जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की

हिन्दी साहित्य में होली...

0

मथुरा की होली सबसे निराली। होलिका दहन पूर्ण चंद्रमा (फाल्गुन पूर्णिमा) के दिन ही प्रारंभ होता है। माघ पूर्णिमा को 'एरंड' या गूलर वृक्ष की टहनी को गाँव के बाहर किसी स्थान पर गाड़ दिया जाता है, और उस पर लकड़ियाँ, सूखे उपले, खर-पतवार आदि चारों से एकत्र किया जाता है और फाल्गुन पूर्णिमा की रात या सायंकाल इसे जलाया जाता है। 

सांकेतिक तस्वीर (फोटो साभार- सोशल मीडिया)
सांकेतिक तस्वीर (फोटो साभार- सोशल मीडिया)
उर्दू साहित्य में होली का अपना अलग महत्व है। मुग़ल काल में रचे गए उर्दू साहित्य में दाग़ देहलवी, हातिम, मीर, कुली कुतुबशाह, महज़ूर, बहादुर शाह ज़फ़र, नज़ीर, आतिश, ख्वाजा हैदर अली 'आतिश', इंशा और तांबा जैसे कई नामी शायरों ने होली की मस्ती और राधा कृष्ण के निश्छल प्यार को अपनी शायरी में ख़ूबसूरती से पिरोया है।

रंग-पर्व होली की पौराणिक मान्यताएं चाहे जितनी तरह की हों, अब इसकी वैश्विक गरिमा और खुशहाली भी शब्दों के खुमार में इतराती रहती है। इसकी आस्था का आख्यान हिरण्यकशिपु की बहन होलिका के दहन और शमन कथानक को बरबस स्मृतियों तक खींच लाता है लेकिन रसिक जनों को सुख की होली तो शब्दों में, साहित्य में ही रमण का संदेश देती है, जैसे कि महान शायर नज़ीर अकबराबादी के शब्दों में होली की झमक 

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की,
और डफ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की,
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की,
खुम, शीशे जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की,
महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की।
हो नाच रंगीली परियों का, बैठे हों गुलरू रंग भरे,
कुछ भीगी तानें होली की, कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग भरे,
दिल फूले देख बहारों को, और कानों में अहंग भरे,
कुछ तबले खड़कें रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे,
कुछ घुंगरू ताल छनकते हों, तब देख बहारें होली की।
गुलजार खिले हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो,
कपड़ों पे रंग के छिंटों से खुशरंग अजब गुलकारी हो,
मुँह लाल गुलाबी आँखें हों और हाथों में पिचकारी हो,
इस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो,
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।

मथुरा की होली सबसे निराली। होलिका दहन पूर्ण चंद्रमा (फाल्गुन पूर्णिमा) के दिन ही प्रारंभ होता है। माघ पूर्णिमा को 'एरंड' या गूलर वृक्ष की टहनी को गाँव के बाहर किसी स्थान पर गाड़ दिया जाता है, और उस पर लकड़ियाँ, सूखे उपले, खर-पतवार आदि चारों से एकत्र किया जाता है और फाल्गुन पूर्णिमा की रात या सायंकाल इसे जलाया जाता है। अग्नि के चारों ओर नृत्य, संगीत का ग्वाल-बाल आनन्द लेते हैं लेकिन अवधी क्षेत्र में जाइए तो वहां के सर्ररररररररर टेक से बंधे होली गीत मौसम में अपने अलग ही रंग बरसाते नजर आते हैं। तब साहित्य में अवधी के शीर्ष कवि कैलाश गौतम के वासंती दोहे हमारी स्मृतियों में ताजा हो उठते हैं -

गोरी धूप कछार की हम सरसों के फूल ।
जब-जब होंगे सामने तब-तब होगी भूल ।।
लगे फूँकने आम के बौर गुलाबी शंख ।
कैसे रहें क़िताब में हम मयूर के पंख ।।
दीपक वाली देहरी तारों वाली शाम ।
आओ लिख दूँ चँद्रमा आज तुम्हारे नाम ।।
हँसी चिकोटी गुदगुदी चितवन छुवन लगाव ।
सीधे-सादे प्यार के ये हैं मधुर पड़ाव ।।
कानों में जैसे पड़े मौसम के दो बोल ।
मन में कोई चोर था, भागा कुंडी खोल ।।
रोली-अक्षत छू गए खिले गीत के फूल ।
खुल करके बातें हुई मौसम के अनुकूल ।।
पुल बोए थे शौक से, उग आई दीवार ।
कैसी ये जलवायु है, हे मेरे करतार ।।

