गरीब महिलाओं के लिए प्रेरणा और उम्मीद की रोशनी हैं ‘चेतना’

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‘मान देसी फाउंडेशन’ की संस्थापक हैं ‘चेतना’ ...

1997 में की मान देसी बैंक की स्थापना...

महिलाओं के लिए चला रहीं हैं कई कल्याणकारी योजनाएं...


महाराष्ट्र के सतारा जिले की मसवाड गांव की महिलाओं का एक झुंड रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अफसरों के सामने बैठा था। इनकी मांग थी कि उनको बैंक चलाने के लिए लाइसेंस दिया जाये। हालांकि इस मांग को ये अफसर छह महीने पहले ही ठुकरा चुके थे क्योंकि तब इन महिलाओं का कहना था कि वो अनपढ़ हैं इसलिए बैंकिग के काम के लिए अंगूठे के निशान को मंजूर किया जाये। जिसे इन अफसरों ने सिरे से नकार दिया था। इसके बाद ये महिलाएं एक बार फिर एकजुट हुई और इनमें से एक महिला ने बैंक अफसर से कहा कि तुमने हमारे बैंकिंग लाइसेंस की मांग इसलिए ठुकरा दी थी कि हम अनपढ़ हैं लेकिन आज हम पढ़ लिख कर यहां बैठी हैं। उन्होने अफसरों से ये भी कहा कि अगर वो अनपढ़ हैं तो इसके लिए वो जिम्मेदार नहीं हैं क्योंकि यहां पर कोई स्कूल नहीं हैं जहां वो पढ़ने जा सकें। इतना ही नहीं इन महिलाओं ने बैंक के अफसरों को चुनौती दी और उनसे कहा कि वो हमें बताये कि कितने मूलधन पर कितना ब्याज निकालना है साथ ही अपने कर्मचारी को भी ऐसा करने को कहें उसके बाद देखें कि कौन सही और जल्दी इसका हल निकाल सकता है।

चेतना , मसवाड गांव की महिलाओं के साथ
चेतना , मसवाड गांव की महिलाओं के साथ

महिलाओं में ये भरोसा देख चेतना विजय सिन्हा को उस वक्त पता चल गया था कि उन्होने महिलाओं के विकास के लिए जो संगठन ‘मान देसी फाउंडेशन’ बनाया है वो उनका सही फैसला था। छह महिने पहले ये महिलाएं उदास हो गई थी लेकिन तब से चीजें बदली। इस तरह साल 1997 में मान देसी बैंक की स्थापना हुई। ये एक कॉओपरेटिव बैंक है जो महिलाओं के लिए, महिलाओं द्वारा चलाया जाता है। ये महाराष्ट्र के चुनिंदा माइक्रो फाइनेंस बैंक में से एक है।

चेतना का जन्म मुंबई में हुआ था लेकिन शादी के बाद उनको अपने पति विजय सिन्हा के साथ मसवाड गांव में आकर रहना पड़ा। चेतना के लिए उनकी जिंदगी में सार्वजनिक और सामाजिक कारणों ने हमेशा खास जगह बनाई। असल में उनकी और उनके पति की मुलाकात जयप्रकाश नारायण आंदोलन के दौरान ही हुई थी। हालांकि उनका शहर से एक गांव तक का सफर काफी दिक्कतों वाला रहा। चेतना ने पहली बार देखा कि गांव में सार्वजनिक परिवहन के लिए लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता है इतना ही नहीं गांव में बिजली ना रहना आम बात थी। तो वहीं दूसरी ओर चेतना मुंबई में पली बढ़ी थीं इसलिए गांव की जिंदगी उनके लिए काफी अलग थी। शादीशुदा महिला होने के नाते लोग उनसे उम्मीद करते कि वो मंगलसूत्र पहने लेकिन वो नारीवादी आंदोलन से जुड़ी थी इसलिए उन्होने कभी भी मंगलसूत्र नहीं पहना। गांव वालों के लिए ये बिल्कुल नई चीज थी वो अक्सर चेतना को पारंपरिक कपड़े पहनने के लिए दबाव डालते। लेकिन चेतना का मानना था कि एक ना एक दिन समाज उनको वैसे ही स्वीकार करेगा जैसी वो हैं। तभी तो आज वो महाराष्ट्र के उस छोटे से कस्बे का हिस्सा हैं। खासतौर से तब से जब उन्होने मान देसी फाउंडेशन की नींव रखी।

चेतना सिन्हा, मसवाड गांव, महाराष्ट्र
चेतना सिन्हा, मसवाड गांव, महाराष्ट्र

दरअसल एक नये अध्याय की शुरूरात साल 1986-87 में तब शुरू हुई जब संसद ने पंचायती राज बिल में कुछ संसोधन किये। जिसके बाद पंचायतों में 30 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं को दिया जाने लगा। चेतना ने गांव की महिलाओं को इसके प्रति जागृत किया और जल्द ही उनके लिए एक फाउंडेशन की शुरूआत की जहां पर महिलाओं को स्थानीय स्वशासन के कामकाज की जानकारी दी जाने लगी। चेतना बताती हैं, 

