आज ही के दिन राज कपूर को रुलाया था शैलेंद्र ने

आज 14 दिसंबर, शैलेंद्र की पुण्यतिथि है और आज ही है राज कपूर का जन्मदिन...

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जिनके तरानों पर आज तक सारा जमाना झूम रहा है, जिनके एक से एक मधुर गीतों ने पूरी दुनिया को कभी मस्ती से नचाया है तो कभी मुट्ठियां बांधे, परचम लहराते हुए, ऐसे यशस्वी शख्स का पूरा नाम है शंकरदास केसरीलाल 'शैलेन्द्र', लेकिन जब फिल्मों से उन्हें अथाह प्रसिद्धि मिली तो बस उनका शैलेंद्र नाम ही लोगों की जुबान पर हमेशा के लिए टिक गया। आज 14 दिसंबर, शैलेंद्र की पुण्यतिथि है और आज ही है राज कपूर का जन्मदिन।

शैलेंद्र और राजकपूर
शैलेंद्र और राजकपूर
किसी ज़माने में मथुरा रेलवे कर्मचारियों की कॉलोनी रही धौली प्याऊ की गली में गंगासिंह के उस छोटे से मकान की पहचान सिर्फ बाबूलाल को है जिसमें शैलेन्द्र अपने भाइयों के साथ रहते थे। सभी भाई रेलवे में थे। 

शैलेंद्र के अंतिम संस्कार के दौरान राज कपूर उनके घर पहुंचे मन में यह मलाल लेकर 14 दिसंबर ही राज कपूर का जन्म दिन था। सबने उन्हें कहते सुना कि 'कमबख्त, तुझे आज का दिन ही चुनना था।'

लोकप्रिय गीतकार शैलेन्द्र को तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था- 1958 में 'ये मेरा दीवानापन है...' (फ़िल्म- यहूदी) के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार, 1959 में 'सब कुछ सीखा हमने...' (फ़िल्म- अनाड़ी) के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार और 1968 में 'मै गाऊं तुम सो जाओ...' (फ़िल्म- ब्रह्मचारी) के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार। उनकी फिलम 'तीसरी कसम' साहित्य की अति मार्मिक कृति है, जिसे सैल्यूलाइड पर पूरी सार्थकता के साथ उतारा गया है।

यह फिल्म नहीं बल्कि सैल्यूलाइड पर लिखी गई कविता है। किसी ज़माने में मथुरा रेलवे कर्मचारियों की कॉलोनी रही धौली प्याऊ की गली में गंगासिंह के उस छोटे से मकान की पहचान सिर्फ बाबूलाल को है जिसमें शैलेन्द्र अपने भाइयों के साथ रहते थे। सभी भाई रेलवे में थे। बड़े भाई बी.डी. राव, शैलेन्द्र को पढ़ा-लिखा रहे थे। मथुरा के 'राजकीय इंटर कॉलेज' में हाईस्कूल में शैलेन्द्र ने पूरे उत्तर प्रदेश में तीसरा स्थान प्राप्त किया था। उस समय 1939 में वह 16 साल के थे। गीतों के बारे में शैलेंद्र की अपनी सबसे अलग तरह की सोच-समझ थी। कहते हैं न कि एक लंबी सूनी सड़क आप को दूर तक सोचने का मौका देती है। गीतकार शैलेंद्र के जीवन में भी 'जूहू बीच' की लंबी सूनी सड़कों ने अहम किरदार निभाया था। सुबह की सैर पर निकलते वक्त शैलेंद्र अपने अधिकतर गीतों को उस सैर के दौरान ही शब्द दिया करते थे -

हैं सबसे मधुर वो गीत, जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं
जब हद से गुज़र जाती है ख़ुशी, आँसू भी छलकते आते हैं
काँटों में खिले हैं फूल हमारे रंग भरे अरमानों के
नादान हैं जो इन काँटों से दामन को बचाए जाते हैं...

शैलेंद्र की जिंदगी के पन्ने पलटते समय लगता है कि वह चमक-दमक वाली फिल्मी दुनिया के लिए बने ही नहीं, इसीलिए बेहतर निर्देशन, बेहतर रचनाओं के बावजूद हमेशा स्ट्रगल करते रहे। वक्त से उन्हें मुंबई ने नहीं पहचाना। सरल और सटीक शब्दों में भावनाओं और संवेदनाओं को अभिव्यक्त कर देना शैलेन्द्र की महान विशेषता थी। 'किसी के आँसुओं में मुस्कुराने' जैसा विचार केवल शैलेन्द्र जैसे गीतकार के संवेदनशील हृदय में ही आ सकता था। मुंबई की दुनिया में शैलेंद्र की कोई लॉबी नहीं थी। शैलेंद्र के तमाम गीत ऐसे हैं, जिनके मुखड़े बातचीत करते, सड़क पर चलते अधरों से यूं ही फिसल जाते थे।

