लाखों का पैकेज ठुकराकर जरबेरा फूल की खेती कर रहे वैभव पांडेय

वैभव की तरह फूलों की खेती करे आप भी कमा सकते हैं लाखों...

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उच्च शिक्षा लेकर आजकल के युवा ग्रीन हाउसों में जरबेरा फूल की खेती करने लगे हैं। एक ऐसे ही युवा हैं गोंडा (उ.प्र.) के वैभव पांडेय। इन दिनो वह लाखों रुपए के पैकेज वाली नौकरी ठुकराकर अपने पिता के साथ ग्रीन हाउस में जरबेरा फूल की पहली फसल तैयार करन में जुटे हैं। जरबेरा के दस फूलों का एक बंडल कम से कम पचास रुपए तक में बिक जाता है। शादी-समारोहों के दौरान इसकी कीमत अस्सी रुपए तक मिल जाती है।

जरबेरा की खेती (सांकेतिक तस्वीर)
जरबेरा की खेती (सांकेतिक तस्वीर)
छत्तीस महीनों वाली इस फसल से लाखों का मुनाफा कमाया जा सकता है। इसके लिए प्रदेश सरकारें किसानों को पचास प्रतिशत तक अनुदान भी मुहैया करवा रही हैं। जरबेरा फ्लावर को एक बार लगाकर लगातार तीन वर्ष तक इससे कमाई की जा सकती है। 

हमारे देश की जलवायु ऐसी है, जहाँ सभी प्रकार के फूल उगाये जाते हैं किन्तु वर्तमान समय की विशेष आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नियंत्रित वातावरण में फूल उपजाए जाते हैं, जो समान्यतः खुले वातावरण में ठीक से नहीं उपजाए जा सकते हैं। ग्रीन हाउस एक ऐसा ढाँचा है, जो पारदर्शी या पारभासी शीट या कपड़े से ढंका होता है। यह इतना बड़ा पूर्णतया या अर्धवातावरणीय नियंत्रित होता है, जिसमें फूलों की अपेक्षित वृद्धि तथा उत्पादकता संभव रहती है। इसी ग्रीन हाउस ढांचे में अपना भविष्य देखा गोंडा (उ.प्र.) के वैभव पांडेय ने और आईसी इन्फोटेक नोएडा में लाखों रुपए का पैकेज ठुकरा कर चल पड़े जरबेरा के फूलों की खेती करने।

जरबेरा एक विदेशी और सजावटी फूल है, जो पूरी दुनिया में उगाया जाता है। इसे ‘अफ्रीकन डेजी’ या ‘ट्रांसवाल डेजी’ के नाम से भी जाना जाता है। इस फूल की उत्पत्ति अफ्रीका और एशिया महादेश से हुई है और यह ‘कंपोजिटाए’ परिवार से संबंध रखता है। भारतीय महाद्वीप में जरबेरा कश्मीर से लेकर नेपाल तक 1200 मीटर से लेकर 3000 मीटर की ऊंचाई तक पाया जाता है। इसकी ताजगी और ज्यादा समय तक टिकने की खासियत की वजह से इस फूल का इस्तेमाल पार्टियों, समारोहों और बुके में किया जाता है।

भारत के घरेलू बाजार में इसकी काफी अच्छी कीमत मिल जाती है। हमारे देश में जरबेरा फूल की खेती मुख्यतः पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक, गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल और अरुणाचलप्रदेश में हो रही है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में ग्रीन हाउस में जरबेरा फूल की खेती पहली बार गोंडा के वैभव पांडेय का परिवार कर रहा है। वैभव के पिता बच्चाराम पाण्डेय भी आरटीओ की नौकरी से रिटायर होकर गोण्डा-बहराइच मार्ग पर गांव मुंडेरवा कला में बेटे के साथ फूलों की खेती में जुट गए हैं। फूलों की खेती शुरू करने से पहले वैभव ने देवा (बाराबंकी) के मोइनुद्दीन सिद्दीकी से मिलकर इसकी पॉली फॉर्मिंग की विधि का प्रशिक्षण लिया।

