140 वर्षों में तमिलनाडु के इस सबसे भयंकर सूखे ने पूरे देश को चिंता में डाल दिया है

2015 में तमिलनाडु में 67 सेंटीमीटर की भरपूर बारिश हुयी थी, जो अपेक्षाकृत वर्षा से 53 प्रतिशत ज्यादा थी। इसके अलावा 2004 से 2012 तक, तमिलनाडु में लगातार 9 वर्षों तक सामान्य से अधिक वर्षा होती रही है। फिर भी, पानी की बहाली और झील के कायाकल्प परियोजनाओं के विफल रहने के कारण राज्य में गंभीर जल संकट उत्त्पन्न हो गया है।

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भूखे पशु, मानव निर्मित अराजकता, संसाधनों का अत्यधिक दोहन, खाली जेब और सूखे खेत के रूप में प्रकृति का कोप झेल रहे तमिलनाडु के किसानों ने खुद को अब भगवान भरोसे छोड़ दिया है। केंद्र और राज्य सरकार के विभिन्न उपायों के बावजूद अभी भी उन्हें राहत मिलनी शुरू नहीं हो पायी है...

दिल्ली में विरोध और भूख हड़ताल के दौरान एक किसान. छवि: अनिल शाक्य 
दिल्ली में विरोध और भूख हड़ताल के दौरान एक किसान. छवि: अनिल शाक्य 
सेवानिवृत्त 70 वर्षीय जोसफ की कहानी भीतर तक सोचने के लिए मजबूर करती है। पांच एकड़ जमीन की खेती से सम्मानजनक आजीविका के माध्यम से 50 वर्ष तक उन्हें और उनके परिवार को घर व पर्याप्त भोजन मिलता रहा है, लेकिन आज की तारीख में उन्हें जैविक खेती करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। तमिलनाडु के नागापतिनम जिले में बहुत कम वर्षा, मेकाडातु में बांध निर्माण और पाइप लाइन में पानी का स्तर कम होने के कारण जोसफ और जोसफ जैसे तमाम किसानों की ज़मीनें सूखी पड़ी हैं।

एक समय था जब जोसफ अपने क्षेत्र में चावल और जीरा के सबसे बड़े विक्रेता थे, लेकिन आज वे जीवित रहने के लिए अपनी नाममात्र की पेंशन पर निर्भर हैं। उनके पड़ोसी कुमार, अपने संयुक्त परिवार को बचाए रखने और अपनी 85 वर्षीय बीमार मां की देखभाल कर पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यहां तक ​​कि वे दुखी होकर बताते हैं, कि 'अगर हम कुआँ या बोरवेल खोदते हैं तो भी 16 फीट के बाद हमें केवल खारा पानी मिलता है।' एक किसान परिवार में जन्मे और पले-बढ़े, कुमार विभिन्न फसल तकनीकों से अच्छी तरह से वाकिफ हैं और उनके आम के लिए केरल और कर्नाटक के बाजारों में खरीदारों की लंबी कतारें लगती रही हैं। वर्तमान में, सालों से मानसून के लगातार ख़राब रहने के कारण, उनकी गायों के लिए पर्याप्त पानी नहीं बचा है। वे सरकार द्वारा दिए गए आश्वासनों पर आश्चर्य प्रकट करते हुए कहते हैं, 'उन्होंने कुछ समय पहले बीमा और राहत निधि देने का वादा किया था लेकिन अभी भी यह मृगतृष्णा जैसा ही है।'

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तमिलनाडु के किसानों ने अपने घाटे को पूरा करने के लिए केंद्र से 40,000 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की मांग की। वीडियो क्रेडिट: अनिल शाक्य
तमिलनाडु के किसानों ने अपने घाटे को पूरा करने के लिए केंद्र से 40,000 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की मांग की। वीडियो क्रेडिट: अनिल शाक्य