फिल्म 'सपनों के सौदागर' के निर्माता बी. अनंथा स्वामी ने एक गाना लिखने को दिया। काफी वक्त निकल गया। एक दिन अनंथा स्वामी और शैलेंद्र का आमना-सामना हो गया। शैलेंद्र के मुंह से निकल पड़ा -'तुम प्यार से देखो, हम प्यार से देखें, जीवन की राहों में बिखर जाएगा उजाला।' यह लाइन सुन स्वामी बोले, आप इसी लाइन को आगे बढ़ाइए। इस तरह 'सपनों के सौदागर' फिल्म के इस गाने का जन्म हुआ। इसी तरह 1955 में आई फिल्म 'श्री 420' के गाने 'मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के' के जन्म की कहानी है। शैलेंद्र ने नई कार ली थी। सैर पर निकले। लाल बत्ती पर कार रुकी। तभी एक लड़की कार के पास आकर खड़ी हो गई। सभी उसे कनखियों से निहारने लगे। बत्ती हरी हुई तो कार चल पड़ी। शंकर उस लड़की को गर्दन घुमा कर देखने लगे, चुटकी ली 'मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के' बस फिर क्या था। सभी चिल्लाए- पूरा करो, पूरा करो' कार चलती रही और पूरे गाने का जन्म कार में हो गया।

शैलेंद्रजी
शैलेंद्रजी

राजकपूर और शैलेंद्र के बीच फिल्म 'तीसरी कसम' के अंत को लेकर कुछ वैचारिक मतभेद हो गए थे। राज कपूर चाहते थे कि फिल्म का अंत मनोरंजक, सुखद हो, शैलेंद्र चाहते थे अंत ट्रेजिक हो ताकि कहानी का नाम 'तीसरी कसम' चरितार्थ रहे। इसी तरह 'जिस देश में गंगा बहती है' फिल्म में एक गाना है- 'कविराज कहे, न राज रहे न ताज रहे न राज घराना …..' लोगों ने राज कपूर को भड़का दिया कि शैलेंद्र ने इस गाने में आप पर चोट की है। सारा जग जानता है कि राज कपूर शैलेंद्र को दिलोजान से चाहते थे। उनके निधन के बाद राज कपूर ने उनके परिवार की काफी मदद की। जब शैलेंद्र पर कर्ज देने वालों ने मुकदमे चलाए, तब भी उन्हें राज कपूर से ही मदद मिली।

शैलेंद्र के अंतिम संस्कार के दौरान राज कपूर उनके घर पहुंचे मन में यह मलाल लेकर 14 दिसंबर ही राज कपूर का जन्म दिन था। सबने उन्हें कहते सुना कि 'कमबख्त, तुझे आज का दिन ही चुनना था।' कम लोग ये जानते होंगे कि शैलेंद्र ने राजकपूर अभिनीत 'तीसरी कसम' फ़िल्म का निर्माण किया था। दरअसल, शैलेन्द्र को फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी 'मारे गए गुलफाम' बहुत पसंद आई। उन्होंने गीतकार के साथ निर्माता बनने की ठानी। राजकपूर और वहीदा रहमान को लेकर 'तीसरी कसम' बना डाली। खुद की सारी दौलत और मित्रों से उधार की भारी रकम फ़िल्म पर झोंक दी।

फ़िल्म डूब गई। कर्ज़ से लद गए शैलेन्द्र बीमार हो गए। यह 1966 की बात है। अस्पताल में भरती हुए। तब वे 'जाने कहां गए वो दिन, कहते थे तेरी याद में, नजरों को हम बिछायेंगे' गीत की रचना में लगे थे। शैलेन्द्र ने राजकपूर से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की। वे बीमारी में भी आर. के. स्टूडियो की ओर चले। रास्ते में उन्होंने दम तोड़ दिया। यह दिन 14 दिसंबर 1966 का था। शैलेंद्र का एक लोकप्रिय गीत -

रुला के गया, सपना मेरा, बैठी हूँ कब हो सवेरा
वही हैं गम-ए-दिल, वही हैं चन्दा तारे, वही हम बेसहारे
आधी रात वही हैं, और हर बात वही हैं, फिर भी ना आया लुटेरा।
कैसी ये जिन्दगी, के साँसों से हम ऊबे के दिल डूबा, हम डूबे
एक दुखिया बेचारी, इस जीवन से हारी उस पर ये गम का अन्धेरा।

