भारत का ऐसा राज्य जहां आज भी संदेश भेजने वाले कबूतरों की विरासत जिंदा है

कबूतरों से संदेश भेजने की गौरवशाली परंपरा ओडिशा में आज भी ज़िंदा है... 

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आज इंस्टैंट मैसेजिंग के जमाने में हम पूरी दुनिया में कहीं भी सेकेंडों में संदेश भेज सकते हैं। लेकिन जब मोबाइल फोन नहीं हुआ करते थे तो कबूतरों से संदेश भिजवाया जाता था। इस परंपरा को जीवित रखने के लिए ओडिशा पुलिस प्रतीकात्मक तौर पर कबूतरों से समय-समय पर संदेश भिजवाया करती है।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
कबूतरों से संदेश भेजने की गौरवशाली परंपरा ओडिशा में 1946 में शुरू हुई थी। तब भारतीय सेना ने राज्य की पुलिस को 200 कबूतर दिए थे। इन कबूतरों से दूरस्थ इलाकों में संदेश भिजवाया जाता था।

दुनियाभर में आज भी कई सारी परंपराएं ऐसी हैं जिनके बारे में सुनकर आपको हैरानी होगी। खासतौर पर भारत जैसे विविधता वाले देश में तो न जाने कितने रीति-रिवाज आज भी जीवित हैं। कबूतरों से संदेश भेजने का काम ऐसा ही एक काम है जो आज भी भारत के ओडिशा राज्य में पुलिस द्वारा किया जा रहा है। आज इंस्टैंट मैसेजिंग के जमाने में हम पूरी दुनिया में कहीं भी सेकेंडों में संदेश भेज सकते हैं। लेकिन जब मोबाइल फोन नहीं हुआ करते थे तो कबूतरों से संदेश भिजवाया जाता था।

फिल्मों और किस्से-कहानियों में कबूतरों से संदेश भिजवाने की बातें सुनने को मिलती थीं। लेकिन हकीकत में भी ऐसा होता था इसकी कल्पना कर पाना थोड़ा मुश्किल होता था। लेकिन ये हकीकत आज भी विरासत के तौर पर जीवित है। इस परंपरा को जीवित रखने के लिए ओडिशा पुलिस प्रतीकात्मक तौर पर कबूतरों से समय-समय पर संदेश भिजवाया करती है।

पिछले हफ्ते शनिवार को 50 कबूतरों को भुवनेश्वर के कटक के लिए भेजा गया। कबूतरों ने 25 किलोमीटर की दूरी सिर्फ 20 मिनट में तय कर ली। कबूतरों से संदेश भेजने की गौरवशाली परंपरा ओडिशा में 1946 में शुरू हुई थी। तब भारतीय सेना ने राज्य की पुलिस को 200 कबूतर दिए थे। इन कबूतरों से दूरस्थ इलाकों में संदेश भिजवाया जाता था। संदेश को एक सादे कागज पर लिखा जाता था और उसे मोड़कर कबूतर के पैरों में बांध दिया जाता था। इससे जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा भी है। 13 अप्रैल 1948 को तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ओडिशा के दौरे पर थे।

उन्होंने संबलपुर से कटक में तैनात अधिकारियों को कबूतर से संदेश भेजा कि कटक में होने वाली सभा में दर्शक और वक्ताओं के बैठने की व्यवस्था अलग-अलग नहीं होनी चाहिए। उस वक्त इन इलाकों में टेलीफोन लाइन भी नहीं थी तो अर्जेंट और जरूरी संदेश भिजवाने का काम कबूतरों के जरिए ही किया जाता था। यह सेवा राज्य में सबसे पहले कोरापुट जिले में शुरू हुई थी जिसे बाद में सभी जिलों तक लागू कर दिया गया। कटक में जब पुलिस हेडक्वॉर्टर बनाया गया तो वहीं पर इन कबूतरों का ब्रीडिंग सेंटर भी स्थापित किया गया।

कबूतरों के साथ पुलिस
कबूतरों के साथ पुलिस

ये कबूतर सामान्य कबूतरों की प्रजाति से थोड़े अलग होते हैं। इन्हें बेल्जियन होमर कबूतर के नाम से जाना जाता है। ये 25 किलोमीटर का सफर सिर्फ 15-20 मिनट में तय कर लेते हैं। मौसम केो मुताबिक ये 500 मील तक का सफर कर सकते हैं। इनकी गति 55 किलोमीटर प्रति घंटे होती है। जब ये छह हफ्ते के होते हैं तभी इनकी ट्रेनिंग शुरू हो जाती है। एक बार रास्ते की पहचान कर लेने के बाद ये कभी नहीं भूलते। इनकी देखरेख करने वाले कॉन्स्टेबल इनसे काफी परिचित हो जाते हैं और कबूतर इनकी आवाज सुनकर इन्हें पहचान लेते हैं।

इन्होंने कई बार मुश्किल के घड़ी में पुलिस का साथ दिया है। ओडिशा में 1982 में जब भीषण बाढ़ आई थी तो सारी टेलीफोन लाइनें ध्वस्त हो गई थीं। उस वक्त यही कबूतर थे जिन्होंने एक विभाग से दूसरे विभाग तक संदेश पहुंचाया। इसके अलावा 199 में सुपर साइक्लोन के दौरान सारी रेडियो सेवाएं ठप हो गई थीं। तब इन कबूतरों ने पुलिस का काफी साथ निभाया था। आज वॉट्सऐप और विडियो कॉलिंग के दौर में इस विरासत को सहेजकर रखने के लिए इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट्स ऐंड कल्चरल हेरिटेज (INTACH) ने एक कार्यक्रम आयोजित किया और कबूतरों को संदेश देकर भुवनेशअवर से कटक तक भेजा। यह सिर्फ प्रतीकात्मक तौर पर किया गया।

अभी ओडशा पुलिस विभाग में 145 ऐसे कबूतर हैं जिनमें 95 कटक में और 50 अंगुल में हैं। इनकी देखरेख चार पुलिस कॉन्स्टेबलों के जिम्मे है। इनका ख्याल रखने वाले एक कॉन्स्टेबल ने बताया कि कबूतरों को सिर्फ पोटैशियमयुक्त पानी दिया जाता है जो कि एक फव्वारे के जरिए बहता रहता है। खाने में इन्हें गेहूं और बाजरा दिया जाता है। साथ ही इनका हाजमा दुरुस्त रखने के लिए काला नमक भी दिया जाता है।

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