मूक-बधिरों के श्रम से नयी बुलंदियों को छूने वाला रेस्तरां ‘मिर्च एंड माइम’

मूक बधिर महिला और पुरुष वेटर को ट्रेनिंग देने के लिए ‘मिर्च एंड माइम’ को प्रशांत और अनुज ने सिर्फ अपने रिश्तेदारों के लिए खोला। जो यहां आकर मुफ्त में खाना खाते। इस दौरान सर्विस का सारा काम ये वेटर ही देखते थे। रिश्तेदारों से मिली अच्छी प्रतिक्रिया के बाद मई 2015 में इन्होने अपना रेस्टोरेंट ‘मिर्ची एंड माइम’ आम लोगों के लिये शुरू कर दिया।

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कभी आप ऐसे किसी रेस्तरां में गये हैं, जहाँ पर आप अपने खाने का ऑर्डर बोल कर नहीं, बल्कि सांकेतिक भाषा में दें और वेटर भी उसे झटपट समझ कर तुरंत आपका दिया ऑर्डर आपके सामने पेश कर दे। कुछ ऐसी ही कोशिश की है प्रशांत इस्सर और अनुज गोयल ने मुंबई में।  काफी साल विदेश में रहने बाद भारत लौटे तो उन्होंने अपने कारोबार के साथ ऐसे लोगों को जोड़ा, जो बोल या सुन नहीं सकते, लेकिन वो आम लोगों से बेहतर समझ सकते हैं, उनसे बढ़िया काम कर सकते हैं और सबसे खास बात ये की काम के बोझ के बावजूद हर वक्त उनके चेहरे पर मुस्कान बनाये रखते हैं। मुंबई में पवई के हीरानंदानी गार्डन में ‘मिर्च एंड माइम’ शायद देश का पहला ऐसा रेस्तरां हैं, जहां पर काम करने वाले सभी महिला और पुरुष वेटर मूक और बधिर हैं।

बेसहारा लोगों के लिए कुछ कर गुजरने की इच्छा ही मुंबई में रहने वाले प्रशांत इस्सर और अनुज गोयल को वापस अपने वतन खींच लाई। दोनों ने अलग अलग समय पर इंग्लैंड के हेनरी बिजनेस स्कूल से एमबीए किया था। अनुज ने व्यापार और प्रबंधन में एमबीए किया था, जबकि प्रशांत ने 2008 में होटल और रेस्टोरेंट से जुड़ा एमबीए कोर्स किया था। एमबीए के बाद अनुज अफ्रीका चले गये जबकि प्रशांत लंदन में ही रह रहे थे। एमबीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रशांत ने अपना कारोबार शुरू करने के बारे में सोचा और साल 2011 में वह पार्क ग्रुप ऑफ होटल के एमडी के साथ भारत वापस आ गये। भारत लौटकर उन्होंने कई होटलों के लिये काम किया, लेकिन थोड़े वक्त बाद उनको लगने लगा कि वो अपने उद्देश्य से भटक रहे हैं। प्रशांत ने योरस्टोरी को बताया,  

"उस वक्त मैंने सोचा कि मैं ये क्या कर रहा हूं, जबकि मेरा मकसद अपना कारोबार शुरू करना था और मैं दूसरे के लिये काम कर रहा हूं। जिसके बाद मैंने कंसलटेंसी और होटल की योजना बनानी शुरू कर दी।”

प्रशांत का कहना है कि उसी दौरान लिंकडिन के जरिये उनकी मुलाकात अनुज से हुई वो भी अपना कारोबार खोलना चाहते थे। मिलने पर बातचीत के दौरान उन्होंने महसूस किया कि एमबीए की पढ़ाई के दौरान नैतिकता का पाठ भी पढ़ाया गया था। जिसमें उनको बताया गया था कि किसी भी कारोबार को करने से सिर्फ अपना ही नहीं बल्कि समाज का भी भला होना चाहिए और दूसरी बात जो इन लोगों को अच्छी लगी थी वो थी कि क्षमता और कौशल से ज्यादा अपने काम के प्रति प्रतिबद्धता और ईमानदारी होनी चाहिए।