फ़िल्मों में गीत लिखने के पहले देश के आजादी की लड़ाई में योगदान देने का शैलेंद्र का एक अलग ही तरीका था। वह उस समय देशभक्ति से सराबोर वीररस की कविताएँ लिखा करते थे और उन्हें जोशोखरोश के साथ सुनाकर सुनने वालों को देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत कर दिया करते थे। उनकी रचना 'जलता है पंजाब...' को उन दिनों बहुत प्रसिद्धि मिली। फ़िल्मों में आने के बाद भी उनका ये जज़्बा बना ही रहा इसीलिये वह 1950 में लिखे अपने इस गीत में ग़रीब भारतीय की अभिव्यक्ति इन शब्दों में करते हैं -

तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर,
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!
सुबह औ' शाम के रंगे हुए गगन को चूमकर,
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूमकर,
तू आ मेरा सिंगार कर, तू आ मुझे हसीन कर!
ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन,
ये दिन भी जाएंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन,
कभी तो होगी इस चमन पर भी बहार की नज़र!
हमारे कारवां का मंज़िलों को इन्तज़ार है,
यह आंधियों, ये बिजलियों की, पीठ पर सवार है,
जिधर पड़ेंगे ये क़दम बनेगी एक नई डगर।
हज़ार भेष धर के आई मौत तेरे द्वार पर
मगर तुझे न छल सकी चली गई वो हार कर
नई सुबह के संग सदा तुझे मिली नई उमर।
ज़मीं के पेट में पली अगन, पले हैं ज़लज़ले,
टिके न टिक सकेंगे भूख रोग के स्वराज ये,
मुसीबतों के सर कुचल, बढ़ेंगे एक साथ हम,
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!
बुरी है आग पेट की, बुरे हैं दिल के दाग़ ये,
न दब सकेंगे, एक दिन बनेंगे इन्क़लाब ये,
गिरेंगे जुल्म के महल, बनेंगे फिर नवीन घर!
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!.... तू ज़िन्दा है

जब देश अंग्रेजों की दासता का सामना कर रहा था, युवा शैलेंद्र आजादी के आंदोलन से जुड़ गए थे। अपनी कविताओं के जरिए वह लोगों में जागृति पैदा करने लगे। उन दिनों उनकी कविता 'जलता है पंजाब' काफी सुर्खियों में आ गई थी। शैलेन्द्र कई समारोह में यह कविता सुनाया करते थे। गीतकार के रूप में शैलेन्द्र ने अपना पहला गीत वर्ष 1949 में प्रदर्शित राजकपूर की फिल्म 'बरसात' के लिए 'बरसात में तुमसे मिले हम सजन' लिखा था। इसे संयोग ही कहा जाए कि फिल्म 'बरसात' से हीं बतौर संगीतकार शंकर जयकिशन ने अपने कैरियर की शुरुआत की थी। उन्होंने 1949 में एक और कालजयी गीत लिखा, जो जन-जन की जुबान पर बैठ गया -

हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में, हड़ताल हमारा नारा है !
तुमने माँगे ठुकराई हैं, तुमने तोड़ा है हर वादा
छीनी हमसे सस्ती चीज़ें, तुम छंटनी पर हो आमादा
तो अपनी भी तैयारी है, तो हमने भी ललकारा है
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है !
मत करो बहाने संकट है, मुद्रा-प्रसार इंफ्लेशन है
इन बनियों चोर-लुटेरों को क्या सरकारी कन्सेशन है
बगलें मत झाँको, दो जवाब क्या यही स्वराज्य तुम्हारा है ?
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है !
मत समझो हमको याद नहीं हैं जून छियालिस की रातें
जब काले-गोरे बनियों में चलती थीं सौदों की बातें
रह गई ग़ुलामी बरकरार हम समझे अब छुटकारा है
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर हड़ताल हमारा नारा है !
क्या धमकी देते हो साहब, दमदांटी में क्या रक्खा है
वह वार तुम्हारे अग्रज अँग्रज़ों ने भी तो चक्खा है
दहला था सारा साम्राज्य जो तुमको इतना प्यारा है
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है !
समझौता ? कैसा समझौता ? हमला तो तुमने बोला है
महंगी ने हमें निगलने को दानव जैसा मुँह खोला है
हम मौत के जबड़े तोड़ेंगे, एका हथियार हमारा है
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर हड़ताल हमारा नारा है !
अब संभले समझौता-परस्त घुटना-टेकू ढुलमुल-यकीन
हम सब समझौतेबाज़ों को अब अलग करेंगे बीन-बीन
जो रोकेगा वह जाएगा, यह वह तूफ़ानी धारा है
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है !

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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