छत्तीस महीनों वाली इस फसल से लाखों का मुनाफा कमाया जा सकता है। इसके लिए प्रदेश सरकारें किसानों को पचास प्रतिशत तक अनुदान भी मुहैया करवा रही हैं। जरबेरा फ्लावर को एक बार लगाकर लगातार तीन वर्ष तक इससे कमाई की जा सकती है। प्रति एकड़ इसके 28 हजार सीड लगाए जा सकते हैं। भोपाल के किसान जरबेरा के दस लाख से अधिक फूल रोजाना पैदा कर रहे हैं। दस फूलों का एक बंडल कम से कम पचास रुपए में बिक जाता है। शादी-समारोहों के दौरान इसकी कीमत अस्सी रुपए तक मिल जाती है।

पॉली फॉर्मिंग के लिए जरबेरा की अधिक उपजाऊ वाली संकर किस्में हैं- रुबी रेड, डस्टी, शानिया, साल्वाडोर, तमारा, फ्रेडोरेल्ला, वेस्टा और रेड इम्पल्स, सुपरनोवा, नाडजा, डोनी, मेमूट, यूरेनस, फ्रेडकिंग, फूलमून, तलासा और पनामा, कोजक, केरैरा, मारासोल, ऑरेंज क्लासिक और गोलियाथ, रोजलिन और सल्वाडोर, फरीदा, डालमा, स्नो फ्लेक और विंटर क्वीन, डेल्फी और व्हाइट मारिया, ट्रीजर और ब्लैकजैक, टेराक्वीन, पिंक एलीगेंस, एसमारा, वेलेंटाइन, मारमारा आदि। जरबेरा फूलों को उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय प्रदेश दोनों ही तरह की जलवायु में पैदा किया जा सकता है।

ऐसे फूलों की खेती उष्णकटिबंधीय जलवायु में खुले खेतों में की जा सकती है। ऐसे फूल पाला वाली स्थिति को लेकर संवेदनशील होते हैं, इनकी खेती पौधा घर (गरम घर), जालीदार पर्दा वाले घरों में उपोष्णकटिबंधीय या समशीतोष्ण जलवायु में की जाती है। जरबेरा की खेती के लिए दिन का सर्वोत्कृष्ट तापमान 20 डिग्री से 25 डिग्री सेंटीग्रेड और रात्रिकालीन तामपमान 12 डिग्री से 15 डिग्री सेंटीग्रेड के बीच आदर्श माना जाता है।

इन फूलों की खेती के लिए मिट्टी अच्छी तरह से सूखी, हल्की, उपजाऊ, हल्की क्षारीय या प्रकृति में तटस्थ होनी चाहिए। देसी हल या ट्रैक्टर से खेत की तीन बार अच्छी तरह से जुताई करने के बाद क्यारी को 30 सेमी ऊंचा, एक मीटर से डेढ़ मीटर तक चौड़ा और दो क्यारियों के बीच 35 सेमी से 50 सेमी की जगह छोड़ते हुए उसमें अच्छी तरह से गली हुई फार्म की खाद, बालू और धान की भूसी को 2:1:1 के अनुपात में मिलाकर डाल देना चाहिए। तैयार की गई मिट्टी की क्यारियों को मिथाइल ब्रोमाइड (30 ग्राम प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र) का घोल या दो फीसदी फोरमेल्डिहाइड (प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में 5 लीटर पानी में 100 एमएल फोरमोलिन) का घोल या मिथाइल ब्रोमाइड (30 ग्राम प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र) के घोल से धुंआ करना चाहिए। धुंआ किए गए क्यारियों को एक प्लास्टिक शीट से कम से कम तीन से चार दिनों के लिए ढंक दें।

