ई-कॉमर्स में नई इबारत लिखने के लिए चाहिए ‘वाणी’ जैसी सोच

स्नेपडिल और मंतरा के लिए जुटाए निवेशकई-कॉमर्स को बुलंदी तक पहुंचाया

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सफलता का अर्थ केवल पद हासिल करना या दौलत और शोहरत कमाना ही नहीं होता। सफलता का असली अर्थ है कि आप जो सही समझते हैं उसे हिम्मत और भरोसे के साथ करें। कुछ ऐसे ही फलसफे पर विश्वास करने वाली वाणी कोला आज 350 मिलियन डॉलर वाली Kalaari Capital में प्रबंध निदेशक हैं। ये भारत में तेजी से उभर रही प्रौद्योगिक आधारिक कंपनी है। इससे पहले वाणी कोला ने सिलिकॉन वैली में दो सफल कंपनियों को बनाया और अरबों डॉलर के मूल्यांकन के बाद उनको छोड़ दिया।

वाणी का कहानी सफलताओं से भरी हुई है। उन्होंने एक के बाद एक कई कंपनियां को छोड़ा, लेकिन उनको उस स्थान पर पहुंचाकर जहां शायद वो बिना वाणी की मदद से नहीं पहुंच सकती थी। उनकी सफलताओं की एक लंबी फेहरिस्त है। जिसमें स्नेपडील और मंतरा जैसी कंपनियों की सफलता भी जुड़ी है। पिछले दिनों ये दोनों कंपनियां निवेश जुटाने के लिए खबरों में थी। स्नेपडील ने जहां 133.7 मिलियन डॉलर की राशि जुटाई, वहीं मंतरा ने 50 मिलियन डॉलर निजी निवेशकों से जुटाए। इन निवेशकों में विप्रो के चेयरमैन अजीम प्रेमजी भी शामिल थे। वाणी की कोशिशों के कारण ही स्नेपडील और मंतरा निवेश जुटाने में सफल हो सके। क्योंकि इससे पहले कोई भी निवेशक इस बिजनेस मॉडल में पैसे लगाने को तैयार नहीं था। वाणी ने इन दोनों कंपनियों के विकास में खासी भूमिका निभाई।

वाणी के मुताबिक उन्होंने पिछले कुछ सालों के दौरान इंटरनेट ट्रेंड को लेकर काफी जानकारी इकठ्ठा की थी। शुरूआत में ये एक बुलबुले के समान था। साल 2000 के दौरान देश में कई कंपनियां शुरू हुई और उन्होंने निवेश भी हासिल करना शुरू कर दिया, लेकिन कोई भी कंपनी ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाई। तब उनके दिमाग में एक बात आई कि कहीं ये बाजार किसी खास मोड़ पर तो नहीं खड़ा। कुछ ऐसा ही साल 2007-2008 में भी लगा। जब देश में स्मॉर्टफोन की आमद हुई ही थी। इन लोगों का शुरू से ही विश्वास था कि स्मॉर्टफोन की मांग तेजी से बढ़ेगी जैसे की शुरूआत में सेल्यूलर फोन की हुई थी। इतना ही नहीं स्मॉर्टफोन के कारण इंटरनेट के क्षेत्र में भी तेजी से विकास होने की उम्मीद जताई गई। 

वाणी बताती हैं कि इस दौरान उन्होंने देखा कि संगठित रिटेल और ग्राहकों के बीच बेमेल संबंध है। इतना ही नहीं तेजी से उभर से भारतीय मिडिल क्लास की जरूरतों को संगठित रिटेल को संभालने में दिक्कत हो रही है। खास बात ये थी कि ये मीडिल क्लास सिर्फ शहरी इलाकों में ही नहीं बढ़ रहा था बल्कि दूर दराज के छोटे शहरों और कस्बों में भी इसका इजाफा हो रहा था। ये एक तरह से लैंडलाइन फोन की जगह सेलफोन का इस्तेमाल करने जैसा था।

वाणी के मुताबिक बदलते भारत में ग्राहकों की जरूरतों को पूरा करने के लिए दूसरे माध्यमों की जरूरत महसूस की जाने लगी। जिसका तोड़ उद्यमियों ने निकाल लिया था और वो था ई-कामर्स। तब सवाल ये आया कि इसके लिए सही उद्यमियों का कैसे पता लगाया जाए? 

