रैबिट फार्मिंग हो सकता है रोजगार का एक बेहतर विकल्प, कम समय में लाखों की कमाई

कम समय में कमाएं लाखों...

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हिमाचल, हरियाणा में रैबिट फॉर्मिंग ने किसानों और युवाओं के लिए एक सबसे मुनाफे के व्यवसाय की राह दिखाई है। रैबिट फॉर्मिंग कर रहे अनुभवी किसान बताते हैं कि इस धंधे में नफा ही नफा है। कुछ ही सप्ताह में लागत की दोगुनी लाखों की कमाई हो जा रही है।

फार्म में रखे गए खरगोश
फार्म में रखे गए खरगोश
एक खरगोश दिनभर में एक मुट्ठी फीड, एक मुट्ठी चारा और दो-तीन कटोरी पानी पीता है। चार महीने में खरगोश दो किलो से ज्यादा वजन का हो जाता है और फिर साढ़े तीन सौ से पांच सौ रुपए तक में बिक जाता है।

किसानों एवं बेरोजगार युवाओं के लिए एक कम लागत, कम समय में बड़े मुनाफे का धंधा चल पड़ा है रैबिट फॉर्मिंग। इसके ऊन और मीट से पांच-छह सप्ताह के भीतर लागत की दोगुनी कमाई हो जा रही है। खरगोश का मीट वसा की दृष्टि से स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी होता है। खरगोश के मीट में तुलनात्मक रूप से ज्यादा प्रोटीन, वसा और कैलोरी कम होती है। साथ ही इसका मीट आसानी से सुपाच्य होता है। इसमें कैल्शियम और फॉस्फोरस अधिक होता है। इसमें तांबा, जस्ता और लौह तत्व शामिल होते हैं। सभी उम्र के लोग इसका सेवन कर सकते हैं। दिल के मरीजों के लिए यह अत्यंत लाभप्रद माना जाता है। खरगोश को पिंजड़े में पाला जा सकता है, जो मामूली खर्च से तैयार हो जाता है।

खरगोशों को मौसमी परिस्थितियों जैसे तेज गर्मी, बरसात और कुत्‍तों, बिल्लियों से बचाने के लिए शेड आवश्‍यक होता है। शेड चार फिट चौड़ा, दस फिट लम्बा और डेढ़ फिट ऊंचा होना चाहिए। अब पार्टीशन देकर दो-बाइ-दो के दस बराबर बॉक्स बना लिए जाते हैं। शेड को ज़मीन से दो फिट ऊंचाई पर रखते हैं, जिससे खरगोश के अपशिष्ट सीधे ज़मीन पर गिरें। खरगोश को आसानी से उपलब्‍ध हरी पत्तियां, घास, गेंहू का चोकर, बचा भोजन आदि खिलाया जा सकता है। ब्रॉयलर खरगोशों में वृद्धि दर अत्‍यधिक उच्‍च होती है। वे तीन महीने की उम्र में ही दो से तीन किलो के हो जाते हैं। एक मादा तीस दिन में बारह बच्चे तक दे देती है। यह क्रम पांच वर्ष तक चलता रहता है। रैबिट फार्मिंग का पिछले कुछ सालों से कारोबार बढ़ता जा रहा है। सैकड़ों लोग इससे अच्‍छी कमाई कर रहे हैं। खरगोश को खास तौर से मीट और इसके ऊन के लिए पाला जाता है। छोटे स्‍तर पर भी चार लाख की लागत से सालाना आठ लाख तक की आराम से कमाई हो जा रही है।

जींद (हरियाणा) के संजय रोहतक रोड बाईपास पर करीब आधा एकड़ जमीन पर अपने रैबिट फॉर्म हाउस में छह प्रजातियों के पांच सौ से अधिक खरगोश पाल रहे हैं। मैट्रिक पास संजय बताते हैं कि हर पैंतालीस दिन बाद मादा खरगोश लगभग एक दर्जन बच्चों को जन्म दे देती हैं। एक खरगोश पचास से ढाई सौ रुपये तक में बिक जाता है। उन्होंने वर्ष 2008 में कर्नाटक से सिर्फ सौ खरगोश लाकर अपना व्यवसाय शुरू किया था। इसके बाद धीरे-धीरे खरगोशों की संख्या बढ़ती गई। दूर-दूर से लोग उनसे रैबिट फार्मिंग के बारे में जानकारी लेने आते हैं। इस कारोबार में अच्छी कमाई हो रही है। उनके यहां से हर महीने हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार समेत दूसरी यूनिवर्सिटी में भी रिसर्च के लिए खरगोश भेजे जाते हैं।

