माँ की जान को जोखिम में पड़ने से बचाने के लिए किये संकल्प ने अय्यप्पा को बनाया 'जल-क्रांति का नायक'

कर्नाटक के एक सूखा पीड़ित गाँव में किसान के घर पैदा हुए अय्यप्पा मसगि ने बचपन में एक डरावना मंज़र देखा था। कई किलोमीटर पैदल चलकर जिस कुदरती कुएँ से माँ पानी निकालती थीं, वह मिट्टी के तोदों से भरा हुआ था, मिट्टी खिसकी कि इंसान उसमें दबकर खत्म। छोटा से बालक ने अपनी माँ को उस जोखिम में देखकर तय किया कि एक दिन वह माँ के साथ-साथ गाँव के सभी लोगों को उस जोखिम से बाहर निकालेगा और पानी की समस्या का ऐसा हल तलाश करेगा कि लोग मिट्टी के नीचे दबकर अपनी जान न गँवा बैठें। एक ऐसा अधनंगा बच्चा जिसे पहनने को केवल शर्ट मौजूद है, स्कूल में किताबें खरीदने के लिए रुपये नहीं हैं, पढ़ने के लिए अगर मिट्टी के दिये का भी इस्तेमाल करें तो पिता को फिज़ूलखर्ची लगती है, जिसे पढ़ने के दौरान रिश्तेदारों से मिले पुराने कपड़े पहन कर गुज़ारा करना पड़ता है, जिसे कॉलेज की फीस अदा करने के लिए माँ के गहने बेचने पड़ते हैं, यही बालक न केवल अपने स्कूल, अपने कॉलेज और अपनी कंपनी में नंबर वन बन जाता है, बल्कि नौकरी छोड़ने के बाद अपनी पत्नी और बेटी से पागल और नालायक जैसी अपशब्द और गालियाँ सुनकर भी विचलित नहीं होता और एक दिन अपने गाँव ही नहीं, बल्कि पूरे देश में सूखे और तूफान के बीच पानी को बचाने और उसके इस्तेमाल के तरीके तलाशने का ‘जलदूत’ बन जाता है। पुत्र के प्रति लापरवाह और कंजूस पिता, लेकिन चिंता करने वाली माँ के पुत्र अय्यप्पा मसगि आज कर्नाटक, तमिलनाडू, आंध्र-प्रदेश एवं तेलंगाना सहित विभिन्न राज्यों में ‘जलक्रांति के नायक’ बन गये हैं। उनकी संस्था सैकड़ों गाँवों में सूखे की समस्या से निपटने के लिए किसानों की मदद कर रही है। हौसला, हिम्मत, मेहनत, त्याग और बलिदान की प्रेरणादायी घटनाओं से भरपूर अय्यप्पा मसगि की कहानी बेहद अनोखी है। इस कहानी में सूखे की वजह से किसानों को होने वाली पीड़ा है, गरीबी की मार से ज़ख़्मी लोगों की कराह है, शहरों से दूर रहने की वजह से तरक्की के साधन-संसाधन न मिल पाने की बेबसी है। इस कहानी में संघर्ष है, सूखे और बाढ़ जैसी प्रकृति की मार से उभरने की चुनौती है। गरीबी के थपेड़े खाते हुए भी निरंतर आगे बढ़ने की कोशिश है। ये कहानी है बचपन में बूँद-बूँद पानी को तरसने वाले एक बच्चे के पानी की किल्लत दूर करने वाला एक मसीहा बनने की। ये कहानी है सूखा ग्रस्त इलाके के एक किसान के बेटे की, जिसने बंजर भूमि को भी उपजाऊ बनाने की काबिलियत हासिल की। एक मामूली किसान के बेटे से जल-क्रांति के नायक बने अय्यप्पा मसगि की कहानी नागरला गाँव से शुरू होती है।

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अय्यप्पा मसगि का जन्म 1 जून, 1957 को कर्नाटक के गदग जिले के नागरला गाँव में हुआ। पिता महादेवरप्पा गरीब किसान थे। माँ पार्वतम्मा गृहिणी थीं। छह भाई-बहनों में अय्यप्पा सबसे बड़े थे। अय्यप्पा के चार छोटे भाई और एक छोटी बहन हैं। वैसे तो महादेवरप्पा और पार्वतम्मा को कुल 12 संतानें हुईं लेकिन 6 संतानों की शिशु-अवस्था या फिर बाल्यावस्था में ही मौत हो गयी। जो संतानें जीवित रहीं उनमें अय्यप्पा सबसे बड़े थे।

लिंगायत जाति के अय्यप्पा का परिवार संयुक्त-परिवार था। अय्यप्पा के पिता महादेवरप्पा के छह भाई थे और सभी मिलजुल कर रहते थे। परिवार के पास 80 एकड़ ज़मीन थी और इसी ज़मीन में खेती-बाड़ी से संयुक्त-परिवार का गुज़र-बसर होता था। लेकिन, सबसे बड़ी दिक्कत ये थी कि गाँव में अक्सर सूखा पड़ता और फसल नहीं हो पाती। सूखे की मार परिवार ने कई बार झेली थी। वैसे भी गदग जिला ही सूखे की वजह से जाना जाने लगा था। गदग जिले में सूखा आम बात हो गयी थी।

अय्यप्पा के माता-पिता दोनों अशिक्षित थे। माँ अय्यप्पा को पढ़ा-लिखाकर बड़ा आदमी बनाना चाहती थीं। लेकिन,पिता चाहते थे कि अय्यप्पा खेती-बाड़ी में उनका साथ दें। अय्यप्पा कहते हैं, “मेरे पिता बहुत ही कंजूस इंसान थे। रुपये-पैसे उनको बहुत प्यारे थे। वे मेरी पढ़ाई-लिखाई पर खर्च करने को तैयार ही नहीं थे। वे खुदगरज़ इंसान थे। उन्हें दूसरों की फ़िक्र नहीं थी, वे बस अपने बारे में ही सोचते थे। माँ मेरी चाहती थी कि मैं खूब पढ़ाई-लिखाई करूँ। माँ की जिद की वजह से ही मैं स्कूल जा पाया था।”

पिता कितने बड़े कंजूस थे इस बात को बताने और समझाने के लिए अय्यप्पा मसगी ने एक घटना सुनायी। उन्होंने कहा, “हमारा मकान बहुत छोटा था। मिट्टी का बना हुआ मकान था। घर में बिजली नहीं थी। एक रात मैं कंदील की रोशनी में पढ़ाई कर रहा था। इतने में मेरे पिता आ गए और उन्होंने जैसे ही देखा कि मैं कंदील की रोशनी में पढ़ रहा हूँ वे आग-बबूला हो गए। उन्होंने गुस्से में सबसे पहले कंदील को बुझाया और फिर जोर से मुझे एक चांटा मारा। मुझे समझ में नहीं आया कि मेरे पिता ने मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया था। जब माँ ने पूछा कि मुझे किस बात की सजा मिली है तब पिता ने बताया कि कंदील की रोशनी में पढ़ाई कर मैं किरोसीन बर्बाद कर रहा हूँ। मेरे पिता की नज़र में किरोसीन जलाकर पढ़ाई करना फ़िज़ूल खर्च था। वे बिलकुल नहीं चाहते थे कि मैं स्कूल जाऊं और पढ़ाई-लिखाई करूँ। उनका मानना था कि किसान का बेटा पढ़-लिखकर भी किसान ही बनेगा और जब किसान के बेटे को किसान ही बनना है तब स्कूल जाकर पढ़ने-लिखने की क्या ज़रुरत है।”