कारोबार में तेजी के लिए जरूरत होती है मांग और संतुलित जोखिम की। ऐसे में एक सफल उद्यमी वही है जो तेजी से विकास के लिए अपनी टीम को सशक्त करे। हालांकि कुछ उद्यमियों का मानना है कि संगठन पर नियंत्रण ही काफी है। वाणी के मुताबिक ऐसी कई कंपनियां हैं जो निवेश जुटाने में सफल हो रही हैं और वाणी की नजर ऐसे उद्यमियों पर है जो आगे बढ़ने के लिए ना सिर्फ प्रेरित हों बल्कि कारोबार बढ़ाने के लिए उत्साही हो।

जब वाणी ने स्नेपडील के कुनाल बहल और रोहित बंसल के अलावा मंतरा के मुकेश बंसल से मुलाकात की तो उनको इस बात का अंदाजा हो गया था कि ये वो उद्यमी हैं जिन्होने काफी काम किया है। जो भारतीय ग्राहकों की नब्ज को पकड़ना जानते हैं। इतना ही नहीं वो चुनौतियों से निपटना भी जानते हैं। सबसे खास बात ये कि वो मार्केट लीडर बन कर उभरना चाहते थे। मंतरा ने साल 2008 और स्नेपडिल ने साल 2009 से कोई खास प्रदर्शन नहीं किया था और जब वाणी ने तय किया कि इन कंपनियों में निवेश को बढ़ाया जाए तो इसके लिए कई निवेशक आगे आए। तभी इस बात का अहसास हो गया था कि ये अपने क्षेत्र में अग्रणी रहेंगे, बावजूद इनके सामने चुनौती थी अपने को साबित करने की। जैसे भुगतान का प्रबंधन कैसे करेंगे ? अपने उत्पादों को कैसे भेजेंगे? और लोजिस्टिक्स की समस्या के कैसे निपटेंगे? या फिर ग्राहक इन पर विश्वास करेंगे भी?

वाणी का कहना है कि उनको पक्का विश्वास था कि कि ये सही वक्त है जब ई-कामर्स पर ध्यान दिया जाए और ये सही उद्यमी है जो आगे बढ़ सकते हैं। आज स्नेपडील के पास बाजार का बड़ा हिस्सा है। इनके प्लेटफॉर्म में कारोबारियों की संख्या भी काफी ज्यादा है। भारत एक विविधता वाला देश है और एक बार उनको उचित प्लेटफॉर्म मिल जाए तो मांग में इजाफा अपने आप हो जाएगा। मंतरा की खासियत ये है कि वो अपना सामान हर जगह पहुंचा सकता है वो उन जगहों पर पहुंच रखता है जहां पर रिटेलर भी नहीं पहुंच पाते। खासतौर से वो उत्पाद जो शहरी ग्राहकों तक ही पहुंच पाते हैं उनको भी वो बड़े आराम से ग्रामीण खरीददारों तक पहुंचा देता है।

इस वक्त देश में जमी जमाई कंपनियों में बड़ी संख्या में निवेश हो रहा है। जो भले ही फायदे में हों लेकिन अपना और विकास करना चाहती हैं। स्नेपडील और मंतरा में निवेश के बाद ये बात साबित हो गई है कि भारतीय उद्यमी ना सिर्फ प्रतिभाशाली हैं बल्कि उभरते ट्रेंड की प्रवृति को भी अच्छी तरह समझते हैं। इतना ही नहीं उनमें इतनी क्षमता है कि वो अपने बल पर कारोबार को नई बुलंदी तक ले जा सकें।

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