एक दिन मेरे पास कांता अमनदास नाम की एक महिला आई और उनसे कहा कि वो अपनी कुछ जमा पूंजी बैंक में जमा करना चाहती हैं लेकिन बैंक ने उनका एकाउंट खोलने से मना कर दिया है। इस बात से मुझे काफी आश्चर्य हुआ। मैंने कांता बाई के साथ बैंक जाने का फैसला किया। मुझे बैंक ऑफिसर ने बताया कि वो कांता का अकाउंट इसलिए नहीं खोल सकते हैं क्योंकि उनकी पूंजी काफी कम है। बैंक अफसर की बात सुन मुझे काफी अजीब लगा और तब मैं ये सोचने पर मजबूर हुईं कि ऐसे में छोटी बचत करने वाली महिलाएं कहां पर अपने पैसे को सुरक्षित रखें।

उसी समय चेतना ने फैसला लिया कि वो ऐसी महिलाओं के लिए बैंक खोलेंगी ताकि कांता बाई जैसी दूसरी महिलाओं को परेशानी ना हो। चेतना का कहना है कि गांव की महिलाएं भी इस काम में मदद देने के लिए तैयार हो गई लेकिन उनको ऐसे मौके का इंतजार था। तब चेतना और बैंक कर्मचारियों को एक और दिक्कत का सामना करना पड़ा और वो था कि महिलाएं अपनी दैनिक मजदूरी की जगह बैंक जाकर अपना समय खराब नहीं करना चाहती थी। इस समस्या से निपटने के लिए मान देसी ने घर घर जाकर बैंकिंग सेवाएं देने का फैसला लिया। इसके बाद अगला कदम ये था कि महिलाएं अपने साथ बैंक की पासबुक रखे। क्योंकि ऐसा करने से उनके पति जान जाएंगे कि उनके पास कितना पैसा है और वो उस पैसे को शराब में खर्च कर देंगे। इस स्थिति से निपटने के लिए मान देसी ने स्मार्ट कार्ड जारी किये और जल्द ही महिलाओं को कर्ज देने का काम शुरू कर दिया गया।

एक दिन गांव की एक महिला केराबाई बैंक में आई और उनसे सेल फोन खरीदने के लिए कर्ज देने की मांग की। जिसके बाद बैंक अफसरों को लगा कि शायद केराबाई के बच्चे उनको अपने लिये नया फोन खरीदने के लिए मजबूर कर रहे हैं इसलिए वो कर्ज मांग रही हैं लेकिन केराबाई ने कहा कि वो बच्चों के लिए नहीं बल्कि अपने लिए फोन खरीदना चाहती हैं क्योंकि वो बकरियों को चराने के लिए कई बार दूर निकल जाती हैं ऐसे में उनको अपने परिवार वालों से बात करने की जरूरत होती है। इस बातचीत के दौरान केराबाई ने चेतना से फोन के इस्तेमाल के बारे में भी जानकारी ली। तब चेतना ने सोचा कि क्यों ने ऐसी महिलाओं के लिए एक बिजनेस स्कूल खोला जाए। उस दौरान उन्होने देखा की कई महिलाएं अनपढ़ हैं तब मान देसी फाउंडेशन ने महिलाओं को शिक्षित करने के लिए ऑडियो विजुअल का सहारा लिया और जल्दी ही महिलाओं के लिए अलग से रेडियो स्टेशन स्थापित हो गया।

आज ये संगठन ग्रामीण महिलाओं को कारोबार स्थापित करने में भी मदद करता है। चेतना का कहना है कि ये महिलाएं उनकी टीचर हैं क्योंकि इनसे उन्होने हर रोज काफी कुछ सीखा है। सागर बाई एक ऐसी महिला जिन्होने चेतना को दृढ़ संकल्प और साहस का जबरदस्त पाठ पढ़ाया है। सागर बाई ने पांचवी तक पढ़ाई करने के बाद चाय की एक दुकान चलाई। अब सागर बाई एक साईकिल चाहती हैं ताकि वो अपने गांव से दूर स्कूल में जाकर पढ़ाई को एक बार फिर शुरू कर सके। सागर बाई का हवाला देते हुए चेतना बताती हैं कि हमारी मदद से उन्होने चाय की एक दुकान खोली और एक दिन पुलिस उनको इसलिए पकड़ कर ले गई क्योंकि वो अपनी दुकान में घरेलू गैस का सिलेंडर इस्तेमाल कर रही थीं। वो दो दिन तक पुलिस हिरासत में रहीं। तब हमने सोचा कि वो इस दौरान टूट गई होंगी और दोबारा वो इस काम को शुरू नहीं करेंगी लेकिन जब वो छूट कर आई तो उन्होने कहा कि वो फिर से इस काम को शुरू करेंगी और इस बार वो कॉमर्सियल गैस का इस्तेमाल कर अपने कारोबार से लाभ उठाएंगी।