लेकिन, अय्यप्पा मसगी की माँ के ख्यालात दूसरे थे। उन्हें लगता था कि अगर उनका बेटा पढ़-लिख जाएगा तो उसे नौकरी मिलेगी। नौकरी करने से हर महीने निर्धारित समय पर तनख्वाह मिल जायेगी और गदग जिले के किसानों की तरह मौसम पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। पार्वतम्मा अपने लड़के अय्यप्पा को पढ़ा-लिखा कर बड़ा अफसर बनाने का सपना देखती थीं।

अय्यप्पा भी अपनी माँ से बहुत प्रभावित थे। माँ घर-परिवार चलाने के लिए दिन-रात मेहनत करती थीं। सूखा-ग्रस्त इलाका होने की वजह से गाँव में पानी की इतनी किल्लत थी कि माँ को चार-पांच किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ता। घर की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पानी बहुत ज़रूरी था। और, पानी के लिए गांववालों के बीच बहुत मारामारी भी होती थी। पानी जुटाने के लिए माँ हर दिन तड़के तीन बजे उठतीं और चार-पांच किलोमीटर दूर पैदल चलकर कुएं के पास जातीं। अक्सर अय्यप्पा भी माँ के साथ पैदल चार-पांच किलोमीटर दूर जाकर घर की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पानी लाते थे।

अय्यप्पा कहते हैं, “माँ जहाँ से पानी लाती थीं वे कुदरती कुएं थे।चारों तरफ मिट्टी ही मिट्टी होती और माँ को इस मिट्टी में नीचे उतर कर पानी बटोरना होता। इसमें जान को बहुत खतरा था। कई बार ऐसा हुआ था कि अचानक मिट्टी तेज़ी से फिसल जाती थी और इंसान उसी मिट्टी के नीचे दबकर मर जाते थे। माँ और मैं बहुत खुशनसीब थे कि हम जब भी पानी भरने गए तब मिट्टी नहीं फिसली।” इस तरह की घटनाओं की वजह से अय्यप्पा बचपन में ही पानी की अहमियत तो अच्छी तरह से समझ गए थे। पानी जुटाने के लिए माँ की दिन-रात की कोशिशों को देखकर अय्यप्पा ने बचपन में ही संकल्प ले लिया था कि वे बड़े होकर ऐसा कुछ काम करेंगे जिससे लोगों को उनकी माँ की तरह पानी के लिए मुसीबतें न उठानी पड़ें।

माँ की बदौलत ही अय्यप्पा स्कूल जाते थे और उन पर ये जुनून सवार हो गया था कि उन्हें अफसर बनकर अपनी माँ का सपना पूरा करना है। साथ ही उस संकल्प को भी पूरा करना है जहाँ लोगों को पानी के लिए तरसना न पड़े।

अय्यप्पा का दाखिला गाँव के ही सरकारी स्कूल में करवाया गया। उन दिनों ये स्कूल एक मस्जिद में चलता था और अय्यप्पा वहीं जाकर पढ़ते थे। गरीबी का आलम ये था कि अय्यप्पा सिर्फ शर्ट पहनकर ही स्कूल जाते थे। चौथी क्लास तक उन्होंने कभी चड्डी पहनी ही नहीं। अय्यप्पा मुस्कुराते हुए कहते हैं, “सभी बच्चे मेरे जैसे ही थे। आधे नंगे ही स्कूल आते थे सभी। घर में हम सभी ऐसे ही आधे नंगे घूमते-फिरते और खेलते-कूदते थे। उस समय कोई शर्म नहीं थी। हालत इतनी खराब थी कि एक ही शर्ट महीनों तक पहनते थे।”

बचपन की यादें अय्यप्पा के ज़हन में अब भी ताज़ा हैं। उन्हें वे दिन भी याद हैं जब वे मिट्टी में खेलते थे। बदन उनका सारा मिट्टी से सना हुआ होता था। लेकिन, एक मामले में अय्यप्पा गाँव के दूसरे बच्चों के बहुत अलग थे। शुरू से ही अय्यप्पा पढ़ाई-लिखाई में बहुत तेज़ थे। हर कोई टीचर जो भी पढ़ाता अय्यप्पा उसे अच्छे से समझ जाते और सारे पाठ को अपने ज़हन में कैद कर लेते। हर परीक्षा में वे अव्वाल रहते। यही वजह भी थी कि सारे टीचर उन्हें बहुत चाहते भी थे।

अय्यप्पा ने चौथी क्लास तक उसी मस्जिद वाली स्कूल में पढ़ाई की। वे जब पांचवीं में आये तब सरकारी स्कूल का भवन तैयार था। लेकिन, अब उनके सामने बड़ी मुसीबतें थीं। पढ़ाई-लिखाई का खर्च बढ़ गया था। पिता अब भी मदद करने को तैयार नहीं थे। माँ कोशिश तो बहुत कर रही थीं, लेकिन उनके लिए भी किताबें, कलम-दवात के लिए रुपये जुटाना मुश्किल हो रहा था। ऐसे में अय्यप्पा के मन में एक ख्याल आया। उन्होंने अपने टीचरों से मदद मांगने की सोची। टीचर जान चुके थे कि अय्यप्पा बहुत ही मेहनती, आज्ञाकारी और होशियार लड़का है और वो अपनी इन्हीं खूबियों की वजह से आगे चलकर बहुत बड़ा आदमी बनेगा। इसी वजह से जब अय्यप्पा ने अपने शिक्षकों से मदद माँगी तो उन्होंने झट-से हाँ कर दी। लेकिन, अय्यप्पा स्वाभिमानी थे और उन्होंने इस मदद के बदले अपने शिक्षकों की भी मदद की। अय्यप्पा अपने शिक्षकों के घर जाते और वहां पर वे साफ़-सफाई का काम करते। अय्यप्पा अपने टीचरों के घर-परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कुएं से पानी भी लाते थे। अपने टीचरों के घर में जो काम उन्हें सौंपा जाता वे उसे मन लगाकर पूरा करते थे। टीचर भी अय्यप्पा की सेवा से बहुत खुश थे।

कई बार तो ऐसा भी हुआ कि टीचरों ने अय्यप्पा को अपने घर ही में रख लिया। कई दिनों बाद अय्यप्पा अपने घर जाते थे। माँ भी इस बात पर बहुत खुश थीं कि टीचर सारे अय्यप्पा को बहुत प्यार करते थे और वे उन पर मेहरबान भी थे। अय्यप्पा बताते हैं, “प्राइमरी स्कूल के दिनों में चार मास्टरों ने बहुत मदद की थी। गणप्पा मास्टर, टी.हेच.वाल्मीकि सर, एम.डी.गोगेरी मास्टर और वी.एम.मडीवालार मास्टर ने मुझे बहुत प्यार दिया। मैं कई दिनों तक इन्हीं लोगों के घर पर रहा था। उनका एहसान मैं ज़िंदगी-भर नहीं भूल सकता हूँ।”

हाई स्कूल की पढ़ाई के दौरान भी शिक्षकों ने अय्यप्पा की खूब मदद ही। एस.एल.हंचनाड, आर.एम.दिवाकर और सी.वी.वंकलकुंती शुरुआत में ही जान गए थे कि उनका शिष्य अपने नाम से साथ-साथ उनका नाम भी रोशन करेगा। लेकिन, शिक्षक इस बात को लेकर हैरान थे कि होनहार और तेज़ होने के बावजूद पिता अय्यप्पा की मदद क्यों नहीं कर रहे हैं। एक दिन हंचनाड मास्टर अय्यप्पा के पिता से मिले और उन्होंने कहा- “आपका लड़का बहुत मेहनती है¸, क्लास में हमेशा सबसे आगे रहता है। आगे चलकर ये बहुत बड़ा आदमी बन सकता है, आप इसकी मदद कीजिये और इसकी ओर ध्यान दीजिये।” इस अनुरोध के जवाब में जो बात अय्यप्पा के पिता ने कही उसे सुनकर हंचनाड मास्टर के होश उड़ गए। अय्यप्पा के पिता ने हंचनाड मास्टर से कहा, “आप अपना काम देखिये। मुझे अपना काम करने दीजिये। अय्यप्पा क्या बनेगा मुझे नहीं पता, लेकिन जब बनेगा तब देखेंगे। मैंने तो उसे पढ़ने के लिए नहीं कहा। वो पढ़ रहा सो वो जाने। मुझे आप क्यों परेशान कर रहे हैं? आप मेरे पास अगली बार आईयेगा भी मत।” 

