गुजरात में मुस्लिम महिला ने शुरू की गौशाला, लोगों के लिए बनीं मिसाल

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अमेरिका में रह रहीं गुजराती मूल की एक महिला मूसा ने करोड़ों रुपए लगाकर अपने पैतृक गांव में गोशाला खोल दी...

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
कुछ समय पहले महाराष्ट्र से उनकी कुछ गायें गुजरात लाई जा रही थीं। रास्ते में कुछ गोरक्षकों ने उनका वाहन रोक लिया। उनके पास सूचना आई तो उन्होंने तुरंत पुलिस को फोन कर मदद मांगी। इस समय उनकी गोशाला में डच नस्ल की कुल 120 होलिस्टन फ्रीजन गायें हैं।

राजस्थान में तो दूध के भाव गोमूत्र बिक रहा है। मुजफ्फरनगर (उ.प्र.) में एक मुस्लिम परिवार ने गौशाला के लिए पौने दो बीघे जमीन दान में दे दी।  बनासकांठा (गुजरात) मूल की अमेरिकी प्रवासी मरजिया मूसा करोड़ों रुपए लगाकर अपने पैतृक गांव में विदेशी गायों की डेयरी चला रही हैं। मूसा के दो बच्चे टेक्सास (अमेरिका) में ही रहते हैं। डेयरी खोलने से पहले अभी तक मूसा टेक्सास में होम फ्लिपिंग इंडस्ट्री के काम से जुड़ी रही हैं। होम फ्लिपिंग यानी पुराने घरों की मरम्मत और उन्हें बेचने का काम।

मूसा को जब लगा कि अपने देश के लिए कुछ करना चाहिए, वह डेयरी व्यवसाय में आ गईं। काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने अपने पैतृक गांव के लिए डेयरी खोलने का फैसला लिया। सबसे पहले उन्होंने नवंबर 2016 में अपने गांव में पांच एकड़ जमीन खरीदी। इसके बाद लगभग दो दर्जन गायें खरीद लाईं। इस पर कुल ढाई करोड़ रुपए खर्च हुए। उन्होंने अपने गांव में एक ऑटोमेटेड गोशाला बनाई। यहां पर तीन महिलाओं को दूध उत्पादन, गायों की देखरेख और दूध बेचने के लिए तैनात किया। इसके लिए उन्हें तरह-तरह की मुश्किलों का भी सामना करना पड़ा। कुछ समय पहले महाराष्ट्र से उनकी कुछ गायें गुजरात लाई जा रही थीं। रास्ते में कुछ गोरक्षकों ने उनका वाहन रोक लिया। उनके पास सूचना आई तो उन्होंने तुरंत पुलिस को फोन कर मदद मांगी। इस समय उनकी गोशाला में डच नस्ल की कुल 120 होलिस्टन फ्रीजन गायें हैं।

मूसा बताती हैं कि पिछले साल बाढ़ के दौरान उनकी एक गाय और बछड़ा बह गए। डेयरी फार्म में पानी भर जाने से दलदल जैसा हो गया। पहले की तरह काम सुचारु करने में कई दिन लग गए। स्थानीय लोगों से उनको बहुत मदद मिली। अब गोशाला का काम दोबारा ठीक से चलने लगा है। मूसा गायों के लिए लोगों के बीच जागरूकता अभियान भी चलाती हैं। गायों की देखरेख के लिए वह रेडियो फ्रिक्वैंसी आइडेंटिफिकेशन सिस्टम लगाए हुए हैं। उनकी गोशाला में गायों के स्वास्थ्य परीक्षण, दवा-इलाज, खान-पान, प्रजनन से लेकर दूध की शुद्धता आदि को लेकर भी सारी कम्पलीट आधुनिक व्यवस्थाएं हैं। प्रतिदिन एक गाय पर कम से कम ढाई-तीन सौ रुपए का खर्च आता है। उनको एक गाय से प्रतिदिन चौदह-पंद्रह लीटर तक दूध मिल जाता है। वह दूध के अलावा घी और तरह-तरह की जड़ी-बूटियों से बने पशुओं के चारे की भी बिक्री करती हैं।

दूध का कारोबार दिनोदिन फैलता जा रहा है। हाल ही में पतंजलि के संस्थापक रामदेव घोषणा कर चुके हैं कि उनकी कंपनी दिल्ली-एनसीआर से दूध और दूध से बने उत्पादों की बिक्री शुरू करने जा रही है। उनकी कंपनी दूध, दही, पनीर, छाछ, मक्खन आदि बेचेगी। उनके दूध कारोबार में बीकानेर और शेखावटी (राजस्थान) के दो हजार गांवों के किसान सहयोग कर रहे हैं। अगर कोई व्यक्ति डेयरी का बिजनेस शुरू करना चाहता है तो सरकार की मुद्रा स्कीम के जरिए 75 फीसदी तक खर्च की मदद मिल सकती है। साथ ही, शुरुआती स्तर पर सालाना छह लाख रुपये तक की कमाई हो सकती है।

असल में डेयरी प्रोडक्ट की मांग हर घर में है, जिससे डेयरी कंपनियों को मुनाफे की संभावना ज्यादा रहती है। आए दिन कोई न कोई नया प्रोडक्ट मार्केट में आता ही रहता है। सरकार ने मुद्रा स्कीम के तहत जिन बिजनेस के बारे में प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की है, उसमें डेयरी प्रोडक्ट भी है। रिपोर्ट के मुताबिक कुल 16 लाख रुपये के खर्च में एक हजार वर्गफुट में यूनिट लगाई जा सकती है। इतने क्षेत्रफल में शुरू होने वाले यूनिट में रोज पांच सौ लीटर दूध का बिजनेस शुरू हो जाएगा। कोई भी व्यक्ति इस तरह सरकारी मदद से डेयरी का कारोबार शुरू कर सकता है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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