पहले होली को होलाका नाम से मनाया जाता था। काठकगृह्य में एक सूत्र है- राका होला के, जिसकी व्याख्या टीकाकार देवपाल ने की है- होला एक कर्म-विशेष है जो स्त्रियों के सौभाग्य के लिए सम्पादित होता है, उस कृत्य में राका देवता है। अन्य टीकाकारों ने इसकी व्याख्या अन्य रूपों में की है। होलाका उन बीस क्रीड़ाओं में एक है जो सम्पूर्ण भारत में प्रचलित है। एक अन्य पुराण में फाल्गुन पूर्णिमा को फाल्गुनिका कहा गया है। ईसा से शताब्दियों पूर्व 'होलाका' का उत्सव प्रचलित था। भविष्योत्तर पुराण इसे वसन्त से जोड़ता है। अत: यह उत्सव पूर्णिमान्त गणना के अनुसार वर्ष के अन्त में होता था।

अत: होलिका हेमन्त या पतझड़ के अन्त की सूचक है और वसन्त की प्रेममय लीलाओं की द्योतक है। मस्ती भरे गाने, नृत्य एवं संगीत वसन्तागमन के उल्लासपूर्ण क्षणों के परिचायक हैं। वसन्त की आनन्दाभिव्यक्ति रंगीन जल एवं लाल रंग, अबीर-गुलाल के पारस्परिक आदान-प्रदान से प्रकट होती है। कुछ प्रदेशों में यह रंग युक्त वातावरण 'होलिका के दिन' ही होता है, किन्तु दक्षिण में यह होलिका के पाँचवें दिन (रंग-पंचमी) मनायी जाती है। कहीं-कहीं रंगों के खेल पहले से आरम्भ कर दिये जाते हैं और बहुत दिनों तक चलते रहते हैं। कवि हरिवंशराय बच्चन कुछ इस तरह अपने शब्दों में होली का चित्र खींचते हैं -

तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।
देखी मैंने बहुत दिनों तक
दुनिया की रंगीनी,
किंतु रही कोरी की कोरी
मेरी चादर झीनी,
तन के तार छूए बहुतों ने
मन का तार न भीगा,
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।
अंबर ने ओढ़ी है तन पर
चादर नीली-नीली,
हरित धरित्री के आँगन में
सरसों पीली-पीली,
सिंदूरी मंजरियों से है
अंबा शीश सजाए,
रोलीमय संध्या ऊषा की चोली है।

कहते हैं न कि फागुनी खुमार पर चढ़ै न दूजो रंग। प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूपों का विस्तृत वर्णन है। श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह रास का वर्णन है। अन्य रचनाओं में 'रंग' नामक उत्सव का वर्णन है जिनमें हर्ष की प्रियदर्शिका व रत्नावली तथा कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् शामिल हैं। कालिदास रचित ऋतुसंहार में पूरा एक सर्ग ही 'वसन्तोत्सव' को अर्पित है। भारवि, माघ और अन्य कई संस्कृत कवियों ने वसन्त की खूब चर्चा की है। चंदबरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में होली का वर्णन है।

भक्तिकाल और रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली और फाल्गुन माह का विशिष्ट महत्व रहा है। आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, मलिक मुहम्मद जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद आदि अनेक कवियों को यह विषय प्रिय रहा है। महाकवि सूरदास ने बसन्त एवं होली पर 78 पद लिखे हैं। पद्माकर ने भी होली विषयक प्रचुर रचनाएँ की हैं। सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, अमीर ख़ुसरो और बहादुरशाह ज़फ़र जैसे मुस्लिम संप्रदाय का पालन करने वाले कवियों ने भी होली पर सुंदर रचनाएँ लिखी हैं जो आज भी जन सामान्य में लोकप्रिय हैं। आधुनिक हिंदी कहानियों में प्रेमचंद की राजा हरदोल होली कथा के रूप में लोकप्रिय है।

उर्दू साहित्य में होली का अपना अलग महत्व है। मुग़ल काल में रचे गए उर्दू साहित्य में दाग़ देहलवी, हातिम, मीर, कुली कुतुबशाह, महज़ूर, बहादुर शाह ज़फ़र, नज़ीर, आतिश, ख्वाजा हैदर अली 'आतिश', इंशा और तांबा जैसे कई नामी शायरों ने होली की मस्ती और राधा कृष्ण के निश्छल प्यार को अपनी शायरी में ख़ूबसूरती से पिरोया है। अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के शब्दों में होली की मस्ती का अपना अलग रंग रहा। भक्तिकाल के महाकवि घनानंद ने होली की मस्ती को 'प्रिय देह अछेह भरी दुति देह, दियै तरुनाई के तेह तुली' से तुक देते हैं तो महाकवि पद्माकर ने कृष्ण और राधा की होली की मस्ती इस तरह बिखेरते हैं -

फाग की मीर अमीरनि ज्यों, गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी,
माय करी मन की पद्माकर, ऊपर नाय अबीर की झोरी।
छीन पितंबर कम्मर ते, सुबिदा दई मीड कपोलन रोरी,
नैन नचाय मुस्काय कहें, लला फिर अइयो खेलन होरी।