अय्यप्पा अपने पिता की मानसिकता को पहले से जानते थे और इसी वजह से उनकी इन बातों का उन पर कोई असर नहीं पड़ा। अय्यप्पा ने अपने टीचरों की मदद से पढ़ाई-लिखाई जारी रखी। अय्यप्पा ने अपने शिक्षकों को कभी भी निराश नहीं किया। दसवीं की परीक्षा में शानदार प्रदर्शन कर अय्यप्पा ने अपने शिक्षकों का नाम खूब रोशन किया। अय्यप्पा ने वो काम कर दिखाया था जिसे इन शिक्षकों के किसी भी छात्र ने पहले नहीं किया था। अय्यप्पा ने डिस्टिंगक्शन में दसवीं की परीक्षा पास की। उस ज़माने में जहाँ दसवीं की परीक्षा पास करना ही बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जानी थी वहीं अय्यप्पा ने डिस्टिंगक्शन में दसवीं की परीक्षा पास कर न सिर्फ अपने स्कूल, अपने गाँव बल्कि सारे तालुक का नाम रोशन किया था। अपने प्रिय शिष्य की उपलब्धि पर सारे शिक्षक भी फूले नहीं समा रहे थे। गांववाले इतना खुश हुए थे कि सभी ने मिलकर एक भारी जुलूस भी निकाला। अय्यप्पा को गांववाले एक के बाद एक अपने कंधे पर बिठाकर उन्हें सारा गाँव घुमा रहे थे। जब पिता ने ये जुलूस देखा तब उन्होंने गांववालों से पूछा – “मेरे बेटे को लेकर तुम सब ये जुलूस क्यों निकाल रहे हो? मेरे बेटे के गले में फूलों की ये मालाएं क्यों पहनाई गयी हैं?” गांववाले भी जानते थे कि पिता को अय्यप्पा की पढ़ाई-लिखाई से कोई लेना-देना नहीं है। अय्यप्पा कहते हैं, “मेरे पिता कभी भी शिक्षा के महत्त्व को नहीं समझ पाए। उन्हें लगता कि गाँव के लोगों को गाँव में ही रहना है और उन्हें वही काम करने हैं जो उनके पुरखे करते आये हैं। पिता को ये भी मालूम था कि उनका लड़का दसवीं की परीक्षा में पास हो गया है। डिस्टिंगक्शन क्या होता है ये तो उन्हें मालूम ही नहीं था। वे बस अपने में मस्त रहते थे। सारा गाँव खुश था, सभी जश्न मना रहे थे, पिता मेरे इन सब से बेपरवाह थे।”

अय्यप्पा से हमारी बेहद ख़ास मुलाकार बेंगलुरु में उनके घर पर हुई थी। इस मुलाक़ात के दौरान दो और घटनाओं का ज़िक्र कर वे बहुत भावुक हो गए थे। ये घटनाएं ऐसी थीं जहाँ उन्हें अपने मास्टर से मार पड़ी थी।

मास्टर के हाथों पिटाई की पहली घटना बताते हुए अय्यप्पा ने कहा, “मैं क्लास में सबसे तेज़ था। गणित में भी मैं सबसे आगे था। जब कोई लड़का टीचर के सवाल का गलत जवाब देता तब टीचर मुझे उनकी पिटाई करने को कहते। क्लास का एक नियम बन गया था- जो विद्यार्थी गलत जवाब देते थे उनकी पिटाई सही जवाब देने वाले विद्यार्थियों से कराई जाती। कई बार ऐसा होता कि मैं अकेला ही सही जवाब देने वाला विद्यार्थी होता और मुझे ही क्लास के बाकी सारे विद्यार्थियों को पीटना पड़ता। गणपति मास्टर मुझसे कहते दूसरे विद्यार्थियों की नाम पकड़ो और गालों पर जमकर तमाचे जड़ो। मैं ऐसा ही करता। और गाँववाले भी मुझे ये कहकर उकसाते थे – “अय्यप्पा, पीट, और जमकर पीट” । इन बातों से मुझमें ऐसा जोश आता कि मैं वाकई सहपाठियों की जमकर पिटाई कर देता, कसकर उनकी नाक पकड़ता और गालों पर जोर से चांटे मारता। इस पिटाई की वजह से कुछ विद्यार्थी मेरे दुश्मन हो गए। एक दिन जब मैं स्कूल से छुट्टी के बाद घर लौट रहा था था तब कुछ विद्यार्थियों ने मुझे पकड़ लिया और बदले की भावना से मुझे पीटने लगे। मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने पलटवार किया। वहां पर मुझे लोहे की एक सीख दिखाई दी और मैंने उसे उठा लिया। मैंने लोहे की सीख लेकर एक विद्यार्थी पर हमला कर दिया। हमला इतना ज़ोरदार था कि उसका मूंह फट गया। चेहरे के एक तरह का हिस्सा बिलकुल बिगड़ गया। इस हमले के बाद सारे विद्यार्थी वहां से भाग गए। मैं भी बहुत डर गया था। मेरी समझ में भी कुछ नहीं आ रहा था। तैश में मैंने अपने एक सहपाठी को खून-खून कर दिया था। मैं इतना घबरा गया था कि मैं मंदिर गया और वहीं छुप गया। लेकिन, टीचरों ने मुझे ढूँढ निकाला और मेरी जमकर धुनाई की। ये पहली बार ऐसा हुआ था जब मैंने किसी टीचर से मार खाई थी।”

अय्यप्पा ये कहते हुए बहुत खुश होते हैं कि “मैंने कभी पढ़ाई-लिखाई के सिलसिले में अपने शिक्षकों से मार नहीं खाई। मेरी पिटाई इस वजह से हुई क्योंकि मैंने कुछ बदमाशी की, या फिर मेरे टीचर किसी गलतफहमी का शिकार हुए। मैंने अपने स्कूल के दिनों में सिर्फ दो बार ही मास्टर से मार खाई थी।”

मास्टर के हाथों पिटाई की दूसरी घटना के बारे में बताते हुए अय्यपा ने कहा, “ये घटना उस समय की है जब मैं सातवीं क्लास में था। बसवलिंगय्या नाम के मास्टर हमें पढ़ा रहे थे। उन्होंने मुझसे मेरी पेन ली थी। मैं दूसरी बेंच में बैठता था और चूँकि मास्टर का हाथ मुझ तक नहीं पहुँचता था , उन्होंने पेन पहली बेंच पर मेरे सामने बैठे एक विद्यार्थी को थमा दी। वो विद्यार्थी मुझसे शरारत करने लगा। वो विधार्थी मेरी पेन मेरे सामने करता और जैसे ही मैं उसे लेने के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाता वो पेन पीछे खींच लेता। कुछ देर तक ये सिलसिला चला। बसवलिंगय्या मास्टर जब ब्लैक बोर्ड पर लिख रहे थे तब ये सिलसिला चल रहा था, इसी वजह से वे नहीं देख पाए थे। सहपाठी की शरारत से जब मैं तंग आ गया तब मैंने जोर से उस पर झपटा मारा और पेन खींच ली। ये चीज़ बसवलिंगय्या मास्टर ने देख ली और उन्हें लगा कि मैंने बेवजह ही अपने सहपाठी पर झपटा मारकर उसे ज़ख़्मी किया है। इस बात के लिए मुझे चांटा मारा गया।”