2015 में तमिलनाडु में 67 सेंटीमीटर की भरपूर बारिश हुयी थी, जो अपेक्षाकृत वर्षा से 53 प्रतिशत ज्यादा थी। इसके अलावा 2004 से 2012 तक, तमिलनाडु में लगातार 9 वर्षों तक सामान्य से अधिक वर्षा होती रही है। फिर भी, पानी की बहाली और झील के कायाकल्प परियोजनाओं के विफल रहने के कारण राज्य में गंभीर जल संकट उत्त्पन्न हो गया है।

पिछले चार सालों में, तमिलनाडु ने प्रकृति के प्रकोप को विभिन्न रूपों में भुगता है- 100 से अधिक वर्षों में चक्रवातों के साथ सबसे बुरी बारिश होने की वजह से, 2015 में इसने विनाशकारी बाढ़ को देखा और वर्तमान वर्ष में मानसून के खराब रहने की वजह से तमिलनाडु भयावह सूखे की मार झेल रहा है। पानी हमेशा से इस राज्य के लिए एक विवादास्पद विषय रहा है। अपने पानी की आवश्यकता के लिए अक्टूबर से दिसंबर तक तमिलनाडु उत्तर-पूर्व मानसून पर काफी हद तक निर्भर रहता है। 2016 के मानसून में राज्य में 10 दिन की देरी से आने के बाद यहाँ स्थानिक और अस्थायी वर्षा दर्ज की गई, जो की सामान्य बारिश से 62 प्रतिशत कम थी।

जलाशयों में उनकी क्षमता का केवल 20 प्रतिशत तक पानी रह गया है। सबसे बड़े सिंचाई बांध मेट्टूर में 93,470 एमसीएफटी के मुकाबले सिर्फ 120 फ़ीट पानी रह गया है, जबकि पीने के पानी वाले बांध पूंडी में 3,231 के मुकाबले केवल 35 फ़ीट पानी रह गया है। ये खतरनाक आंकड़े बड़े पैमाने पर फसल की विफलताओं के साथ किसानों को असहाय कर देते हैं और परिणामस्वरूप बढ़ते कर्ज से किसान आत्महत्या करने के लिए मज़बूर हो जाते हैं। हालांकि अकेले वर्षा की कमी को ही मौजूदा संकटों के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।

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सूखाग्रस्त विल्लुपुरम जिले में बारिश की कमी के चलते एक भी फसल पैदा करने के लिए संघर्ष करती मुथलक्ष्मी। इमेज क्रेडिट: MS Swaminathan Research
सूखाग्रस्त विल्लुपुरम जिले में बारिश की कमी के चलते एक भी फसल पैदा करने के लिए संघर्ष करती मुथलक्ष्मी। इमेज क्रेडिट: MS Swaminathan Research

उत्तर-पूर्वी मानसून की शुरुआत से ठीक पहले 2015 में एम एस स्वामिनाथन रिसर्च फाउंडेशन और वीए टेक WABAG की सलाह के तहत विल्लुपुरम जिले में कुओं के पुनुरुद्धार का कार्य किया गया। समय पर किये गए इस हस्तक्षेप से ये सुनिश्चित किया गया था, कि पुनुरुद्धार किये गए कुओं में बढ़ी हुई भंडारण क्षमता का पूर्ण उपयोग किया गया हो। नतीजतन, छः गांवों के 71 छोटे और सीमांत किसानों को लाभान्वित करने के लिए 45 खुले कुओं का पुनरुत्थान किया गया, जिससे कृषि क्षेत्र में तीन गुना वृद्धि हुई है। एम एस स्वामिनाथन रिसर्च फाउंडेशन के मीडिया संसाधन केंद्र की प्रमुख बी जयश्री कहती हैं, 'कम बारिश के बावजूद भी पिछले दो वर्षों से वो उस पानी का उपयोग करने में कामयाब हुए हैं। चाहे वो जल प्रबंधन का मामला हो या खेती की नई पद्धति अपनाना हो, किसान बदलाव को स्वागत हमेशा बहुत खुले मन से करते हैं। विज्ञान को समाज से जोड़ना होगा है।'

