कॉलेज का माली अपनी काबिलियत के दम पर बना अपने ही कॉलेज का प्रिंसिपल 

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48 वर्षीय ईश्वर सिंह जिन्हें शुरुआती दिनों में कॉलेज में बतौर माली, वॉचमैन और सुपरवाइजर के रूप में काम करना पड़ा था, अब वह अपनी कठोर परिश्रम और मेहनत के बदौलत उसी कॉलेज में प्रिंसिपल हैं। 

ईश्विर सिंह, फोटो साभार: सोशल मीडिया
ईश्विर सिंह, फोटो साभार: सोशल मीडिया
 साल 1989 में अपनी ग्रेजुएशन की डिग्री ले कर उन्होंने एक कॉलेज में बतौर क्राफ्ट टीचर ज्वाइन किया और रात में इसी कॉलेज में वॉचमैन की नौकरी भी करने लगे। 

उन्हें प्रेरणादायक कहानियां पढ़ने और प्रेरित करने वाले भाषण सुनने का बहुत शौक है। 1998 में उनकी शादी कृति सिंह से हो गई। आज उनके दो बेटे केतन और सीमांचल सिंह हैं। 

कहते हैं जिन्दगी जीने का असली मजा तब आता है जब औरों के लिए आपकी जिन्दगी मिसाल बन जाए। छत्तीसगढ़ के ईश्वर सिंह उन्हीं लोगों में से एक हैं जो अपनी काबिलियत के दम पर उस कॉलेज के प्रिंसिपल बन गए जहां वे माली का काम करते थे। जो इंसान सदैव अपने लक्ष्य का पीछा करता रहता है, मंजिल खुद उसे तलाश कर उसके पास आती है। 48 वर्षीय ईश्वर सिंह जिन्हें शुरुआती दिनों में कॉलेज में बतौर माली, वॉचमैन और सुपरवाइजर के रूप में काम करना पड़ा था, अब वह अपनी कठोर परिश्रम और मेहनत के बदौलत उसी कॉलेज में प्रिंसिपल हैं। वे 2005 से इस पद पर काम कर आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं।

परिवार में आर्थिक तंगी को देखते हुए वे अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर 19 वर्ष के उम्र में ही छत्तीसगढ़ के बैतलपुर के पास अपना गांव घुटिया को छोड़ कर नौकरी की तलाश में भिलाई आ गये थे। यहां उन्होंने बतौर सेल्समैन एक कपड़े के दुकान में 150 रूपये मासिक बेतन पर काम करना शुरू कर दिया। उनके भीतर पढ़ने की ललक थी, अपनी इस ललक को पूरा करने के लिए वे अपनी आमदनी के कुछ हिस्से बचा कर पढाई में खर्च करते थे। इन बचाए गए पैसों से उन्होंने वर्ष 1985 में एक कॉलेज में बी.ए में एडमिशन लिया और माली का काम भी देखने लगे। पढ़ाई के दौरान उन्होंने अपना खर्च चलाने के लिए कभी माली तो कभी पार्किंग में स्टैंड पर तो कभी कंस्ट्रक्शन साईट पर सुपरवाइजर जैसी कई छोटी-मोटी नौकरियां भी की।

ईश्वर सिंह कहते हैं, 'मुझे प्रोफेसर टी.एस ठाकुर (जो उस वक्त कॉलेज के प्रिसिपल थे) पी.के श्रीवास्तव (एच.ओ.डी एजुकेशन), डॉ. एच.एन दुबे (एच.ओ.डी केमेस्ट्री) और जे.पी मिश्रा का पूर्ण सहयोग मिला है। मुझे जबलपुर एजुकेशन कॉलेज से दो बार बी.एड करने का अवसर प्राप्त हुआ था लेकिन आर्थिक तंगी के वज़ह से वहां ज्वाइन करने में असमर्थ रहा।' साल 1989 में अपनी ग्रेजुएशन की डिग्री ले कर उन्होंने एक कॉलेज में बतौर क्राफ्ट टीचर ज्वाइन किया और रात में इसी कॉलेज में वॉचमैन की नौकरी भी करने लगे। उनकी मेहनत और लगनशीलता को परखते हुए कॉलेज समिति ने उन्हें बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त कर दिया। कुछ समय बाद उन्होंने एक कॉलेज से बी.पी.एड किया और उसके बाद एम.एड कर उन्होंने एम.फिल भी किया।

ईश्वर सिंह को बचपन से ही सिक्योरिटी फोर्सेज में ज्वाइन करने का सपना था, इसके लिए उन्होंने कई टेस्ट और फिजिकल एग्जाम भी पास किये परन्तु पूर्ण रूप से सफलता हासिल न हो सकी, लेकिन वे अपनी असफलता से कभी हतोत्साहित नही हुए। उन्हें प्रेरणादायक कहानियां पढ़ने और प्रेरित करने वाले भाषण सुनने का बहुत शौक है। 1998 में उनकी शादी कृति सिंह से हो गई। आज उनके दो बेटे केतन और सीमांचल सिंह हैं। कॉलेज समिति के सदस्यों ने उनकी एकाग्रता और लगनशीलता के साथ ही साथ उनके डिग्री को ध्यान में रखते हुए उन्हें छत्तीगढ़ के अहेरी स्‍थित कॉलेज कल्याण शिक्षा महाविद्यालय में वर्ष 2005 में प्रिंसिपल की कुर्सी सौंप दी।

ईश्वर सिंह अपनी इस सफलता का श्रेय कॉलेज प्रशासन को देते हुए कहते हैं कि इस बुलंदी पर पहुचाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आज के दौर में बेरोजगारी के दंश झेल रहे युवाओं के लिए ईश्वर सिंह की जीवन गाथा पर एक झलक डालने की जरूरत है जो अपने आप में एक मिशाल है। अपनी मंजिल को पाने की चाहत रखने वाले लोगों को इनसे से यह सीख लेनी चाहिए कि हमे अपनी वर्तमान कठिनाइयों से बिना घबराए हुए सदैव अपने धुन में इमानदारी से अपनी मंजिल की ओर कदम बढाते रहना चाहिए।

-प्रस्तुति: उत्पल आनंद

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