सूडी के गुरु महंतेश्वर हाई स्कूल से डिस्टिंगक्शन में दसवीं पास करने के बाद अय्यप्पा प्री-यूनिवर्सिटी कोर्स में साइंस पढ़ना चाहते थे। लेकिन, कॉलेज की फीस इतनी ज्यादा थी कि माँ उसका बोझ उठाने में असमर्थ थीं। गरीबी और हालात की मजबूरी में अय्यप्पा को साइंस के बजाय कॉमर्स लेना पड़ा। अय्यप्पा बताते हैं, “चूँकि मुझे डिस्टिंगक्शन मिला था कॉमर्स में मुझे मेरिट लिस्ट में जगह मिल गयी थी। फीस भी नहीं भरनी पड़ी और मुझे हॉस्टल में रहने के लिए भी मुफ्त में ही जगह मिल गयी। खाना-पीना, किताबें सब मुफ्त में ही मिला। अगर मैं साइंस लेता तो मुझे 450 रुपये अदा करने पड़ते। हमारे लिए उस समय ये बहुत बड़ी रकम थी। इतने रुपये जुटाना मेरी माँ के बस की बात नहीं थी।”

अय्यप्पा का दाखिला नवलगुंडा के शंकर आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज में हुआ। इस कॉलेज में भी अय्यप्पा ने मन लगाकर पढ़ाई ली। हमेशा की तरह ही इस बार भी उनकी मेहनत रंग लाई और वे फर्स्ट क्लास में पास हुए।

पीयूसी पूरा करने के बाद अय्यप्पा दुविधा में पड़ गए। उन्हें ये समझ में नहीं आ रहा था कि उन्हें आगे क्या करना है। चूँकि उन्होंने कईयों से सुना था कि इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट यानी आईटीआई का कोर्स करने से नौकरी आसानी से मिल जाती है उन्होंने कॉमर्स में आगे की पढ़ाई करने के बजाय आईटीआई में दाखिला लिया। अय्यप्पा ने कहा, “ उस समय न मुझे एमबीए के बारे में पता था न एमसीए के बारे में। मैंने आईएएस और आईपीएस के बारे में भी कभी नहीं सुना था। गाँव के माहौल में पढ़ने-लिखने की वजह से मुझे कई चीज़ों के बारे में नहीं पता था। सही तरह से गाइड करने वाला भी कोई नहीं था। टीचर जितनी मदद कर सकते थे उन्होंने की। उस समय मुझे लगा कि आईटीआई करने से नौकरी जल्द ही मिल जायेगी मैंने ज्वाइन कर लिया।” 

उन दिनों इलेक्ट्रिकल इंजीनियरों की बहुत मांग थी। बिजलीकरण का दौर था और राज्य सरकारें हर शहर और हर गाँव में बिजली पहुंचाने की कोशिश में जुटी थीं। इसी वजह से अय्यप्पा ने भी आईटीआई में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के लिए अपनी अर्जी दी। आईटीआई की प्रवेश परीक्षा में अय्यप्पा को 100 में से 98 नंबर मिले। लेकिन, एक प्रशासनिक गलती की वजह से अय्यप्पा को फिटर कोर्स यानी मेस्त्री वाले कोर्स में डाला गया। फिटर कोर्स में उन दिनों उन लोगों को भी दाखिला दिया जाता था जो कि दसवीं भी पास नहीं हैं। अय्यप्पा को 100 में से 98 नंबर पाने के बावजूद फिटर कोर्स में डाला गया जबकि वे इलेक्ट्रिकल कोर्स के हकदार थे।

अय्यप्पा ने बताया, “मुझे लगा कि भगवान मेरी परीक्षा ले रहे हैं। मैं फिटर कोर्स नहीं करना चाहता था। मेरे साफ़ नाइंसाफी हुई थी । मेरी हालत देखकर वी.जी. हीरेमठ नाम के एक लेक्चरर ने मेरी मदद करने की कोशिश की। उन्होंने आईटीआई के प्रिंसिपल से बात की और मेरी सिफारिश भी। लेकिन, इस सिफारिश का प्रिंसिपल पर कोई असर नहीं हुआ और उन्होंने नियमों का हवाला देकर मुझे फिटर कोर्स में डाल दिया। गलती मेरी नहीं थी, गलती आईटीआई प्रशासन की थी। उन्होंने मुझे बुलाये बगैर ही रिकॉर्ड में ये लिख दिया था कि अय्यप्पा मसगि इंटरव्यू के लिए गैर-हाज़िर थे।”

अब चूँकि अय्यप्पा के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था उन्होंने फिटर कोर्स में दाखिले के लिए हाँ कर दी। लेकिन, अब उनके पास एक बड़ी चुनौती थी। फिटर कोर्स के लिए उन्हें फीस जमा करनी थी। फीस जमा करने के लिए अय्यप्पा को अपनी माँ के गहने बेचने पड़े। उस दिन के बारे में बताते हुए अय्यप्पा बहुत ही भावुक हो गए। उनकी आँखों से आंसुओं की धार निकल पड़ी। किसी तरह से अपने आप को संभालकर उन्होंने कहा, “ मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था। मैंने सोने और चांदी के गहने बेच दिए। गहने बेचकर मुझे अस्सी रुपये मिले थे और इन्हीं रुपयों से मैंने आईटीआई में दाखिले की फीस भरी।”

उस दिन की यादें अभी भी अय्यप्पा को बहुत सताती हैं। अपनी माँ के त्याग की याद के तौर पर अय्यप्पा मसगी ने एक प्रण लिया था। उन्होंने फैसला लिया था कि वे जीवन-भर में कभी भी सोने या चांदी की कोई भी वस्तु अपने शरीर पर धारण नहीं करेंगे। अय्यप्पा अपने इस प्रण को अपनी मृत्यु तक निभाने के लिए संकल्पबद्ध हैं। वे कहते हैं, “माँ ने त्याग नहीं किये होते तो मैं कुछ भी न होता। मैं भी गाँव में खेती-बाड़ी ही कर रहा होता। माँ ने मेरी पढ़ाई-लिखाई के लिए बहुत त्याग किये। मैं जब कभी सोना या चांदी का कोई जेवर देखता हूँ तो मुझे माँ का त्याग ही याद आता है।” 

आईटीआई में दाखिले के बाद पहले दिन से ही अय्यप्पा ने अपने काम और अनुशासन से शिक्षकों का दिल जीतना शुरू कर दिया। नोट बुक्स देखकर तिमप्पा मास्टर इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने अय्यप्पा से पूछ लिया कि – “तुम तो बहुत इंटेलीजेंट हो, फिर फिटर का काम क्यों सीख रहे हो? इस सवाल के जवाब में अय्यप्पा ने उनके साथ हुई नाइंसाफी और प्रशासनिक गलती के बारे में बताया। इसके बाद तिमप्पा मास्टर आईटीआई के प्रिंसिपल के पास गए और अय्यप्पा को इंसाफ दिलाने की गुहार लगाई। प्रिंसिपल को इंसाफ करने के लिए बाध्य होना पड़ा, लेकिन वे अय्यप्पा का दाखिला इलेक्ट्रिकल्स में नहीं करवा पाए और अय्यप्पा को मैकेनिकल विभाग में जगह दी गयी जोकि फिटर से अच्छी थी। मैकेनिकल विभाग में दाखिले के बाद अय्यप्पा ने पढ़ाई-लिखाई में जी जान लगा दिया। आईटीआई के दिनों में हीरेमट मास्टर ने अय्यप्पा की खूब मदद की थी।