जानवरों के लिए कैम्प, मसवाड गांव, महाराष्ट्र
जानवरों के लिए कैम्प, मसवाड गांव, महाराष्ट्र

आज यहां हार्वर्ड और येल विश्वविद्यालय के छात्र उनके बिजनेस मॉडल को सीखने के लिए आते हैं। कारोबार और व्यावसायिक प्रशिक्षण देने के अलावा मान देसी महिलाओं को कर्ज देने का काम भी करती है। फिर चाहे हाई स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियां को साइकिल खरीदने के लिए कर्ज चाहिए हो। चेतना बताती है कि एक दिन केराबाई अपने आभूषण बैंक में गिरवी रखने के लिए आई। जब उन्होने केराबाई से पूछा कि वो ऐसा क्यों कर रही हैं तो उन्होने कहा कि ऐसा करके वो अपने पशुओं के लिए चारे का इंतजाम कर सकती हैं क्योंकि इस बार सूखा पड़ा है और खेतों में चारे का कोई इंतजाम नहीं है। इसके बाद केराबाई ने उनसे गुस्से में कहा कि वो पढ़ने और पढ़ाने के अलावा क्या उनको अपने आसपास के हालात दिखाई नहीं देते? तब चेतना ने उनसे इस बात का मतलब जानना चाहा। तो केराबाई ने बताया कि इस पूरे इलाके में पानी नहीं है और वो अपने गहने गिरवी रखेंगी तो क्या बदले में वो उनको पानी देंगी। केराबाई ने कहा कि सारी नदियां और तालाब सूख गये हैं कहां से वो अपने पशुओं को पानी पिलाएं। उन्होने कहा कि आप पूरी दुनिया घूमती हैं तो क्या आप इतनी साधारण सी चीज भी नहीं जानती कि बिना पानी के पशु कैसे जिंदा रहेंगे। केराबाई को सुनने के बाद उस रात चेतना सो नहीं सकीं। तब चेतना ने अपनी पति से इस बारे में बात की। इसके बाद अगले दिन उन्होने पशुओं को पानी पिलाने के लिए के लिए कैंप का आयोजन किया लेकिन तब चेतना नहीं जानती थी कि वो पशुओं के लिए चारा और पानी का इंतजाम कैसे करेंगी, लेकिन लोगों ने उनके इस काम में मदद की और एक महीने के अंदर 7000 हजार किसान और 14 हजार जानवर उनके इस कैंप में आए। ये सतारा जिले के मान ताल्लुका का सबसे बड़ा कैंप था। लोगों ने पानी के लिए नये कुएं खोदे और कैंप में हर रोज ट्रकों के जरिये दूर दराज से चारा आने लगा। चेतना का कहना है कि इस दौरान उनको हर तरफ से भरपूर समर्थन मिला। लोगों के समर्थन का ही नतीजा था कि चेतना को ये कैंप करीब डेढ़ साल तक चलाना पड़ा।

इस तरह एक दिन एक गर्भवती महिला उनके कैंप में आई जिसको देखकर चेतना काफी घबरा गई क्योंकि वो कोई जोखिम नहीं लेना चाहती थी। इसलिए उन्होने उस गर्भवती महिला और उसकी मां से अपने गांव लौट जाने को कहा। तो उस महिला ने बताया कि उनके गांव में पानी नहीं है। किसी तरह उस महिला ने जानवरों के उस कैंप में बच्चे को जन्म दिया। चेतना का कहना है कि वो अपने को तर्कवादी मानती थीं लेकिन उस दिन उन्होने देखा कि बच्चे के जन्म के बाद खूब बारिश हुई। तब वहां मौजूद लोगों ने फैसला लिया की उस बच्चे का नाम मेघराज रखा जाए। इस घटना के बाद कैंप का वातावरण एक दम से बदल गया। तब वहां मौजूद एक किसान बोला कि इस बच्चे का जन्म बड़ी बुरी स्थिति में हुआ है लेकिन वो हमारे लिए बारिश लेकर आया है तो हम इस बच्चे को क्या उपहार दे सकते हैं। तब बैंक की सीईओ रेखा ने कहा कि हर कोई 10 रुपये देगा और एक घंटे के अंदर बच्चे के नाम से 70 हजार रुपये इकट्ठा हो गए। जिसके बाद फाउंडेशन ने 30 हजार रुपये अपनी ओर से मिलाकर उस बच्चे के नाम 1 लाख रुपये की एफडी कर दी।

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