देशभर की पेट शॉप में उनके फार्म से खरगोश की सप्लाई होती है। रैबिट फार्मिंग में पोल्ट्री व्यवसाय से काफी कम खर्च और जोखिम है। एक खरगोश दिनभर में एक मुट्ठी फीड, एक मुट्ठी चारा और दो-तीन कटोरी पानी पीता है। चार महीने में खरगोश दो किलो से ज्यादा वजन का हो जाता है और फिर साढ़े तीन सौ से पांच सौ रुपए तक में बिक जाता है। रैबिट फार्मिंग के लिए सरकार पचीस-तीस प्रतिशत सब्सिडी भी देती है। पशु पालन सम्बन्धी किसी भी व्यवसाय में पालक का मुनाफा पल रहे पशु-पक्षी के भोजन के खर्च पर निर्भर करता है। मुर्गियों के विक्रय से प्राप्त कुल धन में से अस्सी प्रतिशत लागत उनके भोजन पर आ जाती है। खरगोश के भोजन पर आधा से भी कम खर्च आता है।

मुर्गियों की तरह खरगोशों की बिक्री में गिरावट भी नहीं आती है। चारे की व्यवस्था बहुत आसानी से हो जाती है। अब तो अच्छी बढ़ोतरी के लिए कुछ कंपनिया खरगोश के लिए विशिष्ट खाद्यान्न भी बनाने लगी हैं। खरगोश का मीट भारी मात्रा में विदेशों को निर्यात हो रहा है। इसके निर्यात में भारत अभी विश्व में तीसवें स्थान पर है हालाकि अभी तेजी से खरगोश पालन व्यवसाय भारत के सभी राज्यों में फ़ैल रहा है। भारतीय क़ानून के तहत भारतीय खरगोश को पकड़ना, मारना व रखना मना है लेकिन 1960 अधिनियम के तहत विदेशी खरगोश को पालने व रखने की अनुमति है।

रैबिट फार्म को यूनिट्स में बांटने के बाद एक यूनिट में सात मादा और तीन नर खरगोश रखे जाते हैं। दस यूनिट से फार्मिंग शुरू करने के लिए लगभग 4 से 4.5 लाख रुपए खर्च आते हैं। इसमें टिन शेड लगभग एक से डेढ़ लाख रुपए में, पिंजरे एक से सवा लाख रुपए में, चारा और इन यूनिट्स पर लगभग दो लाख रुपए खर्च आ जाते हैं। दस यूनिट खरगोश से पैंतालीस दिनों में तैयार बच्‍चों को बेचकर लगभग दो लाख तक की कमाई हो जाती है। इन्‍हें फार्म ब्रीडिंग, मीट और ऊन के लिए बेचा जाता है। साल भर में दस यूनिट से कम से दस लाख रुपए तक की कमाई हो जाती है।

हमीरपुर (हिमाचल) के गांव डमैणा के विपन कुमार सिंह वर्ष 2011 में बीकॉम करने के बाद छह साल तक नौकरियां खोजते रहे। जून 2017 में उन्होंने तीन महीने तक खरगोश पालने का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद बैंक से साढ़े चार लाख रुपये लोन लेकर हरियाणा से सौ खरगोश खरीद लाए। सबसे पहले शेड बनाया। कारोबार चल निकला। उन्होंने एक साल में ही बैंक का आधा लोन भी चुकता कर दिया। वह युवाओं को खरगोश पालन का प्रशिक्षण भी देते रहते हैं।

हिमाचल के ही गोहर (मंडी) में एक बार फिर अंगोरा खरगोश पालन को बढ़ाना देने के लिए निजी कंपनी के उद्योगपति सक्रिय हो गए हैं। देश-विदेश में अंगोरा खरगोश की ऊन की मांग एकाएक बढ़ गई है। अंगोरा खरगोश पालन में देश-विदेश में नाम कमाने वाले मंडी, कुल्लू और कांगड़ा जिलों में एक बार फिर इस व्यवसाय के दिन बहुर गए हैं। अंगोरा ऊन का भाव आजकल 1600 रुपये से लेकर 2000 रुपये किलो तक है। देश विदेश में अंगोरा ऊन का धागा, अंगोरा मफलर, अंगोरा टोपी और अंगोरा शॉल की बाजार में भारी मांग है। मंडी, कुल्लू, कांगड़ा में करीब दो हजार किसान अंगोरा खरगोश पालन से जुड़े हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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