राजस्थान में तीन प्रकार की होली होती है। माली होली। इसमें माली जात के पुरुष, स्त्रियों पर पानी डालते हैं और बदले में औरतें लाठियों से पुरुषों की पिटाई करती हैं। इसके अलावा गोदाजी की गैर होली और बीकानेर की डोलची होली भी प्रसिद्ध हैं। पंजाब में होली को 'होला मोहल्ला' कहते हैं और इसे निहंग सिख मानते हैं। इस मौके पर खूब घुड़सवारियां और तलवारबाज़ियां होती हैं। हरियाणा की होली बरसाने की लट्ठमार होली जैसी ही होती है। बस फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि यहाँ देवर, भाभी को रंगने की कोशिश करते हैं और बदले में भाभी देवर की लाठियों से पिटाई करती है। यहाँ होली को 'दुल्हंदी' भी कहते हैं। दिल्ली की होली तो सबसे निराली है क्योंकि राजधानी होने की वजह से यहाँ पर सभी जगह के लोग अपने ढंग होली मानते हैं जो आपसी समरसता और सौहार्द का स्वरूप है। दिल्ली में नेताओं की होली की भी ख़ूब धूम होती है। देश के जाने-माने कवि दिनेश शुक्ल रंग-पर्व को इन शब्दों से सराबोर करते हैं -

कौन रंग फागुन रंगे, रंगता कौन वसंत।
प्रेम रंग फागुन रंगे, प्रीत कुसुंभ वसंत।।
चूड़ी भरी कलाइयाँ, खनके बाजू-बंद।
फागुन लिखे कपोल पर, रस से भीगे छंद।
फीके सारे पड़ गए, पिचकारी के रंग।
अंग-अंग फागुन रचा, साँसें हुई मृदंग।।
धूप हँसी बदली हँसी, हँसी पलाशी शाम।
पहन मूँगिया कंठियाँ, टेसू हँसा ललाम।।
कभी इत्र रूमाल दे, कभी फूल दे हाथ।
फागुन बरज़ोरी करे, करे चिरौरी साथ।।
नखरीली सरसों हँसी, सुन अलसी की बात।
बूढ़ा पीपल खाँसता, आधी-आधी रात।।
बरसाने की गूज़री, नंद-गाँव के ग्वाल।
दोनों के मन बो गया, फागुन कई सवाल।।

होली पर रंगों का अपना अलग ही महत्व है। इस वैज्ञानिक शोध भी सामने आ चुके हैं। रंगों से कपल्स के जीवन में एक नया बदलाव देखने को मिला है। रिसर्चर से पता चला है कि रंग हमारे तनाव को सोखते हैं। कमरे में पेस्टल कलर की पेंटिग या फिर पर्दों का रंग पेस्टल है तो यह तनाव कम कर देता है। हरा रंग रिश्तों को मजबूत करता है। इंडिगो बेडरूम के लिए सबसे अच्छा कलर माना गया है। नारंगी रंग हर तरीके से कुछ नया करने के लिए प्रोत्साहित करता है। ऐसे में सब पर भारी पड़ता है फागुन का रंग, लेकिन इसकी खुशहालियों में एक रंग दुखियारी दुनिया का भी घुला रहता है। जिनके पास रुपए-पैसे, धन-सम्पत्ति नहीं होती है, उनकी होली का रंग मेरी इस रचना में देखिए -

बिना जंग के जैसे सीने में गोली, गरीबों की होली, गरीबों की होली।
इधर से सलाखें, उधर से सलाखें, सुबकते सुबकते हुईं लाल आंखें,
सिलेंडर मिलेगा तो गुझिया बनेगी, रखे रह गए ताख पर झोला-झोली,
गरीबों की होली, गरीबों की होली...
न हलुआ, न पूरी, मुकद्दर सननही, थके पांव दोनो, फटी-चीथ पनही,
लिये हाथ में अपने झाड़ू या तसला, सुनाये किसे जोंक-जीवन का मसला,
न कुनबा, न साथी-संघाती, न टोली, बीना आग-राखी, बिना रंग-रोली,
गरीबों की होली, गरीबों की होली...
न मखमल का कुर्ता, न मोती, न हीरा, रटे रात-दिन बस कबीरा-कबीरा,
रहा देखता सिर्फ सपने पुराने, नहीं जान पाया मनौती के माने,
मुआ फाग बोले अमीरो की बोली, ये दिन, कांध जैसे कहारों की डोली,
गरीबों की होली, गरीबों की होली...

यह भी पढ़ें: ख़ास क़िस्म का गुड़ बनाने के लिए मशहूर है तमिलनाडु का यह गांव, हर घर में होता है उत्पादन

यदि आपके पास है कोई दिलचस्प कहानी या फिर कोई ऐसी कहानी जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो आप हमें लिख भेजें editor_hindi@yourstory.com पर। साथ ही सकारात्मक, दिलचस्प और प्रेरणात्मक कहानियों के लिए हमसे फेसबुक और ट्विटर पर भी जुड़ें...

पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

Related Stories

Stories by जय प्रकाश जय