पूरे गांव में कुओं की पुनुरुद्धार परियोजना के बाद उनकी जल संचयन क्षमता ढाई गुना तक बढ़ गयी और इसने भूजल और सतह के जल भंडारण में योगदान किया। 
पूरे गांव में कुओं की पुनुरुद्धार परियोजना के बाद उनकी जल संचयन क्षमता ढाई गुना तक बढ़ गयी और इसने भूजल और सतह के जल भंडारण में योगदान किया। 

तकनीकी सुरक्षा कवच को अपनाया जाना चाहिए

किसानों के संकट में वृद्धि के साथ ही सरकार अब साल दर साल असफल फसलों के लिए खराब मानसूनों को दोषी नहीं ठहरा सकती है। उचित सिंचाई प्रणाली का अभाव और वैकल्पिक जल स्रोतों की उपलब्धता को एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों के अधिक से अधिक दोहन ने समुद्र के प्रवाह और हवा के स्वरूप में बदलाव किया है, जिस वजह से न केवल मानसून में देरी होती है, बल्कि ये अपर्याप्त बारिश का कारण भी बनता है। भारतीय किसान संघ के कंसोर्टियम के महासचिव पी चेंगल रेड्डी कहते हैं, 'कृषि क्षेत्र के साथ प्रौद्योगिकी के समन्वय की आवश्यकता है। जवानो के लिए रक्षा उपकरण लाने के साथ ही नरेंद्र मोदी को किसानों के लिए कृषि उपकरण भी लाना चाहिए।'

फोटो साभार: पदिककासु नागराज
फोटो साभार: पदिककासु नागराज

प्रौद्योगिकी और डेटा विश्लेषण के साथ ही न केवल सूखे का अनुमान लगाया जा सकता है, बल्कि फसल पर किसी भी प्राकृतिक आपदा के प्रभाव के स्तर का आकलन भी कर के किसानों को उनके संसाधनों और जमीन की उपलब्धता के अनुसार अनुकूलित समाधान प्रदान किया जा सकता है।

उपग्रह डेटा विश्लेषण करने वाली कंपनी Satsure के संस्थापक अभिषेक राजू कहते हैं, कि 'उपग्रह डेटा के माध्यम से आप पौधों में पानी की वास्तविक उपलब्धता की गणना कर सकते हैं, फसलों की स्थति का निर्धारण कर सकते हैं और तनावग्रस्त और गैर-तनावग्रस्त क्षेत्रों की पहचान कर सकते हैं और तदनुसार अपनी सिंचाई का समय और मात्रा निर्धारित कर सकते हैं।' एक पूरी मांग और आपूर्ति श्रृंखला को बड़े आंकड़ों के जरिये तैयार किया जा सकता है, जिससे सरकार और कृषि समाज को संभावित सूखा के लिए अग्रिम रूप से तैयार किया जा सके। एनसीआरबी की रिपोर्ट में 'दिवालियापन या कर्ज' और 'पारिवारिक समस्या' को किसान आत्महत्याओं के प्रमुख कारणों के रूप में चिह्नित किया गया है।

कर्ज़ माफी और सूखे की समस्या का समाधान नहीं है

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, 2015 में 606 किसानों ने आत्महत्या कर ली थी और इसका प्रमुख कारण 'दिवालियापन या क़र्ज़' और 'पारिवारिक समस्याएं' थीं। ऐसा दावा किया जा रहा है कि वर्तमान संकट ने कथित तौर पर अक्टूबर, 2016 से 144 से अधिक किसानों के जीवन का अंत कर दिया है। हालांकि, राज्य सरकार ने कर्ज को इसके एक कारण के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया है और सर्वोच्च न्यायालय में सौंपे गए हलफनामे में उन्होंने कहा है कि 'व्यक्तिगत कारणों' के कारण किसानों की मृत्यु हुयी है।