लेकिन, आईटीआई में भी अय्यप्पा को गरीबी की मार झेलनी पड़ी थी। उन दिनों रिकार्ड बुक और दूसरी ज़रूरी किताबें खरीदने के लिए भी उनके पास 40 रूपए तक नहीं थे। कॉलेज के 180 विद्यार्थियों में से अय्यप्पा को छोड़ सभी ने किताबें और रिकार्ड बुक्स खरीब ली थीं। जब ये बात तिमप्पा मास्टर को पता चली तो उन्होंने इसकी जानकारी हीरेमट मास्टर को दी। हीरेमट मास्टर को लगा कि अय्यप्पा ने उनके पिता के भेजे हुए रुपये खर्च कर दिए हैं और इसी वजह से उनके पास किताबें खरीदने को रुपये नहीं हैं। लेकिन, या बात सच नहीं थी। पिता ने अय्यप्पा को रुपये दिए ही नहीं थे। गलतफहमी का शिकार हीरेमट मास्टर ने अय्यप्पा को अपने पास बुलाया तो कसकर गाल पर चांटा जड़ दिया और पूछा कि पिता के भिजवाये रुपयों को कहाँ खर्च कर दिया। सवाल के जवाब में जब अय्यप्पा ने सच्चाई बताई तो हीरेमट मास्टर को बहुत पछतावा हुआ और वो रो बैठे। इसके बाद हीरेमट मास्टर ने अय्यप्पा को किताबें खरीदने के लिए अपनी जेब से रुपये दिए । अय्यप्पा कहते हैं, “किसी टीचर के हाथों ये मेरी तीसरी मार थी। बस मैंने तीन बार भी अपने टीचरों से मार खाई थी। हीरेमट मास्टर ने आगे भी मेरा बहुत ख्याल रखा था।”

वे अय्यप्पा की आर्थिक रूप से भी मदद करते थे। एक बार हीरेमट मास्टर के लड़के को भी गलतफहमी हो गयी थी। हुआ यूँ था कि अय्यप्पा को उनके कुछ अमीर रिश्तेदार अपने पुराने कपड़े पहनने के लिए दे देते थे। कहने को वे पुराने थे लेकिन नए सरीके दिखते थे और ये कपड़े ‘लेटेस्ट फैशन’ वाले भी थे। इन्हीं कपड़ों को देखकर एक दिन हीरेमट मास्टर के लड़के ने अपने पिता से पूछा – देखिये अय्यप्पा ‘लेटेस्ट फैशन’ वाले कपड़े पहनता है, वो अमीर है। आप उसको गरीब समझने की गलती कर रहे हैं। आप उसकी मदद करना बंद कर दीजिये। हीरेमट मास्टर हकीकत जानते थे और इसी वजह से उन्होंने अय्यप्पा की मदद करना बंद नहीं किया। अय्यप्पा ने बताया, “मेरे चाचा और बुवा अच्छा कमाने लगे थे। वे लोग इस्तेमाल किये हुए कुछ कपड़े मुझे दे देते थे और मैं वही पहनता भी था। मुझे उन दिनों अपने चाचा से दो ‘बटन वाले शर्ट’ भी मिले थे। यही ‘दो बटन वाले शर्ट’ उन दिनों में काफी लोकप्रिय थे और अमीर लोग ही इस तरह की शर्ट पहनते थे। जब मेरे मास्टर के लड़के ने देखा कि मैं भी ‘दो बटन वाली शर्ट’ पहन रहा हूँ तो उसे भी लगा कि मैं अमीर हूँ।” 

इन सब छोटी-बड़ी घटनाओं के बीच अय्यप्पा ने आईटीआई को कोर्स पूरा कर लिया। आईटीआई की परीक्षाओं में भी अय्यप्पा ने शानदार प्रदर्शन कर अपने कॉलेज और टीचरों का नाम रोशन किया। इस बार भी वे डिस्टिंक्शन में पास हुए। चूँकि अय्यप्पा को आईटीआई की परीक्षाओं में शानदार नंबर मिले थे उन्हें ‘भारत अर्थ मूवर्स’ नाम की सरकारी संस्था में प्रशिक्षुता के लिए चुना गया। अय्यप्पा कहते हैं, “वो दिन मैं कभी नहीं भूल सकता। वो मेरी पहली नौकरी थी। बेंगलुरु में मुझे नौकरी मिली थी। पिता ने मुझे सौ रुपये दिए थे बेंगलुरु जाने के लिए। अपने गाँव से जब मैं बेंगलुरु पहुंचा था तब मेरी जेब खाली थी। मेरा पेट भी खाली था। सारे रुपये रास्ते में ही ख़त्म हो गए थे। मेरे पास सिर्फ कपड़ों से भरा एक बकसा था। मैं भूखे पेट ही कंपनी गया और काम पर लग गया।”

‘भारत अर्थ मूवर्स’ में अय्यप्पा को प्रशिक्षु होने के नाते 150 रुपये महीना वजीफे के तौर पर दिए जाने लगे। इन डेढ़ सौ रुपयों में से अय्यप्पा सिर्फ 60 रुपये अपनी ज़रूरतों के लिए खर्च करते और बाकी 90 रुपये की बचत करते। बतौर प्रशिक्षु अय्यप्पा का काम इतना बढ़िया था कि जल्द ही ‘भारत अर्थ मूवर्स’ में उनकी नौकरी पक्की कर दी गयी। उनकी तनख्वाह महीने आठ सौ रुपये तय की गयी। जून, 1980 में अय्यप्पा को अपनी ज़िंदगी की पहली पगार मिली। उस दिन की यादें हमारे साथ साझा करते हुए अय्यप्पा ने बताया, “मैंने पहली बार आठ सौ रुपये अपने हाथ में लिए थे। नोट गिनते समय मेरे हाथ कांपने लगे थे। मैं बहुत खुश था। मुझे पहली बार लगा कि मैं अपने घर-परिवार की गरीबी दूर कर पाऊंगा।”

‘भारत अर्थ मूवर्स’ में भी अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर अय्यप्पा ने खूब नाम कमाया। ‘भारत अर्थ मूवर्स’ में नौकरी करने के दौरान उन्हें चेन्नई में होने जा रहे राज्य स्तरीय कौशल प्रतियोगिता के बारे में पता चला। अय्यप्पा ने भी इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और उनका कौशल देखकर एल एंड टी कंपनी के अधिकारी इतना प्रभावित हुए कि उन्हें एक हज़ार एक सौ रुपये की मासिक तनख्वाह पर नौकरी देने की पेशकश की। चूँकि एल एंड टी कंपनी बहुत ही मशहूर और बड़ी कंपनी थी अय्यप्पा ने नौकरी की पेशकश को स्वीकार कर लिया। एल एंड टी कंपनी में भी अय्यप्पा ने अपने कौशल, अपनी ईमानदारी और मेहनत से खूब नाम कमाया और साल दर साल तरक्की की।

इसी दौरान अय्यप्पा की शादी शारदा देवी से की गयी। शारदा देवी के पिता कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम में काम करते थे और उनके पास अच्छी नौकरी के साथ-साथ अच्छी-खासी धन-दौलत भी थी। शादी से जुडी बातें बताते हुए अय्यप्पा के कहा, “मेरे ससुर ने मेरे बारे में जिस किसी से पूछताछ की थी उन सभी ने मेरे बारे में अच्छी रिपोर्ट दी । सभी ने मेरे बारे में कहा था कि मैं एक दिन बड़ा आदमी बनूंगा। मेरे ससुर को भी मेरा चाल-चलन और चरित्र बहुत पसंद आया और वे अपनी बेटी की शादी मुझसे करवाने के लिए राजी हो गए।” अय्यप्पा हमें ये बात बताने से भी नहीं हिचकिचाए कि उन्हें 1983 में शादी के समय दस हज़ार रुपये दहेज़ के तौर पर दिए गए थे। 

