बकरियां चराने वाला लड़का बना पिस्टल किंग

जानिए कॉमनवेल्थ में गोल्ड पर निशाना साधने वाले उस शूटर की कहानी जो कभी चराता था बकरियां...

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न जाने क्यों बार-बार ये पंक्तियां अनायास मन में गूंज उठती हैं कि 'हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती'। भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाले पिस्टल किंग जीतू राय का जिंदगीनामा भी कुछ इसी तरह का रहा है। बचपन से ही दुश्वारियां साये की तरह उनकी जिंदगी में शामिल रहीं लेकिन बकरियां चराते, नेपाल के खेतों में वक्त बिताते हुए वह एक दिन गोल्ड कॉस्ट में कामयाबी की बुलंदी पर पहुंच जाएंगे, आज वह सब जानकर आसानी से यकीन करना मुश्किल सा हो जाता है।

जीतू राय (फाइल फोटो)
जीतू राय (फाइल फोटो)
जीतू राय भारतीय सेना में सूबेदार हैं। उन्होंने वर्ष 2014 म्यूनिख वर्ल्ड कप में 10 मीटर एयर पिस्टल में ब्रॉन्ज मेडल जीता था। उसके तुरंत बाद मारिबोर में 50 मीटर एयर पिस्टल में सिल्वर और 10 मीटर एयर पिस्टल में उनको गोल्ड मेडल मिला। उनकी निशानेबाजी की सफलताएं यहीं पर नहीं थमी बल्कि नौ दिनों में उन्होंने तीन मेडल जीतकर अपने नाम कर लिए, साथ ही वर्ल्ड कप में दो मेडल जीतने वाले पहले भारतीय निशानेबाज भी बन गए।

ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में नए गेम्स रिकॉर्ड के साथ सोने का तमगा साधने वाले नेपाली मूल के जीतू राय की कामयाब जिंदगी की राह बड़ी ऊबड़-खाबड़ रही है। ये वही जीतू राय हैं, जो एक वक्त में रियो ओलंपिक में पदक के मजबूत दावेदार होने के बावजूद पोडियम फिनिश से फिसिल गए थे। उस समय उन्होंने मन मसोसते हुए कहा था, 'मैंने अपने देश का सर नीचा कर दिया।' इस बार ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में 235.1 अंकों के साथ वह सर्वोच्च निशानेबाज बनने में कामयाब रहे। वह 2011 में नेशनल गेम्स में उत्तर प्रदेश की नुमाइंदगी कर चुके हैं और अब अपनी अचूक साधना से भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाले चैम्पियन बन गए हैं।

जीतू राय भारतीय सेना में सूबेदार हैं। उन्होंने वर्ष 2014 म्यूनिख वर्ल्ड कप में 10 मीटर एयर पिस्टल में ब्रॉन्ज मेडल जीता था। उसके तुरंत बाद मारिबोर में 50 मीटर एयर पिस्टल में सिल्वर और 10 मीटर एयर पिस्टल में उनको गोल्ड मेडल मिला। उनकी निशानेबाजी की सफलताएं यहीं पर नहीं थमी बल्कि नौ दिनों में उन्होंने तीन मेडल जीतकर अपने नाम कर लिए, साथ ही वर्ल्ड कप में दो मेडल जीतने वाले पहले भारतीय निशानेबाज भी बन गए। वर्ष 2014 के कॉमनवेल्थ गेम्स में भी उन्होंने नया रिकॉर्ड बनाते हुए गोल्ड मेडल जीता था और एशियन गेम्स में 50 मीटर एयर पिस्टल इवेंट में भी गोल्ड मेडल साध लिया था।

ऑस्ट्रेलिया में चल रहे 21वें राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को आठवां स्वर्ण पदक दिलाकर एक बार फिर से तिरंगे का मान बढ़ाने वाले जीतू राय की जिंदगी आज सफलता के शिखर पर यूं ही नहीं जा पहुंची है। इसके पीछे रही है कड़वे और कठिन अनुभवों की एक लंबी दास्तान। अपने पांच भाई-बहनों में एक जीतू राय का जन्म नेपाल के जिला संखुवासभा के एक छोटे से गाँव में हुआ था। होश संभालने के बाद जब जीवन की राहों पर बढ़े, सफर बड़ा मशक्कत भरा रहा। मक्का और आलू की खेती करते हुए खेतों में दिन कटने लगे। शूटिंग से तो तब कोई दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। घर के पास के एक तबेले में भैंसों और बकरियों के साथ उनका समय गुजरता था। बाद में वह नेपाल से लखनऊ आ गए।

2011 में खराब प्रदर्शन के चलते उच्चाधिकारी ने जीतू को यूनिट से लौटा दिया था। इस वाकया ने जीतू को इतना खिन्न कर दिया कि उनका एक बार तो शूटिंग से ही मन उखड़ने लगा लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

जीतू के पिता भारतीय सेना में नौकरी कर रहे थे। जब चीन पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भारत का युद्ध चल रहा था, वह उसमें जूझते रहे। जीतू भी जब बीस साल के हुए, भारतीय सेना में ही भर्ती हो गए, जबकि वह ब्रिटेन की सेना में भर्ती होना चाहते थे। गौरतलब है कि गोरखा रेजीमेंट के लिए ब्रितानी फ़ौज भर्ती के लिए हर साल नेपाल जाती रही है। वर्ष 2006 में जब जीतू ब्रितानी फ़ौज में भर्ती होने गए, उस वक्त भारतीय सैन्य शिविर में भी भर्ती के लिए पंजीकरण चल रहा था। फिर क्या था, जीतू भी लाइन में लग गए और उन्हे सेलेक्ट कर लिया गया। उस समय उनके पिता का निधन हो चुका था। सेना में ही जीतू की जिंदगी ने निशानेबाजी का मोड़ लिया। शुरुआती दिन उनके बड़े खराब गुजरे। एक बार तो 2011 में खराब प्रदर्शन के चलते उच्चाधिकारी ने उन्हें यूनिट से लौटा दिया था। इस वाकया ने उन्हें इतना खिन्न कर दिया कि उनका एक बार तो शूटिंग से ही मन उखड़ने लगा लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