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एआईएडीएमके सरकार ने वृद्धावस्था, दिल का दौरा, लम्बी बीमारियों और अन्य अन्य कारणों से मरने वाले किसानों के लिए 'मानवीय आधार' पर 3 लाख रुपये की राशि दी थी। उस सरकार द्वारा वर्ष 2016-17 में ड्रिप सिंचाई परियोजना के लिए 4,000 करोड़ रुपए और फसलों के ऋण के लिए 2,000 करोड़ रुपये स्वीकृत किए थे। हालांकि, नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फण्ड (एनडीआरएफ) से 39,565 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की उनकी मांग अनसुनी कर दी गयी थी और कृषि संकट को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने सिर्फ 4 प्रतिशत, 1,712.10 करोड़ रुपये की राशि ही जारी की। केंद्र सरकार के उदासीन रवैये के बाद, 100 किसानों ने 41 दिन के लिए नई दिल्ली में जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर आकर्षित करने के लिए किसानों ने अपने विरोध प्रदर्शन में विभिन्न नाट्यक्रमों को भी शामिल किया। नई दिल्ली में किसान विरोध का नेतृत्व करने वाले अय्याकन्नू कहते हैं, 'हम भी भाजपा सरकार से चुनावों के दौरान किए गए एमएस स्वामिनाथन समिति की रिपोर्ट के कार्यान्वयन के वादे को पूरा करने का अनुरोध करते हैं।' प्रो एमएस स्वामिनाथन ने सूखे के दीर्घकालिक और स्थायी समाधान के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य और उत्पादन की कुल लागत के 50 प्रतिशत और अनुशंसित मूल्य निर्धारण और खरीद के सिद्धांत पर आधारित नीति के कार्यान्वयन के लिए वकालत की है।

तमिलनाडु के एक किसान ने विरोध में प्रतीकात्मक रूप से मरने की भूमिका निभाई, जबकि अन्य लोग शोक प्रकट करते हुए, फोटो: protest_street
तमिलनाडु के एक किसान ने विरोध में प्रतीकात्मक रूप से मरने की भूमिका निभाई, जबकि अन्य लोग शोक प्रकट करते हुए, फोटो: protest_street

प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना जैसी विभिन्न योजनाओं के बावजूद भारत में फसल बीमा की उपलब्धता केवल 23 प्रतिशत है और ये विशाल अंतर देश के 26 करोड़ से अधिक किसानों के लिए खतरनाक और चिंताजनक है।

केवल क़र्ज़ माफी ही इस आसन्न संकट का समाधान नहीं है। 60 फीसदी किसान जिनके पास 1-2 हेक्टेयर जमीन है उनके जीवनयापन के लिए पर्याप्त है। वे अत्यधिक दर पर बैंकों के अलावा अन्य स्रोतों से ऋण लेते हैं। इसलिए ऋण माफी का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि पैसा उधार देने वाले किसी महाजन से ये कहने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। अभिषेक कहते हैं, 'बीमा हमारा सुरक्षा कवच है। किसानों की उपेक्षा करके उन्हें कोने में धकेल दिया जाता है, क्योंकि उनके पास सही समय पर आवश्यक सरकारी सहायता नहीं होती है।' प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना जैसी विभिन्न योजनाओं के बावजूद भारत में फसल बीमा की उपलब्धता केवल 23 प्रतिशत है और यs विशाल अंतर, 26 करोड़ से अधिक किसानों के लिए खतरनाक है।

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उचित जोखिम निर्धारण प्रणाली के प्रावधान से बीमा कंपनियों और किसानों दोनों को फायदा होगा। उपग्रह के द्वारा बड़े आंकड़ों, क्लाउड कंप्यूटिंग और आईओटी तकनीक के माध्यम से किसान, फसल के स्तर का आकलन कर सकता है और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार फसलों की खेती करने की योजना बना सकता है। बदले में ये किसी भी किसान के जोखिमों के अनुरूप बीमा कंपनियों को बेहतर अनुबंध तैयार करने में सहायता करेगा। अभिषेक कहते हैं, 'जब तक आप नीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ प्रौद्योगिकी का सम्यक इस्तेमाल नहीं करेंगे, तब तक चीजें आगे नहीं बढ़ेंगी।'

-श्रुति केड़िया

अनुवाद: प्रकाश भूषण सिंह

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