एल एंड टी कंपनी में काम करने के दौरान ही अय्यप्पा ने मैसूर एजुकेशनल इंस्टिट्यूट पॉलिटेक्निक से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा का कोर्स भी पूरा कर लिया। ये कोर्स भी अय्यप्पा ने डिस्टिंक्शन में पास किया। एल एंड टी कंपनी में काम करते हुए ही उन्हें बेंगलुरु विश्वविद्यालय से स्टटिस्टिकल क्वालिटी कंट्रोल में पोस्ट ग्रेजुएशन करने का मौका मिला। ये मौका अय्यप्पा के दूसरे सहकर्मियों को भी मिला था, लेकिन अय्यप्पा ही परीक्षा पास कर पाए थे। अय्यप्पा बताते हैं, “उन दिनों मेरा काम आठ घंटे का होता था और मैं अपने दफ्तर का काम चार घंटे में ही पूरा कर लेता था। बाकी के चार घंटे मैं टॉयलेट में जाकर बैठ जाता और वहीं पढ़ाई करता।”

टॉयलेट में बैठकर पढ़ाई करने का नतीजा भी अच्छा ही निकला। इस पढ़ाई की वजह से वे पोस्ट ग्रेजुएट भी बन गए। कंपनी में उनकी तरक्की हुई और वे कर्मचारी कैडर से मैनेजमेंट कैडर में आ गए। मैनेजमेंट कैडर में रहते हुए अय्यप्पा ने कंपनी के लिए लाखों रुपयों की बचत की। अय्यप्पा ने रद्दी सामग्री का दुबारा इस्तेमाल कर एक साल में दो करोड़ रूपये की बचत की थी। इसके लिए उनकी भूरि- भूरि प्रशंसा भी की गयी। इस तरह की प्रशंसा उन्हें कई बार मिली थी और वे इससे खुश भी होते।

लेकिन, उनकी दिलचस्पी तारीफों के कसीदे सुनने में नहीं थी। वे अपने एक मिशन को कामयाब बनाना चाहते थे। वो एक ऐसा मिशन था जोकि बचपन से उनके मन-मस्तिष्क को परेशान करता रहा था। माँ की तकलीफों को देखकर उन्होंने जो संकल्प लिया था वे उसे पूरा करना चाहते थे। अय्यप्पा ने जब एल एंड टी कंपनी में काम करते हुए अच्छी-खासी दौलत कमा ली और अपने घर-परिवार की गरीबी भी दूर कर ली तब उन्होंने फैसला लिया कि वे अब अपने मिशन पर काम करना शुरू कर देंगे। 

ये मिशन था- गाँवों और शहरों में पानी की किल्लत को दूर करना। मिशन आसान नहीं था, एक अकेला आदमी ऐसा करने की सोच भी नहीं सकता था। लेकिन, अय्यप्पा ने प्रण लिया कि वे इस मिशन को कामयाब बनाने के लिए अपना जी जान लगा देंगे। वे बचपन से ही पानी की किल्लत से होने वाली समस्याओं और परेशानियों का अनुभव करते आ रहे थे। उन्होंने अपनी माँ को अपनी ज़िंदगी जोखिम में डालकर कई किलोमीटर दूर नंगे पाँव जाकर पानी लाते हुए देखा था। सूखे से पीड़ित किसानों की दुर्दशा देखी थी। सूखे की वजह से नुकसान झेलने वाले कई किसानों की खुदकुशी के बारे में सुना था। पानी के लिए होती मारा-मारी को अपनी आँखों से देखा था। इसी वजह से उन्होंने संकल्प ले लिया कि वे पानी की किल्लत को दूर करने के उपाय ढूँढेंगे और किसानों और दूसरे लोगों की मदद करेंगे।

अपने लक्ष्य को पाने के लिए अय्यप्पा ने एल एंड टी कंपनी से इस्तीफ़ा दे दिया और पानी की किल्लत दूर करने के उपाय खोजने शुरू किये। जब पत्नी को इस बात का पता चला कि अय्यप्पा ने नौकरी छोड़ दी है और पानी की समस्या दूर करने के उपाय ढूँढने निकले हैं तब उन्हें बहुत गुस्सा आया। पत्नी ने अय्यप्पा को खूब खरी-खोटी सुनायी। कई अपशब्द कहे। पत्नी ने अय्यप्पा को ‘नायालक’ और ‘पागल’ भी करार दिया। अय्यप्पा की बड़ी बेटी ने भी अपनी माँ का ही साथ दिया। पत्नी और बड़ी बेटी के अपशब्दों और निरुत्साह करने वाली बातों से अय्यप्पा को बहुत दुःख हुआ । लेकिन उन्होंने अपनी पत्नी के अपशब्दों को चुनौती की तरह स्वीकार किया और ठान ली कि वे ये साबित करेंगे कि वे नालायक और पागल नहीं हैं। और इसके बाद अय्यप्पा अपने मिशन को कामयाब करने की कोशिश में जी-जान लगाकर जुट गए।

अय्यप्पा ने सबसे पहले अपने गाँव के करीब वीरापुरा में 6 एकड़ ज़मीन खरीदी और अपने प्रयोग शुरू किये। ये छह एकड़ ज़मीन उन्होंने 1.68 लाख रुपये में खरीदी थी। उन्होंने ये ज़मीन इस वजह से खरीदी थी क्योंकि इलाके में अक्सर सूखा पड़ता था और पानी की किल्लत रहती थी। सूखाग्रस्त इलाके से ही अय्यप्पा अपने प्रयोग शुरू करना चाहते थे। उन्होंने इस छह एकड़ ज़मीन में नारियल, केले, सुपारी, कॉफ़ी आदि के पेड़ लगाये। लेकिन, ज़मीन खरीदने के बाद लगातार तीन साल सूखा पड़ा। सूखा भी मामूली सूखा नहीं था। सारे कुएं, तालाब, नदी-नाले - सभी सूख गए थे। सारे बोर-वेल भी सूख गए। पानी था ही नहीं इसी वजह से फसल भी नहीं हो पायी थी। कई पेड़-पौधे भी सूखकर गिर गए। सूखे के दौरान अय्यप्पा ने अपनी ज़मीन पर एक झील बनाई ताकि जब भी बारिश आये तो ये झील पानी से भर जाए और उसी पानी से साल-भर खेतों और बाग़ में पानी का इस्तेमाल किया जा सके। 

तीन साल के सूखे के बाद यानी चौथे साल 2004 में बारिश हुई। लेकिन, बारिश इतनी ज्यादा हुई कि बाढ़ आ गयी। जो खेत सूखे थे और बूँद-बूँद पानी को तरस रहे थे वहीं बस पानी ही पानी था। पानी इतना ज्यादा था कि वो सब कुछ बर्बाद कर रहा था। कई मकान बाढ़ में बह गए थे, कईयों की जान चली गयी थी। वो बहुत भयानक स्थिति थी। अय्यप्पा ने उन दिनों को अपने जीवन के सबसे भयावह दिन बताते हुए कहा, “मेरी भी जान पर बन आयी थी। पानी इतना ज्यादा था कि हर तरफ पानी ही पानी दिखाई दे रहा था। गाँव में एक समय ऐसा था जब लोग बूँद-बूँद पानी को तरस रहे थे और वहीं वो दिन ऐसा था जहाँ लोग पानी से नफरत कर रहे थे। मेरा घर भी पानी में डूब गया था और मुझे अपनी जान बचाने के लिए पेड़ पर चढ़ना पड़ा था। पेड़ पर ही मैंने रात भी गुजारी थी। जब पानी का स्तर कम हो गया तब जाकर मैं नीचे उतरा था।” 