उसी दौरान प्रशांत और अनुज की मुलाकात शिशिर गोरले और राजशेखर रेड्डी से हुई। ये दोनों पहले से ही मुंबई में ‘इंडिया बाइट’ नाम की एक सफल कंपनी चला रहे थे। इन्होंने फेसबुक पर टोरंटो में एक साइन रेस्टोरेंट देखा था। ऐसे ही रेस्टोरेंट मुंबई में खोलने की इच्छा शिशिर और रेड्डी ने इनके सामने रखी। प्रशांत और अनुज का कहना है कि उन्हें ये आइडिया पसंद आया क्योंकि प्रशांत अपने 21 साल के करियर में भारत और ब्रिटेन दोनों जगह पर करीब 17 से 18 रेस्टोरेंट खोल चुके थे जो कि काफी सफल रहे थे, लेकिन मूक बधिरों के साथ काम करने का उनका कोई भी अनुभव नही था।  प्रशांत और अनुज ने इस काम को शुरू करने से पहले मूक बधिर लोगों के माता-पिता से मिले और उनको समझाया कि उनके बच्चे भी बेहतर काम कर सकते हैं।

प्रशांत का कहना है,  

“मुझे और अनुज दोनों को ही ये लगा कि अगर हमें अपने कारोबार में ऐसे लोगों को जोड़ना है तो सबसे पहले हमें भी सांकेतिक भाषा सीखनी पड़ेगी। जिसके बाद हम दोनों ने साइन लैंग्वेज को सीखा और उसके बाद मूक बधिर बच्चों से बात की तो हमें पता चला कि ये लोग भी काम करना चाहते हैं। इतना ही नहीं बातचीत में हम दोनों को ये बात भी पता चली की ऐसे मूक-बधिर बच्चें सामान्य बच्चों की तुलना में ज्यादा तेज दिमाग वाले और मेहनती होते हैं।”

प्रशांत और अनुज ने इसके बाद अपने रेस्टोरेंट के बारे में सोचा और इन मूक-बधिर लोगों को ट्रेनिंग दी। इनके लिए आठ हफ्तों का एक खास तरह का प्रोग्राम बनाया गया। जिसको चार हिस्सों में बांटा गया। पहले हिस्से में इन लोगों को बताया गया कि जिंदगी कैसे चलती है और कैसे काम करते हैं क्योंकि इनमें से ज्यादातर ने कभी काम ही नहीं किया था। दूसरे हिस्से में इन लोगों को नौकरी की जरूरत के बारे में समझाया गया और तीसरे हिस्से में साधारण अंग्रेजी का ज्ञान दिया गया, जिसमें इन्हें अंग्रेजी पढ़ना सिखाया गया। चौथे और अंतिम हिस्से में इन लोगों को मॉडयूल्स में इन्हें हॉस्पिटलिटी की ट्रेनिंग दी गयी। जिसके बाद मूक बधिर महिला और पुरुष वेटर को ट्रेनिंग देने के लिए ‘मिर्च एंड माइम’ को प्रशांत और अनुज ने सिर्फ अपने रिश्तेदारों के लिए खोला। जो यहां आकर मुफ्त में खाना खाते। इस दौरान सर्विस का सारा काम ये वेटर ही देखते थे। रिश्तेदारों से मिली अच्छी प्रतिक्रिया के बाद मई 2015 में इन्होने अपना रेस्टोरेंट ‘मिर्ची एंड माइम’ आम लोगों के लिये शुरू कर दिया।

प्रशांत बताते हैं, 

“इन्होंने आम वेटरों की तुलना में इतना अच्छा काम किया कि इनके रेस्टोरेंट को शुरूआत के 6 महीने अंदर ही जोमाटो के ‘हाइयेस्ट रेटेड रेस्तरां इन मुंबई’ का खिताब मिल गया। जिसमें 800 रिव्यू के साथ हमें 4.9 की रेटिंग मिली।” 