क्यारियों से रसायन को निकालने के लिए इसमे पानी डालना चाहिए। जरबेरा की खेती वसन्त ऋतु के साथ-साथ ग्रीष्म ऋतु में भी की जा सकती है। इसकी पौध को अधिक रोशनी की जरूरत होती है। इसकी रोपाई जनवरी से मार्च के बीच की जाती है। फूल की अच्छी बढ़त और बेहतरीन पैदावार के लिए खेत में भरपूर मात्रा में जैव खाद आदि पोषक तत्व इस्तेमाल करना जरूरी रहता है। पौधारोपन के तुरंत बाद सिंचाई की जरूरत होती है। पौधारोपण के साथ ही तीन महीने तक दो सप्ताह में एक बार घास-फूस नियंत्रण करना चाहिए। इसके फूलों की बाजार में भारी डिमांड रहती है। तभी तो वैभव पांडेय ने इसके लिए लाखों के पैकेज की नौकरी को ठोकर मार दी।

वैभव पांडेय ने इसी साल जनवरी-फरवरी में एक हजार वर्ग मीटर में ग्रीन हाउस का स्ट्रक्चर खड़ा किया। दो लाख से अधिक रुपए खर्च कर बंगलुरु की फ्लोरेंस फ्लोरा कंपनी से फ्लाइट द्वारा इसके साढ़े छह हजार पौधे मंगवा कर रोप दिए। अभी पहली फसल है। आगे वह अन्य तरह के फूलों की भी खेती करने वाले हैं। वह अपनी ताजा पैदावार को लखनऊ की फूल मंडियों में सप्लाई करना चाहते हैं। जो कोई भी ग्रीन हाउस में इस फूल की खेती करना चाहे, उसे इस बात की भी जानकारी जरूरी रहती है कि पालमपुर (हिमाचल प्रदेश) में ग्रीन हाउस में पौधों को उगाने के लिए एक अनुसन्धान केंद्र स्थापित किया गया है।

प्रत्येक पुष्प के पुष्पन का एक निश्चित समय होता है इसलिए समान्य क्रियाओं का ज्ञान जो पुष्पन को प्रभावित करता है प्राथमिक आवश्कता है। ग्रीन हाउस का ढाँचा अल्युमिनियम या कलाईदार स्टील का बनाया जाता है। इस प्रकार कई तरह के ग्रीन हाउस बनाए जाते हैं - धरातल से धरातल ग्रीन हाउस, गैवल टाइप ग्रीन हाउस तथा कोनिया टाइप ग्रीन हाउस। इनके मध्य की उंचाई 3 मीटर रखी जाती है। लोहा के पाइप को मोड़कर 3-4 मीटर की अंतर पर लगाया जाता है। इनके मध्य में इस प्रकार जोड़ा जाता है कि आर्क का आकार ले। निचली सुरंग की बनावट में सुरंगे 1-1.6 मीटर ऊँची होती है। इन्हें स्टील की नलिकाओं या बांस को मोड़कर गोल आकार दिया जाता है और स्वच्छ पोलीथिन से ढँक दिया जाता है। इन्हें इस तरह बनाने में लागत कम आती है।

जरबेरा की खेती के लिए ग्रीन हाउस निर्माण पर उसके टाइप के अनुसार खर्च आता है। ग्रीन हाउस का नेट बनवाने में ढाई-तीन सौ रुपए प्रति मीटर, प्राकृतिक ग्रीन हाउस-एलडीपीई की छत में साढ़े चार सौ से पांच सौ रुपए तक प्रति वर्गमीटर, फैन और पैड शीतलित ग्रीन हाउस- एलडीपीई की छत में सौ रुपए प्रति वर्गमीटर, फैन और पैड शीतलित ग्रीन हाउस बनवाने में दो से तीन हजार रुपए प्रति वर्गमीटर का खर्च आता है। इस समय जरबेरा फूलों की खेती में उत्तर प्रदेश का बाराबंकी जिला सबसे आगे चल रहा है। यहां सर्वाधिक ग्रीन हाउसों में ही जरबेरा की खेती हो रही है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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