मिस व्हीलचेयर इंडिया की कहानी: जिंदगी के हर मोड़ पर मुश्किलों को मात देते हुए हासिल की सफलता

मिस व्हीलचेयर पूजा शर्मा की सफलता की कहानी...

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पूजा बताती हैं कि जब वे सिर्फ 40 दिन की थीं तो उन्हें अपने पैर गंवाने पड़ गए। वह हमेशा से अपने पैरों पर खड़े होना चाहती थीं और उन्होंने ऐसा किया भी। हालांकि स्कूल की पढ़ाई खत्म करने के बाद जिस कॉलेज में उन्होंने एडमिशन लिया वहां नि:शक्तजनों के लिए अच्छी सुविधाएं नहीं थीं।

पूजा शर्मा (फोटो साभार- ह्यूमन्स ऑफ बॉम्बे)
पूजा शर्मा (फोटो साभार- ह्यूमन्स ऑफ बॉम्बे)
वह बताती हैं कि काफी दुख होता था जब उनकी योग्यता को जाने बगैर सिर्फ बाहरी व्यक्तित्व को देखकर रिजेक्ट कर दिया जाता था। हालांकि उन्हें नौकरी तो मिल गई, लेकिन आत्मनिर्भर बनना आसान नहीं था। 

कहते हैं कि जिंदगी फूलों का ताज नहीं होती। कुछ लोगों के लिए जिंदगी आसान लगती होगी, लेकिन अधिकतर लोगों को जीवन में हर पल, हर रोज तमाम उतार-चढ़ावों से होकर गुजरना पड़ता है। फिर भी आप जिंदगी की हर चुनौती का सामना कर सकते हैं और जीत भी सकते हैं। अगर आपको लगता है कि ऐसा कैसे हो सकता है तो आपको पूजा शर्मा की कहानी से रूबरू होना पड़ेगा, जो व्हीलचेयर के सहारे चलती तो हैं, लेकिन व्हीलचेयर उनकी कमजोरी बिल्कुल भी नहीं है। ह्यूमन्स ऑफ बॉम्बे ने पूजा शर्मा की कहानी साझा की है। हम उनकी कहानी को आप तक पहुंचा रहे हैं।

पूजा बताती हैं कि जब वे सिर्फ 40 दिनन की थीं तो उन्हें अपने पैर गंवाने पड़ गए। वह हमेशा से अपने पैरों पर खड़े होना चाहती थीं और उन्होंने ऐसा किया भी। हालांकि स्कूल की पढ़ाई खत्म करने के बाद जिस कॉलेज में उन्होंने एडमिशन लिया वहां नि:शक्तजनों के लिए अच्छी सुविधाएं नहीं थीं। बाद में उन्होंने दूसरा कॉलेज चुना और अपनी डिग्री पूरी की। लेकिन असली मुश्किल उनका इंतजार कर रही थी। यह मुश्किल थी नौकरी हासिल करने की। पूजा नौकरी के लिए कई इंटरव्यू में शामिल हुईं। लेकिन इंटरव्यू लेने वाले लोग सिर्फ उनकी अक्षमता के बारे में बात करते थे। उनकी काबिलियत की बात नहीं की जाती थी।

नौकरी खोजना कठिन काम था, लेकिन पूजा ने नौकरी हासिल कर ही ली। वह एक अच्छी कंपनी में नौकरी कर रही हैं। कई मुश्किलों और चुनौतियों के बाद पिछले साल पूजा ने मिस इंडिया व्हीलचेयर का खिताब जीता। वह कहती हैं, 'मेरी जिंदगी में कई चुनौतियां रही हैं, लेकिन मैंने कभी उन्हें खुद पर हावी नहीं होने दिया बल्कि उस पर विजय हासिल की।' पूजा से जब पूछा गया कि क्या अब आप अपने पैरों पर खड़े हो सकती हैं, तो उन्होंने कहा कि वह अब आसमां में उड़ रही हैं।