तीन साल के सूखे के बाद बाढ़ के अनुभव ने अय्यप्पा के दिमाग में नए विचारों और प्रयोगों को जन्म दिया। इस अनुभव से उन्हें आभास हुआ कि जब पानी है तब बहुत ज्यादा है और जब नहीं है तब कुछ भी नहीं है। उन्हें अहसास हुआ कि बारिश के मौसम में जो पानी बरसा वो बेकार चला गया। इस ज्ञानार्जन के बाद अय्यप्पा के मन में एक योजना सूझी। उन्होंने मानव निर्मित कुओं और तालाबों के ज़रिये बारिश के पानी को बचाकर रखने की योजना बनाई। उन्होंने अपनी छह एकड़ ज़मीन पर ऐसी जगह तालाब और कुएं बनवाये जहाँ बारिश का पानी आकर ठहर जाता था। अय्यप्पा की ये योजना कारगर साबित हुई और उनकी ज़मीन पर फसल, फलों के पेड़ों, बागवानी, कॉफ़ी,नारियल, केले, रबर आदि के पेड़ों के लिए भी साल-भर पानी उपलब्ध रहने लगा। अय्यप्पा ने अपने प्रयोग से ये साबित कर दिखाया था कि पानी की बचत से ही पानी की किल्लत को दूर किया जा सकता है। बारिश के पानी को बचाकर ही सूखे जैसे हालात में भी फसल उगाही की जा सकती है।

अपने कामयाब प्रयोग से उत्साहित अय्यप्पा ने जन संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए नया आन्दोलन शुरू करने का बड़ा फैसला लिया। अपने फैसले को अमलीजामा पहनाने के लिए उन्होंने साल 2005 में ‘वाटर लिटरेसी फाउंडेशन’ के नाम से एक गैर-सरकारी संस्था की स्थापना की और ‘जल साक्षरता आन्दोलन’ शुरू किया। इस आन्दोलन के तहत अय्यप्पा गाँव-गाँव और शहर-शहर जाकर लोगों में पानी की बचत और उसके सदुपयोग से होने वाले फायदे के बारे में बताने लगे। अय्यप्पा ने इस आन्दोलन के तहत लोगों को बारिश के पानी को बचाने की अलग-अलग तरकीबें भी बताईं-सिखाईं। अय्यप्पा की बताई तरकीबों को अमल में लाकर कई लोगों ने फायदा उठाना शुरू किया। अपने जल साक्षरता आन्दोलन की वजह से अय्यप्पा कुछ ही दिनों में काफी लोकप्रिय हो गए। दूर-दूर तक उनकी ख्याति पहुँची और दूर-दूर से लोग उन्हें अपने यहाँ बुलवाकर पानी की बचत के तौर-तरीके सीखने लगे। 

अय्यप्पा ज्यादातर मामलों में एक ख़ास और बेहद कारगर तकनीक/मॉडल का इस्तेमाल करते हैं। इस मॉडल के तहत अय्यप्पा जमीन में गड्ढे खोदते हैं और फिर उसमें रेत, मिट्‌टी, छोटे-बड़े कंकड़, पत्थर आदि डालते हैं। ऐसा करने से एक ऐसी संरचना बनती है जहाँ बारिश होने पर पानी आकर जमा होने लगता है। इस संरचना के भू-जल का स्तर भी बढ़ता है। यही तकनीक अब कई राज्यों में सरकारी संस्थाओं, आम लोगों, किसानों द्वारा भी इस्तेमाल में लाई जा रही है।

अय्यप्पा को एक बहुत बड़ी कामयाबी उस समय मिली जब उन्होंने बेंगलुरु से कुछ ही किलोमीटर दूर अर्देशनहल्ली गाँव में सारे सूखे बोर-वेल को पुनर्जीवित कर दिया। हुआ यूँ था कि अर्देशनहल्ली गाँव में सारे कुओं का पानी दूषित हो गया था। अर्देशनहल्ली गाँव के आसपास दवाईयां बनाने वाली कई फक्ट्रियाँ थीं और इन फक्ट्रियों से निकलने वाले रसायनों से गाँव के सारे कुएं और तालाब दूषित हो गए थे। पानी इतना दूषित हो गया था कि उसे पीने पर कई तरह की बीमारियाँ होने का खतरा था। अय्यप्पा को जब इस गाँव के बारे में पता चला उन्होंने इसे एक नयी चुनौती के तौर पर स्वीकार किया। सबसे पहले उन्होंने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर दवाईयों की फक्ट्रियों के खिलाफ आन्दोलन किया और जल-वायु – दोनों को प्रदूषित कर रहीं फक्ट्रियों को बंद करवाया। इसके बाद अपनी ईजाद की हुई तकनीकों से पानी की बचत करवाई और बारिश के पानी से सारे कुओं को पुनर्जीवित किया। इस काम की चारों तरफ सराहना हुई। ‘जल-पुरुष’ के नाम से मशहूर राजेंद्र सिंह को जब इस कामयाब आन्दोलन और प्रयोग के बारे में पता चला तो वे भी अध्ययन करने अर्देशनहल्ली गाँव आये थे।

अय्यप्पा के काम और उनके जल साक्षरता आन्दोलन से प्रभावित होकर विश्वविख्यात ‘अशोका फाउंडेशन’ भी उनकी मदद को आगे आया। ‘अशोका फाउंडेशन’ ने अय्यप्पा को अपनी फ़ेलोशिप से नवाज़ा और तीन साल तक तीस हज़ार रुपये महीना आर्थिक सहायता राशि के तौर पर देने का एलान किया। ‘अशोका फाउंडेशन’ की फ़ेलोशिप मिलने के बाद अय्यप्पा की लोकप्रियता और भी बढ़ गयी। उनके काम का बड़ी तेज़ी के विस्तार होने लगा। अलग-अलग राज्यों की सरकारें उन्हें अपना यहाँ बुलवाकर उनसे जल-संरक्षण के तौर-तरीके और तकनीकें सीखने लगीं। कई सारे लोग और संस्थाओं ने भी अय्यप्पा की सेवाएं लेना शुरू किया। 

अय्यप्पा ने वर्षा-जल संचयन, कम पानी के इस्तेमाल से खेती-बाड़ी की नयी, कारगर और बेहद फायदेमद तकनीकों से अब तक लाखों किसानों और दूसरे लोगों को फायदा पहुंचाया है। जल-संरक्षण के लिए समर्पित अय्यप्पा को उनकी समाज-सेवा और जन-आन्दोलन के लिए कई अवार्डों और पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। वे प्रतिष्टित जमनालाल बजाज राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किये जा चुके हैं। उनके चाहने वाले और उनकी तरकीबों से फायदा पाने वाले लोग उन्हें अब ‘पानी का डाक्टर’ कहकर बुलाते हैं। जिस तरह के काम कर अय्यप्पा ने पानी की बचत को लेकर जागरूकता अभियान चलाया है उसकी व्यापकता, विस्तार और कामयाबी को ध्यान में रखकर कुछ लोग उन्हें ‘जल-गांधी’ कहते हैं और उनकी तुलना महात्मा गांधी से करते हैं। कई लोग अब उन्हें 'आधुनिक भगीरथ' के नाम से भी जानते-पहचानते हैं 

अय्यप्पा के आन्दोलन से जुड़े आंकड़ों पर नज़र डाली जाय तब भी उनके काम की महत्ता का पता चलता है। वे जून, 2016 तक 7000 करोड़ लीटर बारिश के पानी का संचयन करवा चुके हैं। उन्होंने 500 से ज्यादा झीलें बनवाई हैं। 200 से ज्यादा शहरी अपार्टमेंट में वर्षा-जल संचयन परियोजना को लागू करवाया है। हज़ारों कुओं को पुनर्जीवित किया है। पचास से ज्यादा शैक्षणिक संस्थाओं और सत्तर से ज्यादा उद्योगों-कारखानों में बारिश के जल को संरक्षित करने के लिए भी सफलतापूर्वक परियोजना लागू की हैं।