अपने यहां काम करने वाले मूक बधिर वेटरों की तारीफ करते हुए प्रशांत कहते हैं कि ये लोग अपने काम के लेकर बहुत ही सजग होते हैं और हॉस्पिटलिटी के तीनों गुण इनमें मौजूद रहते हैं। जैसे कि ये हमेशा मुस्कुराते हैं दूसरा ये अपने काम को लेकर फोकस्ड रहते हैं क्योंकि ये सुन नहीं सकते और तीसरा ये कि ये लोग दूसरों की भावनाओं को पढ़ लेते हैं। ऐसे में एक ग्राहक को इससे ज्यादा अच्छी सर्विस और क्या मिल सकती है कि वेटर मुस्कुराते हुए उनके मूड को पहचानकर ध्यानपूर्वक उन्हें सर्विस प्रदान करें। इनके यहां कुल 24 महिला और पुरूष वेटर काम करते हैं और उनकी औसत आयु 22 से 35 साल के बीच है। इस रेस्टोरेंट में एक साथ 90 लोगों के बैठने की जगह है।

प्रशांत का कहना है कि रेस्टोरेंट के कारोबार में जहां करीब 60 प्रतिशत लोग काम छोड़कर चले जाते हैं वहीं इनकी संख्या 2 से 3 प्रतिशत है क्योंकि ये लोग जल्दी किसी पर भरोसा नहीं करते और इनका भरोसा जीतने पर ये आपका साथ नहीं छोड़ते। इसी वजह से ये लोग इन्हें 35 प्रतिशत ज्यादा सैलरी देते हैं। इन्होंने अपने सर्विस स्टाफ की टीशर्ट के पीछे एक स्लोगन लिखवाया है- “आई नो साइन लैंग्वेज, वट्स इज योर सुपरपॉवर”। इसका मकसद ये है कि कोई भी व्यक्ति इन्हें दया की नजरों से ना देखे ये भी आम लोगों की तरह हैं। प्रशांत का कहना है कि “वास्तव में विकलांग तो हम लोग हैं, जो कि सुन बोल सकते हैं अगर ये लोग चाहे तो पल भर में हमारा मजाक बना सकते हैं और हमें पता भी नही चलेगा।” रात 10 बजे तक काम करने वाली महिला वेटर को इन लोगों ने उनके घर तक सुरक्षित छोड़ने का इंतजाम किया हुआ है जबकि पुरुष वेटरों को ये नजदीक के बस या रेलवे स्टेशन पर छुड़वाते हैं।

इसके अलावा इनका कहना है कि अप्रैल में इनके यहां काम करने वाले स्टाफ चाहे वो रसोई में काम करता हो या बाहर, अगर अपना 1 साल पूरा कर लेगा तो ये उसे अपनी कंपनी के शेयर भी देंगे। जिसे वे 3 साल के बाद रिडिम करा सकते हैं। कंपनी में कुल 90 प्रतिशत निवेश प्रशांत,अनुज,शिशिर और रेड्डी ने किया है और 10 प्रतिशत इन्होंने दोस्तों से लिया है। प्रशांत और अनुज इसके को-फाउंडर और शिशिर और रेड्डी इसके एंजल निवेशक हैं। भविष्य की योजनाओं के बारे में प्रशांत का कहना है कि ये अगले 3 से 5 सालों के अंदर देश में 18 और दुबई, सिंगापुर और लंदन में एक एक रेस्टोरेंट खोलेंगे। जहां पर इनका सर्विस स्टाफ मूक बधिर ही होंगे। इस तरह ये करीब 600 ऐसे मूक बधिर लोगों को रोजगार उपलब्ध करायेंगे। अपनी योजनाओं को हकीकत में बदलने के लिए और निवेश की जरूरत पड़ेगी जिसके लिए इनकी बातचीत कई कंपनियों से चल रही है।

वेबसाइट : www.mirchiandmime.com