एक ओर 26 अगस्त सन 1987 को जन्मे जीतू राय दुनिया भर में अपनी कामयाबियों के किले फतह कर रहे थे, दूसरी ओर उनके घर वाले इस सबसे से बेखबर बने रहे। जब उनको अर्जुन पुरस्कार मिला तो माँ दिल्ली आईं। इसकी वजह ये थी कि निशानेबाजी की साधना में लगे रहने के कारण वह यदा-कदा ही घर-परिवार में जा पाते थे। अब तो फ्लाइट सुलभ होने लगी है, पहले नेपाल के लिए उन्हें दार्जिलिंग, बागडोगरा तक ट्रेन से, उसके बाद एक दिन और गाँव पहुँचने में लग जाता था। गांव भी ऐसा कि अभी कुछ वर्ष पहले ही वहां के लोगों को बिजली मयस्सर हुई है।

यूनिट से लौटा दिया जाना ही जीतू की जिंदगी का टर्निंग प्वॉइंट साबित हुए। वह पूरी मेहनत से निशानेबाज़ी को साधने में जुट गए। रात-दिन एक कर दिया। एक साल बाद ही वह अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने के योग्य बन गए और फिर तो उनकी कामयाबी का सफर चल पड़ा। एक साल के अंदर अंदर ही वह खेल के विश्वमंच पर नाम रोशन करने लगे। वर्ष 2016 में ओलंपिक पदक न जीत पाना उनकी जिंदगी का दूसरा सबसे बड़ा झटका रहा। तब भी उन्होंने पीछे मुड़कर देखने की बजाए अपनी निगाहें भविष्य के लक्ष्य पर टिकाए रखीं। अब जाकर उनकी अपने करियर में शानदार वापसी हुई है। ऑस्ट्रेलिया से पहले इसी साल मेक्सिको वर्ल्ड कप में उन्हें निशानेबाजी में कांस्य मिला।

जीतू निशानेबाजी में भले दुनिया के अव्वल खिलाड़ी बन चुके हों, लेकिन वॉलीबॉल खेलना उन्हें आज भी सबसे अधिक पसंद है और साथ ही आमिर ख़ान की फ़िल्में जीतू को दीवाना बना देती हैं।

जीतू के होश संभालने के दिनों का दुखदायी जिंदगीनामा आज भी उन्हें भूला नहीं है। उस वक्त उनके परिवार का गुजर बसर सिर्फ खेती से होता था। जब उनके पिता को भारतीय गोरखा राइफल्स रेजिमेंट में नौकरी मिली तो घर-गृहस्थी में मामूली सी चमक शुमार हुई। अपने पांचों भाई-बहनों में जीतू चौथे नंबर की संतान हैं। बचपन के दिनों में तो इन सबकी परवरिश का जिम्मा माँ पर था, जो पढ़ी-लिखी भी नहीं थीं पर अपनी संतानों को लेकर उनमें हौसला बरकरार था। वह सुबह-सवेरे जल्दी से उठ जातीं और खाना पकाकर बच्चों को स्कूल भेज देतीं। उसके बाद वह खेतों में बुआई, सिंचाई, कटाई के कामों में लग जातीं। हालाँकि स्कूल गाँव से बहुत दूर थे और पैदल जाने-आने में जीतू और उनके भाई-बहनों को रोजमर्रा में तमाम मुश्किलें झेलनी पड़ती थीं।

जीतू स्कूल से लौटने के बाद मां के साथ खेतों में मदद करने पहुंच जाते थे। उन दिनों ही जीतू के मन में सेना में भरती होने के सपने जन्म लेने लगे थे। वह भी पापा की तरह सैनिक बनना चाहते थे। यद्यपि उन्होंने ये सपना अपनी मां से कभी साझा नहीं किया। बस खामोशी से वक्त से लड़ते रहे। जब उनके पापा चल बसे, पूरे परिवार में कोहराम सा मच गया। उस वक्त जब जीतू ने सेना में भरती होने की मां से इच्छा व्यक्त की तो वह अपने कलेजे के टुकड़े को पति की तरह गंवा देने का आसानी से साहस नहीं जुटा पाईं। समस्या थी कि फिर आखिर परिवार कैसे चले।

खेती के भरोसे तो अब बड़े हो चुके भाई-बहनों की जिंदगी कटने से रही। काफी कोशिश के बाद जीतू मां को समझाने में सफल रहे। सेना में भरती हो जाने के बाद जीतू का सबसे ज्यादा ध्यान अपनी फिटनेस पर रहता। साथ ही उन्होंने एक बार फिर से दोबारा पढ़ाई शुरू कर दी। इंदौर (मध्यप्रदेश) के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक की परीक्षा पास कर ली। गोरखा रेजिमेंट में बतौर सिपाही भर्ती होकर वह अपनी योग्यता के बूते एक दिन नायब सूबेदार बन गए। वर्ष 2010 में पहली बार जिंदगी ने रफ्तार पकड़ी और एक साल बाद सेना की ओर से वह निशानेबाजी की प्रतिस्पर्द्धाओं में शामिल होने लगे। आज तो वह भारत के सिरमौर निशानेबाज हो चुके हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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