अय्यप्पा नियमित रूप से अलग-अलग गाँवों और शहरों का दौरा कर लोगों में जल-संरक्षण के प्रति जागरूकता लाने का काम बिना रुके करते रहते हैं। अय्यप्पा की वजह से कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, गोवा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, पंजाब और राजस्थान राज्यों में लाखों किसान और दूसरे लोगों ने पानी की बचत कर अपने जीवन को तरक्कीनुमा, खुशहाल और सुखी बनाया है।

साल 2008 में अय्यप्पा ने ‘रेन वाटर कॉन्सेप्ट्स (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड’ नाम से एक कंपनी खोली। अय्यप्पा अपनी की कंपनी के ज़रिये अलग-अलग लोगों और संस्थाओं से फीस लेकर उन्हें पानी के बचत और सदुपयोग के तौर-तरीके बता रहे हैं।

अय्यप्पा की ख़ास बात ये है कि अगर मामला पानी का हो तो वे कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। उनके लिए न दिन मायने रखता है न रात। वे काम के लिए फौरी राजी हो जाते हैं। वे कहते हैं, “मेरा मिशन अभी पूरा नहीं हुआ है। मैं भारत को वो देश बनाना चाहता हूँ जहाँ पीने और सिंचाई के लिए पानी की किल्लत कभी न हो। मैं भारत में ऐसी स्थिति पैदा करना चाहता हूँ जहाँ आवश्यकता से अधिक पानी हो। भारत में कोई भी पानी को न तरसे।”

अय्यप्पा लोगों को सचेत करने से भी नहीं चूकते हैं। वे चेतावनी देते हुए कहते हैं, “अगर हम लोगों ने अभी से बारिश के पानी की बचत नहीं की और पानी का सही इस्तेमाल नहीं किया तो आने वाले दिनों में सारा देश बूँद-बूँद पानी को तरसेगा। पानी की बचत ही समय की मांग है।”

अय्यप्पा ये भी कहते हैं कि उनके जैसे कुछ कार्यकर्ताओं और आन्दोलनकारियों से पानी की बचत नहीं होगी। पानी की बचत सही मायने में तभी होगी जब देश का हर एक नागरिक पानी की बचत करेगा, पानी का संरक्षण करेगा। पानी का संरक्षण सिर्फ सरकारों या फिर कुछ संस्थाओं की ज़िम्मेदारी नहीं है बल्कि देश के हर नागरिक की ज़िम्मेदारी है।

बड़ी बात ये भी है कि अय्यप्पा ने अपने मिशन के तहत बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने की कामयाब कोशिश भी है। उन्होंने आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले में ये कामयाब प्रयोग किया है। अय्यप्पा ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर सूखाग्रस्त अनंतपुर जिले में अस्सी एकड़ ज़मीन खरीदी। ये ज़मीन ऐसी जगह खरीदी गयी जहाँ बारिश बहुत कम होती है और सारी ज़मीन पर पत्थरों के ढेर थे। लोग इसे बंजर भूमि करार देकर वहां से चले गए थे। आंध्रप्रदेश का अनंतपुर वो जिला है जहाँ राज्य के किसी भी जिले की तुलना में सबसे कम बारिश होती है। ऐसी जगह अय्यप्पा ने अपना प्रयोग शुरू किया। उन्होंने इस अस्सी एकड़ भूमि में कई सारे तालाब बनवाए। कई नए कुएं खुदवाए। पुराने सूखे कुओं को पुनर्जीवित किया। जब कभी बारिश हुई उसका सारा पानी बेकार जाने से बचाया। ये प्रयोग कामयाब भी हुआ। अय्यप्पा ने अपनी मेहनत से बंजर ज़मीन को उपजाऊ बना दिया। जहाँ एक पौधा भी जीवित नहीं रहता था वहां उन्होंने सब्जियां उगायीं। फलों के पेड़ लगाये। धान की भी खेती की और कर भी रहे हैं। अय्यप्पा का कहना है कि बंजर भूमि को उपजाऊ बनाना तभी संभव हुआ जब बारिश के पानी का संरक्षण किया गया। बारिश के पानी के सही संरक्षण से भू-जल का स्तर भी बढ़ा। 

अय्यप्पा बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने के इस कामयाब प्रयोग/ मॉडल को अब देश के अलग-अलग बंजर इलाकों में लागू करने की योजना बना रहे हैं। कई जगह उन्होंने ये काम शुरू भी कर दिया है।

दिलचस्प बात ये भी है कि एक समय अय्यप्पा को नालायक और पागल कहने वाली उनकी पत्नी अब अपने पति की कामयाबियों पर बहुत फक्र महसूस करती हैं। अय्यप्पा की तीनों बेटियाँ – सुजाता, सुनीता और निवेदिता अब जल जागरूकता अभियान में अपने पिता की मदद करती हैं। बेटा नवीनचंद्रा सिविल इंजीनियर हैं।

अय्यप्पा के ‘कंजूस’ और ‘खुदगर्ज़’ पिता महादेवप्पा सौ साल से भी ज्यादा जिए और उनकी मृत्यु जनवरी, 2016 में हुई।

अय्यप्पा के हाथों लोहे की सीख से ज़ख़्मी हुए सहपाठी बागली वीरभद्र इन दिनों गाँव में किराना की दूकान चला रहे हैं।  

एक बड़ी बात ये भी है कि अय्यप्पा  मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता और जन-आंदोलनकारी अन्ना हजारे और जल-आंदोलनों के जाने-पहचाने जाने वाले ‘जल-पुरुष’ डॉ. राजेंद्र सिंह से भी मिले और अपने आंदोलन को कामयाब बनाने के लिए उनसे सुझाव और मार्ग-दर्शन लिया। अय्यप्पा विदेश जाकर अलग-अलग देशों में पानी के बचत की योजनाओं और परियोजनाओं का अध्ययन भी करना चाहते हैं

अय्यप्पा एक और बहुत बड़ा काम कर रहे हैं। अपने जल-संरक्षण आन्दोलन के तहत वे गाँव-गाँव, शहर-शहर जाकर ‘जल योद्धा’ तैयार कर रहे हैं। अपने आस-पड़ोस के लोगों को जल-संरक्षण के महत्त्व को समझाना और साथ ही लोगों को जल-संरक्षण के आसान और कारगर तौर-तरीके अपनाने के लिए प्रेरित करना ही इन जल योद्धाओं की ज़िम्मेदारी है। 

कुछ और तसवीरों में पेश है अय्यप्पा के कामों की झलक

सूखी भूमि को पानी पहुँचाने की सोच को अमली जामा पहनाने की जुगत

साकार हुआ सपना..

हरे भरे खेत, जो कभी सूखे का शिकार थे....

बारिश के पानी को बचाने के लिए आज़माई जा रही है विभिन्न प्रकार की तकनीक....

जागरूकता लिए किया जा रहा है प्रचार....

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Dr Arvind Yadav is Managing Editor (Indian Languages) in YourStory. He is a prolific writer and television editor. He is an avid traveler and also a crusader for freedom of press. In last 20 years he has travelled across India and covered important political and social activities. From 1999 to 2014 he has covered all assembly and Parliamentary elections in South India. Apart from double Masters Degree he did his doctorate in Modern Hindi criticism. He is also armed with PG Diploma in Media Laws and Psychological Counseling . Dr Yadav has work experience from AajTak/Headlines Today, IBN 7 to TV9 news network. He was instrumental in establishing India’s first end to end HD news channel – Sakshi TV.

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