम करके पाँच सेंट तक लाया जा सकता है।’’ उनके अनुसार आज घरों के निर्माण में उसी सामग्री का प्रयोग किया जा रहा है जिसका उपयोग गगनचुंबी इमारतों को बनाने में किया जाता है और यह बिल्कुल अनुत्पादक हैं।

डेविड बताते हैं कि उनका विचार मुख्यतः स्थायी निर्माण को तैयार करने में जियोपाॅलीमर्स का उपयोग करने का है। इनमें से अधिकतर उत्पाद और सामग्रियां आसानी से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करके तैयार की जाएंगी। स्टील का उदाहरण देते हुए डेविड बताते हैं कि निर्माण कार्य में उपयोग होने वाले लोहे को भारत में आसानी से उपलब्ध कई अन्य संसाधनों के द्वारा बदला जा सकता है।

एक ऐसी टीम जिसे औद्योगिक पारिस्थितिकी के क्षेत्र में काम करने के भरपूर अनुभव के अलावा पूरा ज्ञान भी है, क्लोरोअर्थ का इरादा भारत के माध्यम से पूरी दुनिया के बाजार पर कब्जा करने का है। डेविड कहते हैं, ‘‘हम जिस जियोपाॅलीमर आईपी के निर्माण पर काम कर रहे हैं उसकी अगुवाई हमारे एक मित्र कर रहे हैं जिन्हें इस काम को करने का 35 वर्षों का अनुभव है।’’

स्मार्ट गांवों को तैयार करना

क्लोरोअर्थ का इरादा स्मार्ट गांवों को तैयार करना है। यह टीम आने वाले 60 से 90 दिनों के भीतर 25 हजार से 30 हजार के करीब घरों के निर्माण के लिये तत्पर है। यह टीम गैर-शहरी क्षेत्रों में एक से तीन मंजिला भवनों के निर्माण पर अपनी नजरे गड़ाए बैठी है। डेविड कहते हैं कि उनका इरादा और लक्ष्य गगनचुंबी इमारतों का निर्माण करना नहीं है।

डेविड का मानना है कि आज के वाईफाई और इंटरनेट के युग में हर किसी के लिये सिर्फ शहरी क्षेत्रों में ही निवास करना आवश्यक नहीं है। वे कहते हैं, ‘‘मुझे लगता है कि वर्तमान में शहरों में बहुत अधिक भीड़भाड़ हो गई है और अब इन इलाकों को साफ-सफाई की बहुत अधिक आवश्यकता है।’’ उनका मानना है कि कोई भी ग्रामीण इलाकों में शहरी जीवन की सभी सुविधाओं से युक्त जीवन बड़े आराम से व्यतीत कर सकता है और वह भी शहरों से आधी कीमत में।

वे आगे कहते हैं, ‘‘एक स्मार्टसिटी को तैयार करने में प्रयोग किया गया इंफ्रास्ट्रक्चर उससे प्राप्त होने वाले फायदों से कहीं अधिक कीमत वसूलता है। सभी शहर बहुत बुरी तरह से अवरूद्ध हैं और सिर्फ बायपास बना देना समस्या का समाधान नहीं हैं।’’

एक अनिच्छुक बाजार

डेविड का मानना है कि भारत में वीसी समुदाय की काफी कमी है। यहां पर धन का निवेश करने वाली अधिकतर संस्थाएं पश्चिम के अर्थशास्त्र का पालन करते हैं। उनके अनुसार भारत में अव्यक्त मांग को समझा नहीं जाता है इंटरवेंशन कैपिटल का तो कहीं कोई नामोनिशान ही नहीं है। वे कहते हैं, ‘‘मैं यहां पर अभी तक किसी भी ऐसे वीसी से मिलने के लिये बेकरार हूँ जो यह समझते हों कि इंटरवेंशन कैपिटल किस चिडि़या का नाम है।’’

एक बड़ा अंतर्राष्ट्रीय निवेश उनके इस विचार के समर्थन में है लेकिन रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया की मंजूरी मिलने में इन्हें अपेक्षित से कहीं अधिक समय लग रहा है।

बाजार

विभिन्न रियल एस्टेट डवलपर्स और रियल्टर्स के द्वारा करवाये गए अध्ययनों के अनुसार पर्यावरण के अनुकूल घरों की मांग समय के साथ बढती जा रही है। मिनिस्ट्री आॅफ हाउसिंग एंड अर्बन पाॅवर्टी एलीवेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2012 में देशभर में शहरी क्षेत्रों में करीब 18.78 मिलियन घरों की कमी है।

वर्ष 2011 में भारत में करीब 800 मिलियन वर्गफीट हरित निर्माण क्षेत्र पाया गया था जिसमें से 40 प्रतिशत आवासीय था। इसके अलावा इसी वर्ष पुणे के पिंपरी चिंचवाड़ नगर निगम ग्रीन हाउसिंग की अवधारणा को पेश करने और अपनाने वाला देश का पहला नगर निगम बन गया था।

फिलहाल भारत में यह बाजार अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में है वैश्विक स्तर पर ग्रीन इमारतों और आवासीय बाजारों का बाजार 60 बिलियन अमरीकी डाॅलर तक बढ़ने का अनुमान है। वर्ष 2014 के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस दौरान अमरीका में तैयार होने वाले नए निर्माणों में 20 प्रतिशत के ग्रीन बिल्डिंग्स होने का अनुमान है।


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