अपनी कहानी बताते हुए पूजा कहती हैं, 'मैं सिर्फ 40 दिन की थी जब मेरे पैरों को बचाने के लिए ऑपरेशन किया गया था। लेकिन तंत्रिका कोशिकाएं काफी खराब हो गई थीं, इसीलिए डॉक्टरों ने उनके पैरेंट्स से कह दिया के वे अब कुछ नहीं कर सकते।' पूजा ने अपनी जिंदगी व्हीलचेयर के सहारे चलाई, लेकिन वह अपने सपने पूरा करना चाहती थीं, अपने पैरों पर खड़े होना चाहती थीं, कानून की पढ़ाई करना चाहती थीं। उन्होंने सिंबोयसिस कॉलेज पुणे में एडमिशन लिया। कॉलेज में नि:शक्तजनों के अनुरूप इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं था। इसलिए पूजा के जाने के बाद कॉलेज ने उनके लिए रैंप बनवाया।

पूजा शर्मा
पूजा शर्मा

लेकिन यह रैंप ज्यादा ढालदार था इसलिए उन्हें चढ़ने और उतरने में दिक्कत होती थी। उन्होंने कॉलेज प्रशासन से रैंप को सही करवाने के लिए बोला लेकिन उन्हें कहा गया कि जो रैंप उन्हें मिला है उसी से काम चलाएं। इस बात के लिए पूजा ने काफी बहस भी कोई लेकिन कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला और उन्हें कह दिया गया कि वे किसी और कॉलेज में एडमिशन ले लें। यह सुनकर पूजा बिखर गई थीं, लेकिन उन्होंने खुद को टूटने नहीं दिया। उन्होंने अपनी डिग्री पूरा करने के लिए एक दूसरा कॉलेज चुना और पढ़ाई पूरी की। अब उनकी चुनौती नौकरी हासिल करने की थी।

वह बताती हैं कि काफी दुख होता था जब उनकी योग्यता को जाने बगैर सिर्फ बाहरी व्यक्तित्व को देखकर रिजेक्ट कर दिया जाता था। हालांकि उन्हें नौकरी तो मिल गई, लेकिन आत्मनिर्भर बनना आसान नहीं था। एक अनुभव को साझा करते हुए वह कहती हैं कि एक बार दिल्ली में उनका दोस्त रात उन्हें घर छोड़ने जा रहा था, लेकिन अचानक बीच रास्ते में वह कार से उन्हें उतारकर अकेला छोड़कर चला गया। पूजा को कुछ समझ ही नहीं आया। वह सड़क के किनारे ही कैब बुक करने लगीं, लेकिन कैब वाले भी व्हीलचेयर पर उन्हें देख बैठाने से इनकार कर देते। पूजा बताती हैं कि ऐसा पहली बार हुआ था कि वह अपनी अक्षमता पर रोई थीं।

लेकिन इस मौके पर फिर उन्होंने खुद को टूटने नहीं दिया और सोच लिया कि जिंदगी में किसी पर निर्भर नहीं होना है। पूजा ने अपनी कार को खुद के हिसाब से कस्टमाइज्ड कराया और कार चलाना सीख लिया। वह कहती हैं कि अभी तो उनका सफर शुरू हुआ है। पूजा ने कहा कि अगर वह उन लोगों की बात मान लेतीं जो उनकी अक्षमता को नियति मानकर चुप बैठने को कहते थे, तो शायद वह आज यहां नहीं होतीं। वह कहती हैं, 'मेरी जिंदगी में तमाम चुनौतियां हैं, लेकिन वे कभी मुझे परिभाषित नहीं करेंगी। आप यह सोचने के लिए स्वतंत्र हैं कि मैं अक्षम हूं, लेकिन मुझे पता है कि मैं क्या हूं। अधिकतर लोग पहले मेरी व्हीलचेयर को देखते हैं फिर मुझसे मुखातिब होते हैं। कुछ मिनट बिताने के बाद वे कहते हैं कि मैं तो आकर्षक हूं।' पूजा कहती हैं कि वह सिर्फ अपने पैरों पर खड़ी नहीं बल्कि उड़ रही हैं।

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