पानी मांगने पर क्यों पिया था बाबा नागार्जुन ने खून का घूंट

बाबा नागार्जुन की ज़िंदगी से जुड़ी एक सच्ची घटना, जो करेगी सोचने पर मजबूर...

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महान साहित्यकारों के साथ बीते, भूले-बिसरे वाकये यदा-कदा सुदूर भविष्य में भी स्थायी विरासत की तरह प्रेरणा और जनजागरण का सबब बने रहते हैं। ऐसा ही एक वाकया 'जमनिया का बाबा' के प्रसिद्ध कवि-लेखक बाबा नागार्जुन के जीवन से जुड़ा है। यह सच्ची घटना हमे अंधेरे समय में देश-समाज के लिए जूझने और जीने की राह दिखाती है।

महान साहित्यकारों के साथ बीते, भूले-बिसरे वाकये यदा-कदा सुदूर भविष्य में भी स्थायी विरासत की तरह प्रेरणा और जनजागरण का सबब बने रहते हैं। ऐसा ही एक वाकया 'जमनिया का बाबा' के प्रसिद्ध कवि-लेखक बाबा नागार्जुन के जीवन से जुड़ा है। यह सच्ची घटना हमे अंधेरे समय में देश-समाज के लिए जूझने और जीने की राह दिखाती है।

यह वाकया यशस्वी कवि नागार्जुन पर स्वयं बीता है। उस घटनाक्रम को ही आधार बनाकर बाबा नागार्जुन ने बाद में 'जमनिया का बाबा' नाम से एक अविस्मरणीय कृति का सृजन किया। घटनाक्रम इस प्रकार है। नागार्जुन उन दिनों जीवन की यायावरी में रमे हुए थे। एक दिन गोरखपुर जिले के देहात अंचल में पहुंचे। जिन लोगों के बीच उनके दीन बीत रहे थे, वे लोग पीने के पानी के लिए तरस रहे थे। न पीने योग्य प्रदूषित पानी से अपना काम चलाने को विवश थे। लोगों ने यह आपबीती जब नागार्जुन को सुनाई तो वह उस अंचल के एक आश्रम पर जा धमके। उस वक्त आश्रम के साधु का प्रवचन चल रहा था। नागार्जुन ने श्रद्धालुओं के बीच खड़ा होकर साधु को ललकारते हुए कहा- 'क्यों रे, तू ने यहां लोगों की जमीन पर धनबल से मठ बना लिया है। ठाट से मसनद पर बैठकर प्रवचन कर रहा है, चेले-चपाटी तुझे चंवर डुला रहे हैं और इस इलाके के लोग पीने के लिए एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। तू अपनी अकूत संपत्ति से कुछ धन खर्च कर यहां की जनता के लिए पेय जल की व्यवस्था नहीं करा सकता?'

साधु का मौन इशारा पाकर उसके चेले-चपाटी नागार्जुन को लोगों के बीच से खींच ले गए। बंधक बनाकर उन्हें इतना मारा कि वह बेहोश हो गए। उधर, बीच में ही प्रवचन खत्म करने के बाद साधु भी बेहोश नागार्जुन पर नजर गड़ाए रहा, साथ ही उसने अपने चेलों से कहा कि होश आते ही इसका दवा-इलाज कराओ, खूब खान-पान से सेवा सुश्रुषा करो, यह तो कोई पहुंचा हुआ फकीर लगता है। नागार्जुन होश में आए तो देखा, उनके सामने फल और पकवान रखे हुए हैं। दर्द से कराहते हुए उन्होंने सोचा, अगर वह यहां और रुके तो साधु के चेले फिर मारेंगे, उनकी जान ही ले लेंगे। उनकी नजरों से बच-बचाकर नागार्जुन वहां भाग निकले और सीधे गोरखपुर के तत्कालीन डीएम के दफ्तर पर पहुंच गए। उन्हें आपबीती सुनाई और कहा कि उस साधु को तुरंत गिरफ्तार कराइए।

डीएम ने कहा- सीधे कार्रवाई करने पर साधु के समर्थक बवाल कर सकते हैं। यदि ऊपर से ऐसा आदेश करा दें तो कार्रवाई के बाद मेरी नौकरी बची रह जाएगी। उन दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री संपूर्णानंद थे। नागार्जुन ने कहा, मुख्यमंत्री को फोन मिलाइए। स्वयं डीएम ने मुख्यमंत्री को फोन मिलाकर रिसीवर नागार्जुन को पकड़ा दिया। संपूर्णानंद नागार्जुन से सुपरिचित थे। उन्होंने नागार्जुन से सारा वाकया जानने के बाद डीएम को तुरंत कार्रवाई का आदेश दे दिया। डीएम के निर्देश पर जिले के कप्तान फोर्स लेकर आश्रम पर पहुंच गए और साधु को उसके हमलावर चेले-चपाटियों समेत गिरफ्तार कर लिया।

जब पुलिस ने मामले की छानबीन की तो पता चला कि वह साधु तो नेपाल से भागा हुआ खतरनाक बदमाश था, जो वेश बदलकर भारत में वर्षों से छिपा हुआ था। इस तरह एक बड़े साहित्यकार के साहस ने समाज के लिए एक पंथ, दो काज कर दिया। साधु वेशधारी खूंख्वार बदमाश के आतंक से पूरे इलाके को मुक्ति मिली और अनजान भारत-नेपाल पुलिस के हाथों वह बिना खोजबीन पकड़ा गया। यह घटना नागार्जुन ने बुजुर्ग कवि माहेश्वर तिवारी को सुनाई थी, जिन्होंने पिछले दिनों मुझे बताया। इस घटनाक्रम को ही केंद्र में रखकर नागार्जुन ने 'जमनिया का बाबा' की रचना की थी।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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